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रूपांतर :: मनोज कुमार |
अब क्या बताएं.... इतने दिन हो गए शहर का धुंआ खाते पर दिल है कि मानता नहीं.... अब भी सरपट दौड़ जाता है गाँव की ओर। हां, गाँव की बात ही कुछ और है। मनमोहक हरियाली, लज्जा का आवरण ओढ़े महिलाएं, मिलनसार बुजुर्ग, छैल छबीले युवक मंडली... मतलब एक अलग तरह क अल्हड़पन होता है, गाँव के परिवेश में। यहाँ शहर में तो एक छोटा-सा का घर होता है, एक रसोई पकाने का कोना और एक ही गुशलखाना। और उसी में स्त्री-पुरुष सब लाइन लगाए रहते हैं। एक अन्दर है तो दूसरा बाहर से दरवाजा पीट रहा है। और अपने गाँव में देखो कितनी आजादी रहती है।
अब उसी दिन की बात लीजिये न। हम बहुत दिनों बाद गए थे अपने गाँव। अब तो बताने में थोड़ा संकोच भी हो रहा है। एकदम सुबह-सुबह.... नीले गगन के तले... सुबह के पांच बजे... हाथ में लोटा... लोटा में पानी गाछी की ओर चले। अच्छा गाँव की एक और खासियत है। शहर में भले कोई शुभ कार्य में भी साथ ना दे मगर गाँव में गाछी जाने के समय भी आपको दो-चार साथी मिल ही जायेंगे। हमें भी मिल गए। और बहुत दिनों बाद गए थे सो हाल-समाचार पूछते-पाछते बढ़ चले गाछी की ओर। दोनों तरफ़ लहलहाते खेत और बीच मे एकदम संकड़ी पगडंडी। उसी पर हम लोग बिल्कुल रेल-गाड़ी के डब्बे की तरह लाइन से चले जा रहे थे। उधर से अब्दुल चाचा गाछी से निपट कर लौट रहे थे। इसबार कमर थोड़ी झुक गई है। चश्मा की एक डंडी की जगह सुतली बाँध कर कान पर चढ़ाए हुए हैं लेकिन बूढी आँखों में अब भी पुराना स्नेह चमक रहा है। माटी का बधना (एक प्रकार का लोटा जिसमे पानी निकलने के लिए टोटी लगी होती है) पकड़े हुए कमजोर हाथ काँप रहा था। आमना-सामना हुआ... दुआ-सलाम भी। लेकिन सुबह के समय ज्यादा देर तो ठहराव नहीं हो सकता है न सो आगे बढ़ने लगे। लेकिन पतली पगडंडी पर क्रोसिंग कैसे हो ? हम तो किसी तरह साइड कटा के निकल लिए... लेकिन पीछे और भी लोग थे और इधर संभाल-संभाल कर कदम उठाते और रखते अब्दुल चच्चा। एक-दो लड़के तो निकल लिए पर गनेसिया पता नहीं कैसे टकरा गया? अब्दुल चाचा को तो रामभरोस ने संभाल लिया लेकिन उनके हाथ से बधना छूट गया। बधना बेचारा पगडंडी पर ऐसे चारो खाने चित्त गिरा की दुबारा उठ नहीं पाया। बेचारे का इहलीला समाप्त होय गया। लेकिन यह क्या... दुर्घटना के शिकार बधना को जमीन पकड़े देख अब्दुल चाचा रामभरोस का हाथ झटक धम्म से खेत में ही बैठ गए... और लगे रोने। मेरा तो कलेजा मुंह को आ गया.... ये अब्दुल चाचा को क्या हो गया... ? झट से पीछे मुड़ के गए उनके पास। चाचा तो एकदम कलेजा पीट-पीट कर आठ-आठ आंसू रो रहे थे। हम पूछे क्या हुआ चाचा ?
चाचा चिग्घारते हुए बोले, "रे बाबू रे बाबू.... हमारा बधना चला गया रे....! दस बरस से हमारे साथ था...! अपना-पराया सब साथ छोड़ दिया.... पर ई बधना अभी तक निबाह रहा था.... ई गनेसिया हमारे बधना की जिन्दगी छीन लिया रे बेटा.... अब हम क्या लेकर रहेंगे रे बाबू... ! ई रमभरोसिया.... रे तू हमको काहे बचाया... मरने देता हमको गिर कर.... हमारे बधना को तो बचा लेता रे मुद्दैय्या.... अब हम क्या लेकर रहेंगे रे बाप!''
