गुरुवार, 2 जून 2011

उपन्यास साहित्य :: मनोवैज्ञानिक धारा

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  मनोज कुमार

२. मनोवैज्ञानिक धारा :

आधुनिक युग के उपन्यासों की चर्चा के क्रम में आज हम मनोवैज्ञानिक धारा की चर्चा करते हैं। मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों ने यह माना कि बाह्य सत्य की अपेक्षा अन्तःसत्य ही प्रमाणिक एवं विश्वनीय है। अतः उसे ही मानना महत्वपूर्ण है।

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जैनेन्द्र कुमार जी का जन्म अलीगढ़ के कौड़ियागंज में 2 जनवरी 1905 में हुआ था। पिता प्यारेलाल का देहावसान तभी हो गया था जब वे चार मास के थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा (1911-1918) जैन गुरुकुल ऋषि ब्रह्मचर्याश्रम हस्तिनापुर में हुई। यहीं पर उन्हें आनंदीलाल से ‘जैनेन्द्र’ नाम दिया गया। कुछ वर्षों तक अध्ययन करने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद आगे के अध्ययन के लिए काशी गए। दो वर्षों (1919-20) तक काशी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गये। वे स्वाधीनता संग्राम में पूरे मनोयोग से जुड़े रहे। इसके बाद अध्ययन का क्रम टूट गया। वे कई बार जेल गये। जेल में ही इन्हें लिखने की प्रेरणा मिली। 1929 में इनका विवाह भगवती देवी से हुआ। उनका पहला लेख ‘अहिंसा’ है जो 1929 में विशाल भारत में छपा थी। इसके कुछ दिनों के बाद इनका उपन्यास ‘परख’ निकला। गांधी जी का उन पर विशेष प्रभाव पड़ा। बाद में वे दिल्ली में रहकर साहित्य रचना करते रहे। प्रेमचंद के साथ मिलकर लाहौर में हिंदुस्तानी सभा की स्थापना । डॉ के.एम.मुंशी तथा प्रेमचंद के साथ मिलकर महात्मा गांधी की अध्यक्षता में भारतीय साहित्य परिषद की स्थापना की। प्रेमचंद की मृत्यु के पश्चात हंस का संपादन शुरु किया। इनकी मृत्यु 24-12-1988 को हुई।

पुरस्कार व सम्मान :: हिन्दुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद (परख, 1929, भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय (प्रेम में भगवान, 1952, पाप और प्रकाश, 1953), साहित्य अकादमी (मुक्तिबोध, 1965), हस्तीमल डालमिया पुरस्कार, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार (समय और हम, 1970). पद्मभूषण (1971), मानद डि. लिट्‌ (दिल्ली विश्व विद्यालय, 1973, आगरा विश्व विद्यालय, 1974), हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, (साहित्य वाचस्पति, 1973), विद्या वाचस्पति, गुरुकुल कांगड़ी, साहित्य अकादमी की फेलोशिप, 1974|

जैनेन्द्र कुमार जी को उपन्यास-साहित्य के विकास में भाषा और शैली की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उन्होंने साहित्य में कलात्मकता के साथ-साथ भारतीय सामाजिक तथा राजनैतिक परिवेश की गहरी पकड़ बनाई। अंतर्वृत्ति अथवा शीलवैचित्र्य और उसका विकासक्रम अंकित करने वाले उपन्यास ‘गबन’ की रचना करने वाले प्रेमचंद जी ने इस धारा के उपन्यासकार श्री जैनेन्द्र कुमार जी के मनोविज्ञान चित्रण पर मुग्ध होकर ‘हंस’ में लिखा था,

‘‘इनमें अन्तःप्रेरणा और दार्शनिक संकोच का संघर्ष है।”

जैनेन्द्र कुमार (1905-1988) ने हिन्दी उपन्यास को प्रेमचंद-युग में ही नयी दिशा देने का सफल प्रयास किया। उन्होंने हिन्दी उपन्यास साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उपन्यास को सामाजिक यथार्थ ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक यथार्थ के क्षेत्र में भी प्रवेश करने की राह सुझाई। उन्होंने व्यक्ति की गुम होती पहचान को उभार कर सामने रखा। उनके उपन्यासों में अनमेल विवाह या दहेजप्रथा जैसी समस्याएं नहीं हैं, बल्कि विवाह स्वयं में एक समस्या है। उनके उपन्यासों में मनुष्य-जीवन के अनेक नवीन पहलुओं का उद्घाटन हुआ। गांधी जी के जीवन दर्शन से वे प्रभावित थे, परन्तु कहीं भी उन्होंने ऐसा कुछ न लिखा जो उनका स्वयं चिंतित न हो।

हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं,

“उनकी रचनाओं में नवीन कारीगरी और नवीन उपस्थापन-कौशल को देखकर सहृदयों को आशा हुई कि ये आगे चलकर बड़े साहित्यकार होंगे। यह आशा सत्य सिद्ध हुई।”

जैनेन्द्र कुमार की रचनाओं में नवीन कारीगरी और नवीन उपस्थापन-कौशल देखने को मिलता है।

उपन्यास :: ‘परख’(1929), ‘तपोभूमि’, ‘सुनीता’ (1935), ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’, ‘त्यागपत्र’ (1937), ‘विवर्त’, ‘व्यतीत’, ‘जयवर्धन’ ‘अनाम स्वामी’, ‘मुक्तिबोध’, ‘अनन्तर’, ‘यामा’, ‘दशार्क’।

जैनेन्द्र जी के मनोवैज्ञानिक उपन्यास में मनुष्य-जीवन के अनेक नवीन पहलुओं का उद्घाटन हुआ है। उन्होंने व्यापक सामाजिक जीवन को अपने उपन्यासों का विषय न बना कर मानव की शंकाओं, कुंठाओं, विकारों, उलझनों और प्रेम की वैक्तिकता के चित्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराया है। उन्होंने मुक्ति की समस्या पर बल तो दिया है, पर रूढ़ संस्कार उसके आड़े आ जाते हैं। इस तरह से उनके सभी उपन्यास अंतर्विरोधों का उपन्यास बन गए हैं। वे अपने पात्रों को पहेली बना कर छोड़ देते हैं और पाठक उस मनोवैज्ञानिक पहेली को सुलझाने के प्रयत्न में उलझा रह जाता है।

कहानी संग्रह :: फांसी, स्पर्धा, वातायन, एक रात, नीलम देश की राज कन्या, नई कहानियां, कथा कुसुमांजलि, जय सन्धि, ध्रुव यात्रा, एक दिन, दो चिड़िया, जैनेन्द्र की कहानियां (दस भागों में), जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियां, प्रेम में भगवान।

नाटक :: पाप और प्रकाश, मग्दालिनी।

संस्मरण - निबंध संग्रह :: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, गांधी नीति, लघु निबन्ध, व्यक्तिवाद, पूर्वोदय, सर्वोदय, विचार वल्लरी, मंथन, सोच-विचार, ये और वे, मेरे भटकाव, कश्मीर की वह यात्रा, परिप्रेक्ष्य, इतस्ततः, विहंगावलोकन।

साहित्य, आलोचना और संदर्भ-ग्रंथ :: साहित्य और संस्कृति, प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व, साहित्य का श्रेय और प्रेम, कहानी : अनुभव और शिल्प, समय समस्या और सिद्धांत, समय और हम, प्रेम और विवाह, नारी, काम प्रेम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी, प्रश्न और प्रश्न, राष्ट्र और राज्य, वृत्त विहार (तीन भागों में), शिक्षा और संस्कृति, क्या अभी भविष्य है? जैनेन्द्र के विचार।

सरस, सचित्र बाल व किशोर साहित्य :: अपना-पराया, जंगल की आवाज़, खेल, किसका रुपया, लाल सरोवर, नारद का निवेदन, पढ़ाई, रामू की शादी, सुन्दरियां, तमाशा, वह बेचारा, प्रेम में भगवान, दो साथी, मूरखराज, बाहुबली, धर्मपुत्र, देर है अंधेर नहीं, जीवन मूल, चिड़िया की बच्ची, तीन जोगी, गांधी कुछ स्मृतियां, हमसे सयाने बालक, खोखला ढ़ोल।

कहा जा सकता है कि उनके उपन्यास, विषय और शिल्प दोनों दृष्टियों से व्यस्क और संवेदनशील पाठकों के लिए लिखे गए उपन्यास हैं। एक प्रकार से देखा जाए तो नारी उन उपन्यासों की प्रधान समस्या है। इनका पुरुष पात्र इतना आकर्षक होता है कि सब नारियां उसके आसपास मंडरा कर उससे प्रेम करना चाहती हैं। उनके नारी-पात्रों में अद्भुत महिमा है। उन्होंने अपने उपन्यासों में सामाजिक मर्यादाओं के बीच अपनी पहचान बनाने वाले नारी पात्रों की सृष्टि की है जो सामाजिक दबावों और व्यक्तिगत आग्रहों के चलते द्वन्द्वग्रस्त होकर आत्मयातना के शिकार हो गये हैं। वे समाज को न तोड़कर, स्वयं टूटते हैं। इनके उपन्यासों में आदमी टूटता है समाज बचता है। मेरा मानना है कि अभी के समय में मनुष्य को थोड़ा और सामाजिक होना है, समाज को थोड़ा और मानवीय होना है। तभी देश की दशा और दिशा संतुलित रह सकती है।

