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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

यह मेरी मातृभूमि है

arunpicकथा सम्राट प्रेमचंद  की यह कहानी "यह मेरी मातृभूमि है" उनकी कम प्रचलित कहानियों में है लेकिन अपनी मिटटी के प्रति प्रेम को दिखाती यह एक महत्वपूर्ण कहानी है. आज जब विश्व की सीमाएं सिमट रही हैं  फिर भी आज प्रासंगिक है यह कहानी.  आप भी पढ़िए.                                   अरुण चंद्र रॉय
यह मेरी मातृभूमि है

प्रेमचंद

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है अरुण चंद्र रॉय की प्रस्तुति।

आज पूरे 60 वर्ष के बाद मुझे मातृभूमि-प्यारी मातृभूमि के दर्शन प्राप्त हुए हैं। जिस समय मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ था और भाग्य मुझे पश्चिम की ओर ले चला था, उस समय मैं पूर्ण युवा था। मेरी नसों में नवीन रक्त संचालित हो रहा था। हृदय उमंगों और बड़ी-बड़ी आशाओं से भरा हुआ था। मुझे अपने प्यारे भारतवर्ष से किसी अत्याचारी के अत्याचार या न्याय के बलवान हाथों ने नहीं जुदा किया था। अत्याचारी के अत्याचार और कानून की कठोरताएँ मुझसे जो चाहे करा सकती हैं, मगर मेरी प्यारी मातृभूमि मुझसे नहीं छुड़ा सकती। वे मेरी उच्च अभिलाषाएँ और बड़े-बड़े ऊँचे विचार ही थे, जिन्होंने मुझे देश-निकाला दिया था।
मैंने अमेरिका जाकर वहाँ खूब व्यापार किया और व्यापार से धन भी खूब पैदा किया तथा धन से आनंद भी खूब मनमाने लूटे। सौभाग्य से पत्नी भी ऐसी मिली, जो सौंदर्य में अपना सानी आप ही थी। उसकी लावण्यता और सुन्दरता की ख्याति तमाम अमेरिका में फैली। उसके हृदय में ऐसे विचार की गुंजाइश भी न थी, जिसका संबंध मुझसे न हो, मैं उस पर तन-मन से आसक्त था और वह मेरी सर्वस्व थी। मेरे पाँच पुत्र थे जो सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट और ईमानदार थे। उन्होंने व्यापार को और भी चमका दिया था। मेरे भोले-भाले नन्हें-नन्हें पौत्र गोद में बैठे हुए थे, जबकि मैंने प्यारी मातृभूमि के अंतिम दर्शन करने को अपने पैर उठाये। मैंने अनंत धन, प्रियतमा पत्नी, सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े नन्हें-नन्हें बच्चे आदि अमूल्य पदार्थ का केवल इसीलिए परित्याग कर दिया कि मैं प्यारी भारत-जननी का अंतिम दर्शन कर लूँ। मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ; दस वर्ष के बाद पूरे सौ वर्ष का हो जाऊंगा। अब मेरे हृदय में केवल एक ही अभिलाषा बाकी है कि मैं अपनी मातृभूमि का रजकण बनूँ।


यह अभिलाषा कुछ आज ही मेरे मन में उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि उस समय भी थी जब मेरी प्यारी पत्नी अपनी मधुर बातों और कोमल कटाक्षों से मेरे हृदय को प्रफुल्लित किया करती थी। और जबकि मेरे युवा पुत्र प्रात:काल आकर अपने वृद्ध पिता को सभक्ति प्रणाम करते, उस समय भी मेरे हृदय में एक काँटा-सा खटखटाता रहता था कि मैं अपनी मातृभूमि से अलग हूँ। यह देश मेरा देश नहीं है और मैं इस देश का नहीं हूँ।

मेरे पास धन था, पत्नी थी, लड़के थे और जायदाद थी, मगर न मालूम क्यों, मुझे रह-रहकर मातृभूमि के टूटे झोंपड़े, चार-छै बीघा मौरूसी जमीन और बालपन की लँगोटियाँ यारों की याद अक्सर सता जाया करती। प्राय: अपार प्रसन्नता और आनंदोत्सव के अवसर पर भी यह विचार हृदय में चुटकी लिया करता था कि ‘‘यदि मैं अपने देश में होता।’’