हमने देखा हे भगवान! .... अब्दुल चाचा तो ऐसा विलाप कर रहे हैं मानों बधना नहीं चच्ची हो। फिर भी हम अपना गीता-ज्ञान बघारने लगे। उको समझाए। "क्या चाचा आप भी इतना समझदार होकर इअस मामूली बधना के लिए रो रहे हैं...? इन चीजों का तो आना-जाना लगा रहता है। अभी आपको कुछ हो जाता तो?"
चाचा आंसू से तर-बतर घिघियाते हुए बोले, "मर जाने दो हमें... अब बधना बिना भी क्या जीना.... !"
हम बोले, "अरे चच्चा ! बधना का क्या है, एक गया दूसरा आएगा...। चलिए अभी कारी पंडित से नया बधना आपको ख़रीद देते हैं। रोइए मत।"
इस पर अब्दुल चाचा अपना आंसू पोछते हुए बोले, "न रे बेटा.... बात नया बधना का नहीं है। नया तो मिलिए जाएगा। पर हमरा वो बधना तो नहीं ही मिलेगा न। उसकी बात जुदा थी। वह हमारा सब कुछ देखा हुआ था... हम उसका देखे हुए थे। अब तो जो दूसरा आएगा... वह भी हमरा सब कुछ देख लेगा और पता नहीं इअस बधना जैसे पचा के रखेगा कि हमारा तन देख कर समूचे गाँव मे चुगली कर देगा...!"
हम्म्म्म.... अब हमारी समझ में आया कि चाचा फजूल का नहीं रो रहे थे। बात में तो दम था। हमारे पीछे लड़का लोग "चाचा के तन बधना देखा... बधना के तन चाचा!" कह-कह के ताली पीट कर हंस रहा था। हम सब को डांटे। सब चुप हुए। फिर चाचा को किसी तरह सांत्वना दिला कर गाँव का रास्ता पकराए।
तभी लखना कहने लगा, "बूढा सठिया गया है। बधना के लिए भी कोई ऐसे रोता है ???”
हम उसको समझाए, "धुर्र बुरबक! समझा नहीं... चाचा के तन ई बधना देखा और बधना के तन चच्चा देखे थे। मतलब चाचा बधना के लिए नहीं रो रहे थे। बधना तो सच में फिर से आ जाएगा.... मगर क्या पता वो भी इसी बधने की तरह वफादार होगा? इस बधने पर जो उनका विश्वास था उसके लिए रो रहे थे चाचा। सच ही तो कह रहे थे चाचा कि अब तो जो नया आएगा वह भी चाचा का सबकुछ देखेगा... लेकिन क्या पता कि उसी पुराने बधने की तरह भरोसेमंद होगा... ?”
तब सब लड़कों के समझ मे आयी चाचा की बात। और उसी दिन से ये कहाबत भी बन गयी।
नए के प्रति अंदेशा और पुराने वफादार के प्रति विश्वास व्यक्त करने के लिए, लोग अक्सर इस कहावत का प्रयोग करते हैं।
उड़ गई चिडि़या,
ऐडगर ऐलन पो के शब्द लें तो कह सकते हैं कि
खोलता हूँ
आपको गोनू झा के किस्से तो मालूम ही होंगे। यदि नहीं मालूम है तो कोई बात नहीं। हम फिर से कह देते हैं। वही कमला-बलान के किनारे मिथिला का प्रसिद्ध गाँव है, भरवारा। उस गांए के बड़े पोखर के सामने जो ऊंचा आवास है न.... वह गोनू झा का ही है। गोनू झा की चालाकी के किस्से तो मिथिलांचल क्या अगल-बगल के क्षेत्र में भी एक युग से प्रचलित है। गोनू झा किसी स्कूल-कॉलेज में पढ़े नहीं. थे .. वे तो मिथिला का एक सीधा-सादा किसान थे। लेकिन हाज़िरजवाबी और चतुराई में बड़े-बड़े विद्वान को धूल चटा देते थे। 
पक्षियों का प्रवास-2
