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सोमवार, 10 मई 2010

काव्यशास्त्र-१४

आचार्य राजशेखर

आचार्य परशुराम राय

04092008148-001 आचार्य राजशेखर का काल दसवीं शताब्‍दी का आरम्‍भ माना जाता है। ये विदर्भ राज्‍य के निवासी थे। आचार्य दण्‍डी के बाद ये दूसरे आचार्य है जो कश्‍मीर के बाहर के थे। वैसे इनका कार्यक्षेत्र कन्‍नौज रहा है। इन्‍होंने स्‍वयं अपने “बालरामायण” नामक नाटक में उल्‍लेख किया है कि कन्‍नौज के प्रतिहार वंश के राजा महेन्द्रपाल और महिपाल इनके शिष्‍य थे।

ये यायावर वंश में उत्‍पन्‍न महाराष्‍ट्र के प्रसिद्ध कवि अकालजलद के पौत्र थे। इनके पिता दुर्दुक थे और माँ शीलवती थी। यायावर वंश में इनके पितामह के अतिरिक्‍त सुरानन्‍द, तरल आदि अनेक विद्वान कवि हुए है। कवित्‍व तथा शास्‍त्रीय प्रतिभा वंश-परंपरा से विरासत के रूप में इन्‍हें मिली थी। इनकी पत्‍नी अवन्तिसुन्‍दरी भी बड़ी ही विदुषी एवं कवित्‍व प्रतिभा से संपन्‍न थीं। आचार्य राजशेखर अपने ग्रन्‍थ “काव्‍यमीमांसा” में कई स्‍थानों पर अपनी पत्‍नी के साहित्यिक मतों का उल्‍लेख किया है। कर्पूरमज्जरी में आचार्य ने अपनी पत्‍नी का परिचय निन्‍नलिखित शब्‍दों में दिया है (संस्‍कृत छाया) –

चाहुमानकुलमौलिमालिका राजशेखरकवीन्‍द्रगेहिनी।

भर्तुः कृतिमवन्तिसुन्‍दरी यो प्रयोक्‍तुमेवमिच्‍छति।।

आचार्य राजशेखर कवि और नाटककार के रूप में भी जाने जाते हैं। बालरामायण, बालभारत, विद्धशाल भज्जिका और कर्पूरमज्जरी ये चार इनके द्वार प्रणीत नाटक है। इनमें से कर्पूरमज्‍जरी नाटक प्राकृत भाषा में लिखा गया है। इनका पाँचवा ग्रंथ काव्‍यमीमांसा है, जो काव्‍यशास्‍त्र से संबंधित है। अट्ठारह अध्‍यायों में विभक्‍त यह ग्रंथ अपने ढंग का अनूठा है।

काव्‍यमीमांसा को कविशिक्षा से संबंधित ग्रंथ माना जाता है और इसी आधार पर आचार्य राजशेखर को भारतीय काव्‍यशास्‍त्र के इतिहास में कवि शिक्षा संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। इस सम्‍प्रदाय में आचार्य राजशेखर के बाद आचार्य क्षेमेन्‍द्र, आचार्य अरि सिंह, आचार्य अमरचन्‍द्र, आचार्य देवेश्‍वर आदि ने कार्य किया है।

काव्‍यमीमांसा के प्रथम अध्‍याय का नाम शास्‍त्र संग्रह, दूसरे का शास्‍त्रनिर्देश, तीसरे का काव्‍यपुरूषोत्‍पत्ति, चौथे का पदावाक्‍यविवेक, पांचवें का काव्‍यपादकल्‍प, छठवें का भी पदवाक्‍यविवेक, सातवें का पाठप्रतिष्‍ठा, आठवें का काव्‍यार्थयोनि, नवें का अर्थव्‍याप्ति और दसवें अध्‍याय का नाम कविचर्या तथा राजचर्या है। 11 – 13 अध्‍यायों में अपने पूर्ववर्ती कवियों के अभिप्राय को समझने की युक्ति और सीमा का उल्‍लेख किया गया है। 14-16 अध्‍यायों में देश, काल, प्रकृति आदि के माध्‍यम से कवि – समय का वर्णन मिलता है। सत्रहवें अध्‍याय में देश-विभाग और अठारहवें में काल-विभाग का उल्‍लेख किया गया है।

काव्‍यमीमांसा को यदि विश्‍वकोष कहा जाए, तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। इस ग्रंथ के कारण आचार्य राजशेखर का नाम भारतीय काव्‍यशास्त्र के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

इति। 05092008479-001

बुधवार, 5 मई 2010

काव्य शास्त्र – 15 ::आचार्य अभिनव गुप्त

आचार्य अभिनव गुप्त

                       --- आचार्य परशुराम राय

44793_wallpaper280 आचार्य अभिनव गुप्त दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आते हैं। आपने मूल निवास और परिवार आदि के विषय में ’तंत्रलोक’ नामक ग्रंथ में थोड़ा विवरण दिया है। इसके अनुसार इनके पूर्वज गंगा-यमुना के मध्यवर्ती प्रदेश कन्नौज के रहने वाले थे। इनके जन्म के 200 वर्ष पूर्व अविगुप्त नामक एक अत्यन्त प्रसिद्ध विद्वान कन्नौज के तत्कालीन राजा यशोवर्मा के राज्य में थे। कश्मीर नरेश ललितादित्य ने कन्नौज के अधिपति यशोवर्मा को पराजित किया और अविगुप्त को बड़े आदर के साथ अपने राज्य कश्मीर ले गये और धन, जागीर आदि देकर सम्मनित किया। इन्हीं अविगुप्त के वंश में आचार्य अभिनवगुप्त का जन्म हुआ। इनके पितामह वराह्गुप्त और पिता नरसिंह गुप्त थे। वैसे इनके पिता चुलुखक के नाम से प्रसिद्ध थे।

अभिनव गुप्त बचपन में बड़े शरारती थे। ये अपने सहपाठियों को काफ़ी सताते थे। इनकी इस प्रवृत्ति के कारण इनके गुरुओं ने इनका नाम अभिनव गुप्तपाद रख दिया था। गुप्तपाद का अर्थ सर्प होता है । इसके बाद इन्होंने इस गुरु प्रदत्त नाम का व्यवहार किया, इसका उल्लेख भी उन्होंने अपने ग्रंथ तंत्रलोक में किया है।