जिस समय मैं बंबई में जहाज से उतरा, मैंने पहिले काले कोट-पतलून पहने टूटी-फूटी अँगरेजी बोलते हुए मल्लाह देखे। फिर अँगरेज़ी दूकान, ट्राम और मोटरगाड़ियाँ दीख पड़ी। इसके बाद रबरटायर वाली गाड़ियों की ओर मुँह में चुरट दाबे हुए आदमियों से मुठभेड़ हुई। फिर रेल का विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन देखा। बाद में मैं रेल में सवार होकर हरी-भरी पहाड़ियों के मध्य में स्थित अपने गाँव को चल दिया। उस समय मेरी आँखों में आँसू भर आये और मैं खूब रोया, क्योंकि यह मेरा देश न था। यह वह देश न था, जिसके दर्शनों की इच्छा सदा मेरे हृदय में लहराया करती थी। यह तो कोई और देश था। यह अमेरिका या इंग्लैंड था; मगर प्यारा भारत नहीं था।

रेलगाड़ी जंगलों, पहाड़ों, नदियों और मैदानों को पार करती हुई मेरे प्यारे गाँव के निकट पहुँची, जो किसी समय में फूल, पत्तों और फलों की बहुतायत तथा नदी-नालों की अधिकता से स्वर्ग की होड़ कर रहा था। मैं उस गाड़ी से उतरा, तो मेरा हृदय बाँसों उछल रहा था-अब अपना प्यारा घर देखूँगा-अपने बालपन के प्यारे साथियों से मिलूँगाँ। मैं इस समय बिलकुल भूल गया था कि मैं 10 वर्ष का बूढ़ा हूँ। ज्यों-ज्यों मैं गाँव के निकट आता था, मेरे पग शीघ्र-शीघ्र उठते थे और हृदय में अकथनीय आनंद का स्रोत्र उमड़ रहा था। प्रत्येक वस्तु पर आँखें फाड़-फाड़कर दृष्टि डालता। अहा ! यह वही नाला है, जिसमें हम रोज घोड़े नहलाते थे और स्वयं भी डुबकियाँ लगाते थे, किन्तु अब उसके दोनों और काँटेदार तार लगे हुए थे। सामने एक बँगला था, जिसमें दो अँगरेज बँदूकें लिये इधर-उधर ताक रहे थे। नाले में नहाने की सख्त मनाही थी।

गाँव में गया और निगाहें बालपन के साथियों को खोजने लगीं, किन्तु शोक ! वे सब के सब मृत्यु के ग्रास हो चुके थे। मेरा घर-मेरा टूटा-फूटा झोपड़ा-जिसकी गोद में मैं बरसों खेला था, जहाँ बचपन और बेफ्रिकी का आनंद लूटे थे और जिनका चित्र अभी तक मेरी आँखों में फिर रहा था, वही मेरा प्यार घर अब मिट्टी का ढेर हो गया था।

यह स्थान गैर-आबाद न था। सैकड़ों आदमी चलते-फिरते दृष्टि में आते थे, जो अदालत-कचहरी और थाना-पुलिस की बातें कर रहे थे, उनके मुखों से चिंता, निर्जीवता और उदासी प्रदर्शित होती थी और वे सब सांसारिक चिंताओं से व्यथित मालूम होते थे। मेरे साथियों के समान हृदय-पुष्ट, बलवान, लाल चेहरे वाले नवयुवक कहीं न दीख पड़ते थे। उस अखाड़े के स्थान पर जिसकी जड़ मेरे हाथों ने डाली थी, अब एक टूटा-फूटा स्कूल था। उसमें दुर्बल तथा कांतिहीन, रोगियों की-सी सूरत वाले बालक फटे कपड़े पहिने बैठे ऊँघ रहे थे। उनको देखकर सहसा मेरे मुख से निकल पड़ा कि नहीं-नहीं, यह मेरा प्यारा देश नहीं है।