इन विदेशी मेहमानों का सफरनामा भी कम रोचक नहीं है। आखिर कैसे ये निरीह अपना कार्यक्रम, देश व दिशा तय करते हैं? बत्तख (डक्स), सामुद्रिक (गल्स) एवं समुद्र तटीय पक्षी रात या दिन किसी भी समय अपनी यात्रा करते हैं। पर कुछ पक्षी जैसे कौए, अबाबील, रोबिन, बाज, नीलकंठ, क्रेन, मुर्गाबी (लून्स), जलसिंह (पेलिकन्स), आदि केवल दिन में ही उड़ान भरते हैं। अपनी लम्बी उड़ान के दौरान ये कुछ देर के लिए उचित जगह पर चारे की खोज में रुकते हैं। किन्तु अबाबील और बतासी तो अपने आहार कीट-पतंगों को उड़ते-उड़ते ही पकड़ लेते हैं। दिन में उड़ने वाले पक्षी झुंड में चलते हैं। बत्तख, हंस एवं बगुले में झुंड काफी संगठित होता है। इन्हें टोली का नाम दिया जा सकता है। जबकि अबाबील का झुंड काफी बिखरा-बिखरा होता है।
अधिकांश पक्षी रात में ही लंबी यात्रा करना पसंद करते हैं। इस श्रेणी में बाम्कार (थ्रशेज), एवं गोरैया (स्पैरो) जैसे छोटे-छोटे पक्षी आते हैं। ये अंधेरे में अपने शत्रुओं से बचते हुए यात्रा करते हैं। इसके अलावा एक और बात महत्त्वपूर्ण है, यदि ये पक्षी दिन में यात्रा करें तो रात होते-होते काफी थक जाएंगे। अतः अगली सुबह ऊर्जाहीन इन पक्षियों को अपने आहार प्राप्त करने में काफी दिक़्क़त होगी। यह उनके लिए प्राणघातक भी साबित हो सकता है। जबकि रात को चलते हुए सवेरा होते-होते ये उचित जगह पर थोड़ा विश्राम भी कर लेते हैं, फिर भोजनादि की तलाश में जुट जाते हैं। रात होते ही आगे की यात्रा पर पुनः निकल पड़ते हैं।
अपनी प्रवासीय यात्रा के दौरान ये पक्षी कितनी दूरी तय करते हैं यह उनकी स्थानीय परिस्थिति एवं प्रजाति के ऊपर निर्भर करता है। इनके द्वारा तय की गई यात्रा की दूरी मापने के लिए पक्षी विज्ञानी इन्हें बैंड लगा देते हैं या फिर इनके ऊपर रिंग लगा देते हैं। फिर जहां वे पहुंचते हैं, उसका उन्हें अंदाज़ा हो जाता है। और तब दूरी माप ली जाती है। आर्कटिक क्षेत्र के कुररी (टर्न) पक्षी को सबसे ज़्यादा दूरी तय करने वाला पक्षी माना जाता है। लेबराडोर की
तटों से ये ग्यारह हज़ार मील की दूरी तय कर अन्टार्कटिका में जाड़े के मौसम में पहुंचते हैं। इतनी ही दूरी तय कर गर्मी में ये वापस लौट जाते हैं। इसी तरह की मराथन उड़ान भरने वाली अन्य प्रजातियां हैं सुनहरी बटान, टिटिहरी (सैंड पाइपर) एवं अबाबील। ये आर्कटिक क्षेत्र से अर्जेन्टिना तक की छह से नौ हज़ार मील की दूरी तय करते हैं। यूरोप के गबर (व्हाइट स्टौर्क) जाड़ों में आठ हज़ार माल की दूरी तय कर दक्षिण अफ्रीका पहुंच जाते हैं।
प्रवासी पक्षी अपने वतन लौटने की तैयारी लगभग दो सप्ताह पूर्व ही आरंभ कर देते हैं। सप्ताह पूर्व से अपना वजन घटाने हेतु सजग हो जाते हैं। यहाँ आए, ठहरे, प्रजनन में व्यस्त रहे, मौसम का लाभ लिया, शिशु के पंख खुलने लगे, उडने योग्य हुए और आबोदाना उठना शुरू। पक्षीविद् के अनुसार शुक्ल पक्ष की दूधिया चाँदनी में उडान के समय रोशनी में वे अपना निश्चित मार्ग सुगमता से देख सकते हैं। दिन में दिशाभ्रम, तेज धूप, असहनीय गर्मी तथा शत्रु भय के कारण शुक्ल पक्ष उनकी वापसी उडान का शुभ मुहूर्त होता है। इसलिये भी कि यात्रा के प्रत्येक चरण में रोशनी मिलती रहे। अपने वतन तक पहुँचने में अंतिम पडाव तक अथक निरन्तर सक्रिय व गतिशील बने रहें, इस उद्देश्य से विदाई पूर्व वजन घटाते हैं।
अपने वतन लौट चलने की तैयारी में जुटे प्रवासी जोरदार विशेष ध्वनि में अपने सभी सहयोगी मित्रों से ऊँची आवाज में लौट चलने