“अभिनव्गुप्तस्य कृतिः सेयं यस्योदिता गुरुभिराख्या।”

आचार्य अभिनवगुप्त विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उस समय कश्मीर और कश्मीर के आस-पास के विद्याविशेष के उद्भट विद्वानों के पास जाकर विभिन्न विद्याओं का उन्होंने अध्ययन किया। अपने ग्रंथ में इन गुरुओं का शास्त्र सहित उन्होंने उल्लेख किया है।

नरसिंह गुप्त (पिता) – व्याकरण शास्त्र

वामनाथ – द्वैताद्वैत तंत्र

भूतिराजतनय -- द्वैतवादी शैव सम्प्रदाय के गुरु

लक्ष्मणगुप्त – प्रत्यभिज्ञा, क्रम एवं त्रिकदर्शन

भट्ट इन्दुराज – ध्वनि सिद्धान्त

भूतिराज – ब्रह्म विद्या

भट्टा तोत – नाट्य शास्त्र

इनके अतिरिक्त उन्होंने अपने तेरह अन्य गुरुओं का उल्लेख भी एक स्थान पर किया है।

04032010059 अभिनवगुप्त का जीवन अधिक सुखमय नहीं रहा। उनकी माता उन्हें बाल्यावस्था में ही छोड़कर परलोक वासी हो गईं। इसकी पीड़ा उन्हें बहुत काल तक रही। इसके बावज़ूद आभिनव गुप्त ने माता के वियोग को कल्याणप्रद रूप में स्वीकार किया। माता के देहान्त के पश्चात उनके पिता भी वैरागी होकर संन्यासी हो गये। माता-पिता दोनों के वियोग ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। वे साहित्य के सरस विषय से अनासक्त होकर शिवभक्ति और दर्शन शास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्त हो गये।

उन्होंने जीवन पर्यंत ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया और उनके जीवन का अंत भी उनकी कठिन साधना के अनुरूप ही सुन्दर रूप में हुआ। अंतिम समय में वे कश्मीर में श्रीनगर व गुलमर्ग के बीच “भैरव” नामक नदी के किनारे “मगम” नामक स्थान पर बस गये। यहां का वातावरण और प्रकृति बहुत ही सुरम्य थे। अपने अंतिम समय में इन्होंने यहां स्थित प्रसिद्ध “भैरव गुफा” में प्रवेश किया और फिर कभी बाहर नहीं आये। अंतिम यात्रा में बारह सौ शिष्य उनके साथ थे।

आभिनव गुप्त प्रणीत ग्रंथों की एक लंबी श्रृंखला है। इनके 41 ग्रंथ माने जाते हैं। इनमें ग्रंथों का उल्लेख सूचीपत्र मात्र में मिलता है। शेष में अधिकांश प्राप्त नहीं हैं। इनमें तीन ग्रंथ साहित्य शास्त्र से संबंधित हैं। ध्वन्यालोक पर “लोचन” नाम की और “अभिनवभारती”, “भरतनाट्यशास्त्र” पर टीकाएं हैं। “घटकर्पर विवरण”, “मेघदूत” के सदृश दूत काव्य पर टीका है। शेष ग्रंथ शैव दर्शन पर हैं। इनमें “तंत्रलोक” विशालकाय ग्रंथ है। “क्रमस्त्रोत” “भैरव स्त्रोत” जैसे कृतियां अति लघु रूप में हैं और इनकी सीमा 10-12 श्लोकों तक सीमित हैं।

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मंगलवार, 4 मई 2010

काव्य शास्त्र-14 :: आचार्य भट्टनायक

आचार्य भट्टनायक :: -आचार्य परशुराम राय

आचार्य भट्टनायक मूलतः मीमांसक हैं और इनका काल दसवीं शताब्दी माना जाता है। ये आचार्य आनन्दवर्धन के बाद हुए हैं। काव्यशास्त्र पर इनका एकमात्र ग्रंथ ‘हृदयदर्पण’ है। पर दुर्भाग्य से यह उपलब्ध नहीं है।

ये ध्वनि-सम्प्रदाय के कट्टर विरोधी हैं। क्योंकि एक मीमांसक के लिए वेद ही परम प्रमाण है। और उसके लिए सभी प्रकार के अर्थों का अभिधा के अर्थ में ही अन्तर्भाव होता है। इसीलिए आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा ‘ध्वन्यालोक’ में प्रतिपादित ध्वनि के सिद्धान्तों का बड़े ही सशक्त ढ़ग से ‘हृदयदर्पण’ में इन्होंने विरोध किया है। जबकि इनके मतों का खण्डन आचार्य अभिनवगुप्त ने ‘ध्वन्यालोक’ पर ‘लोचन’ नामक टीका करते समय भी उतने ही सशक्त ढंग से किया है। इससे पता चलता है कि आचार्य भट्टनायक आचार्य अभिनवगुप्त के पहले हुए हैं।

ग्यारहवीं शताब्दी के आचार्य महिमभट्ट भी आचार्य भट्टनायक की तरह ही एक मीमांसक थे। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘व्यक्तिविवेक’ में आचार्य भट्टनायक कृत ‘हृदयदर्पण’ के अनुपलब्ध होने के दर्द का उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि अब तक ‘हृदयदर्पण’ ग्रंथ को देखे बिना मेरी बुद्धि रुपी नायिका अलंकार सज्जा में लग गयी है। अतएव उसे कैसे पता चलेगा कि उसमें कोई दोष है या नहीं, अर्थात् उसके अभाव में अपने ग्रंथ‘व्यक्तिविवेक’ में कमियों का कैसे पता चलेगा। उक्त विवरण से पता चलता है कि ग्यारहवीं शताब्दी से ही हृदयदर्पण उपलब्ध नहीं रहा है अथवा हो सकता है कि व्यक्तिविवेककार आचार्य महिमभट्ट को किन्हीं कारणों से यह ग्रंथ न मिल पाया हो। क्योंकि इनके थोड़े काल पूर्व ही आचार्य अभिनवगुप्त हुए हैं और उन्होंने ‘हृदयदर्पण’ अवश्य पढ़ा था। अन्यथा आचार्य भट्टनायक द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का खण्डन नहीं कर पाते।

