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गुरुवार, 12 जुलाई 2012

आग की भीख

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआदरणीय  पाठक वृन्द   को   अनामिका का सादर प्रणाम   !  साथियो आज यह  दिनकर  जी के व्यक्तित्व  और कृतित्व पर आधारित  साहित्यिक सफ़र की अंतिम कड़ी  हैं.  इस अंक में पढ़ते  हैं उनकी पुस्तक 'शुद्ध कविता की खोज' पर उनके कुछ और विचार और राष्ट्रीयता पर उनकी सोच  ....

दिनकरजी जीवन दर्पण - भाग - 16

 

दिनकर जीअंतिम चार पंक्तियाँ दिनकर जी का परिचय देती हुई...

 

बंधा तूफ़ान हूँ, चलना मना है

बंधी उद्दाम निर्झर - धार हूँ मैं,

कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी ?

बंधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं.

 

"दुनिया का इतिहास दुनिया की असली अदालत है. उसका फैसला उन लोगों के खिलाफ कभी नहीं गया है जो ज्यादा ताकतवर और ज्यादा पूरे मर्द थे, जिनकी धर्म-कर्म भावना अत्यंत प्रखर थी,  जिनका आत्म-विश्वास अदम्य था. इस अदालत ने बराबर शक्ति और नस्ल की मजबूती पर सच्चाई और इंसाफ को कुर्बान किया है. और इस अदालत ने उन जातियों को हमेशा सजा दी है, जो सत्य को कर्म से तथा न्याय को शक्ति से अधिक महत्त्व देती थीं. गेटे ने कहा था, 'कर्मठ पुरुष विवेकशून्य होते हैं'. विवेकशून्यता उन सभी लोगों का गुण है जो लडाई में भाग लेते हैं. अच्छे बुरे का ज्ञान सिर्फ तमाशबीनों का होता है, जो निरापद और लडाई से दूर हैं".

क्या उक्त विचारों से ईश्वरवाद या धर्म को बल मिलता है ? या इससे अस्तित्ववाद की कड़ी बू आती है ? इस प्रकार इस पुस्तक के पाठक की एक अजीब स्थिति होती है कि एक तरफ तो दिनकरजी नये कवियों को यह सीख देते हैं कि धर्म और रहस्यवाद से कोई बच नहीं सकता और दूसरी तरफ वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि संसार में शक्ति और नस्ल कि जय-जय कार रही है. इस दुधारा और अंतर्विरोध के कारण पुस्तक की दिलचस्पी घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है और यह भी कहा जा सकता है कि इस हद तक दिनकरजी की यह पुस्तक युग-मन के द्विमनस्क फटेपन को भी खोलकर सामने रखने में समर्थ हुई है.

आश्चर्य है कि राष्ट्रीय भावों पर चढ़ कर उदित होनेवाले दिनकर जी राष्ट्रीयता के विरुद्ध हो गए थे. राष्ट्रीयता उन्हें उतनी ही दूर तक ग्राह्य थी जितनी दूर तक वह अंतर्राष्ट्रीय भावनाओं के विकास में सहायक होती हैं. 'नील कुसुम' में उनकी एक कविता का शीर्षक 'राष्ट्र्देवता का विसर्जन' है और अपनी इस विचारधारा को उन्होंने कई निबंधों और भाषणों में भी पल्लवित किया है. फिर भी यह परिवर्तन स्थायी नहीं था, न धर्म की तरह राष्ट्रीयता दिनकर के निकट एक चली हुई गोली बन गयी. ठीक है, राष्ट्रीयता जहाँ तक कि वह पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक हथियार थी, प्रगतिशील थी, पर अब वह प्राच्य देशों में भी (पाश्चात्य में तो वह पहले ही प्रतिक्रियावादी बन चुकी थी ) प्रतिक्रियावादी बनती जा रही है. पर चीनी आक्रमण ने दिनकर जी को फिर एक बार देशभक्ति के आवेश में डाल दिया. इस देशभक्ति के आवेश में बंदरगाह में बंधी गांधीवाद की सुंदर नाव भी बह गयी. जो कुछ भी हो, इससे प्रमाणित होता है कि दिनकरजी किसी व्यक्ति या सिद्धांत के प्रति इतने प्रतिबद्ध नहीं थे कि वे नये वातावरण में नया आक्सीजन ग्रहण करने में चूक या कतरा जाते. इसी गुण के कारण वे वर्तमान जीवन की सारी क्षुद्रताओं, सीमाओं आदि के बावजूद जनप्रिय महाकवि रहेंगे. कोई उनसे कुछ लेगा कोई कुछ. कहा गया है पूर्वापरसंगति गदहे का ही गुण है. दिनकरजी में पूर्वापरसंगति ढूँढने पर कुछ हाथ नहीं लगने का. क्योंकि वे साहित्य-गगन के दिनकर हैं. जिनसे निरंतर ऊर्जा की ही वर्षा हो रही है. फिर कौन ऐसा महाकवि है जिसमे पूर्वापरसंगति  है ?