बरगद के पेड़ की ओर मैं दौड़ा, जिसकी सुहावनी छाया में मैंने बचपन के आनंद उड़ाये थे, जो हमारे छुटपन का क्रीड़ास्थल और युवावस्था का सुखद वासस्थान था। आह ! इस प्यारे बरगद को देखते ही हृदय पर एक बड़ा आघात पहुँचा और दिल में महान् शोक उत्पन्न हुआ। उसे देखकर ऐसी-ऐसी दु:खदायक तथा हृदय-विदारक स्मृतियाँ ताजी हो गयीं कि घण्टों पृथ्वी पर बैठे-बैठे मैं आँसू बहाता रहा। हाँ ! यही बरगद है, जिसकी डालों पर चढ़कर मैं फुनगियों तक पहुँचता था, जिसकी जटाएँ हमारी झूला थीं और जिसके फल हमें सारे संसार की मिठाइयों से अधिक स्वादिष्ट मालूम होते थे। मेरे गले में बाहे डालकर खेलने वाले लँगोटिया यार, जो कभी रूठते थे, कभी मनाते थे, कहाँ गये ? हाय, बिना घरबार का मुसाफिर अब क्या अकेला हूँ ? क्या मेरा कोई भी साथी नहीं ? इस बरगद के निकट अब थाना था और बरगद के नीचे कोई लाल साफा बाँधे बैठा था। उसके आस-पास दस-बीस लाल पगड़ी वाले करबद्ध खड़े थे। वहाँ फटे-पुराने कपड़े पहने, दुर्भिक्षग्रस्त पुरुष, जिस पर अभी चाबुकों की बौछार हुई थी, पड़ा सिसक रहा था। मुझे ध्यान आया कि यह मेरा प्यारा देश नहीं है, कोई और देश है। यह योरोप है, अमेरिका है, मगर मेरी प्यारी मातृभूमि नहीं है- कदापि नहीं है।

इधर से निराश होकर मैं उस चौपाल की ओर चला, जहाँ शाम के वक्त पिताजी गाँव के अन्य बुजुर्गों के साथ हुक्का पीते और हँसी-कहकहे उड़ाते थे। हम भी उस टाट के बिछौने पर कलाबाजियाँ खाया करते थे। कभी-कभी वहाँ पंचायत भी बैठती थी, जिसके सरपंच सदा पिताजी ही हुआ करते थे। इसी चौपाल के पास एक गोशाला थी, जहाँ गाँव भर की गायें रखी जाती थीं, और बछड़ों के साथ हम यहीं किलोलें किया करते थे। शोक ! कि अब उस चौपाल का पता तक न था। वहाँ अब गाँवों में टीका लगाने की चौकी और डाकखाना था।

उस समय इसी चौपाल से लगा एक कोल्हवाड़ा था, जहाँ जाड़े के दिनों में ईख पेरी जाती थी और गुड़ की सुगंध से मस्तिष्क पूर्ण हो जाता था। हम और हमारे साथी वहाँ गंडरियों के लिए बैठे रहते और गंडरियाँ करने वाले मजदूरों के हस्तलाघव को देखकर आश्चर्य किया करते थे। वहाँ हजारों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिलाकर पिया था और वहाँ आस-पास के घरों की स्त्रियाँ और बालक अपने-अपने घड़े लेकर आते थे और उनमें रस भरकर ले जाते थे। शोक है कि वे कोल्हू अब तक ज्यों के त्यों खड़े थे, किन्तु कोल्हवाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटने वाली मशीन लगी थी और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेटवाले की दूकान थी। इन हृदय-विदारक दृश्यों को देखकर मैंने दुखित हृदय से, एक आदमी से, जो देखने में सभ्य मालूम होता था, पूछा, ‘‘महाशय, मैं एक परदेशी यात्री हूँ। रात भर लेट रहने के लिए मुझे आज्ञा दीजिए ?’’ इस आदमी ने मुझे सिर से पैर तक गहरी दृष्टि से देखा और कहने लगा कि ‘‘आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है।’’ मैं आगे गया और वहां से भी यही उत्तर मिला। ‘‘आगे जाओ।’’ पाँचवीं बार एक सज्जन से स्थान माँगने पर उन्होंने एक मुट्ठी चने मेरे हाथ पर रख दिये। चने मेरे हाथ से छूट पड़े और नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा बहने लगी। मुख से सहसा मिकल पड़ा कि ‘‘हाय ! यह मेरा देश नहीं है, यह कोई और देश है। यह हमारा अतिथि-सत्कारी प्यारा भारत नहीं है- कदापि नहीं।’’

मैंने एक सिगरेट की डिबिया खरीदी और एक सुनसान जगह पर बैठकर सिगरेट पीते हुए पूर्व समय की याद करने लगा कि अचानक मुझे धर्मशाला का स्मरण हो आया, जो मेरे विदेश जाते समय बन रही
थी; मैं उस ओर लपका कि रात किसी प्रकार वहीं काट लूँ, मगर शोक ! शोक !!! महान् शोक ! !!! धर्मशाला ज्यों की त्यों खड़ी थी, किन्तु उसमें गरीब यात्रियों के टिकने के लिए स्थान न था। मदिरा, दुराचार और द्यूत ने उसे अपना घर बना रखा था। यह दशा देखकर विवशतः मेरे हृदय से एक सर्द आह निकल पड़ी और मैं जोर से चिल्ला उठा कि ‘‘नहीं, नहीं, नहीं और हजार बार नहीं है’’- यह मेरा प्यारा भारत नहीं है। यह कोई और देश है। यह योरोप है, अमेरिका है; मगर भारत कदापि नहीं है।

