शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

साखी ----- भाग - 26 / संत कबीर

जन्म  --- 1398

निधन ---  1518


कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ । 

फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ ॥ 251 ॥



लंबा मारग, दूरिधर, विकट पंथ, बहुमार ।

कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार ॥ 252 ॥



बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ । 

राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ ॥ 253 ॥ 




यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं । 

लेखणि करूं करंक की, लिखी-लिखी राम पठाउं ॥ 254 ॥



अंदेसड़ा न भाजिसी, सदैसो कहियां । 

के हरि आयां भाजिसी, कैहरि ही पास गयां ॥ 255 ॥



इस तन का दीवा करौ, बाती मेल्यूं जीवउं ।

लोही सींचो तेल ज्यूं, कब मुख देख पठिउं ॥ 256 ॥



अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि । 

जीभड़ियाँ छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि ॥ 257 ॥



सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त ।

और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त ॥ 258 ॥



जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ । 

मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ ॥ 259 ॥



कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त ।

बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व ॥ 260 ॥


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अच्छी प्रस्तुति

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  2. Aajkal jaisi meree mansik halat hai,Kabeer ko padhna manko bada sukoon deta hai.

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  3. बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ ।
    राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ ॥


    कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रुढियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रुढिवाद तथा कट्टपरंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर की वाणी उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी में देखें जा सकते हैं। कबीर के जीवन दर्शन से परिचित कराती आपकी यह पोस्ट अच्छी लगी। आशा है कि आप इस पोस्ट की निरंतरता बनाए रखेंगी । धन्यवाद ।

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  4. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित
    है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है,
    पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी
    किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री
    भी झलकता है...

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.

    .. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से
    मिलती है...
    My web page - संगीत

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