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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

साखी ...भाग -- 23 / संत कबीर

हमारे प्रबुद्ध पाठकों में से एक हैं प्रतिभा सक्सेना जी  । आपने  एक विशिष्ट बात पर ध्यान आकृष्ट कराया है .
कबीर की रचनायें तीन श्रेणियों में हैं - 1. साखी (दोहे छंद में हैं पर कवीरने कभी दोहा या श्लोक नहीं कहा .जैसा अब कहा जाने लगा है ).2 . सबदी (उनके मुक्तक पद ,गुरुग्रंथ साहब में भी 'सबद' संज्ञा के अंतर्गत संग्रहीत हैं ). 3. रमैनी.- दोहे और चौपाई छंदों में ,जिसमें आगे चल कर तुलसी ने राम चरित-मानस की रचना की .
क्या कबीर के वचनों  की रक्षा करते हुये ,दोहें के स्थान पर उसे साखी (साक्षी,जिस के वे साक्षी थे) 
कहने में कोई बाधा है?
. इससे आगे की पीढ़ियों को सही संदेश मिलेगा .साखी केसाथ  कबीर का एक कथन ,सब की जानकारी के लिये , मुझे उद्धृत करने योग्य लग रहा है - 
'साखी आँखी ज्ञान की, समुझि देखु मन माहिं ,
बिनु साखी संसार का झगरा छूटे नाहिं !'(कबीर).



इस बात से प्रेरित हो कर अब यह शृंखला  दोहावली न हो कर साखी के रूप में प्रस्तुत की जाएगी .... आभार प्रतिभा जी 



जन्म  --- 1398

निधन ---  1518

माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश
जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश 221

भज दीना कहूँ और ही, तन साधुन के संग
कहैं कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग 222

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय
भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय 223

मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ
साधु संग हरि भजन बिनु, कछु आवे हाथ 224

माली आवत देख के, कलियान करी पुकार
फूल-फूल चुन लिए, काल हमारी बार 225

मैं रोऊँ सब जगत् को, मोको रोवे कोय
मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय 226

ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठें घर माहिं 227

या दुनियाँ में कर, छाँड़ि देय तू ऐंठ
लेना हो सो लेइले, उठी जात है पैंठ 228

राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास
नैन आवे नीदरौं, अलग आवे भास 229

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय
हीरा जन्म अनमोल था, कौंड़ी बदले जाए 230


शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

दोहवाली .... भाग - 22 / संत कबीर




जन्म  --- 1398

निधन ---  1518


पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात
देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात 211


पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार

याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार 212



पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय

अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय 213



प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय

चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय 214



बन्धे को बँनधा मिले, छूटे कौन उपाय

कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय 215



बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय

समुद्र समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय 216



बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम

कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम 217



बानी से पहचानिए, साम चोर की घात

अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात 218



बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर

पँछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर 219



मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय

बार-बार के मुड़ते, भेड़ बैकुण्ठ जाय 220


शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

दोहावली ...भाग -21 / संत कबीर


जन्म  --- 1398

निधन ---  1518

ते दिन गये अकारथी, संगत भई संत
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत 201

तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर होय
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय 202

तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय 203

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर
तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर 204

दुर्लभ मानुष जनम है, देह बारम्बार
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि लागे डार 205

दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन
रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन 206

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सीचें सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय 207

न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल जाय
मीन सदा जल में रहै, धोये बास जाय 208

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय
एक पहर भी नाम बीन, मुक्ति कैसे होय 209

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया कोय
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय 210