अँधेरी रात थी। गीदड़ और कुत्ते अपने-अपने कर्कश स्वर के उच्चारण कर रहे थे। मैं अपना दुखित हृदय लेकर उसी नाले के किनारे जाकर बैठ गया और सोचने लगा- अब क्या करूँ। फिर अपने पुत्रों के पास लौट जाऊँ और अपना यह शरीर अमेरिका की मिट्टी में मिलाऊँ। अब तक मेरी मातृभूमि थी, मैं विदेश में जरूर था किंतु मुझे अपने प्यारे देश की याद बनी थी, पर अब मैं देश-विहीन हूँ। मेरा कोई देश नहीं है। इसी सोच-विचार में मैं बहुत देर तक घुटनों पर सिर रखे मौन रहा। रात्रि नेत्रों में ही व्यतीत की। घंटे वाले ने तीन बजाये और किसी के गाने का शब्द कानों में आया। हृदय गद्गद् हो गया कि यह तो देश का ही राग है, यह तो मातृभूमि का ही स्वर है। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ और क्या देखता हूँ कि 15-20 वृद्ध स्त्रियाँ, सफेद धोतियाँ पहिने, हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं :
‘‘हमारे प्रभु, अवगुन चित न धरो....’’

मैं इस गीत को सुनकर तन्मय हो ही रहा था कि इतने में मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुन पड़ी। उनमें से कुछ लोग हाथों में पीतल के कमंडलु लिये हुए शिव-शिव, हर-हर, गंगे-गंगे, नारायण-नारायण आदि शब्द बोलते हुये चले जाते थे। आनंददायक और प्रभावोत्पादक राग से मेरे हृदय पर जो प्रभाव हुआ, उसका वर्णन करना कठिन है।

मैंने अमेरिका की चंचल से चंचल और प्रसन्न से प्रसन्न चित्तवाली लावण्यवती स्त्रियों का आलोप सुना था, सहस्त्रों बार उनकी जिह्वा से प्रेम और प्यार के शब्द सुने थे, हृदयाकर्षक वचनों का आनंद उठाया था, मैंने सुरीले पक्षियों का चहचहाना भी सुना था, किन्तु जो आनंद, जो मज़ा और जो सुख मुझे इस राग में आया, वह मुझे जीवन में कभी प्राप्त नहीं हुआ था। मैंने खुद गुनगुना कर गाया :
‘‘हमारे प्रभु, अवगुन चित न धरो.....’’

मेरे हृदय में फिर उत्साह आया कि ये तो मेरे प्यारे देश की ही बातें हैं। आनंदातिरेक से मेरा हृदय आनंदमय हो गया। मैं भी इन आदमियों के साथ हो लिया और 6 मील तक पहाड़ी मार्ग पार करके उसे नदी के किनारे पहुँचा, जिसका नाम पतित-पावनी है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिंदू अपना परम सौभाग्य समझता है। पतित-पावनी भागीरथी गंगा मेरे प्यारे गाँव से छै-सात मील पर बहती है। किसी समय में घोड़े पर चढ़कर गंगा माता के दर्शनों की लालसा हृदय में सदा रहती थी। यहाँ मैंने हजारों मनुष्यों को इस ठंडे पानी में डुबकी लगाते हुए देखा। कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री-मंत्र का जाप कर रहे थे। कुछ लोग हवन करने में संलग्न थे। कुछ माथे पर तिलक लगा रहे थे और कुछ लोग सस्वर वेदमंत्र पढ़ रहे थे। मेरा हृदय फिर उत्साहित हुआ और मैं जोर से कह उठा- ‘‘हाँ, हाँ, यही मेरा प्यारा देश है, यही मेरी पवित्र मातृभूमि है, यही मेरा सर्वश्रेष्ठ भारत है और इसी के दर्शनों की मेरी उच्कट इच्छा थी तथा इसी की पवित्र धूलि कण बनने की मेरी प्रबल अभिलाषा है।’’

मैं विशेष आनंद में मग्न था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतारकर फेंक दिया और गंगा माता की गोद में जा गिरा, जैसे कोई भोला-भाला बालक दिनभर निर्दय लोगों के साथ रहने के बाद संध्या को अपनी प्यारी माता की गोद में दौड़कर चला आये और उसकी छाती से चिपट जाय। हाँ, अब मैं अपने देश में हूँ। यह मेरी प्यारी मातृभूमि है। ये लोग मेरे भाई हैं और गंगा मेरी माता है।