हेतु आमंत्रित करती है। इनके जाने के बाद तिनकों से सजे वीरान आशियाने तथा प्रजनन के वक्त के बचे अण्डों की खोलें इनके गुजरे वक्त के चश्मदीद गवाह होते हैं। जाते-जाते ये बेजुबान मेहमान हमें ढेरों संदेश दे जाते हैं।
पिंजड़े में बंद पंछी, क्या जाने आकाश को,
माइग्रेशन कहते हैं। शताब्दियों तक मनुष्य उनके इस रहष्य पर से पर्दा उठाने के लिए उलझा रहा। उत्सुकता एवं आश्चर्य से आंखें फाड़े आकाश में प्रवासी पक्षियों के समूह को बादलों की भांति उड़ते हुए देखता रहा। अनेको अनेक जीवों में प्रवास की घटना देखने को मिलती है, पर पक्षियों जैसी नहीं, जो इतनी दूर से एक देश से दूसरे देश में प्रवास कर जाते हैं। इस रहस्यमय यात्रा में पक्षी कहां जाते हैं इस कौतूहल को दूर करने के लिए मनुष्यों ने दूरबीन, रडार, टेलिस्कोप, वायुयान आदि का प्रयोग कर जानकारी एकत्र करना शुरु कर दिया। यहां तक कि जाल में उन्हें पकड़ कर, उनके ऊपर बैंड या रंग लगा कर अध्ययन किया गया। तब जाकर इस रहस्यमय घटना के बारे में पर्याप्त जानकारी मिली।
तलाश में भूमध्य रेखा पार कर दक्षिण अमेरिका या अफ्रीका के गर्म हिस्सों में प्रवास कर जाते हैं। अमेरिकी बटान (गोल्डेन प्लोवर) आठ हज़ार मील की दूरी तय कर अर्जेन्टीना के पम्पास क्षेत्र में नौ महीने गृष्म काल का व्यतीत करते हैं। इस प्रकार वे प्रवास कर साल भर गृष्म ऋतु का ही आनंद उठाते हैं। उन्हें जाड़े का पता ही नहीं होता। इसी प्रकार साइबेरिया के कुछ पक्षी भारत के हिमालय के मैदानी भागों में प्रवास कर जाते हैं। हुगली के हरिपाल जैसे अनजान व शांत इलाके में ये पक्षी आकर तीन से चार माह का प्रवास करते हैं। इस दौरान वे प्रजनन की क्रिया संपन्न करते हैं। बच्चों को जन्म देने के बाद वे पुन: वापस लौट जाते हैं। उत्तर प्रदेश के भी कई वन्य विहार, नदियों, झीलों आदि में ये अपना बसेरा बना लेते हैं। हंस (हेडेड गोज), कुररी (ब्लैक टर्न), चैती, छेटी बतख (कामन टील), नीलपक्षी (गार्गेनी), सराल (इवसलिंग), सिंकपर (पिनटेल) आदि पक्षी न सिर्फ दिखने में खूबसूरत होते हैं बल्कि अपनी दिलकश अदाओं के लिए भी जाने जाते हैं।
(कूट्स) तथा ग्रेट ब्रिटेन के बैगनी अबाबीलों (स्वैलोज) पक्षियों में पाई जाती है। मौसम का असर इन पक्षियों पर इतना अधिक होता है कि इनकी भूरे रंग की पक्षति (प्लुमेज) सफेद हो जाती है और इनका आहार भी बदल जाता है। जाड़े में ये कीट-पतंगों की जगह टहनी पत्तों के खाकर अपना गुजारा करते हैं।
फणीश्वरनाथ रेणु
इस युग में रीतिवाद विरोधी अभियान चला। मकसद था हिन्दी कविता को दरबारी काव्य की रूढियों से मुक्त करना! आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इस आंदोलन को गति प्रदान की। उनका मानना था कि साहित्य की महत्ता लोकजागरण की चेतना से सम्बद्ध है। साहित्य में जो शक्ति है वह तो, तलवार और बम में भी नहीं है। उनके अनुसार लोकजागरण के लिए साहित्य से बढकर कोई दूसरा समर्थ माध्यम नहीं है।
मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस आंदोलन को आगे बढाया। उन्होंने कविता के प्रयोजन को बताते हुए कहा