दिनकरजी के नश्वर शरीर का अंत २५ अप्रेल १९७४ को मद्रास में हुआ. पर जब तक हिंदी भाषा रहेगी, वे अमर हैं.

साथियों आज इस अंतिम कड़ी के साथ ही  दिनकर जी के साहित्य सफ़र को यहीं विश्राम देती हूँ.  प्रस्तुत है दिनकर जी की ज्वलंत रचना 'आग की भीख'.

आग की भीख

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।

- दिनकर

* * *

गुरुवार, 28 जून 2012

एक बार फिर स्वर दो !


आदरणीय  पाठक वृन्द को   अनामिका का नमस्कार  ! लीजिये साथियो शनैः शनैः दिनकर जी के साहित्यिक सफ़र की यह शृंखला अपने अंतिम पड़ाव पर आ पहुंचा है, देश आजाद हो गया  और आप सब के साथ यह शृंखला  सांझा करते करते वक़्त  कैसे बीत गया पता भी नहीं चला......चलिए आज जानते हैं दिनकर जी की देश के आजाद होने के बाद की दूरदर्शिता और गांधीवाद  के प्रति मोह...

दिनकरजी जीवन दर्पण -14


लीजिये चार पंक्तियाँ दिनकर जी के ही शब्दों में....
सुनूं क्या सिन्धु, मैं गर्जन तुम्हारा ?
स्वयं युगधर्मं की हुंकार हूँ मैं.
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय गांडीव की टंकार हूँ मैं.

दिनकरजी जिस कोटि  के कवि हैं, वह स्वभाव से ही विद्रोही होता है. उनका अपना भी वही विश्वास है कि  क्रोध सामाजिक काव्य का मूल रस है. संतुष्ट कवि कविता नहीं उपदेश और आराधना लिखता है.

स्वराज्य प्राप्ति के बाद भी दिनकरजी को संतोष नहीं हुआ. १९४७ में उन्होंने 'अरुणोदय' शीर्षक कविता लिखकर स्वाधीनता का स्वागत उन्मुक्त भाव से किया था. किन्तु स्वराज्य की पहली वर्षगाँठ के आते-आते उनका उत्साह मद्धिम पड़ गया और वे स्वाधीन भारत में भी असंतोष की कविता लिखने लगे.

किसने कहा, और मत बढो हृदय वह्नी के शर से,
भरो भुवन का अंग कुसुम से, कुंकुम से केसर से ?
कुंकुम लेपूँ किसे ? सुनाऊँ किसको कोमल गान ?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान !
फूलों की रंगीन लहर पर ओ इतरानेवालो!
ओ रेशमी नगर के वासी ! ओ छवि के मतवालो !
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है !
(समर शेष है )

और ग्रामों की दुखी जनता की विवशता और विस्मय का यह भाव 

पूछ  रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज;
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज ?

गांधीवादी मार्ग से समाजवाद की स्थापना यदि नहीं हुई तो दिनकर जी देश के सामने हलचल और विप्लव से भरा हुआ भविष्य देखते हैं -

बाँध तोड़ जिस रोज फौज खुलकर हल्ला बोलेगी,
तुम दोगे क्या चीज़ ? वही जो चाहेगी सो लेगी !
स्वत्व छीनकर क्रांति छोडती कठिनाई के प्राण,
बड़ी कृपा उसकी, भारत में मांग रही वह दान !
(भूदान)

तोडना है पुण्य तो तोड़ो ख़ुशी से,
जोड़ने का मोह जी का काल होता !
अनसुनी करते रहे इस वेदना को,
एक दिन ऐसा अचानक हाल होगा -
वज्र की दीवार यह फट जायेगी -
लपलपाती आग या सात्विक प्रलय का रूप धरकर 
नीव की आवाज बाहर आएगी.
(नीव का हाहाकार)