‘हृदयदर्पण’ ध्वनिविरोधी एवं रसनिष्पति सम्बन्धी सिद्धांतों के लिए अधिक जाना जाता है। क्योंकि इन दोनों विषयों पर आचार्य भट्टनायक का दृष्टिकोण बिल्कुल नया था। वैसे आचार्य अभिनवगुप्त ने इनके ध्वनिविरोधी सिद्धान्तों का ध्वन्यालोक पर अपनी ‘लोचन टीका’ में बहुत ही जोरदार ढ़ग से खण्डन किया है और रसनिष्पत्ति के सिद्धांन्तो का आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र की टीका ‘अभिनवभारती’ में। काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने भी आचार्य भट्टनायक के मत का उल्लेख किया है।

आचार्य भट्टनायक के रसनिष्पत्ति संबन्धी सिद्धांत का उल्लेख आचार्य मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश किया है। वे तीन प्रकार का व्यापार मानते हैं – अभिधाव्यापार, भावकलत्वव्यापार और भोजकत्व व्यापार। अभिधा- व्यापार से काव्य के सामान्य अर्थ का ज्ञान होता है, भावकत्व व्यापार से सीता-राम आदि के स्वरुप का साधारणीकरण होता है और भोजकत्वव्यापार से पाठक या श्रोता को रस की अनुभूति होती है। आचार्य जयरथ द्वारा आचार्य रुय्यक के ‘अलंकारसर्वस्व’ की टीका मे तथा आचार्य हेमचन्द्र द्वारा अपने ‘काव्यनुशासनविवेक’ नामक टीका में आचार्य भट्टनायक के उक्त सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाले दो श्लोकों उद्धृत किया गया है, जो निम्नवत हैं-

अभिधा भावना चान्या तद्भोगीकृतिरेव च।

अभिधाधामतां याते शब्दार्थालङ्कृती ततः।।

भावनाभाव्य एषोऽपि शृंगारादिगणो मतः।

तद्भोगीकृतिरुपेण व्याप्यते सिद्धिमान्नरः।।

सोमवार, 3 मई 2010

काव्य शास्त्र-13 :: आचार्य मुकुलभट्ट

आचार्य मुकुलभट्ट :: -आचार्य परशुराम राय

आचार्य मुकुलभट्ट का काल नवीं शताब्दी है। आचार्य आनन्दवर्धन और आचार्य मुकुलभट्ट के पिता कल्लटभट्ट कश्मीर नरेश अवन्तिवर्मा के शासन काल में थे। महाकवि कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ में इस प्रकार का उल्लेख किया है-

अनुग्रहाय लोकानां भट्टाः श्री कल्लटादयः।

अवन्तिवर्मणः काले सिद्धा भुवमवातरन्।।

प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार आचार्य मुकुलभट्ट इनके गुरु और मीमांसाशास्त्र के उद्भट विद्वान थे। इसके अतिरिक्त व्याकरण, तर्कशास्त्र, काव्यशास्त्र आदि पर भी इनका पूर्ण अधिकार था।

इनका एकमात्र ग्रंथ ‘अभिधावृत्तमातृका’ है जिसमें केवल 15 कारिकाएँ हैं। इन पर वृत्ति भी स्वयं इन्होंने ही लिखी है। आचार्य मुकुलभट्ट ध्वनिसिद्धांत और व्यञ्जना आदि वृत्तियों के विरोधी हैं। क्योंकि ये मीमांसक हैं। ये व्यञ्जना और लक्षणा वृत्तियों को अभिधा का ही भेद मानते हैं-

इत्येतदभिधावृत्तं दशधाम विवेचितम्।

‘अभिधावृत्तिमातृका’ छोटा ग्रंथ अवश्य है, पर क्लिष्ट है। ‘काव्यप्रकाश’ में अभिधा, लक्षणा, व्यंजना आदि वृत्तियों का विवेचन आचार्य मम्मट द्वारा इसी ग्रंथ के आधार पर किया है। इसीलिए कुछ विद्वानों का मानना है कि काव्यप्रकाश के रहस्य को समझने के लिए ‘अभिधावृत्तिमातृका’ का परिशीलन आवश्यक है।

आचार्य मुकुलभट्ट ने अपने ग्रंथ में आनन्दवर्धन, उद्भट, विज्जका आदि आचार्यों के नामों का उल्लेख किया है। ग्रंथ छोटा होने के कारण शायद इस पर कोई टीका नहीं लिखी गयी। जबकि इनके शिष्य प्रतिहारेन्दुराज अपने गुरु का नाम बड़े आदर के साथ लेते है, लेकिन उन्होंने इस पर टीका नहीं लिखी। फिर भी यह ग्रंथ काव्यशास्त्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

आचार्य धनञ्जय

आचार्य धनंजय का काल दसवीं शताब्दी है। इनका एक मात्र ग्रंथ ‘दशरुपक’ है जिसका विवेच्य विषय नाट्यशास्त्र है। ग्रंथ के अन्त में अपना परिचय देते हुए वे लिखते हैः-

विष्णोः सुतेनापिधनञ्जयेन विद्धन्मनोरागनिबन्ध हेतुः।

आविष्कृतं मुञ्जमहीशगोष्ठी वैदग्ध्यभाजा दशरुपकमेतत्।।

इसके अनुसार आचार्य धनञ्जय के पिता का नाम विष्णु था और इन्हें मालवा के परमारवंश के राजा मुंज की राजसभा में रहने का सौभाग्य मिला था। यहीं इन्होंने दशरुपक की रचना की थी। महाराज मुंज का राज्यकाल 974 से 994 ई. तक माना गया है। अतएव आचार्य धनञ्जय इसी काल के हैं।

आचार्य भरत के बाद केवल नाट्यशास्त्र पर कार्य करने वाले यह दूसरे आचार्य हैं। आचार्य भरत का नाट्यशास्त्र एक तरह से विश्वकोश है, जबकि आचार्य धनञ्जय ने ‘दशरुपक’ में नाटक की परिधि को नहीं लाँघा है।

