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शनिवार, 16 जुलाई 2011

राजभाषा हिंदी का नवीनतम इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से प्रचार-प्रसार

राजभाषा हिंदी का नवीनतम इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से प्रचार-प्रसार

मनोज कुमार

सूचना है कि राजभाषा हिंदी का नवीनतम इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से प्रचार-प्रसार करने की योजना बनाई जा रही है। इसके लिए राष्‍ट्रव्‍यापी स्‍तर पर प्रचार-प्रसार संबंधी मार्गदर्शी सिद्धांत तैयार कर लिए गए हैं। इस के अंतर्गत प्रचार-प्रसार की कार्य योजना में आउटडोर प्रचार-प्रसार को महत्‍व दिया जाएगा। दिल्‍ली के अलावा देश के तीन अन्‍य महानगरों अर्थात कोलकाता, मुम्‍बई, चेन्‍नई तथा बड़े शहरों जैसे विभिन्‍न राज्‍यों की राजधानियों में तथा कुछ अन्य बड़े नगरों में फिलहाल प्रचार-प्रसार कार्य को संकेन्द्रित किया जाएगा।

इस काम को अंजाम देने के लिए महानगरों के नगर राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति के अध्‍यक्ष की अध्‍यक्षता में समिति गठित की गई है। यह समिति इस बात को ध्‍यान में रख कर स्‍थल का चयन व निर्धारण करेगी कि लक्षित वर्ग अर्थात केंद्रीय सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारीगण अधिक से अधिक लाभान्वित हों। प्रचार-प्रसार सरकारी कार्यालयों/आवासीय कॉलोनियों के आस-पास भी किया जाएगा।

रेलवे स्‍टेशन, सीजीएचएस, ईएसआईसी अस्‍पताल, पासपोर्ट कार्यालय, पोस्‍ट ऑफिस, हवाई अड्डे, केंद्रीय सरकारी कार्यालय समुच्‍चय तथा सरकारी आवासीय कॉलोनी के आस-पास के क्षेत्रों को प्रचार-प्रसार के स्‍थल के रूप में प्राथमिकता आधार पर चयन किये जाने से राजभाषा हिंदी के प्रति अच्‍छा संदेश जायेगा। इस कार्यक्रम में केन्द्र सरकार के कार्यालयों को भी शामिल किया जाएगा ।

प्रचार-प्रसार की विषय वस्‍तु को देशभर में प्रचारित करने के लिए गृहमंत्रालय के राजभाषा विभाग में समिति गठित की गई है। विषय-वस्तु पर सचिव (राजभाषा) का अनुमोदन अनिवार्य होगा। यह बहुत ही ज़रूरी है कि हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए संस्‍तुत विषय वस्‍तु से किसी अन्‍य भाषा के साथ तुलना न हो, किसी की भावना आहत न हो।

महापुरूषों/विद्वानों द्वारा हिंदी के बारे में व्‍यक्‍त उदगारों को भी प्रचार-प्रसार हेतु चयन किया जाएगा। राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रांतीय भाषा को भी प्रचार प्रसार का माध्‍यम बनाया जा सकता है। संदेश का व्‍यापक व मैत्रीपूर्ण प्रसार किया जाएगा। प्रांतीय, राष्‍ट्रीय और यदि आवश्‍यक हो तो अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सुविख्‍यात व्‍यक्तियों के हिदी के संबंध में व्‍य‍क्‍त विचारों/साक्षात्‍कारों क दृश्‍य/श्रव्‍य रिकार्डिंग की जाएगी।