इस देश में ऐसे भी लोग हैं, जो गांधीजी से समाजवाद की प्रेरणा लेते हैं, और ऐसे भी लोग हैं जो गांधीजी का उदाहरण पूंजीवादी व्यवस्था को कायम रखने के लिए देते हैं.  इस पिछले वर्ग के हथकंडों का अनुमान दिनकरजी को १९५३ में हो चुका था, और उन्होंने बड़ी ही दूरदर्शिता के साथ लिखा था कि मार्क्स की बवंडर लानेवाली बौछार से बचने के निमित्त गांधीवाद का छटा ओढना बेकार होगा. अनर्थपूर्ण संचय को न तो मार्क्सवादी टिकने देंगे, न शायद वे लोग जो गांधीवाद को ख्वाम-ख्वाह समाजवाद सिद्ध करने पर तुले हैं.

कहो, मार्क्स से डरे हुओं का गांधी चौकीदार नहीं है
सर्वोदय का दूत किसी संचय का पहरेदार नहीं है.
आशय में जिसके असत्य, हिंसा से जिसकी कुत्सित काया,
सत्य न देगा धूप, अहिंसा उसे न दे पाएगी छाया. 
(काँटों का गीत)

दुर्भाग्यवश दिनकरजी का यह अनुमान सत्य निकला और सचमुच ही लोग गांधीजी का उद्धरण पूंजीवाद के पक्ष में देने लगे. आज परिस्थिति यह है कि गांधीवाद  के स्वीकृत और अधिकारारूढ़ प्रतिपादक पूर्णरूप से प्रतिक्रियावादी और भ्रष्टाचारी हैं. इस स्थिति के पूर्वाभास से क्षुब्ध होकर उन्होंने १९६० में कवितायें लिखो जो क्रमशः 'कल्पना' और 'आजकल' में प्रकाशित हुई.  मार्क्स के भय से घबराया हुआ धनियों का समाज गांधी को अपना त्राता बनाना चाहता है, यह देश के लिए खतरे की  बात थी और गांधीवाद के लिए घातक, क्योंकि इस प्रकार उसकी कलई खुल गयी. कवि ने भविष्य दृष्टा   की दूरदर्शिता और आत्म-विश्वास के साथ ही गांधीवाद के प्रति कुछ मोह के साथ लिखा है -

ना, गाँधी सेठों का चौकीदार नहीं है,
न तो लोहमय छत्र जिसे तुम ओढ़ बचा लो,
अपना संचित कोष मार्क्स की बौछारों से.
इस प्रकार मत पियो, आग से जल जाओगे,
गांधी शरबत नहीं प्रखर, पावक-प्रवाह था,
घोल दिया यदि इतर कहीं अपनी शीशी का,
अन्लोदक दूषित अपेय यह हो जाएगा.
(तब भी आता हूँ मैं )

इसी भाव को कुछ और सीधे ढंग से उन्होंने एक दूसरी कविता में लिखा है -

कहो सर्वत्यागी वह संचय का संतरी नहीं था,
न तो मित्र उन सांपों का जो दर्शन विरच रहे हैं,
दंश मारने का अपना अधिकार बचा रखने को.
(एक बार फिर स्वर दो )

दिनकरजी का कहना है कि गांधीजी ने देश को स्वराज्य पथ पर अग्रसर किया, यह बड़ी बात हुई. पर गांधीवाद की असली विजय तब होगी जब उसके द्वारा समाजवाद की स्थापना हो जाए. गांधीवाद कसौटी पर चढ़कर खोता हुआ सिद्ध हो चुका है , फिर भी दिनकर को गांधीवाद से पूरी निराशा नहीं हुई थी.

उन्हें पुकारो जो गांधी के सखा-शिष्य सहचर हैं.
कहें, आज पावक मैं उनका कंचन पड़ा हुआ है.
प्रभापूर्ण होकर निकला यह तो पूजा जाएगा,
मलिन हुआ तो भारत की साधना बिखर जाएगी.
(एक बार फिर स्वर दो )

क्रमशः 

अब एक कविता दिनकर जी की एक बार फिर स्वर दो  


इस कविता में  कवि ने देश को आगाह किया है कि यदि गांधीवादी  ढंग से समता नहीं लायी जा सकी तो देश को विप्लव का सामना करना पड़ेगा..