‘दशरुपक’ में लगभग 300 कारिकाएँ हैं, जिन्हें चार प्रकाशों में विभक्त किया गया है। प्रथम प्रकाश में ग्रंथ का प्रयोजन, नाटकों की पंचसंधियाँ, अर्थोपक्षेपक आदि के लक्षण और आख्यान के भेद आदि का विवेचन किया गया है। द्वितीय प्रकाश में नायक-नायिका भेद एवं कैशिकी (कौशिकी) आदि नाट्य शैलियों के भेदों का विवरण दिया गया है। तृतीय प्रकाश में नाटक के लक्षण, प्रस्तावना, अङ्कविधान, कथाभाग के औचित्य की दृष्टि से बदलाव, नाटक के मुख्य रस, पात्रों की संख्या, प्रवेश और निर्गम के नियम आदि का वर्णन मिलता है। अन्तिम प्रकाश में रसोत्पत्ति के कारकों, यथा- स्थायिभाव, व्यभिचारी भाव आदि का विवेचन, रसास्वादन के प्रकार, नाटक में शान्तरस की उपयोगिता का अभाव आदि पर प्रकाश डाला गया है।

‘दशरुपक’ पर कुल पाँच टीकाएँ लिखी गयी हैं। आचार्य धनिक, नृसिंहभट्ट, देवपाणि, कुरविराम और बहुरूप मिश्र टीकाकारों के नाम हैं। आचार्य बहुरुप मिश्र की टीका को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता हैं।

रविवार, 2 मई 2010

काव्य शास्त्र-12 :: आचार्य भट्टनायक

आचार्य भट्टनायक :: -आचार्य परशुराम राय

आचार्य भट्टनायक मूलतः मीमांसक हैं और इनका काल दसवीं शताब्दी माना जाता है। ये आचार्य आनन्दवर्धन के बाद हुए हैं। काव्यशास्त्र पर इनका एकमात्र ग्रंथ ‘हृदयदर्पण’ है। पर दुर्भाग्य से यह उपलब्ध नहीं है।

ये ध्वनि-सम्प्रदाय के कट्टर विरोधी हैं। क्योंकि एक मीमांसक के लिए वेद ही परम प्रमाण है। और उसके लिए सभी प्रकार के अर्थों का अभिधा के अर्थ में ही अन्तर्भाव होता है। इसीलिए आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा‘ध्वन्यालोक’ में प्रतिपादित ध्वनि के सिद्धान्तों का बड़े ही सशक्त ढ़ग से‘हृदयदर्पण’ में इन्होंने विरोध किया है। जबकि इनके मतों का खण्डन आचार्य अभिनवगुप्त ने ‘ध्वन्यालोक’ पर ‘लोचन’ नामक टीका करते समय भी उतने ही सशक्त ढंग से किया है। इससे पता चलता है कि आचार्य भट्टनायक आचार्य अभिनवगुप्त के पहले हुए हैं।

ग्यारहवीं शताब्दी के आचार्य महिमभट्ट भी आचार्य भट्टनायक की तरह ही एक मीमांसक थे। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘व्यक्तिविवेक’ में आचार्य भट्टनायक कृत ‘हृदयदर्पण’ के अनुपलब्ध होने के दर्द का उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि अब तक ‘हृदयदर्पण’ ग्रंथ को देखे बिना मेरी बुद्धि रुपी नायिका अलंकार सज्जा में लग गयी है। अतएव उसे कैसे पता चलेगा कि उसमें कोई दोष है या नहीं, अर्थात् उसके अभाव में अपने ग्रंथ‘व्यक्तिविवेक’ में कमियों का कैसे पता चलेगा। उक्त विवरण से पता चलता है कि ग्यारहवीं शताब्दी से ही हृदयदर्पण उपलब्ध नहीं रहा है अथवा हो सकता है कि व्यक्तिविवेककार आचार्य महिमभट्ट को किन्हीं कारणों से यह ग्रंथ न मिल पाया हो। क्योंकि इनके थोड़े काल पूर्व ही आचार्य अभिनवगुप्त हुए हैं और उन्होंने ‘हृदयदर्पण’ अवश्य पढ़ा था। अन्यथा आचार्य भट्टनायक द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का खण्डन नहीं कर पाते।

‘हृदयदर्पण’ ध्वनिविरोधी एवं रसनिष्पति सम्बन्धी सिद्धांतों के लिए अधिक जाना जाता है। क्योंकि इन दोनों विषयों पर आचार्य भट्टनायक का दृष्टिकोण बिल्कुल नया था। वैसे आचार्य अभिनवगुप्त ने इनके ध्वनिविरोधी सिद्धान्तों का ध्वन्यालोक पर अपनी ‘लोचन टीका’ में बहुत ही जोरदार ढ़ग से खण्डन किया है और रसनिष्पत्ति के सिद्धांन्तो का आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र की टीका ‘अभिनवभारती’ में। काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने भी आचार्य भट्टनायक के मत का उल्लेख किया है।

आचार्य भट्टनायक के रसनिष्पत्ति संबन्धी सिद्धांत का उल्लेख आचार्य मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश किया है। वे तीन प्रकार का व्यापार मानते हैं – अभिधाव्यापार, भावकलत्वव्यापार और भोजकत्व व्यापार। अभिधा- व्यापार से काव्य के सामान्य अर्थ का ज्ञान होता है, भावकत्व व्यापार से सीता-राम आदि के स्वरुप का साधारणीकरण होता है और भोजकत्वव्यापार से पाठक या श्रोता को रस की अनुभूति होती है। आचार्य जयरथ द्वारा आचार्य रुय्यक के ‘अलंकारसर्वस्व’ की टीका मे तथा आचार्य हेमचन्द्र द्वारा अपने ‘काव्यनुशासनविवेक’ नामक टीका में आचार्य भट्टनायक के उक्त सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाले दो श्लोकों उद्धृत किया गया है, जो निम्नवत हैं-