मैंने ठीक गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटी बनवा ली है। अब मुझे सिवा राम-नाम जपने के और कोई काम नहीं है। मैं नित्य प्रात:-सायं गंगा-स्नान करता हूँ और मेरी प्रबल इच्छा है कि इसी स्थान पर मेरे प्राण निकलें और मेरी अस्थियाँ गंगा माता की लहरों की भेंट हों।

मेरी स्त्री और मेरे पुत्र बार-बार बुलाते हैं; मगर अब मैं यह गंगा माता का तट और अपना प्यारा देश छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। अपनी मिट्टी गंगा जी को ही सौंपूंगा। अब संसार की कोई आकांक्षा मुझे इस स्थान से नहीं हटा सकती, क्योंकि यह मेरा प्यार देश और यही प्यारी मातृभूमि है। बस, मेरी उत्कट इच्छा यही है कि मैं अपनी प्यारी मातृभूमि में ही अपने प्राण विसर्जन करूँ।

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

हिंदी के अमर कथाकार,उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी



मुंशी प्रेमचंद 
हिंदी के अमर कथाकार, उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई सन्1880 में बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उनके पिता मुंशी अजायबलाल निम्न-मध्यवर्ग के कुलीन कायस्थ थे। वे डाकखाने में मुंशी के पद पर कार्य किया करते थे। अपनी नई आशा में उन्होंने अपने पुत्र का नाम धनपतराय और प्यार का नाम नवाबराय रखा। सन् 1883 में अजायबलाल का स्थानांतरण बांदा हो गया। प्रेमचंद के जन्म के समय से ही इनकी माता बीमार रहने लगी और निर्धनता के कारण उचित चिकित्सा के अभाव में वह पुत्र को सात वर्ष का छोड़ कर स्वर्ग सिधार गई।

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है मनोज भारती की रचना।
पांच वर्ष की अवस्था में ही प्रेमचंद को अपनी कुल-परंपरा के अनुसार उर्दू-फारसी पढ़ाना शुरु किया गया। पर वे मदरसे की गणित जैसे रूखे विषयों की पुस्तकों के स्थान पर उपन्यासों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। बचपन में उपन्यास पढ़ने की इस लत ने ही उन में उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति भी आगे चल कर जागृत कर दी और धीरे-धीरे वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास लेखक के पद पर आसीन हो गए। किंतु इस प्रवृत्ति के कारण वे स्कूल की पढ़ाई में और विशेष रूप से गणित में बहुत कमजोर रह गए। पन्द्रहवें वर्ष में पदार्पण करते-करते,जबकि वे अभी नवीं कक्षा में ही पढ़ रहे थे,उनका विवाह भी हो गया। इसी समय उनके पिता का देहांत हो गया। इन दोनों घटनाओं ने प्रेमचंद जी के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डाला। छोटे भाई,विमाता तथा पत्नी इन तीनों प्राणियों का पालन-पोषण व अपनी पढ़ाई के खर्च के भार ने पन्द्रह वर्ष की छोटी-सी अवस्था में ही प्रेमचंद जी की कमर तोड़ डाली। विवश होकर स्कूल छोड़ देना पड़ा।

पांच रुपए मासिक की ट्यूशन कर किसी प्रकार से मैट्रिक परीक्षा पास की। गांव से पांच मील चल कर प्रतिदिन कॉलेज पढ़ने जाना,ट्यूशन पढ़ाना,परिवार का पालन-पोषण करना,इन सब शारीरिक और मानसिक कष्टों के कारण प्रेमचंद की दशा अत्यंत दयनीय हो उठी। फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी और दो बार इंटर परीक्षा में प्रविष्ट हुए,पर गणित के कारण दोनों बार ही असफल हुए। ऐसे ही समय में उन्हें स्कूल मास्टर की अठारह रुपए मासिक की नौकरी मिल गई। सन् 1902 में इलाहाबाद ट्रेनिंग कॉलेज से जे.टी.सी. की परीक्षा पास की और वहीं मॉडल स्कूल में हैडमास्टर बन गए। सन् 1908 में वे स्कूलों के सब-डिप्टी इन्सपेक्टर बन कर हमीरपुर पहुंचे, तो वहां आप को बुंदेलखंडी देहातों के दौरों में भारतीय कृषक-जीवन को निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 'रानी सारंधा', 'राजा हरदौल' आदि ऐतिहासिक कहानियां यहीं लिखी गई। इसी समय 'सोजे-वतन' नामक देशभक्तिपूर्ण पांच उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसके कारण अंग्रेज सरकार बौखला उठी और पुस्तक की पांच सौ प्रतियां जब्त करके जला दी गई। साथ ही प्रेमचंद जी को भविष्य में ऐसी कोई रचना न लिखने के लिए सावधान भी किया गया।