गांधी अगर जीतकर निकले, जलधारा बरसेगी,
हारे तो तूफ़ान इसी उमस से फूट पड़ेगा.

एक बार फिर स्वर दो !

एक बार फिर स्वर दो !
जिस गंगा के लिए भागीरथ सारी आयु तपे थे,
और हुई जो विवश छोड़ अम्बर भू पर बहने को 
लाखों आंसुओं, करोड़ों के हाहाकारों से,
लिए जा रहा इंद्र कैद करने को उसे महल में.
सींचेगा वह गृहोद्यान अपना इसकी धारा से
और भागीरथ के हाथों में डंडा थमा कहेगा,
अगर मार्क्स को मार सके तुम, हम तुमको पूजेंगे,
हार गए तो, गंगा की धारा जो ले आये हो,
उसी धार में बोर-बोर हम तुम्हें मार डालेंगे.

एक बार फिर स्वर दो !
देख रहे हो, गांधी पर कैसी विपत्ति आई है ?
तन तो उसका गया, नहीं क्या मन भी शेष बचेगा ?
अगर चुरा ले गया भाव-प्रतिमा कोई मंदिर से 
उन अपार, असहाय, बुभुक्षित लोगों का क्या होगा,
जो अब भी हैं खड़े मौन गांधी से आस लगा कर ?

ना, गाँधी सेठों का चौकीदार नहीं है,
न तो लोहमय छात्र जिसे तुम ओढ़ बचा लो,
अपना संचित कोष मार्क्स की बौछारों से.
इस प्रकार मत पियो, आग से जल जाओगे,
गांधी शरबत नहीं प्रखर, पावक-प्रवाह था,
घोल दिया यदि इतर कहीं अपनी शीशी का,
अन्लोदक दूषित अपेय यह हो जाएगा.

कहो सर्वत्यागी वह संचय का संतरी नहीं था,
न तो मित्र उन सांपों का जो दर्शन विरच रहे हैं,
दंश मारने का अपना अधिकार बचा रखने को.

उन्हें पुकारो जो गांधी के सखा-शिष्य सहचर हैं.
कहें, आज पावक मैं उनका कंचन पड़ा हुआ है.
प्रभापूर्ण होकर निकला यह तो पूजा जाएगा,
मलिन हुआ तो भारत की साधना बिखर जाएगी.

एक बार फिर स्वर दो !
कहो, शांति का मन अशांत है, बादल घुमड़ रहे हैं,
तप्त, उम्सी हवा टहनियों में छटपटा रही है.
गांधी अगर जीतकर निकले, जलधारा बरसेगी,
हारे तो तूफ़ान इसी उमस से फूट पड़ेगा.
(परशुराम की प्रतीक्षा)

गुरुवार, 21 जून 2012

परशुराम की प्रतीक्षा



सुधी जनों  को अनामिका का सादर नमन!  दिनकर जी अपने जीवन वृत्तांत में बताते हैं कि वो कभी भी राजनीति को पसंद नहीं करते थे वरन वह राजनीतिक स्वाधीनता के प्रेमी रहे.....और इसके साथ ही आर्थिक साम्य के उपासक थे. उनका यह साम्य-विषयक भाव उनकी कविताओं में भी व्यक्त हुआ...तो आइये जानते हैं उनकी कविताओं में क्रांति और साम्य की हुंकार को...



पिछले पोस्ट के लिंक
१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हे, नाचो, नटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट ६. कवि की मृत्यु ७. दिगम्बरी 8. ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल ! 9.दिल्ली 10. विपथगा 11. हिमालय 12 .हाहाकार

दिनकरजी जीवन दर्पण भाग - १३  


दिनकर जी  लिखते हैं.....
ना देखे विश्व पर मुझको घृणा से,
मनुज हूँ सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं,
पुजारिन ! धूलि से मुझको उठा ले,
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं.