अभिधा भावना चान्या तद्भोगीकृतिरेव च।

अभिधाधामतां याते शब्दार्थालङ्कृती ततः।।

भावनाभाव्य एषोऽपि शृंगारादिगणो मतः।

तद्भोगीकृतिरुपेण व्याप्यते सिद्धिमान्नरः।।

शनिवार, 1 मई 2010

काव्यशास्त्र-11 आचार्य आनन्दवर्धन

आचार्य आनन्दवर्धन :: -आचार्य परशुराम राय

काव्यशास्त्र के ऐतिहासिक पटल पर क्रम में आचार्य रुद्रभट्ट के बाद आचार्य आनन्दवर्धन आते हैं और इनका ग्रंथ ‘ध्वन्यालोक’ काव्य शास्त्र के इतिहास में मील का पत्थर है। आचार्य आनन्दवर्धन काव्यशास्त्र में ध्वनि सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

आचार्य आनन्दवर्धन कश्मीर के निवासी थे और ये तत्कालीन कश्मीर नरेश अवन्तिवर्मा के समकालीन थे। इस सम्बंध में महाकवि कल्हण ‘राजतरङ्गणी’ में लिखते हैं:

मुक्ताकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः।

प्रथां रत्नाकराश्चागात् साम्राऽयेऽवन्तिवर्मणः।।

कश्मीर नरेश अवन्तिवर्मा का राज्यकाल 855 से 884 ई. है। अतएव आचार्य आनन्दवर्धन का काल भी नौवीं शताब्दी मानना चाहिए। इन्होंने पाँच ग्रंथों की रचना की है- विषमबाणलीला, अर्जुनचरित,देवीशतक, तत्वालोक और ध्वन्यालोक।

ध्वन्यालोक उद्योतों में विभक्त है। इसमें कुल चार उद्योत हैं। प्रथम उद्योत में ध्वनि सिद्धान्त के विरोधी सिद्धांतों का खण्डन करके ध्वनि-सिद्धांत की स्थापना की गयी है। द्वितीय उद्योत में लक्षणामूला (अविवक्षितवाच्य) और अभिधामूला (विवक्षितवाच्य) के भेदों और उपभेदों पर विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त गुणों पर भी प्रकाश डाला गया है। तृतीय उद्योत पदों, वाक्यों, पदांशों, रचना आदि द्वारा ध्वनि को प्रकाशित करता है और रस के विरोधी और विरोधरहित उपादानों को भी। चतुर्थ उद्योत में ध्वनि और गुणीभूत व्यंग्य के प्रयोग से काव्य में चमत्कार की उत्पत्ति को प्रकाशित किया गया है।

ध्वन्यालोक के तीन भाग हैं- कारिका भाग, उस पर वृत्ति और उदाहरण। कुछ विद्वानों के अनुसार कारिका कारिका भाग के निर्माता आचार्य सहृदय हैं और वृत्तिभाग के आचार्य आनन्दवर्धन। ऐसे विद्वान अपने उक्तमत के समर्थन में ध्वन्यालोक के अन्तिम श्लोक को आधार मानते हैं-

सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्मचिरप्रसुप्तकल्पं

मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत्।

तद्व्याकरोत् सहृदयलाभ हेतो-

रानन्दवर्धन इति प्रथिताभिधानः।।

लेकिन कुंतक, महिमभट्ट, क्षेमेन्द्र आदि आचार्यों के अनुसार कारिका भाग और वृत्ति भाग दोनों के प्रणेता आचार्य आनन्दवर्धन ही हैं। आचार्य आनन्दवर्धन भी स्वयं लिखते हैं-

इति काव्यार्थविवेको योऽयं चेतश्चमत्कृतिविधायी।

सूरिभिरनुसृतसारैरस्मदुपज्ञो विस्मार्यः।।

यहाँ उन्होंने अपने को ध्वनि सिद्धान्त का प्रवर्तक बताया है। इसके पहले वाले श्लोक में प्रयुक्त ‘सहृदय’ शब्द किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं, बल्कि सहृदय लोगों का वाचक है और कारिका तथा वृत्ति, दोनों भागों के रचयिता आचार्य आनन्दवर्धन को ही मानना चाहिए।

इस अनुपम ग्रंथ पर दो टीकाएँ लिखी गयीं- ‘चन्द्रिका’ और ‘लोचन’। हालाँकि केवल ‘लोचन’ टीका ही आज उपलब्ध है। जिसके लिखने वाले आचार्य अभिनव गुप्तपाद हैं। ‘चन्द्रिका’ टीका का उल्लेख इन्होंने ही किया है और उसका खण्डन भी किया है। इसी उल्लेख से पता चलता है कि ‘चंद्रिका’ टीका के टीकाकार भी आचार्य अभिनवगुप्तपाद के पूर्वज थे।

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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

काव्य शास्त्र-10 :: आचार्य रुद्रट

आचार्य रुद्रट :: -आचार्य परशुराम राय

काव्यशास्त्र के इतिहास में आचार्य वामन के बाद प्रसिद्ध आचार्य रुद्रट का नाम आता है। इनका एक नाम शतानन्द भी है। इस संदर्भ में आचार्य रुद्रट के एक टीकाकार ने इन्हीं का एक श्लोक उद्धृत किया हैः-

शतानन्दपराख्येन भट्टवामुकसूनुना।

साधितं रुद्रटेनेदं समाजा धीनतां हितम्।।

इसके अनुसार इनके पिता का नाम वामुकभट्ट था। इनका रुद्रट नाम जैसा शतानन्द प्रसिद्ध नहीं हुआ। आचार्य रुद्रट के मत का उल्लेख धनिक, मम्मट, राजशेखर आदि कई आचार्यों ने किया है। आचार्य, राजशेखर इनके सबसे पहले के पूर्ववर्ती आचार्य है और इनका काल लगभग 920 ई. के आस-पास माना जाता है। इस प्रकार आचार्य रुद्रट का काल नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के आस-पास मानना चाहिए।

काव्यशास्त्र के अधिकांश आचार्य कश्मीरी हैं और इनमें से अधिकांश आचार्यों ने अपने ग्रंथों को ‘काव्यलङ्कार’ नाम से ही अभिहित किया है। आचार्य रुद्रट ने भी अपने काव्यशास्त्र के ग्रंथ का नाम भी यही रखा है। इस ग्रंथ में कुल 714 आर्याएँ (एक छंद विशेष) हैं और यह 16 अध्यायों में विभक्त हैं।