“जागो ग्राहक जागो” की तर्ज़ पर सरकार द्वारा उठाया गया यह क़दम निश्चय ही प्रशंसनीय है। इस कार्य को अंजाम देने के लिए एनीमेशन डिस्‍प्ले बोर्डों का भी इस्तेमाल किया जाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी साधन जैसे श्रुतलेखन, लीला, मंत्रा राजभाषा, ई-महाशब्‍दकोश, यूनीकोड-इनकोडिंग के बारे में भी सूचना प्रदर्शित की जाएगी। यह काम डीएवीपी द्वारा कराए जाएंगे। आउटडोर पर फोकस देते हुए होने वाले इस प्रचार प्रसार के माध्‍यम के रूप में बस क्‍यू शेल्‍टर, मेट्रो रेल पैनल, एनीमेशन डिस्‍प्‍ले, एलईडी/एलसीडी, टीवी, एफ एम रेडियो, आदि जैसे माध्‍यमों को अपनाया जाएगा। पिलर्स पर कियोस्‍क लगाकर भी प्रचार किया जा सकता है। इससे लोगों को अच्‍छी जानकारी मिलेगी। डीएवीपी के माध्‍यम से लघु फिल्‍में भी बनवाई जा सकती है। विमानों में टी.वी चैनल्‍स पर उक्‍त लघु फिल्‍में प्रदर्शित की जा सकती है।

बुधवार, 6 जुलाई 2011

हिंदी के बारे में दीवारों पर पोस्टर व स्लोगन कब तक चिपके रहेंगे?

सितंबर का महीना और हिंदी दिवस आते ही सभी कार्यालयों में प्रतियोगिताओं का दौर शुरू हो जाएगा और जगह जगह पोस्टर बैनर लगाए जाने लगेंगे। राजभाषा विभाग/कक्षों से जुड़े कार्मिक अतिशय व्यस्त हो जाएंगे, लोगों को प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में भाग लेने के लिए। मुख्य अतिथि तलाशे जाएंगे, कार्यालय प्रमुख, चाहे वह हिंदी जानता हो या न जानता हो, हालाँकि सरकारी आँकड़े बताते हैं कि भारत सरकार के कार्यालयों में काम करने वाले 90 प्रतिशत से अधिक लोगों को हिंदी आती है, उनके लिए भाषण लिखे जाएंगे। उस दिन चारों तरफ हिंदी दिखेगी और आभास होगा कि चारों तरफ हिंदी ही हिंदी है। लोग राजभाषा कार्मिकों पर एहसान जताएंगे कि आज तो हमने भी हिंदी में कविता लिखी है।
हिंदी दिवस बीतता है, दीवारों पर लगे टेंपोरेरी पोस्टर/बैनर अगले दिन उतर कर कचरे में चले जाते हैं। उसके बाद फिर वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है। अंग्रेज़ी में काम शुरू हो जाते हैं और कुछ स्लोगन-पोस्टर स्थायी रूप से टंगे ही रहते हैं और दीवार पर टंगी गांधी जी की उक्ति, भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविता की पंक्तियाँ के नीचे राष्ट्र प्रेम एवं राष्ट्र भक्ति का मज़ाक सारा साल उड़ता रहता है। केवल हिंदी वाले ही हिंदी में काम करने के लिए अभिशप्त हैं। हिंदी को राजभाषा घोषित हुए इकसठ साल बीत गए परंतु हिंदी की स्थिति पोस्टरों से आगे नहीं बढ़ पाई है। इस स्थिति में परिवर्तन तभी आएगा जब कि मुख्यधारा में कार्यरत लोग आगे आएंगे और कार्यालय के मुख्य कार्य हिंदी में किए जाएंगे। आज तो हिंदी में काम करना आसान हो गया है क्योंकि अब तो कंप्यूटर का उपयोग होने लगा है और बिना किसी हिंदी सॉफ़्टवेयर के कंप्यूटर से हिंदी में काम करना संभव हो गया है। अतः हिंदी के प्रति मन में कोई भी विद्वेश न ला कर, दीवार पर पोस्टर/बैनर लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेन के बजाय हिंदी में काम करना शुरू करें तभी हिंदी दिवस सार्थक होगा और हिंदी राजभाषा बन पाएगी। हिंदी दिवस आने से पहले, प्रतिदिन कुछ काम हिंदी में करने का संकल्प किया जाए और उसे नियमित रूप से जारी रखा जाए?
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सोमवार, 28 मार्च 2011

