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रविवार, 7 नवंबर 2010

कहानी ऐसे बनी-११ :: मियाँ बीवी के झगड़ा !

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमार

कहानी ऐसे बनी-११

मियाँ बीवी के झगड़ा !

पाठक वृन्द की जय हो!

मान गए साहब आपको ! एक तो रविवार आते ही हम सुध खो देते हैं और महराज आप भी सब कुछ भुला कर कहानी ऐसे बनी की बाट जोहते रहते है। यह आपका प्रेम ही है, नहीं तो आज तो हमारा मूड बहुत ही ख़राब था। अब आप आ गए हैं तो एक कहानी बनने की दासतां सुना ही देते हैं। परन्तु आज से हम भी मारे गए गुलफ़ाम की तरह तीसरी क़सम खाए हैं कि सब करम करेंगे .... लेकिन किसी की पंचायती नहीं करेंगे। चाहे यह समाज रहे या जाए कोशी की बाढ़ में .... कोई जीए या मरे ... हमें कोई मतलब नही है। भाड़ में जाए दुनिया!  हम बजाएं हरमुनिया !! आपको लगता होगा कि हम खा-म-खा बकवास कर रहे हैं। हमारा गुस्सा नाजायज़ है। लेकिन आप जब बात सुनेंगे तो सब समझ जाएंगे।

अब क्या बताएं .... दिन भर कचहरी में मगज खपा कर अपनी पुरानी खर-खरिया सायकल पर चढे चले आ रहे थे। उतरबारी टोला पहुंचे ही थे कि उधर से खखोरन काका बायां हाथ झुकी हुई कमर पर रखे और दायें हाथ को वर्षा में कार का शीशा पोछने वाले वाइपर जैसे तेजी से हिलाते एकदम झटक-झटक कर चले आ रहे थे। आ..हा...हा... वह तो हमरी सायकल बच्चों वाली सायकल की तरह मंद गति से आ रही थी नहीं तो धक्का तो लग ही जाता। जैसे-तैसे चक्का से सट के काका रुके और कमर पर रखे हाथ का जोर बढ़ा दूसरे हाथ को हेड-लाईट के ढक्कन की तरह आँखों के ऊपर रख कर हाँफते हुए बोले, "बौआ... रेलवे तरफ़ से आ रहे हो क्या ?"

हम बोले, "हाँ, काका ! मगर आप इतना घबराए हुए कहाँ जा रहे हैं?"

खखोरन काका हमारी सायकल का हेंडिल पकड़ कर कमर को सीधा करते हुए बोले, "अब क्या बताएं बिटवा ! इस बुढापे में हमको और कौन-कौन दिन देखना बचा है, राम जाने ? ये सब मौत दिखाने से पहले भगवान हमको उठा क्यों नही लेते...!" कह कर काका एकदम से फफक कर रो पड़े।

हम साईकिल को स्टैंड पर खड़ा कर के काका का कन्धा पकड़ कर बोले, "काका ! आप बच्चों की तरह क्यों रो रहें हैं ? अरे कुछ बताइये तो सही कि बात क्या है ?"

कक्का कहने लगे, "हमारा छोटका बेटा और उसकी बहू है न सिंघपुर वाली... परसों से ही दोनों मियां-बीवी में पता नही किस बात की खट-पट चल रही थी। आज सुबह में बात और बिगड़ गयी.... मरद जात ! कितना सहे... मंगरुआ … शायद दू-चार हाथ रख दिया। उस पर उसकी औरत ने जो हंगामा मचाया है, पूछो मत बौआ ! मेरी और तुम्हारी काकी के तन-बदन का भी एक भी गत नही छोड़ी, इस बुढ़ापे में। चूल्हा-चौका छोड़ कर दिन भर हमें जली-कटी सुनाती रही। अभी सांझ भरे छौड़ा आया है, तो फिर एक झोंक और हो गया। हम समझाने गए तो पासा उल्टा ही पड़ गया... गाली-श्राप भी दिया उसने और छोकरे के साथ-साथ हम बूढा-बूढ़ी पर भी इल्जाम लगाते हुए भागी है रेल में कटने। पीछे से छौड़ा भी गया है... ! मुझसे तो दम नही धरा जा रहा है। पता नही क्या हुआ... !!" इतना कह खखोरन काका गमछी की खूंट से आँख पोछने लगे।