पराधीन भारत के नौजवान वीरता का जागरण चाहते थे, धर्म की रूढ़ियों से निकलकर जीवन पर विजय पाना चाहते थे और चाहते थे की फ़्रांस और रूस की तरह भारत में भी क्रांति खडग धारिणी  होकर आये और अन्यायियों के अन्याय को चकनाचूर कर कर दे. दिनकरजी जिस क्रांति का आवाहन कर रहे थे वह बहुत कुछ ऐसी ही क्रांति थी - 

असि की नोकों से मुकुट जीत अपने अपने सिर उसे सजाती हूँ,
इश्वर का आंसन छीन, कूद मैं आप खड़ी हो जाती हूँ,
थर थर करते कानून-न्याय इन्गति पर जिन्हें नचाती हूँ.
भयभीत पातकी धर्मो से अपने पग मैं धुलवाती हूँ.
सिर झुका घमंडी सरकारें करती मेरा अर्चन -पूजन.
(विपथगा)

जिन दिनों हुंकार की रचना हुई, दिनकरजी चिन्तक कम, भावना-शील अधिक थे. इसलिए कभी-कभी उन्होंने क्रांति का आवाहन केवल क्रांति के लिए भी किया था. हुंकार में ही एक कविता के भीतर ये पंक्तियाँ आती हैं जिन्हें अंधी क्रांति का स्तवन मात्र समझा जा सकता है

स्वातंत्र्य ! पूजता मैं न तुझे
इसलिए की तू सुख शांति रूप
हाँ, उसे पूजता जो चलता
तेरे आगे नित क्रांति-रूप !
(चाह एक )

किन्तु इसकी भी सार्थकता तो थी ही कि युवक विप्लव मचाने को उतावले हो रहे थे और समझौते के रास्ते स्वराज्य प्राप्त करने की बात वे नही सोच सकते थे. स्वाभाविक रूप से शक्ति ऐसे लोगों के हाथों में दी गयी, जो क्रांतिकारी नहीं थे. अलाय-बलाय हवा के झोंकों से ऊपर पहुँच गयी. किन्तु यह नियति का व्यंग्य है कि देश अंत में दृश्य  मान रूप से संधि से ही, सो भी विभक्त होकर स्वाधीन हुआ. बाद को चीनी आक्रमण की  प्रतिक्रिया में रचित 'परशुराम की प्रतीक्षा' में दिनकर जी ने शुद्ध कविता का घूंघट और अहिंसा की  पायल उतार दी और तब तांडव का ताबड़तोड़ आह्वान किया.

जहाँ तक क्रांति के आर्थिक, सामाजिक पक्षों का सम्बन्ध है, दिनकर काव्य में वे बराबर समता की कल्पना के रूप में उतरते रहे. दिनकरजी केवल राजनीतिक स्वाधीनता के ही प्रेमी नहीं, आर्थिक साम्य के भी उपासक रहे हैं. यहाँ तक कि उनके दार्शनिक काव्य क्षेत्र में भी जिसका राजनीति से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, उनका साम्य-विषयक भाव व्यक्त होने से नही रुका.

साम्य कि वह रश्मि स्निग्ध, उदार,
कब खिलेगी, कब खिलेगी विश्व में भगवान् ?
कब सुकोमल, ज्योति से अभिषिक्त
हो सरस होंगे जली-सूखी रसा के प्राण !
(कुरुक्षेत्र ) 

तात्पर्य ? जब तक समता नहीं आती, धरती पर हरियाली भी नहीं आएगी.
किन्तु कुरुक्षेत्र से पूर्व की कविताओं में तो कवि के साम्य-विषयक विचार और भी उन्मुक्त रूप से प्रकट हुए हैं -

अचरज नहीं, खींच ईंटें यह सुरपुर को बर्बाद करे,
अचरज नहीं, लूट जन्नत वीरानों को आबाद करे.
(अनल किरीट) 

ऊपर ऊपर सब स्वांग, कहीं कुछ नहीं सार,
केवल भाषण की  लड़ी, तिरंगे का तोरण !
कुछ से कुछ होने को तो आजादी न मिली
वह मिली गुलामी की  ही नकल बढ़ाने को !
(नीम के पत्ते)

जिस भ्रष्टाचार की और लाभ की  प्रधानता से देश आज इतना परेशान है उसका संकेत भी दिनकरजी ने १९४८ में दिया था -

टोपी कहती है मैं थैली बन सकती हूँ,
कुरता कहता है मुझे बोरिया ही कर लो,
ईमान बचाकर कहता है आँखे सबकी,
बिकने को हूँ तैयार, ख़ुशी हो जो, दे दो.