वर्तनी आयोग द्वारा मानकीकृत देवनागरी की नवीनतम वर्णमाला व लेखन विधि--डॉ. दलसिंगार यादव निदेशक राजभाषा विकास परिषद , नागपुर

डा० साहब ने  मेरी एक पोस्ट पर यह टिप्पणी की थी ---संगीता जी आपने अनुनासिक और अनुस्वार के बारे में भ्रम को दूर करने का अच्छा प्रयास किया है। आप विदुषी हैं और भाषा पर अच्छी पकड़ भी रखती हैं परंतु आपके इस लेख में कुछ भ्रम हैं। यह व्याकरण का विषय है इसलिए नियमों का प्रतिपादन स्पष्ट और निर्दोष होना चाहिए। इन पर टिप्पणी लिखी जाएगी तो शायद न्याय न हो सके। यदि आप अनुमति दें तो एक लेख लिखकर मेल से भेज देता हूं आप उसे पोस्ट कर लें। थोड़ा समय लगेगा।
 और यह मौका मैं चूकना नहीं चाहती थी …आज मैं उनके द्वारा भेजा हुआ लेख प्रकाशित कर रही हूँ …इससे हमें हिंदी की शुद्धता के बारे में विशेष जानकारी मिलेगी और हम सभी लाभान्वित होंगे …आभार
वर्तनी आयोग द्वारा मानकीकृत देवनागरी की नवीनतम वर्णमाला व लेखन विधि--
भाषा की मुख्य इकाई वाक्य है। वाक्य पदों से बनता है और पद प्रायः ध्वनि प्रतीकों से बनते हैं। पर भाषा में कुछ मूल ध्वनियाँ होती हैं जिनके स्वतंत्र प्रयोग द्वारा या उनके संयोजनों द्वारा पदों और फिर अंततः सार्थक पूर्ण इकाई – वाक्य की रचना की जाती है तथा वाक्य दर वाक्य आलेख की रचना की जाती है। भाषा के इन तीनों पहलुओं का ज्ञान व्याकरण कराता है। अतः व्याकरण में इन्हें क्रमशः वर्ण विचार, शब्द विचार और वाक्य विचार कहा जाता है। हम यहाँ हिंदी भाषा व्याकरण के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसकी लिपि देवनागरी है।
देवनागरी मूलतः संस्कृत भाषा की लिपि है और अब इसे अनेक भाषाओं ने अपनाया है। हम इस लिपि की वर्णमाला के आधारभूत पक्ष, अर्थात्, मूल स्वर, संयुक्त स्वर, दीर्घ स्वरों, अनुस्वार, विसर्ग, स्पर्श व्यंजन, नासिक्य व्यंजन, अंतःस्थ व्यंजन और ऊष्म व्यंजनों का परिचय देंगे तथा इनके लेखन के मानक तरीकों पर चर्चा करेंगे।
1. मूल स्‍वर
अ इ उ ऋ
2. संयुक्‍त स्‍वर
अ + इ = ए
अ + उ = ओ
3. दीर्घ स्‍वर
आ ई ऐ औ
4. अनुस्‍वार
अं
5. विसर्ग
अः
6. नया जुड़ा स्वर