जैनेन्द्र का विश्वास है कि पीड़ा और व्यथा ही अहं को विगलित करने में समर्थ है। व्यथा का तीव्रतम रूप कामगत यातना में प्राप्त होता है। इसीलिए जैनेन्द्र ने अपने उपन्यासों में कामपीड़ा और समर्पण का चित्रण करके अहं का विसर्जन किया। इनकी रचनाओं में ‘सुनीता’ को पर्याप्त ख्याति मिली है।

जैनेन्द्र जी के अतिरिक्त इस धारा के उपन्यासकारों में भगवती प्रसाद वाजपेयी का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है।

भिन्न-भिन्न जातियों और मतानुयायियों के बीच मनुष्यता के व्यापक संबंध पर ज़ोर देनेवाले उपन्यास ‘राम रहीम’ (1937) की रचना राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह ने की। उन्होंने इस उपन्यास में सामाजिक पहलुओं का उद्घाटन किया। उनके उपन्यास में मुहावरेदार भाषा और चटकीले चित्रों की योजना हिंदी में अपने ढ़ंग की अकेली ही है।

संदर्भ

1. हिंदी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 2. हिंदी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र 3. हिन्दी साहित्य का इतिहास – श्यामचन्द्र कपूर 4. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारी प्रसाद द्विवेदी 5. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली खंड-7 6. साहित्यिक निबंध आधुनिक दृष्टिकोण – बच्चन सिंह 7. झूठा सच – यशपाल 8. त्यागपत्र – जैनेन्द्र कुमार

बुधवार, 1 जून 2011

उड़ते चेहरे फिसलते पाँव

उड़ते चेहरे फिसलते पाँव



डॉ. दलसिंगार यादव


वैसे तो हर साल गाँव जाता रहता था और खदेरू आदि जैसे पर पीड़ा में संतुष्टि महसूस करने वाले लोग तो मिलते ही रहते थे और अपनी व्यंग्यात्मक शैली में कुछ सुनाने और कुरेदने की कोशिश करते ही रहते थे लेकिन इस बार जब गाँव गया तो खदेरू को न देख कर भइया से पूछा कि खदेरू ना देखात हउऐं कतों गयल हउएं का? भइया ने बड़ी सहजता से बताया कि उ त मर गइलैं। भइया की इतनी आसानी से और बिना किसी दुःख की शैली में कही गई बात से मैं अवाक् रह गया और मुझे पिछली बार जब गाँव गया था तो उनसे हुई मुलाकात और उनकी बदली हुई चाल ढाल याद आ गई। जब मैं पिछली बार गाँव गया था और वे मिले थे तो कुछ दुःखी दिखे। बाज़ार से अकेले ही घर की ओर जा रहे थे। न चाल में वह तेज़ी थी और न ही वह आत्म विश्वास जिससे कि वे अपने तरकश में छुपे व्यंग्य बाणों से लोगों के दिल को छलनी कर देते थे और उसका मलाल भी उनके मन में नहीं आता था। 

मुझे लगा कि उनकी तबीयत कुछ खराब है, शायद डॉक्टर के पास दवाई लेने आए होंगे और अब घर लौट रहे होंगे। उनके पास आकर गाड़ी रोकी और सांत्वना के लहज़े में पूछा "का खदेरू भाई तबियत ठीक ना ह का।" मेरी बात सुनकर ठिठके और फिर पहचान कर बोले "अरे मास्टर भइया! कइसे हउआ? कब अइला है?" उनकी बात का जवाब दिया कि "हम त ठीक हई और अबहिनै चलल आवत हई। देखात ह कि तबियत कुछ ढिल्ल बाय! आवा बैठा गड़िया में हमहूं घरै जात हई।" यह कहकर गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया और खदेरू जी गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी में बैठते ही अपने तरकश में से एक बाण निकाला और बहुत ही सहजता से चलाया कि "गाड़ी नई लेहला है का। ई तो बड़ी महंग होई। अच्छी आमदनी होत बाय का?" उनकी यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी। लेकिन कुछ कहने के बजाय उन्हें समझाने की कोशिश की कि यह गाड़ी अपनी आमदनी से नहीं बल्कि बैंक से कर्ज़ लेकर कर खरीदी है। और लोगों के पास गाड़ी है और मेरे पास नहीं है तो लोग बाग मुझे बड़ा अफ़सर ही नहीं समझते। अतः लोगों से बराबरी दिखाने लिए यह गाड़ी खरीदी है और अब इसकी किस्त भी भारी पड़ रही है। आज की महंगाई में घर खर्च तथा बच्चों की पढ़ाई का खर्च ही बड़ी मुश्किल से पूरा होता था और ऊपर से इसकी किस्त। इसके लिए ओवर टाइम करना पड़ता है जिससे सेहत भी जवाब देने लगी है। लेकिन मेरा कोई भी स्पष्टीकरण उनको संतुष्ट नहीं कर सकता था क्योंकि उन्होंने तो किसी पर विश्वास करना सीखा ही नहीं था। 