आचार्य रुद्रट नौ रसों के स्थान पर दस रस मानते हैं। दसवें रस को ‘प्रेयरस’ के नाम से इन्होंने अभिहित किया है। इसके अतिरिक्त अलंकारों का विभाजन करने के लिए उन्होंने चार तत्व निर्धारित किए हैं-औपम्य, अतिशय और श्लेष। इन्होंने मत, साम्य, पिहित और भाव नाम के चार नये अलंकार प्रतिपादित किए हैं। कुछ प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रतिपादित अंलकारों को इनके द्वारा नए नाम दिए गये हैं, यथा आचार्य भामह के ‘व्याजस्तुति अलंकार’ को व्याजश्लेष, ‘स्वभावोक्ति’ को ‘जाति’ और ‘उदात्त’ को ‘अवसर अलंकार’ आदि ।

आचार्य रुद्रट के ग्रंथ ‘काव्यालंकार’ के तीन टीकाकारों का उल्लेख मिलता है- आचार्य वल्लभदेव, आचार्य नमिसाधु और आचार्य आशाधर। अन्तिम दो टीकाकार जैन यति थे। आचार्य वल्लभ देव की टीका‘रुद्रटालंकार’ अभी तक उपलब्ध नहीं हो पायी है।

आचार्य रुद्रभट्ट

आचार्य रुद्रभट्ट का ग्रंथ ‘शृंगारतिलक’ के नाम से जाना जाता है। हालाँकि प्राचीन और अर्वाटीन अधिकांश विद्वान आचार्य रुद्रट और आचार्य रुद्रभट्ट को एक ही व्यक्ति मानते हैं। जबकि कुछ विद्वान दोनों को भिन्न मानते हैं और ऐसे विद्वानों के निम्नलिखित तर्क हैः-

1. आचार्य रुद्रट के ग्रंथ का नाम काव्यालंकार है, जबकि आचार्य रुद्रभट्ट के ग्रंथ का नाम ‘शृंगारतिलक’ है।

2. ‘काव्यालंकार’ में 16 अध्याय हैं, किन्तु ‘शृंगारतिलक’ में तीन परिच्छेद हैं।

3. आचार्य रुद्रट काव्यत्व अलंकारों में मानते हैं, जबकि आचार्य रुद्रभट्ट काव्य का प्रधान तत्व रस मानते हैं।

4. ‘काव्यलंकार’ में दस रसों (दसवाँ प्रेम रस) का उल्लेख है तथा ‘शृगारतिलक’ में नौ रसों का उल्लेख है।

5. ‘काव्यालंकार’ में पाँच वृत्तियों (शैलियों) का उल्लेख किया गया है – मधुरा, परुषा, प्रौढ़ा, ललिता और भद्रा। किन्तु रुद्रभट्ट केवल चार वृत्तियाँ मानते है- कौशिकी, भारती, सात्वती और आरभटी।

6. नायक-नायिका भेद करते समय आचार्य रुद्रट ने वेश्यानायिका का वर्णन मात्र दो श्लोकों में किया है, किन्तु रुद्रभट्ट ने इसका विस्तार से वर्णन किया है।

प्राचीन सूक्तिसंग्रहों में दोनों आचार्यों के पद्य एक-दूसरे के नामों से उल्लिखित हैं। शायद इसी आधार पर इन दोनों आचार्यों को विद्वान एक ही व्यक्ति मानते हैं।

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

काव्य शास्त्र-9 :: आचार्य वामन

आचार्य वामन :: आचार्य परशुराम राय

आचार्य वामन आचार्य उद्भट के समकालीन थे। क्योंकि महाकवि कल्हण ने अपने महाकाव्य राजतरङ्गिणि में लिखा है कि आचार्य उद्भट महाराज जयादित्य की राजसभा के सभापति थे और आचार्य वामन मंत्री थे। जयादित्य का राज्य काल 779 से 813 ई. माना जाता है।

आचार्य वामन काव्यशास्त्र में रीति सम्प्रदाय प्रवर्तक है। ये रीति (शैली) को काव्य की आत्मा मानते हैं। इन्होंने एकमात्र ग्रंथ काव्यालङ्कारसूत्र लिखा है। यहकाव्यशास्त्र का ग्रंथ है जो सूत्र शैली में लिखा गया है। इसमें पाँच अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरण अध्यायों में विभक्त है। इस ग्रंथ में कुल बारह अध्याय हैं। स्वयं इन्होंने ही इस पर कविप्रिया नाम की वृत्ति (टीका या भाष्य) लिखी-

प्रणम्य परमं ज्योतिर्वामनेन कविप्रिया।

काव्यालङ्कारसूत्राणां स्वेषां वृत्तिर्विधीयते

उदाहरण के तौर पर अन्य कवियों के साथ-साथ अपनी कविताओं का भी उल्लेख किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि वे स्वयं भी कवि थे। लेकिन काव्यालंकार सूत्र के अलावा उनके किसी अन्य ग्रंथ का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। हो सकता है कि उन्होंने कुछ श्लोकों की रचना केवल इस ग्रंथ में उदाहरण लिए ही की हो।

काव्यालङ्कारसूत्र पर आचार्य वामन की कविप्रिया नामक वृत्ति ही मिलती है। इस पर किसी ऐसे आचार्य ने टीका नहीं लिखी जो प्रसिद्ध हों। लगता है कि कविप्रिया टीका में आचार्य वामन ने अपने ग्रंथ को इतना स्पष्ट कर दिया है कि अन्य परवर्ती आचार्यों ने अलग से टीका या भाष्य लिखने की आवश्यकता न समझी हो या यह हो सकता है कि आचार्यों ने टीकाएँ की हों, परन्तु वे आज उपलब्ध न हों। क्योंकि काव्यालंकारसूत्र बीच में लुप्त हो गया था। आचार्य मुकुलभट्ट (प्रतीहारेन्दुराज के गुरु) को इसकी प्रति कहीं से मिली, जो आज उपलब्ध है। इस बात का उल्लेख काव्यालंकार के टीकाकार आचार्य सहदेव ने किया है।

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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