7. नुक़्ता
उत्क्षिप्त और अरबी फ़ारसी अंग्रेज़ी मूल की ध्वनियों के लिए
व्यंजन
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म
8. अंतःस्थ
य र ल व
9. ऊष्म
श ष स ह
10. उत्क्षिप्त ध्वनियाँ
ड़ ढ़
11. विशेष संयुक्त व्यंजन
क्ष त्र ज्ञ
12. नासिक्य व्यंजन (व्यंजनों वर्गों के पंचम वर्ण)
ङ ञ ण न म
चूंकि हिंदी राजभाषा है और इसकी लिपि देवनागरी है तथा देश विदेश में व्यापक रूप से प्रयुक्त हो रही है इसलिए इसका मानकीकृत रूप में शिक्षण और लेखन न किया जाए तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। 1961 में वर्तनी आयोग का गठन किया गया था यद्यपि इससे पहले देवनागरी के मानकीकरण का सझाव लेने के लिए अनेक गैर सरकारी प्रयास (काका कालेलकर समिति 1941, नागरी प्रचारिणी सभा समिति 1945, आचार्य नरेंद्र देव समिति 1947) किए गए थे। परंतु समन्वय के अभाव में एकरूपता नहीं लाई सकी थी। अतः केंद्र सरकार से तत्ववधान में यह कार्य हुआ और 1980 में अंतिम सुझाव के साथ ही देवनागरी लिपि का मानकीकृत रूप जारी किया गया और सिफ़ारिश की गई की एकरूपता के दृष्टिकोण से इनका ही अनुसरण किया जाए।
उच्चारण
लिखित वर्ण या प्रतीक ध्वनियों के उच्चारण को प्रतिबिंबित करते हैं। अतः इनके लेखन नियम निर्धारित किए गए हैं जिनका परिचय हम यहाँ देने जा रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि उच्चारण स्वरों का ही होता है, व्यंजनों का नहीं। इसीलिए स्वर को अक्षर कहा गया है। व्यंजनों का उपयोग रूप परिवर्तन दिखाने के लिए किया जाता है जिससे विभिन्न शब्दों का निर्माण होता है। इसीलिए 'अक्षर' की परिभाषा, 'ऋग्वेद प्रातिशाख्यम्' के अनुसार इस प्रकार की गई है – सव्यंजनः (व्यंजन से युक्त) सानुस्वारः (अनुस्वार से सहित) शुद्धो (अनुस्वार रहित) वापि स्वरोçक्षरम् (स्वयं स्वर) अक्षर कहलाता है (18.32)।
अनुस्वार और हिंदी भाषा में इसका महत्व तथा लेखन नियम
वर्णमाला में केवल अनुस्वार और अनुनासिक का उल्लेख है। अनुस्वार स्वर है और अनुनासिक व्यंजन। अनुस्वार स्वर के उच्चारण का नासिक्यीकरण है तथा अनुनासिक पंचम वर्णों के उच्चारण में मुंह और नासिका का उपयोग दर्शाता है। संस्कृत में अंतःस्थ और ऊष्म वर्णों के साथ सर्वत्र अनुस्वार , अर्थात्, उच्चारण के स्थान के पूर्ववर्ती वर्ण के ऊपर केवल बिंदु का प्रयोग किया जाना था, जैसे, संयम, संशय, संहार, संश्लेषण, हंस, वंश। इन शब्दों में अनुनासिक का प्रयोग है। चंद्रबिंदु वाले अनुस्वार का रूप पहले नहीं था क्योंकि संस्कृत में ऊष्म और अंतःस्थ वर्णों के साथ ही अनुस्वार का प्रयोग होता था। स्वर रहित नासिक्य वर्णों (स्वर रहित पंचम वर्णों के साथ) का उपयोग ही सही माना जाता था, मात्र बिंदु का नहीं।
साँस, हँस, आँगन, नँद-नंदन, हैँ, मैँ इन शब्दों में नासिक्य व्यंजनों का उपयोग नहीं बल्कि व्यंजन ध्वनियों में स्वरों का नासिक्यीकरण है। शब्दों के अंत में, चाहे वे क्रिया हों या किसी शब्द का बहुवचनी रूप, उनमें नियमानुसार स्वर की ही नासिक्यीकृत उच्चारण होता है, जैसे, मैँ, हैँ, हूँ, सकूँ, गिरूँ, उठूँ आदि। एन.सी.आर.