हमने कहा, "कुछ नही होगा काका ! चलिए देखते हैं कहाँ गए हैं दोनों।" फिर हमने सायकल घुमाई और कक्का को बैठा कर खरंजा वाली सड़क पर अपनी खर-खरिया को रॉकेट की तरह उड़ा दिए।

रेलवे किनारे कोस भर खोजे मगर कोई चख-चुख सुनने को नहीं मिला ... जैसे-जैसे उनके मिलने में देर हो रही थी, काका के हृदय की धुक-धुक्की लोहार के भाथी जैसे बढी जा रही थी। घूम-फिर कर हम लोग गौरी पोखर पर पहुंचे। वहाँ सांझ के झल-फल में दो परछाईयां दूर से ही दिखाई दी। हमने कक्का को भरोसा दिया।

सच में, वही दोनों थे!

मैं उनके पास गया। देखा जोरू जोर लगा रही थी। मरद उसका हाथ पकड़े कभी समझा रहा था तो कभी डरा रहा था। हम भी लगे दोनों को समझाने। लेकिन यह क्या ... हमारी गोद में खेला मंगरुआ लगा हम पर ही खिसियाने। ससुर का नाती तैश मे आकर कहने लगा, "वो कोट-कहचरी का धमकी हमें ना दिखाओ... ! नही तो तुम भी कुछ सुन जाओगे !!"

हम दपट दिए उसको तो चुप होय गया, मगर सिंघपुर वाली के तो सच में सिंघ फूटे थे। लगी हमारे खानदान का उद्धार करने, "दिन भर कहचरी में दांत निपोरते हैं और अभी हमारे मरद को सिखाने चले हैं। अपना घर से बाहर तक कौन गत बचा है, …  जैसे किसी से छिपा है।"

उसका प्रवचन सुन कर और लोग भी इकट्ठा हो गए थे। मुझे भारी बेइज़्ज़ती लग रही थी। हम से भी रहा नही गया। बोले, "जुबान को लगाम दो दुल्हिन, नही तो बहुत ख़राब होगा। तब से समझा रहे हैं, हमारा गुस्सा अभी नही देखी हो तुम !"

अरे बाप रे बाप ! हमारे मुंह से इतना निकला नहीं कि वह नागिन की तरह और मंगरुआ नाग सांप की तरह हमारे ऊपर फुंफकार छोड़ने लगा ! कहने लगा, "हे... इतना रोब मत दिखाओ, भैय्या ! क्या कर लोगे गुस्सा आ गया तो ? अभी उसका मरद जिंदा है !"

सिंघपुर वाली का हाथ पकड़ कर बोला, "इसका हाथ पकड़े हैं रक्षा के लिए। हमारे रहते जो कोई भी इसपर आँख उठाएगा उसकी आँख निकाल लेंगे।"

अभी तक मंगरुआ से हाथ छुड़ा रही सिंघपुर वाली भी उसी के सीने से चिपक कर लगी हमारी तरफ़ हाथ चमकाने। फिर दोनों हाथ में हाथ दिए अंधेरे में घर की राह पकड़ लिए।

हमने अपनी खीझ खखोरन काका पर ही उतारा। बोले, "लो काका जी, आपका बेटा-पतोहू तो गए हाथ में हाथ धरे ! और हम बीच मे बेकार में लबरा बन गए!”