काव्य शस्त्र-8 :: आचार्य भट्टोद्भट

आचार्य भट्टोद्भट :: आचार्य परशुराम राय

आचार्य भट्टोद्भट एक कश्मीरी ब्राह्मण थे। आचार्य दण्डी के ये परवर्ती आचार्य हैं। ये कश्मीर के राजा जयादित्य की राजसभा के सभापति थे। इनका काल आठवीं शताब्दी का अन्तिम तथा नवीं शताब्दी का प्रारंभिक भाग माना जाता है।

आचार्य उद्भट के तीन ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। तीन ग्रंथों में केवल काव्यशास्त्र विषयक ग्रंथ काव्यालंकार सारसग्रंह ही मिलता है। दूसरा ग्रंथ भामहविवरण है, जो आचार्य भामह के काव्यलंकार पर टीका है। इसके अतिरिक्त आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र पर इन्होंने एक टीका भी लिखी थी। क्योंकि शार्ङ्गदेव ने अपने संगीतरत्नाकर नामक ग्रंथ में नाट्यशास्त्र व्याख्याताओं में इनके नाम का भी उल्लेख किया हैः

व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटोद्भटशङ्कुकाः।

भट्टाभिनवगुप्तश्च श्रीमत्कीर्तिधरोऽपर।

तीसरा ग्रंथ कुमारसंभव नामक काव्य है। इसी नाम से महाकवि कालिदास द्वारा विरचित ग्रंथ भी है। दोनों की कथावस्तु एक है, लेकिन ग्रंथ अलग-अलग हैं।

काव्यालंकार सार गंग्रह में कुल 79 कारिकाएँ हैं और 41 अलंकारों के लक्षण दिए हैं। पूरा ग्रंथ छः वर्गों विभक्त है। इस ग्रंथ में उदाहरण के रुप में आचार्य उद्भट ने अपने काव्य ग्रंथ कुमारसम्भव से ही लिए हैं।

यहाँ उल्लेखनीय है कि पुनरुक्तवदाभास, काव्यलिंग, छेकानुप्रास, दृष्टांत और संकर ये पाँच अलंकार काव्यालंकार सारसंग्रह में ही मिलते हैं। इनके पूर्ववर्ती आचार्य भामह और दण्डी के ग्रंथों में नहीं मिलते।

उत्प्रेक्षावयव, उपमा-रूपक और यमक अलंकारों को आचार्य भामह और दण्डी उत्प्रेक्षा के अन्तर्गत मानते हैं, किन्तु उद्भट इससे सहमत नहीं हैं। इसी प्रकार आचार्यच दण्डी ने अपने ग्रंथ काव्यादर्श में लेश, सूक्ष्म तथा हेतु अलंकारों की भी चर्चा की है, जबकि आचार्य भामह उनका निषेध करते हैं और आचार्य उद्भट ने तो इनका उल्लेख ही नहीं किया है।

इसके अतिरिक्त रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि, समाहित और श्लिष्ट अलंकारों के निरूपण भामह और दण्डी के ग्रंथों में मिलते तो हैं, लेकिन उनके लक्षण (परिभाषा) स्पष्ट नहीं हैं। इन अलंकारों के स्पष्ट लक्षण आचार्य उद्भट के काव्यालंकार सार-सग्रंह में ही मिलते हैं और ये तथा पुरुक्तवद्भास आदि पाँच अलंकार काव्यशास्त्र के लिए आचार्य. उद्भट की अनुपम देन हैं।

आचार्य उद्भट के काव्यालंकार सारसग्रंह की दो टीकाएँ मिलती हैं-

प्रतीहारेन्दुराजकृत ‘लघुविवृति’ और राजनक तिलक की उद्भटविवेक।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

काव्यशास्त्र के मेधाविरुद्र या मेधावी

काव्यशास्त्र के मेधाविरुद्र या मेधावी

-आचार्य परशुराम राय

आचार्य भरतमुनि के बाद साहित्यशास्त्र के इतिहास पटल पर आचार्य भामह का काल छठवें विक्रम सम्वत का पूर्वार्ध माना गया। आचार्य भरतमुनि और आचार्य भामह के बीच लगभग छः- सात सौ वर्षों का एक लम्बा अन्तराल आता है। अन्य शास्त्रों में इस अवधि में अनेक ग्रंथों का प्रणयन हुआ, तो साहित्यशास्त्र का क्षेत्र सूना नहीं रहा होगा। निश्चित रूप से कई आचार्य हुए होंगे और कई ग्रंथ रचे गए होंगे। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस काल के कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं हैं। आचार्य मेधाविरुद्र द्वारा उपमालंकार के दोषों का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसका उल्लेख आचार्य भामह ने स्वयं अपने काव्यालंकार में उपमा अलंकार के दोषों को दर्शाते हुए किया है। उन्होंने आचार्य मेधावी के नाम का भी उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त वामन, दण्डी, रूद्रट, राजशेखर आदि आचार्यों ने भी अपने ग्रंथों में आचार्य मेधावी के नाम का उल्लेख करते हुए इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों की चर्चा की है।
वर्तमान में आचार्य मेधावी का कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। चूंकि आचार्य भामह ने अपने ग्रंथ में इनके नाम का उल्लेख किया है, तो यह निश्चित है कि ये उनके पूर्ववर्ती आचार्य हैं। इनके जीवन काल के सम्बन्ध में केवल इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे आचार्य भरत और आचार्य भामह के बीच में आते हैं।
परवर्ती आचार्यों ने आचार्य मेधावी को निम्नलिखित तीन सिद्धांतों के निरूपण हेतु याद किया हैः
1.उपमादोष निरूपण
2.यथासंख्य अलंकार को उत्प्रेक्षा से अलग अलंकार मानना।
3.पाँच के स्थान पर केवल चार शब्द विभाग मानना अर्थात नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात।
(शब्द के पाँच विभाग हैं- नाम, आख्यात (क्रिया), उपसर्ग, निपात, कर्मप्रवचनीय - वे उपसर्ग या अव्यय, जो क्रियाओं के साथ सम्बद्ध न होकर संज्ञाओं का शासन करते हैं।)
आचार्य मेधावी अन्तिम विभाग अर्थात् कर्मप्रवचनीय को नहीं मानते। निरुक्तकार महर्षि यास्क का मत भी यही है।
आचार्य मेधाविरुद्र के ग्रंथों की अनुपलब्धि साहित्यशास्त्र के लिए बहुत बड़ी क्षति है।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