टी. की, प्रारंभिक शिक्षा की भाषा पुस्तकों में इसी प्रकार सिखाया जाता है ताकि बच्चों के मस्तिष्क में संकल्पना घर कर जाए कि स्वरों के नासिक्यीकरण तथा नासिक्य व्यंजनों के स्वर रहित प्रयोग में क्या अंतर है। बाद में चलकर ऊंची कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में स्वरों के नासिक्यीकरण तथा नासिक्य व्यंजनों के स्वर रहित प्रयोग के लेखन में कोई अंतर नहीं रखा जाता है और दोनों के ही लिए अनुस्वार का ही प्रयोग किया जाता है। हंस और हँस जैसे शब्दों में अंतर एवं अर्थांतर का ज्ञान संदर्भ के अनुसार होता रहता है। नासिक्य व्यंजनों के स्वर रहित प्रयोग केवल वहीं करने की सिफ़ारिश की गई है जहाँ आवश्यक हो, जैसे, कन्या, संन्यासी, सम्मत आदि।
नुक़्ता का महत्व व उपयोग
अंग्रेज़ों ने देवनागरी पर आरोप लगाया था कि इसमें एफ़ और ज़ेड ध्वनियों को शुद्ध रूप में व्यक्त करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। अतः देवनागरी सुधार समिति ने सुझाव दिया कि हमारे पास, उत्क्षिप्त ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए ड और ढ के नीचे बिंदु लगाने की व्यवस्था है। अतः हम इसका उपयोग करने का नियम बना सकते हैं। इस प्रकार यह निर्णय किया गया कि अंग्रेज़ी के एफ़ और ज़ेड की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए ज तथा फ के नीचे बिंदु लगाने का नियम नियत किया जा सकता है। इस प्रकार यह व्यवस्था की गई कि अंग्रेज़ी के एफ़ और ज़ेड की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए ज तथा फ के नीचे बिंदु लगाया जाए, अर्थात्, इन्हें फ़ और ज़ (ज़ाल, ज़े, झ़े, ज़्वाद, ज़ोय) लिखा जाए। इसी प्रकार अरबी एवं फ़ारसी के शब्दों में तालव्य-दंत्य तथा कंठ्य (हल़की) ध्वनियाँ उत्पन्न करने के लिए नुक़्ता का उपयोग किया जाए, जैसे, जहाज़, सफ़र, क़ाग़ज़, ख़ानदान आदि।
सभी भारतीय भाषाओं की ध्वनियों के लिए मानक वर्धित देवनारी लिपि
अतः इसी प्रकार देवनागरी को सभी भाषाओं की सभी संभावित ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए भी, जैसे, कश्मीरी, सिंधी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ विस्तारित औ समृद्ध किया गया है। ( ए बेसिक ग्रामर ऑफ़ मॉडर्न हिंदी; 1975; पृष्ठ 209-212; केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली, देखें।) इस प्रकार देवनागरी वैज्ञानिक, सरल तथा स्वयं पूर्ण लिपि बन गई है।
देवनागरी के बजाय रोमन लिपि – ख़तरनाक प्रयोग
आजकल कुछ लोग रोमन वर्णमाला और रोमन लिपि का उपयोग करके हिंदी में ब्लॉगिंग कर रहे हैं। यह ख़तरनाक प्रयोग है। रोमन लिपि अत्यंत दोषपूर्ण है जिसके लिए जॉर्ज बर्नार्ड शॉ जैसे विद्वान ने कहा है कि "English spelling is an international calamity." । जिन ध्वनियों का हम उपयोग कर सकते हैं उन्हें लिखने में नितांत असमर्थ है। जो लोग रोमन लिपि का इस्तेमाल करके हिंदी लिख रहे हैं या हिंदी लिखने के लिए रोमन प्रणाली का उपयोग करने की सलाह देते हैं वे जाने अनजाने हिंदी भाषा व संस्कृति का अहित कर रहे हैं। मुझे तो बड़ा आश्चर्य होता है जब हिंदी अधिकारी भी ट्रांसलिटरेशन पद्धति द्वारा हिंदी टाइप करने की सलाह देते हैं। मैं इसके सख्त ख़िलाफ़ हूं और अपने हर कार्यक्रम में हिंदी लिपि और लेखन पद्धति पर ही बल देता हूं। इस विषय पर व्यापक और गंभीरता से वैज्ञानिक चर्चा की ज़रूरत है।
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शुक्रवार, 14 मई 2010