उधर भीड़ में से बादल को छांट कर निकलते हुए सूरज की तरह शकुंतला फुआ प्रकट होते हुए बोली, "हाँ रे बेटा ! मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !! औरत-मरद के बीच में तो बोलना ही बेकार है। देखा तीन दिन से कित्ता नौटंकी कर रहे थे। अभी समझाने वाले पर ही पलट गए। तुरत रूठना-मनाना, रेल में कटना, पोखर में डूबना और क्षण में ही कैसे सब को बुरबक बना गलबहियां डाले चले गए !!! सच मे, मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !! देखा लैला-मजनू ने कैसे सबको लबरा बना दिया !!!"

फुआ तो एक बार कह के चुप हो गयीं। लेकिन वहाँ खड़े सारे बच्चे तो कविता ही बना दिया।" मियां-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !!" पढ़-पढ़ के लगे हमारी ओर देख कर ताली बजाने। अब आपही बताइये, इस बात पर गुस्सा आएगा कि नही ? क्या नाजायज़ है हमारा गुस्सा ?? तभी से हमने उल्टे हाथ से कान पकड़ा कि अब किसी की पंचायती नही करेंगे। ख़ास कर मियाँ-बीवी का तो भूल कर भी नहीं।

लेकिन एक बात है। हम लबरा बने तो बने। एक कहावत भी तो बन गया, "मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !!" (सांय-बहू के झगड़ा, पंच बने लबड़ा)

मतलब ::

करीबी लोगों की छोटी-छोटी बातों में दखल देना बेवकूफी ही है।

 

हाँ तो हुज़ूर ! हम तो एक बार लबरा बन ही चुके हैं ! आप दोबारा मत बनाइएगा। और इस कहानी पर अपनी राय ज़रूर दीजिएगा !!!

तो अब चलते हैं। जय राम जी की !! मिलेंगे अगले रविवार को ... और बताएंगे कि कहानी कैसे बनी?

पुराने लिंक

  1. कहानी ऐसे बनी-१ :: नयन गए कैलाश ! 
  2. कहानी ऐसे बनी- 2 : 'न राधा को नौ मन घी होगा... !' 
  3. कहानी ऐसे बनी – 3 "जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!" 
  4. कहानी ऐसे बनीं-४ :: जग जीत लियो रे मोरी कानी ! … 
  5. कहानी ऐसे बनी–५ :: छोड़ झार मुझे डूबन दे !  
  6. कहानी ऐसे बनी– 6 -"बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ?" 
  7. कहानी ऐसे बनी– 7 :: मरद उपजाए धान ! तो औरत बड़ी लच्छनमान !!   
  8. कहानी ऐसे बनी– 8 :: न कढी बना न बड़ी! 
  9. कहानी ऐसे बनी-९ :: गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े ! 
  10. कहानी ऐसे बनी-१०::चच्चा के तन ई बधना देखा और बधना के तन चच्चा देखे थे।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

कहानी ऐसे बनी-९ :: गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !

कहानी ऐसे बनी-९

गोनू झा मरे! गाँव को पढ़े!

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमा

राम-राम हजूर! देखते ही देखते सप्ताह बीत गया और फिर आ गया रविवार कहानी ऐसे बनी का दिन! अब क्या बताएं, आज सुबह-सुबह ब्लॉग पर आए तो ऐसा  अमोल बोल देखे कि गाँव की एक पुरानी कहावत याद आ गयी। हमारे मिथिलांचल में कहते हैं 'गोनू झा मरलथि ! सौंसे गाम जंचलथि!!' अर्थात्‌ 'गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!'

आपको गोनू झा के किस्से तो मालूम ही होंगे। यदि नहीं मालूम है तो कोई बात नहीं। हम फिर से कह देते हैं। वही कमला-बलान के किनारे मिथिला का प्रसिद्ध गाँव है, भरवारा। उस गांए के  बड़े पोखर के सामने जो ऊंचा आवास है न.... वह गोनू झा का ही है। गोनू झा की चालाकी के किस्से तो मिथिलांचल क्या अगल-बगल के क्षेत्र में भी एक युग से प्रचलित है। गोनू झा किसी स्कूल-कॉलेज में पढ़े नहीं. थे .. वे तो मिथिला का एक सीधा-सादा किसान थे। लेकिन हाज़िरजवाबी और चतुराई में बड़े-बड़े विद्वान को धूल चटा देते थे।

