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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

साखी .... भाग - 27 / संत कबीर


जन्म  --- 1398

निधन ---  1518

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे । 

दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रौवे ॥ 261 ॥


परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ । 

सो बूटी पाऊँ नहीं, जातैं जीवनि होइ ॥ 262 ॥


पूत पियारौ पिता कौं, गौहनि लागो घाइ । 

लोभ-मिठाई हाथ दे, आपण गयो भुलाइ ॥ 263 ॥


हाँसी खैलो हरि मिलै, कौण सहै षरसान । 

काम क्रोध त्रिष्णं तजै, तोहि मिलै भगवान ॥ 264 ॥ 


जा कारणि में ढ़ूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ । 

धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकौं पाइ ॥ 265 ॥


पहुँचेंगे तब कहैगें, उमड़ैंगे उस ठांई । 

आजहूं बेरा समंद मैं, बोलि बिगू पैं काई ॥ 266 ॥


दीठा है तो कस कहूं, कह्मा न को पतियाइ । 

हरि जैसा है तैसा रहो, तू हरिष-हरिष गुण गाइ ॥ 267 ॥


भारी कहौं तो बहुडरौं, हलका कहूं तौ झूठ । 

मैं का जाणी राम कूं नैनूं कबहूं न दीठ ॥ 268 ॥


कबीर एक न जाण्यां, तो बहु जाण्यां क्या होइ । 

एक तै सब होत है, सब तैं एक न होइ ॥ 269 ॥


कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ । 

नैनूं रमैया रमि रह्मा, दूजा कहाँ समाइ ॥ 270 ॥


2 टिप्‍पणियां:



  1. कबीर एक न जाण्यां, तो बहु जाण्यां क्या होइ ।

    एक तै सब होत है, सब तैं एक न होइ ॥ 269 ॥

    अर्थात अनेकता में एकता नहीं है ,एकता (एक से )में अनेकता है (अनेक हैं ).....यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
    लम्पटता के मानी क्या हैं ?
    .

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