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सोमवार, 27 जून 2011

कुछ क्षणिकाएँ


वक्त के साथ
पकड़ लिए थे
मैंने कुछ जुगनू
लेकिन उनकी रौशनी
छुप गयी
वक्त की गर्द में ..

भाषा हो 
मौन की ,
एहसास हों
ज़िंदगी के
व्यवहार में थोड़ी
गहराई लाइए
भावनाएं हो जाएँ
न कहीं दूषित
इसलिए मुझे
शब्द नहीं चाहिए .
 
आँख से
इस कदर
पानी गिरा
कि
लोग समझे
ज़बरदस्त
मानसून
आया है .

पलकों को 
निचोडने की
कोशिश में
समा गयी
हाथों में
सूखी रेत
तब जाना कि
आँखें मेरी
रेगिस्तान बन गयी हैं
संगीता स्वरुप