अब तो गाँव की बात पता ही है। उनकी चालाकी से भी सभी गाँव वाले जलते थे लेकिन मुंह पर उनका 'फैन' बने फिरते थे। पर गोनू झा की छठी बुद्धि को शक था कि लोगो के प्यार में कुछ झूठ मिश्रित है। वे बहुत दिनों से गाँव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का प्लान बना रहे थे। अगर बात सिर्फ गाँव वालों की ही होती तब तो गोनू झा अपने जोगार टेक्नोलोजी से उनको तुरत फिट कर देते। मगर उनको तो अपने घर के लोगों की बातों में भी मिलाबट की महक आती थी। सो उन्होंने सोचा कि क्यूँ न सबका एक ही 'कॉमन टेस्ट एग्जाम' ले लिया जाय।

बहुत सोच-विचार कर झा जी एक दिन सुबह में उठे ही नहीं! सूरज चढ़ गया छप्पर के ऊपर मगर गोनू झा बिछावन नहीं छोड़े। तब ओझाइन को थोड़ा अंदेशा हुआ। गयी जगाने तो यह क्या ....  हे भगवान .... अरे बाप रे बाप...!!! झा जी के मुंह से तो झाग निकला हुआ था और बेचारे बिछावन से गिरकर नीचे एक कोने में लुढ़के पड़े थे। ओझाइन तो लगी कलेजा पीट के वहीं चिल्लाने। बेटा भी माँ की आवाज़ सुन कर बाबू के कमरे में आया। वहाँ का नजारा देख कर उसका कलेजा भी दहल गया। वह भी लगा फफक-फफक कर रोने।

इधर ओझाइन कलेजे पर दोनों गाथ मार-मार कर चिल्ला रही हैं,.... उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई लेले बस हमारे बाबूजी को लौटा दे। इस महा दुखद खबर सुन कर गोनू झा से उनको मरणोपरांत अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया जी भी पहुँच गए। गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी। लगे दोनों जने झा जी के बेटे को समझाने। "आ..हा...हा... ! बड़े परतापी आदमी थे। पूरे जवार में कोई जोर नहीं। अब विध का यही विधान था।"

उधर ज़िन्दगी भर झा जी का चिलमची रहा अकलू हजाम औरत महाल में ज्ञान बाँट रहा है। 'करनी देखो मरनी बेला !' देखा गोनू झा जैसे उमर भर सब को बुरबक बनाते रहे वैसे ही चट-पट में अपना प्राण भी गया। सारा भोग बांक़ी ही रह गया।'

सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, 'झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे। सीधे स्वर्ग गए। अब इनके पीछे रोने-पीटने का कोई काम नहीं है। कुछ रुपया-पैसा रखे हैं तो गौदान करा दीजिये। बैकुंठ मिलेगा।'

उधर मुखिया जी उनके बेटे को बोले, जल्दी करो भाई, घर में लाश अधिक देर तक नहीं रहना चाहिए। ऊपर से मौसम भी खराब है। प्रभुआ और सीताराम को तुम्हारे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने। जल्दी से ले के चलो। फिर दो आदमी से पकड़ कर झा जी को कमरे से बाहर निकालने लगे। लेकिन गोनू झा कद काठी के जितने ही बड़े थे उनके घर का दरवाजा उतना ही छोटा था। अपनी जिन्दगी में तो झा जी झुक कर निकल जाते थे। लेकिन अभी लोग बाहर कर ही नहीं पा रहे थे। तभी मोहन बाबू कड़क कर बोले, “अरे सुरजा बढई को बुलाओ। दरवाजा काट देगा।”