दिनकरजी ने नौकरी १९५२ में छोड़ी और उसी समय वे संसद के सदस्य हुए. संसद  सदस्य के रूप में दिल्ली आने से पूर्व वे दिल्ली पर दो कवितायें लिख चुके थे, 'नयी दिल्ली'  १९३३ में, तथा 'दिल्ली और मास्को'  १९४५ में. सदस्य होकर दिल्ली आने के बाद उन्होंने दिल्ली पर दो कवितायें और लिखी 'हक़ की  पुकार'  १९५२ में और 'भारत का यह रेशमी नगर' १९५४ में. इन चार कविताओं का संकलन 'दिल्ली' नाम से अलग प्रकाशित हुआ. इनसे स्पष्ट विदित होता है कि दिल्ली से कवि कभी सुलह नहीं कर सके थे, पर साथ ही यह भी सत्य है कि दिल्ली का स्वाद पा गए, उसे वह छोड़ नहीं सके. संसद सदस्य नहीं रहे तो गृह मंत्रालय में हिंदी की नौकरी लेकर आये. ऐसा क्यों किया ? परिवार से दूर रहने के लिए या परिवार की बढ़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए ?

ओ बुझी हुई ज्वालाओं की राखों के ढेर ! सुने जाओ,
सोने से चंगुल मढ़े हुए गद्दी के शेर सुने जाओ,
दिल्ली की सारी चमक-दमक, यह लोच-लचक सब झूठी है !
रेशम  पर  पड़ती  हुई रेशमी की लक -डाक सब झूठी है !
झूठा है यह सारा बानव, झूठे महल अटारी हैं !
तुम यहाँ फूकते हो वंशी, गाँवों में नाले जारी  हैं.
(हक़ की पुकार )

चल रहे ग्राम कुंजों में पछिया के झकोरे,
दिल्ली, लेकिन ले रही लहर पुरवाई में,
है विकल देश सारा अभाव के तावों से,
दिल्ली सुख से सोयी है नरम रजाई में.
(भारत का यह रेशमी नगर)

'रेणुका' में संकलित अपनी विख्यात कविता 'कस्मै देवाय' में जब उन्होंने लेनिन का नाम लिया था, तब भी उसके पीछे आर्थिक समत्व की प्रेरणा काम कर रही थी.

उठ भूषण की भाव रंगीनी 
लेनिन के दिल की चिंगारी
युग मर्दित यौवन की ज्वाला,
जाग,जाग, ओ क्रांति कुमारी
लाखों क्रौंच कराह रहे हैं,
जाग आदिकवि की कल्याणी
फूट फूट तू मूक कंठ से 
बन व्यापक निज युग की वाणी. 

ये लाखों क्रौंच भारत की अपार जनता के प्रतीक हैं, जो अभावों से त्रस्त है और यह मूक कंठ भी उसी जनता का है जिसे गांधीजी 'पद-दलित और निर्वाक' कहते थे.

दिनकरजी की साम्योपासक यह भावना कुरुक्षेत्र में आकर दर्शन के धरातल पर पहुँच गयी और कवि ने बड़े ही विश्वास के साथ कहा -

शांति कहाँ कब तक जब तक सुख भाग न नर का सम हो ?
नहीं किसी को बहुत अधिक हो नही किसी को कम हो .

क्रमशः :

लीजिये प्रस्तुत है दिनकर जी की चीनी आक्रमण की  प्रतिक्रिया में रचित 'परशुराम की प्रतीक्षा'  जिसमे  दिनकर जी ने शुद्ध कविता का घूंघट और अहिंसा की  पायल उतार दी और तब तांडव का ताबड़तोड़ आह्वान किया - 

परशुराम की प्रतीक्षा 


नेता निमग्न दिन-रात शांति-चिंतन में
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में.
यज्ञाग्नि हिंद में समिध नहीं पाती है !
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है.

ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो !
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो !
वह अघि, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है !

जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते हैं,
है जब खडग, सब पुन्य वहीँ बसते हैं !
वीरता जहाँ पर नहीं, पुन्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है !

तलवार पुन्य की सखि, धर्म पालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है !
असी छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचंडतम वहीँ प्रकट होता है !

तलवारें सोती जहाँ बंद म्यानों में,
किस्मतें वहां  सडती हैं तहखानों में !
बलिदेवी पर बालियाँ-नाथेन चढ़ती हैं,
सोने की ईंटे, मगर नहीं कढती हैं !