सबकी आशा: राजभाषा

सबकी आशा: राजभाषा

प्रेम सागर सिंह

भाषा अहर्निश प्रवाहित नदी के समान है। भाषा जो परिस्थिति, काल, समुदाय के अनुरूप ढ़लने लगती है, वही जीवंत भाषा है। हिंदी की वास्तविक प्रकृति में यह निहित है। अपनी लचीली और ग्राह्य प्रकृति के कारण यह सामाजिक आवश्यकताओं के बदलते परिप्रेक्ष्य में स्वयं को आसानी से परिवर्तित कर लेती है। स्वतंत्रता के दौरान विकसित भाषा के स्वरूप, शैली एवं प्रयोग में आज अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। बदलते युग संदर्भ की पृष्ठभूमि में आज यह संचार माध्यम की भाषा बनने के साथ- साथ विज्ञान जगत में भी अपनी सफलता दर्ज कराने में सफल सिद्ध हुई है। प्रवासी भारतीयों की बोली और आज के युवा पीढी़ की धड़कन की भाषा बन गई है। आज भारत में व्यापार के विविध क्षेत्रों में पदार्पण करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। सामाजीकरण एवं आर्थिक उदारीकरण के बदलते परिप्रेक्ष्य में आज हिंदी बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की भाषा बन गई है एवं शनै: शनै: इसे वैश्विक स्वीकृति भी मिल रही है।

सरकारी कामकाज के प्रत्येक क्षेत्र में राजभाषा हिंदी परिणामोन्मुखी दिशा में अग्रसरित हो रही है। इसे प्रत्येक स्तरों पर नई दशा और दिशा प्रदान करना हम सबका संवैधानिक दायित्व बनता है। सरकार की राजभाषा नीति, अधिनियम एवं विनियम के अनुपालन को सुदृढ़ करने के साथ- साथ इसके विस्तृत आयाम का सृजन ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। हमे अपनी मानसिकता, वैचारिक शक्ति एवं नैतिकता में बदलाव करना परम आवश्यक है। भाषा और संस्कृति हमारे देश की अस्मिता की पहचान हैं। इसके प्रति श्रद्धा. सम्मान, प्रतिबद्धता और इसके उत्तरोत्तर विकास में सहयोग करना हमारा नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है। हमे आशा ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि हम सब अपने-अपने स्तर पर राजभाषा हिंदी की श्रीवृद्दि के लिए सत्य-निष्ठा के साथ इसके चतुर्दिक विकास के लिए कटिबद्ध रहेगे।

यह मान लेना कि हिंदी सर्वरूपेण एवं सर्वभावेन एक सक्षम भाषा है, पर्याप्त नही है। इसे व्यवहारिक बनाना, अमल में लाना और राष्ट्र के मुख्य धारा में शामिल करना भी आवश्यक है। तदुपरांत, इसकी क्षमता का बोध सभी को होगा एवं उस स्थिति में विकास की हर यात्रा व पड़ाव में हमारी सहभागी बन सकेगी। ज्ञान- विज्ञान और सामयिक विषय जब हिंदी में लिखे जाएगे तब इसके प्रति विश्वास बढ़ेगा। इस दिशा में आवश्यकता है आत्म-मंथन की, संकल्प की जिसके माध्यम से शायद हमारा य़ह प्रयास पूर्वजों के मानसिक संकल्पनाओं को साकार करने में सहायक सिद्ध हो। यह शुरूआत तो हमें और आपको ही करनी है। आईए, इस पुनीत कार्य में सार्थक प्रयास की आधारशिला रखें ताकि सरकारी तंत्र, नियम और सरकारी कार्यालयों की कार्य-संहिता के साथ- साथ भारतीय बाजार, अर्थ व्यवस्था एवं सामासिक संस्कृति अपनी समग्रता में अक्षुण्ण बनी रहे।