इस घटना से प्रेमचंद को बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने अपना नाम धनपतराय व नवाबराय से बदलकर 'प्रेमचंद' नाम से साहित्य-निर्माण आरम्भ कर दिया। आगे चलकर इस प्रेमचंद उपनाम से ही वे हिंदी जगत में विख्यात हुए। इन्हीं दिनों उनकी पत्नी उनसे लड़-झगड़ कर मायके चली गई। पत्नी के चले जाने से प्रेमचंद का हृदय संवेदना और सहानुभूति पाने के लिए तड़प उठा। ऐसे ही समय में शिव रानी देवी ने उनके संपर्क में आकर इस महान कलाकार के जीवन-निर्माण में महत्त्वपूर्ण योग दिया।

शिवरानी स्वयं बाल-विधवा थी। जिन रुढ़ियों से प्रेमचंद का हृदय उत्पीड़ित था,वे भी उन्ही की शिकार हो चुकी थी। अत: उन्होंने बड़े साहस के साथ समाज की परवाह न कर विधवा शिवरानी के साथ विवाह कर लिया। शिवरानी में प्रेमचंद जी को मनचाहे गुण प्राप्त हो गए। उनका जीवन सरस,सुंदर और सप्राण हो उठा,जिसका  प्रभाव उनकी आगामी रचनाओं पर भी स्पष्ट लक्षित होता है। पीछे उन्हें अपनी पहली पत्नी के विच्छेद पर पश्चाताप भी हुआ और वे जीवन-भर उसका भरण-पोषण करते रहे,पर शिवरानी देवी के बार-बार आग्रह करने पर भी वे उसे स्वयं बुलाने नहीं गए। उनकी इस मानसिक स्थिति का चित्रण एक आलोचक ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में इस प्रकार किया है- "शायद यह..... प्रेमचंद के भीतरी पुरुष को यह समझौता या प्रत्यावर्तन गवारा न हुआ,यह दूसरी बात है; पर उन्हें इसका ज्ञान जरूर हो गया कि भारतीय नारी के ओज का उन्होंने उचित आदर नहीं किया और अपनी इस गलती का परिमार्जन उन्होंने अपने नारी-पात्रों के उन्नयन में किया! किया तो बंगाल के शरच्चंद्र ने भी है, पर प्रेमचंद की नारी अपनी निष्ठा को नीति से जोड़कर रखती है,जबकि शरत् की नारी नीति के बंधन को तोड़कर निष्ठा का पालन करती है।" शिव रानी के त्याग और धैर्य से प्रेमचंद का साहित्य पनप उठा है। शिवरानी में उन्हें प्रथम प्रीति का उन्माद तो न मिला होगा,पर नारीत्व की पूर्णता मिली,सबसे अधिक उन्हें उनमें मातृत्व की छाया मिली। इसी कारण बाद में उन्होंने अपने आपको शिवरानी की स्नेहमयी रक्षा में बच्चे की भांति सौंप डाला। सन् 1910 में वे इंटर परीक्षा में पास हो गए और बाद में उन्होंने बी.ए. भी कर लिया। 

सन् 1914 में वे स्थानांतरित होकर बस्ती आ पहुंचे जहां उन्हें पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी के संपर्क से हिंदी में लिखने की प्रबल प्रेरणा प्राप्त हुई। इसी समय 'सेवासदन' समाप्त हुआ। इससे पूर्व 'सप्त सरोज' नामक हिंदी कहानियों का संग्रह पर्याप्त लोकप्रिय हो चुका था। यहां इनकी पेचिश की बीमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया,इन्ही दिनों उन्हें गोरखपुर गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल का हैडमास्टर बनाकर भेज दिया गया। वहीं पर इनके प्रथम पुत्र श्रीपतराय का जन्म हुआ। 

