रविवार, 24 अक्तूबर 2010

कहानी ऐसे बनी-९ :: गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !

कहानी ऐसे बनी-९

गोनू झा मरे! गाँव को पढ़े!

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमा

राम-राम हजूर! देखते ही देखते सप्ताह बीत गया और फिर आ गया रविवार कहानी ऐसे बनी का दिन! अब क्या बताएं, आज सुबह-सुबह ब्लॉग पर आए तो ऐसा  अमोल बोल देखे कि गाँव की एक पुरानी कहावत याद आ गयी। हमारे मिथिलांचल में कहते हैं 'गोनू झा मरलथि ! सौंसे गाम जंचलथि!!' अर्थात्‌ 'गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!'

आपको गोनू झा के किस्से तो मालूम ही होंगे। यदि नहीं मालूम है तो कोई बात नहीं। हम फिर से कह देते हैं। वही कमला-बलान के किनारे मिथिला का प्रसिद्ध गाँव है, भरवारा। उस गांए के  बड़े पोखर के सामने जो ऊंचा आवास है न.... वह गोनू झा का ही है। गोनू झा की चालाकी के किस्से तो मिथिलांचल क्या अगल-बगल के क्षेत्र में भी एक युग से प्रचलित है। गोनू झा किसी स्कूल-कॉलेज में पढ़े नहीं. थे .. वे तो मिथिला का एक सीधा-सादा किसान थे। लेकिन हाज़िरजवाबी और चतुराई में बड़े-बड़े विद्वान को धूल चटा देते थे।

अब तो गाँव की बात पता ही है। उनकी चालाकी से भी सभी गाँव वाले जलते थे लेकिन मुंह पर उनका 'फैन' बने फिरते थे। पर गोनू झा की छठी बुद्धि को शक था कि लोगो के प्यार में कुछ झूठ मिश्रित है। वे बहुत दिनों से गाँव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का प्लान बना रहे थे। अगर बात सिर्फ गाँव वालों की ही होती तब तो गोनू झा अपने जोगार टेक्नोलोजी से उनको तुरत फिट कर देते। मगर उनको तो अपने घर के लोगों की बातों में भी मिलाबट की महक आती थी। सो उन्होंने सोचा कि क्यूँ न सबका एक ही 'कॉमन टेस्ट एग्जाम' ले लिया जाय।

बहुत सोच-विचार कर झा जी एक दिन सुबह में उठे ही नहीं! सूरज चढ़ गया छप्पर के ऊपर मगर गोनू झा बिछावन नहीं छोड़े। तब ओझाइन को थोड़ा अंदेशा हुआ। गयी जगाने तो यह क्या ....  हे भगवान .... अरे बाप रे बाप...!!! झा जी के मुंह से तो झाग निकला हुआ था और बेचारे बिछावन से गिरकर नीचे एक कोने में लुढ़के पड़े थे। ओझाइन तो लगी कलेजा पीट के वहीं चिल्लाने। बेटा भी माँ की आवाज़ सुन कर बाबू के कमरे में आया। वहाँ का नजारा देख कर उसका कलेजा भी दहल गया। वह भी लगा फफक-फफक कर रोने।

इधर ओझाइन कलेजे पर दोनों गाथ मार-मार कर चिल्ला रही हैं,.... उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई लेले बस हमारे बाबूजी को लौटा दे। इस महा दुखद खबर सुन कर गोनू झा से उनको मरणोपरांत अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया जी भी पहुँच गए। गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी। लगे दोनों जने झा जी के बेटे को समझाने। "आ..हा...हा... ! बड़े परतापी आदमी थे। पूरे जवार में कोई जोर नहीं। अब विध का यही विधान था।"

उधर ज़िन्दगी भर झा जी का चिलमची रहा अकलू हजाम औरत महाल में ज्ञान बाँट रहा है। 'करनी देखो मरनी बेला !' देखा गोनू झा जैसे उमर भर सब को बुरबक बनाते रहे वैसे ही चट-पट में अपना प्राण भी गया। सारा भोग बांक़ी ही रह गया।'

सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, 'झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे। सीधे स्वर्ग गए। अब इनके पीछे रोने-पीटने का कोई काम नहीं है। कुछ रुपया-पैसा रखे हैं तो गौदान करा दीजिये। बैकुंठ मिलेगा।'

उधर मुखिया जी उनके बेटे को बोले, जल्दी करो भाई, घर में लाश अधिक देर तक नहीं रहना चाहिए। ऊपर से मौसम भी खराब है। प्रभुआ और सीताराम को तुम्हारे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने। जल्दी से ले के चलो। फिर दो आदमी से पकड़ कर झा जी को कमरे से बाहर निकालने लगे। लेकिन गोनू झा कद काठी के जितने ही बड़े थे उनके घर का दरवाजा उतना ही छोटा था। अपनी जिन्दगी में तो झा जी झुक कर निकल जाते थे। लेकिन अभी लोग बाहर कर ही नहीं पा रहे थे। तभी मोहन बाबू कड़क कर बोले, “अरे सुरजा बढई को बुलाओ। दरवाजा काट देगा।”

सूरज तुरत औजार-पाती लेकर हाज़िर भी हो गया। तभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, 'रुको हो सूरज भाई ! बाबू जी तो अब रहे नहीं। उन्होंने बड़े शौक से यह दरवाजा बनवाया था। इसे काटने से उनकी आत्मा को भी तकलीफ होगी। अब तो वे दिवंगत हो गए। शरीर तो उनका रहा नहीं। इसलिए उनके पैर को बीच से काट कर छोटा कर दो। फिर आराम से निकल जायेंगे।'

images (3) ‘हूँ’ कर के सूरज बढई जैसे ही झा जी के घुटने पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठ कर बैठ गए.... और बोले “रुको! अभी हम मरे नहीं हैं। वह तो हम तुम सब लोगों की परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरने के बाद भी।”

अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हजाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा... सब का मुंह बासी जलेबी की तरह लटक गया। आखिर सब की कलई जो खुल गयी थी। गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए लेकिन तभी से यह कहावात बन गयी कि "गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!"

मतलब बुरे वक़्त में ही हित और अहित की पहचान होती है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. कहावतों के पीछे कितना सार्थक तथ्य होता है अच्छी पोस्ट बधाई

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  2. बहुत सुन्दर! मिथिला के तेनालीराम और बीरबल से हमारा परिचय करा रहे हैं है.. करन हिंदी और मिथिला के बीच अच्छे सेतु का काम कर रहे हैं..

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  3. 4/10

    रोचक पोस्ट
    हर मुहावरा अपने भीतर एक अतीत की कहानी समेटे होता है. उसके ख़ास निहितार्थ होते हैं. इस तरह के मुहावरों से परिचित होना भी अच्छा लगता है.

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  4. गोनू झा की चतुराई के अनेकों किस्से पढ़े हैं बचपन से आजतक.. जितनी बार पढिए, इनकी कथा नवीन प्रतीत होती है.. और हाँ आज पहली बार पता चला कि झा जी की पत्नी ओझाइन कहलाती हैं..सोचते थे वर्माजी की वर्माइन तो सुने हैं पर झा जी की झाइन नहीं सुने.. बहुत अच्छा रहा यह अंक भी!

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  5. गोनू झा के किस्से बचपन में बहुत पढ़े थे. बाल पत्रिकाओं में एक चित्र कथा होती थी. अच्छी तरह से परिचित और उनकी चतुराई भारी कहानियों और किस्सों से भी. आज अपने नई कहानी सुनाई तो मजा आ गया.
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  6. इस ब्लाग के माध्यम से हमें भी आपके क्षेत्र आचंलि कता का ज्ञान हो जाता है कहानी बहुत अच्छी है आपका मुहावरों के जरिए उसके पीछे छिपी कहानी व शिक्षा से परिचित कराना, जीवन के बहुत से पहलुओ को उजागर करने का प्रयास सटीक है। बहुत ही रोचक।

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  7. रोचक जानकारियाँ रहती हैं हमेशा आपकी कथाओं में..आभार.

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  8. उत्तर में बीरबल,दक्षिण में तेनालीराम और पूरब में अपने गोनू झा!

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