मंगलवार, 13 जुलाई 2010

जानकीवल्ल्भ शास्त्री की कविताएं

गया, बिहार के मैगरा गांव में माघ शुक्लपक्ष द्वितीया 1916 को जन्मे जानकी वल्लभ शास्त्री को अपनी माता की स्नेहिल-छाया से पांच साल की छोटी उम्र में ही वंचित हो जाना पड़ा। इनके पिता स्व. रामानुग्रह शर्मा इन्हें आधुनिक शिक्षा दिलाने में विफल रहे कुल-परंपरा के अनुसार उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया। 11 वर्ष की उम्र में ही इन्होंने 1927 में प्रथमा परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शास्त्री की उपाधि 16 वर्ष की आयु में प्राप्तकर ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए। वहां 1932 से 1938 तक रहे। 1934-35 में इन्होंने साहित्याचार्य की उपाधि स्वर्णपदक के साथ अर्जित की। पूर्वबंग सारस्वत समाज ढाका के द्वारा साहित्यरत्न घोषित किए गए। 1937-38 में रायगढ़ (मध्यप्रदेश) में राजकवि भी रहे। 1940-41 में रायगढ़ छोड़कर मुजफ्फरपुर आने पर इन्होंने वेदांतशास्त्री और वेदांताचार्य की परीक्षाएं बिहार भर में प्रथम आकर पास की। 1944 से 1952 तक गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज में साहित्य-विभाग में प्राध्यापक, पुनः अध्यक्ष रहे। 1953 से 1978 तक बिहार विश्वविद्यालय के रामदयालु सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर में हिन्दी के प्राध्यापक रहकर 1979-80 में अवकाश ग्रहण किया।
साहित्य-सर्जना

काव्य संग्रह :: बाललता, अंकुर , उन्मेष , रूप-अरूप , तीर-तरंग , शिप्रा , अवन्तिका , मेघगीत , गाथा , प्यासी-पृथ्वी , संगम , उत्पलदल , चन्दन वन , शिशिर किरण , हंस किंकिणी , सुरसरी , गीत , वितान , धूपतरी , बंदी मंदिरम्‌  महाकाव्य :: राधा संगीतिका :: पाषाणी , तमसा , इरावती  नाटक :: देवी , ज़िन्दगी , आदमी , नील-झील  उपन्यास :: एक किरण : सौ झांइयां , दो तिनकों का घोंसला , अश्वबुद्ध , कालिदास , चाणक्य शिखा (अधूरा) कहानी संग्रह :: कानन, अपर्णा, लीला कमल, सत्यकाम, बांसों का झुरमुट  ललित निबंध :: मन की बात, जो न बिक सकीं  संस्मरण ::अजन्ता की ओर, निराला के पत्र, स्मृति के वातायन, नाट्य सम्राट पृथ्वीराज कपूर, हंस-बलाका, कर्म क्षेत्रे मरु क्षेत्र, अनकहा निराला  समीक्षा :: साहित्य दर्शन, त्रयी, प्राच्य साहित्य, स्थायी भाव और सामयिक साहित्य, चिन्ताधारा  संस्कृत काव्य :: काकली  ग़ज़ल संग्रह :: सुने कौन नग़मा


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