सन् 1916 के आसपास इनकी अनुभूति बड़ी तीव्र हो गई और 'प्रेमाश्रम' का प्रारंभ हुआ। महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित होकर सन् 1921 में आप ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। कानपुर से आप काशी आए,जहां डेढ़ वर्ष तक मर्यादा का संपादन कर काशी विद्यापीठ में अध्यापक बन गए। सन् 1923 में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। सन् 1928 में उन्होंने 'माधुरी' का संपादन-भार संभाला और सन् 1930 में 'हँस' नामक एक साहित्यिक पत्र का श्रीगणेश किया। इस मासिक पत्र के साथ-साथ 'जागरण' नामक एक साप्ताहिक पत्र भी प्रारंभ किया। अत्यधिक घाटा उठा कर भी प्रेमचंद जी  इन दोनों पत्रों को सन् 1931 से 1935 तक निरंतर चलाते रहे। 'रंगभूमि','गबन' और 'कर्मभूमि' नामक बड़े-बड़े उपन्यास भी इसी अवधि में प्रकाशित हुए।

अलवर के महाराजा ने उन्हें स्थायी रूप से अपने यहां बुलाना चाहा पर उनकी स्वाभिमानी प्रवृत्ति ने किसी राजा के यहां रहना स्वीकार नहीं किया।

सन् 1934 में वे बम्बई में फिल्म-कंपनी में कहानी लिखने चले गए,पर एक वर्ष में ही वहां के वातावरण से ऊब कर बम्बई छोड़कर बनारस लौट आए। इस समय प्रेमचंद जी का सबसे गौरवमय ग्रंथ 'गोदान' लिखा जाने लगा। सन् 1936 में गोदान प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशित होने के कुछ मास अनन्तर अपने अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' को अधुरा ही छोड़कर यह हिंदी का महान कथाकार हम से सदा के लिए विदा हो गया। वास्तव में प्रेमचंद जी ने जीवन-भर आर्थिक संकटों की चक्की में पिसते हुए भी जिस गौरवमय कथा-साहित्य का सृजन किया है उसके कारण वे सदा अमर रहेंगे। 

प्रेमचंद जी वास्तव में हिंदी के एक महान कलाकार थे। नानाविध अभावों से ग्रस्त निम्नमध्यवर्ग का जैसा सजीव सहानुभूतिपूर्ण चित्र प्रेमचंद जी के कथा-साहित्य(कहानी और उपन्यास) में उपलब्ध होता है,वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पीड़ित मानवता की पुकार को उन्होंने बड़े ध्यान से सुना और उसे बड़े ही मर्मस्पर्शी कलात्मक रूप में विश्व को सुनाया। वे जनता के सच्चे प्रतिनिधि कलाकार थे। यही कारण है कि आज भी उनकी रचनाएं बड़े चाव के साथ पढ़ी जाती हैं। इतना ही नहीं उनकी अनेक रचनाओं का अनुवाद चीनी,रुसी आदि अनेक भाषाओं में अनूदित होकर वहां की जनता के द्वारा सोत्साह पढ़ी जा रही हैं। प्रेमचंद वास्तव में किसी देश या जाति के नहीं प्रत्युत अखंड मानवता के प्रचारक एवं विश्व के महान कलाकार थे।

रचनाएं: प्रेमचंद जी ने कुल मिलाकर तीन सौ से अधिक कहानियां, ग्यारह उपन्यास,तीन जीवनियां,आठ विभिन्न भाषाओं से अनूदित ग्रंथ,अनेक आलोचनात्मक तथा विविध विषयों के निबंध,तीन नाटक और बहुत सा बाल-साहित्य देकर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में महत्त्वपूर्ण योग दिया। 

कहानियां: 'मासरोवर' के आठ भागों में उनकी बहुत सी कहानियां संकलित हैं। 'ईदगाह','कफन','अलग्योझा','शतरंज के खिलाड़ी', 'आत्माराम', 'मुक्ति का मार्ग','बेटी का धन', 'बड़े घर की बेटी','डिग्री के रुपए','पंचपरमेश्वर','शंखनाद','दुर्गा का मंदिर','रानी सारंधा','राजा हरदौल','मंदिर और मस्जिद', 'नमक का दारोगा','मंत्र','कामना-तरु','सुजानभगत', 'ईश्वरीय न्याय' ये उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां गिनी जाती हैं।

