वक्त के साथ पकड़ लिए थे मैंने कुछ जुगनू लेकिन उनकी रौशनी छुप गयी वक्त की गर्द में .. भाषा हो मौन की , एहसास हों ज़िंदगी के व्यवहार में थोड़ी गहराई लाइए भावनाएं हो जाएँ न कहीं दूषित इसलिए मुझे शब्द नहीं चाहिए . आँख से इस कदर पानी गिरा कि लोग समझे ज़बरदस्त मानसून आया है . पलकों को निचोडने की कोशिश में समा गयी हाथों में सूखी रेत तब जाना कि आँखें मेरी रेगिस्तान बन गयी हैं संगीता स्वरुप |
क्षणिकाएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
क्षणिकाएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सोमवार, 27 जून 2011
कुछ क्षणिकाएँ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)