सूरज तुरत औजार-पाती लेकर हाज़िर भी हो गया। तभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, 'रुको हो सूरज भाई ! बाबू जी तो अब रहे नहीं। उन्होंने बड़े शौक से यह दरवाजा बनवाया था। इसे काटने से उनकी आत्मा को भी तकलीफ होगी। अब तो वे दिवंगत हो गए। शरीर तो उनका रहा नहीं। इसलिए उनके पैर को बीच से काट कर छोटा कर दो। फिर आराम से निकल जायेंगे।'

images (3) ‘हूँ’ कर के सूरज बढई जैसे ही झा जी के घुटने पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठ कर बैठ गए.... और बोले “रुको! अभी हम मरे नहीं हैं। वह तो हम तुम सब लोगों की परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरने के बाद भी।”

अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हजाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा... सब का मुंह बासी जलेबी की तरह लटक गया। आखिर सब की कलई जो खुल गयी थी। गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए लेकिन तभी से यह कहावात बन गयी कि "गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!"

मतलब बुरे वक़्त में ही हित और अहित की पहचान होती है।

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

कहानी ऐसे बनी– 7 :: मरद उपजाए धान ! तो औरत बड़ी लच्छनमान !!

कहानी ऐसे बनी– 7

मरद उपजाए धान ! तो औरत बड़ी लच्छनमान !!

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमार

नमस्कार मित्रों! आज फिर रविवार है। आप कहाँ खोये हुए हैं... ? देखिये हम अपने गाँव से सीधे चले आ रहे हैं आपको 'कहानी कैसे बनी' सुनाने। वैसे तो अब गाँव-देहात में भी पहले वाली बात नहीं रही। लेकिन इस बार नए धान का मीठा चूरा खा कर आये हैं इसलिए मुंह मिठास से भरा है।

हां धान से याद आया... इस बार तो इन्द्र महराज ने धोखा दे दिया। बरसे ही नहीं मन से। खरीफ का तो इस साल हालत खराब हो ही गया साहब! पहले यही पैदावार इस कदर होती थी कि उपजे हुए धान की ढेर हर दरवाजे पर लगी रहती थी और लोग-बाग़ कहते थे, "अगहन के महीने में  तो चूहा-मूसा भी दो-दो बीवी रखते हैं।" लेकिन इस बार तो पलटन बाबू के दालान पर भी पिछली बार की तुलना में आधा ही पुआल था। धान का फसल मार खा गया। पूरे गाँव में सारे किसान सर पर हाथ रखे थे! लेकिन मंगरु के आँगन से सुबह चार बजे से झटा-झट धान झाड़ने के ताल पर पूरा टोला थिड़क उठता था। अब क्या बताएं भैया! हमें तो खुद ही बहुत आश्चर्य हुआ! जब से घुरण काका और काकी गुज़रे, उनका बेटा मंगरु.... उसे तो पूरा गाँव ही निखट्टू समझे लगा।

घुरण काका थोड़ी बहुत खेती कर के छः महीने का जुगाड़ लगा लेते थे। बांकी मजदूरी से चलता था। लेकिन उनके स्वर्ग सिधारते ही मंगरु तो खेत-खलिहान की तरफ़ नज़र फेर कर भी नहीं देखता... बस इधर-उधर घूम-फिर कर, किसी का बेगारी कर किसी तरह पेट भर लेता है अपना। अकेला पेट तो कुत्ते भी पाल लेते हैं, साहब! मंगरु की जिन्दगी वैसी ही समझ लीजिये। बरसों बीत गया... घर के छप्पर का के खर-पतवार हाथी-दांत की तरह दोनों तरफ से निकल गया है परन्तु उसने एक फूस भी नहीं उगाया है। उसका दिन तो वैसे ही पानी जैसा बह रहा था।

वह तो धन्य हो सुक्कन मामू का ! बीते लगन में मंगरु का भी ब्याह रचा दिए, चन्दनपट्टी की रूपवती से। जैसा नाम वैसा काम! रूपवती गुणवंती भी निकली।  मंगरुआ का घर उसने बसा ही दिया। बरसों से जहां चूल्हा नहीं जला, उसके टूटे छप्पर से सांझ-सबेरे दोनों बक़्त धुंआ उठने लगा। दोनों जून सिद्ध अन्न पेट में और घर में सुन्दर लुगाई देख कर मंगरु को भी अपना कर्त्तव्य-बोध हुआ।