प्रेमचंद जी जितने बड़े उपन्यासकार थे उतने ही बड़े कहानीकार भी थे। उनकी कहानियों में जीवन के अनेक रूप,समाज के अनेक चित्र और मनोविज्ञान के अनेक पहलू अंकित हुए हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिस पर प्रेमचंद जी की प्रतिभा ने अपना चमत्कार न दिखाया हो। अनेक छोटी-मोटी समस्याओं का इन कहानियों में समाधान करने का प्रयत्न किया गया है।'रामलीला' कहानी में पाखंड पर चोट की गई है। 'सभ्यता की पोल', में बताया गया है कि जिस काम को करने पर कोई छोटा आदमी दुष्ट समझ लिया जाता है,उसी को कोई बड़ा कर बैठे तो कोई कुछ नहीं कहता। 'उद्धार' में दहेज-प्रथा की भयंकरता दिखाई गई है। 'मोटर के छिंटे', 'सत्याग्रह' आदि में हास्य-व्यंग्य की पुट है। 'आत्माराम' कहानी को जिसमें कंजूस महादेव सुनार को डाकुओं का धन पाकर उदार बनने की कथा के साथ-साथ उसका 'आत्माराम' नामक तोते पर प्रगाढ़ प्रेम दिखाया गया है-इसे प्रेमचंद जी ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिना है।'दंड' नामक कहानी में अफसरों की रिश्वतखोरी और मुकदमेंबाजी का चित्र खिंचा गया है। 'पंचपरमेश्वर' में पंचायत-प्रथा की महत्ता बताई गई है। 'बड़े घर की बेटी' में संयुक्त परिवार का वर्णन किया गया है। 'शतरंज के खिलाड़ी' में लखनवी नवाबों के ठाठ-बाठ और शतरंज के भयंकर परिणामों को दिखाया गया है। 'अमावस्या की रात्रि 'और 'मंत्र' में डाक्टरों और वैद्यों की स्वार्थमय प्रवृत्ति तथा गरीब जनता की सात्विकता का चित्र चित्र अंकित किया गया है। 'सत्याग्रह','विनोद','मोटेराम की डायरी' और 'बूढ़ी काकी' सुंदर हास्यरस की कहानियां हैं।

उपन्यास: (1) प्रतिज्ञा या प्रेमा(1904)- विधवा समस्या को लेकर लिखा गया है।
(2) वरदान(1906)- इसमें सामयिक राजनैतिक आन्दोलन प्रतिबिम्बित है।
(3) सेवासदन(1914)-नारी समस्या, विशेषत: वेश्या-सुधार और निम्नमध्यवर्ग की दुर्बलता को लेकर लिखा गया है।
(4) प्रेमाश्रम(1918)- इसमें जमींदारों के द्वारा किसानों के शोषण का चित्र मुख्य रूप से अंकित हुआ है।
(5) निर्मला(1923)- इसमें दहेजप्रथा और बेमेल विवाह के दुष्परिणाम दिखानेवाली एक करुण कथा है।
(6) रंगभूमि(1926)- औद्योगिक शोषण,राजनैतिक दासता तथा अंतर-जातीय विवाह की समस्याओं को लेकर चलने वाला एक बड़ा उपन्यास है।
(7) कायाकल्प(1928)- मध्यवर्ग के मिथ्या अभिमान से विद्रोह कर आत्मा के रहस्यों में खो जाने वाली रचना।
(8) गबन(1930)- निम्न-मध्यवर्ग की पारिवारिक समस्या की भयंकरता का सजीव चित्रण है।
(9) कर्मभूमि(1932)- किसान आन्दोलन और अछूतोद्धार को लेकर यह उपन्यास लिखा गया है।
(10)गोदान(1936)- भारतीय किसान के जीवन-संघर्ष को लेकर लिखा गया यह एक महत्त्वपूर्ण गौरवग्रंथ है।
(11) मंगलसूत्र(अपूर्ण 1936) - लेखक की साहित्य साधना में आने वाले कष्टों का इसमें हृदयस्पर्शी चित्र अंकित हुआ है।

निबंध--'कुछ विचार' के नाम से उनके निबंधों का संग्रह प्रकाशित हुआ है।

नाटक--'संग्राम','कर्बला', 'प्रेम की बेदी' -यह तीन प्रेमचंद जी के नाटक हैं।

जीवनियां--'महात्मा शेखसादी', 'दुर्गादास', 'कलम तलवार और त्याग'।

अनुवाद --'सृष्टि का आरंभ'(बर्नाड शॉ), 'टालस्टाय की कहानियां', 'सुखदास'(जार्ज इलियट का साइलस मेरिनर), 'अहंकार','छाया'(अनातोले फ्रांस), 'चांदी की डिबिया','न्याय','हड़ताल' तीनों गाल्सवर्दो के नाटकों का अनुवाद और 'आज़ाद-कथा'(रतननाथ सरशार)।

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