काव्यशास्त्र - 4

नाट्यशास्त्र प्रणेता भरतमुनि

- परशुराम राय

भारतीय साहित्यशास्त्र पर उपलब्ध ग्रंथों के साक्ष्यों पर दृष्टि डालने पर यह निर्विवाद सत्य है कि इस परम्परा के आदि आचार्य भरतमुनि ही हैं और इनका एकमात्र ग्रंथनाट्यशास्त्रही मिलता है। वैसे नाम से यह केवल नाट्य विषयक ग्रंथ लगता है, किन्तु यह अनेक कलाओं का विश्वकोष है। क्योंकि आचार्य भरतमुनि के अनुसार न ऐसा कोई ज्ञान है, न शिल्प, न कोई ऐसी विद्या, न कला, न योग और नंही कोई कर्म है जो नाट्य में न पाया जाता हो-

न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला।

नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येडस्मिन यन्न दृश्यते।।

भरतमुनि के काल के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वान तो इन्हें काल्पनिक व्यक्ति मानते हैं, यथा डॉ. मनमोहन घोष। लेकिन अनेक साक्ष्यों के आधार पर यह निर्विवाद सत्य है कि आचार्य भरतमुनि एक ऐतिहासिक पुरुष हैं और इसका उल्लेख मत्स्यपुराण में भी मिलता है। कहा जाता है कि स्वर्गलोक में लक्ष्मी स्वयंवर का मंचन आचार्य भरतमुनि ने किया था, जिसमें प्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी लक्ष्मी का अभिनय करते समय महाराज पुरुरवा को देखकर उन पर मोहित हो गयी और अभिनय करना भूल गयी थी। इस पर भरतमुनि ने कुपित होकर दोनों को शाप दे दिया था। महाकवि कालिदास नेविक्रमोर्वशीयम्में इस घटना का संकेत करते हुए आचार्य भरतमुनि का उल्लेख किया हैः-

मुनिना भरतेन यः प्रयोगो भवतीष्वष्टरसाश्रयः प्रयुक्तः।

ललिताभिनयं तमद्य भर्ता मरुतां द्रष्टुमनाः सलोकपालः।।

इसके अतिरिक्त भट्टोद्भट, भट्टलोल्लट, भट्टशंकुक भट्टनायक, अभिनवगुप्त, कीर्तिधर, राहुल, भट्टयंत्र और हर्षवार्तिक जैसे उद्भट आचार्यों ने नाट्यशास्त्र पर टीकाएँ लिखीं। इन सबको देखकर यह कहना असंगत होगा कि नाट्यशास्त्रके प्रणेता भरतमुनि एक काल्पनिक व्यक्ति हैं। हालाँकि उक्त टीकाकार आचार्यों का उल्लेख विभिन्न काव्यशास्त्रों तथा इस ग्रंथ पर उपलब्ध एक मात्र आचार्य अभिनवगुप्त की टीका अभिनवभारतीमें मिलता है, अन्य उक्त आचार्यों की टीकाएँ आज अनुपलब्ध हैं। यही नहीं अभिनवभारतीटीका मूल रूप में पूरी उपलब्ध नहीं है। जो मिला है, वह भी काफी अशुद्ध है। आचार्य विश्वेश्वर सिद्धांतशिरोमणि (काव्यप्रकाश के हिन्दी-व्याख्याता) ने तो यहाँ तक लिखा है कि अभिनव भारती की उपलब्ध प्रति पढ़कर स्वर्ग से आकर स्वयं आचार्य अभिनवगुप्त भी उसे नहीं समझ सकते। विदेशी विद्वानों ने भी नाट्यशास्त्र की खण्डित प्रतियाँ लेकर प्रकाशित करने का अदम्य प्रयास किया इनमें फेड्रिक हाल, जर्मन विद्वान हेमान, फ्रांसीसी विद्वान रैग्नो एवं इनके शिष्य ग्रौसे आदि का नाम उल्लेखनीय है। आचार्य विश्वेश्वर सिद्धांत-शिरोमणि ने अभिनवभारतीका यथासम्भव पाठ संशोधन कर नया संस्करण प्रस्तुत किया और सम्पादन भी किया, जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय की हिन्दी अनुसंधान परिषदने प्रकाशित किया है।

ऐतिहासिक दृष्टि के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, यथा- व्यक्ति का जन्म-काल, पैतृक पृष्ठभूमि, शिक्षा-दीक्षा आदि, भरतमुनि के विषय में उन सबका अभाव है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अटकलें लगाते हुए अधिकांश विद्वान सहमत हैं कि भरतमुनि का जीवन काल विक्रमपूर्व 500 वर्ष से प्रथम विक्रमशताब्दी के बीच ही रहा है।

इनके द्वारा विरचित नाट्यशास्त्र में 6000 श्लोक हैं। इसीलिए इसका एक नाम षट्साहस्त्री संहिताभी है। किन्तु शायद इसके पूर्व इसमें 12000 श्लोक रहे होगें, क्योंकि द्वादशसाहस्त्री संहितानाम का भी उल्लेख भरतनाट्यशास्त्रके लिए मिलता है। आचार्य शारदातनयकृतभावप्रकाशननामक ग्रंथ में इस सम्बन्ध में निम्नलिखित श्लोक आया हैः-

एवं द्वादशसाहस्त्रैः श्लोकैरेकं तदर्धतः।

षड्भिः श्लोकसहस्त्रैर्यो नाट्यवेदस्य सग्रंहः।।

यहाँनाट्यशास्त्रके लिएनाट्यवेदशब्द का प्रयोग किया गया है। आचार्य शारदातनय नेद्वादशसाहस्त्री संहिताके रचयिता वृद्ध भरत को और षट्साहस्त्री संहिताके रचयिता आचार्य भरत को माना है।

नाट्यशास्त्र उपलब्ध संस्करणषट्साहस्त्री संहितामें 36 अध्याय हैं, जबकि निर्णयसागर द्वारा प्रकाशित प्रथम संस्करण में 37 अध्याय दिए गए थे। वैसेनाट्यशास्त्रके प्रचीन टीकाकार आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इसमें 36 अध्यायों का ही उल्लेख किया है।