मैंने प्रसंग बदलने की कोशिश की और पूछा कि "डॉक्टर के पास गयल रहला का।" "अरे डॉक्टर के पास का जाईं घर में दूध दही न हउऐ यह मारे थोड़ी कमज़ोरी हवै। भंइस बियावै वाली हौ तब सब ठीक होय जाई।" उनसे बातें करते-करते घर आ गया और उन्हें उतार कर घर आ गया। उस बार एक मुकदमे के सिलसिले में एक दिन के लिए ही गाँव गया था इसलिए दूसरे दिन काम खत्म होते ही वापस आ गया था।

कंजूसी में तो जैसे उन्हें डॉक्टोरेट हासिल था। शरीर को चाहे कितन ही कष्ट क्यों न हो और कैसी ही व्याधि क्यों न हो पैसा एक नहीं खर्च करेंगे। उनकी इसी कंजूसी की प्रवृत्ति के चलते उनकी पुत्रवधू प्रसव के समय ही चल बसी थी। लोगों के लाख समझाने के बावज़ूद उसे अस्पताल नहीं ले गए। उनका मानना था कि "यश अपयश जीवन मरन सब विधि के हाथ।" गाँव के लोग हर संदर्भ में दार्शनिक हो जाते हैं और अपने समर्थन में ऐसे अकाट्य तर्क देंगे कि पढ़ा लिखा मूर्ख साबित हो जाए। जब अमरीकी अपोलो यान चाँद पर उतरा था और उनको जब बताया गया कि आदमी चाँद पर पहुंच गया तो उन्होंने झट से तर्क दिया कि "अदमी का अंजोरिया तक पहुंच पाई? रावणवा सीढ़ी लगावत लगावत थक गयल उहाँ तक पहुंची न पउलै औ अब अदमी उहाँ तक पहुंच पाई।" जब पौराणिक कथा बीच में आ जाती है तो विज्ञान भी फ़ेल हो जाता है। 

गाँव वाले अपने ऐसे ही तर्कों से किसी भी नई तकनीक को अपने तक पहुंचने ही नहीं देते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की तो ऐसी धज्जी उड़ा देते हैं कि डॉक्टर तो उनके सामने टिक ही नहीं पाते हैं। डॉक्टर की परीक्षा तक लेने से नहीं बाज़ आते हैं। एक बार एक डॉक्टर गाँव में आया और खदेरू और उनके साथ मिलकर कुछ लोग डिस्पेंसरी गए और बीमारी के ऐसे ऐसे लक्षण बताए कि डॉक्टर को लगा कि मेरी सारी पढ़ाई ही फ़ेल हो गई है। इसी प्रकार गाँव में कोई बच्चा पढ़ने में मन लगाता है और अच्छा निकलने लगता है तो उसका टेस्ट ये लोग कैसे लेते हैं एक उदाहरण देखिए – एक पेड़ पर अस्सी मकड़ा, वे खाएं लकड़ा, एक मकड़ा खाए एक छटाँक लकड़ा तो कुल खाएं कितना लकड़ा। अब इसका जवाब देने के लिए टो रामानुजम जैसा गणितज्ञ ही चाहिए। एक व्यंग्यकार ने सही ही लिखा है – गाँव वाले भोले नहीं "भाले" होते हैं। ऐसा ही विचार उस दिन सुनने को मिला जब एक दवाई कंपनी ने गाँव में मुफ़्त में कुछ पेटेंटेड दवाइयों को वितरित करने के गाँव के किसी व्यक्ति से संपर्क किया। संपर्क सूत्र ने गाँव के लोंगों को बताया और सुबह 8 बजे चौपाल में एकत्र होने के लिए कहा। उस गोष्ठी में गाँव वालों ने जो प्रश्न पूछे उनमें से एक यह भी था। इससे कंपनी को क्या फ़ायदा होगा जो हमें मुफ़्त में दवाइयाँ बाँट रही है? ये लोग कहीं सरकारी एजेंट तो नहीं हैं जो आबादी घटाने के लिए लोगों को बाँझ बना देंगे। 

शायद ऐसी ही सोच के कारण गाँव में कॉस्मेटिक, पाउडर क्रीम तो लोकप्रिय हो रहे हैं परंतु स्वास्थ्य की बातों के प्रति लोग सशंकित हैं जिसके कारण खदेरू जैसे लोग हृदय रोग को भी कमज़ोरी मानकर जीवन जैसी अनमोल नेमत के प्रति गंभीर नहीं होते हैं। जब उनके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो पीछे छूटे परिवार के लोगों के उड़ते चेहरे फिसलते पाँव ही नज़र आते हैं।
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