इस बार हार नहीं मानेगा, पट्ठा! पिल गया कुदाल ले कर। सारे खेत की मेढ़-क्यारी ठीक किया। पानी का ठहराव किया। धान का चारा डाला। दिन-दुगुना रात चौगुना मेहनत किया लेकिन चनपट्टी वाली को घर से बाहर नहीं निकलने दिया। पिछले तीसों बरस का दम इसी बार लगा दिया उसने। अब इन्द्र भगवान रूठे तो क्या? गड्ढे-तालाब मे जमे पानी से खेतों को पटाया उसने।... हार नहीं मानी! ... शादी में मिले रेडियो को बंधक रख कर डी.ए.पी  यूरिया भी डाला खेत में। मुखिया जी के हाथ-पांव पर कर दमकल से पानी दिया... आ हा हा... ! भगवान ने उसकी मेहनत का फल भी दिया। चढ़ते अगहन उसके दरवाज़े पर धान के बोझों का पहाड़ खड़ा हो गया।

धान की जब झराई हुई तो उसने धान के ढेर बनाए और उसके ऊपर गोबर का महादेव बना कर फूल चढाया! खुद ही मंगरु ने तराजू लेकर धान को तौलना शुरु किया। तौल-तौल कर जब वह धान को पत्नी के पास रखे डाले में डाल रहा था तो दोनों प्राणी का चेहरा ख़ुशी,गर्व और संतुष्टि से चमक उठा। उसी समय सुमित्रा बुआ का वहां पर पदार्पण हुआ!  मंगरु बोला, "पायं लागू बुआ !" चनपट्टी वाली डाला छोड़ माथे पर साड़ी डाली और बुआ को मोढे बिठा कर उनके चरण छूए। बुआ हाथ बढा कर आशीर्वाद दीं। बोली “मंगरु, तेरी बहुरिया तो साक्षात लक्ष्मी है रे। ऐसी उपज तो घुरण भाई के जमाने में भी तेरे घर नहीं आई थी। इस बार देखो, बड़े-बड़े किसान धोती के खूट से आँख पोछ रहे हैं। तेरे दरवाज़े पर तो लक्ष्मी दमक रही है। साल भर पहले कैसे ग़रीबी छाई थी यहां! आज देखो कैसा खिलखिला रहा है घर-आँगन! सच बड़ी लच्छनमान औरत आयी है तेरे घर। देखो पहली फसल में तेरा घर भर दिया इसने।

बुआ तो चनपट्टी वाली की तारीफ़ में कसीदे पढी जा रही थी। बात भी सही थी। लेकिन मंगरु के जी-तोड़ मेहनत की कोई चर्चा ही नहीं की बुआ ने। इस पर हमारे मुंह से निकल गया, "हाँ ! हाँ ! बुआ !! सोलह आने सच कहती हो !!! आखिर क्यों नहीं ? मरद उपजाए धान ! तो औरत बड़ी लच्छनमान !!" इस पर मंगरु तराजू की डंडी पटक कर लगा खिलखिला कर हंसने। … और चनपट्टी वाली भी साड़ी का पल्लू मुंह पर डाल कर दूसरी तरफ़  मुड़ गयी। बुआ बोलने लगी, "मार मुंहझौंसा! यह तो कहावत ही बनाते रहता है!"

लेकिन आप सोच कर देखिये तो बात बिलकुल दुरुस्त है। अब भाई, मेहनत किसी का और श्रेय किसी को मिले? मंगरु अगर मेहनत न करता तो चनपट्टी वाली लक्ष्मी होती क्या ???

कहावत की जड़ तो आपको दे दिए हम। तो फिर याद रखिये, जब भी मेहनत किसी की और श्रेय किसी और को मिले तो यही कहावत कहियेगा, "मरद उपजाए धान ! तो औरत बड़ी लच्छनमान !!'