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रविवार, 7 नवंबर 2010

कहानी ऐसे बनी-११ :: मियाँ बीवी के झगड़ा !

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमार

कहानी ऐसे बनी-११

मियाँ बीवी के झगड़ा !

पाठक वृन्द की जय हो!

मान गए साहब आपको ! एक तो रविवार आते ही हम सुध खो देते हैं और महराज आप भी सब कुछ भुला कर कहानी ऐसे बनी की बाट जोहते रहते है। यह आपका प्रेम ही है, नहीं तो आज तो हमारा मूड बहुत ही ख़राब था। अब आप आ गए हैं तो एक कहानी बनने की दासतां सुना ही देते हैं। परन्तु आज से हम भी मारे गए गुलफ़ाम की तरह तीसरी क़सम खाए हैं कि सब करम करेंगे .... लेकिन किसी की पंचायती नहीं करेंगे। चाहे यह समाज रहे या जाए कोशी की बाढ़ में .... कोई जीए या मरे ... हमें कोई मतलब नही है। भाड़ में जाए दुनिया!  हम बजाएं हरमुनिया !! आपको लगता होगा कि हम खा-म-खा बकवास कर रहे हैं। हमारा गुस्सा नाजायज़ है। लेकिन आप जब बात सुनेंगे तो सब समझ जाएंगे।

अब क्या बताएं .... दिन भर कचहरी में मगज खपा कर अपनी पुरानी खर-खरिया सायकल पर चढे चले आ रहे थे। उतरबारी टोला पहुंचे ही थे कि उधर से खखोरन काका बायां हाथ झुकी हुई कमर पर रखे और दायें हाथ को वर्षा में कार का शीशा पोछने वाले वाइपर जैसे तेजी से हिलाते एकदम झटक-झटक कर चले आ रहे थे। आ..हा...हा... वह तो हमरी सायकल बच्चों वाली सायकल की तरह मंद गति से आ रही थी नहीं तो धक्का तो लग ही जाता। जैसे-तैसे चक्का से सट के काका रुके और कमर पर रखे हाथ का जोर बढ़ा दूसरे हाथ को हेड-लाईट के ढक्कन की तरह आँखों के ऊपर रख कर हाँफते हुए बोले, "बौआ... रेलवे तरफ़ से आ रहे हो क्या ?"

हम बोले, "हाँ, काका ! मगर आप इतना घबराए हुए कहाँ जा रहे हैं?"

खखोरन काका हमारी सायकल का हेंडिल पकड़ कर कमर को सीधा करते हुए बोले, "अब क्या बताएं बिटवा ! इस बुढापे में हमको और कौन-कौन दिन देखना बचा है, राम जाने ? ये सब मौत दिखाने से पहले भगवान हमको उठा क्यों नही लेते...!" कह कर काका एकदम से फफक कर रो पड़े।

हम साईकिल को स्टैंड पर खड़ा कर के काका का कन्धा पकड़ कर बोले, "काका ! आप बच्चों की तरह क्यों रो रहें हैं ? अरे कुछ बताइये तो सही कि बात क्या है ?"

कक्का कहने लगे, "हमारा छोटका बेटा और उसकी बहू है न सिंघपुर वाली... परसों से ही दोनों मियां-बीवी में पता नही किस बात की खट-पट चल रही थी। आज सुबह में बात और बिगड़ गयी.... मरद जात ! कितना सहे... मंगरुआ … शायद दू-चार हाथ रख दिया। उस पर उसकी औरत ने जो हंगामा मचाया है, पूछो मत बौआ ! मेरी और तुम्हारी काकी के तन-बदन का भी एक भी गत नही छोड़ी, इस बुढ़ापे में। चूल्हा-चौका छोड़ कर दिन भर हमें जली-कटी सुनाती रही। अभी सांझ भरे छौड़ा आया है, तो फिर एक झोंक और हो गया। हम समझाने गए तो पासा उल्टा ही पड़ गया... गाली-श्राप भी दिया उसने और छोकरे के साथ-साथ हम बूढा-बूढ़ी पर भी इल्जाम लगाते हुए भागी है रेल में कटने। पीछे से छौड़ा भी गया है... ! मुझसे तो दम नही धरा जा रहा है। पता नही क्या हुआ... !!" इतना कह खखोरन काका गमछी की खूंट से आँख पोछने लगे।

हमने कहा, "कुछ नही होगा काका ! चलिए देखते हैं कहाँ गए हैं दोनों।" फिर हमने सायकल घुमाई और कक्का को बैठा कर खरंजा वाली सड़क पर अपनी खर-खरिया को रॉकेट की तरह उड़ा दिए।

रेलवे किनारे कोस भर खोजे मगर कोई चख-चुख सुनने को नहीं मिला ... जैसे-जैसे उनके मिलने में देर हो रही थी, काका के हृदय की धुक-धुक्की लोहार के भाथी जैसे बढी जा रही थी। घूम-फिर कर हम लोग गौरी पोखर पर पहुंचे। वहाँ सांझ के झल-फल में दो परछाईयां दूर से ही दिखाई दी। हमने कक्का को भरोसा दिया।

सच में, वही दोनों थे!

मैं उनके पास गया। देखा जोरू जोर लगा रही थी। मरद उसका हाथ पकड़े कभी समझा रहा था तो कभी डरा रहा था। हम भी लगे दोनों को समझाने। लेकिन यह क्या ... हमारी गोद में खेला मंगरुआ लगा हम पर ही खिसियाने। ससुर का नाती तैश मे आकर कहने लगा, "वो कोट-कहचरी का धमकी हमें ना दिखाओ... ! नही तो तुम भी कुछ सुन जाओगे !!"

हम दपट दिए उसको तो चुप होय गया, मगर सिंघपुर वाली के तो सच में सिंघ फूटे थे। लगी हमारे खानदान का उद्धार करने, "दिन भर कहचरी में दांत निपोरते हैं और अभी हमारे मरद को सिखाने चले हैं। अपना घर से बाहर तक कौन गत बचा है, …  जैसे किसी से छिपा है।"

उसका प्रवचन सुन कर और लोग भी इकट्ठा हो गए थे। मुझे भारी बेइज़्ज़ती लग रही थी। हम से भी रहा नही गया। बोले, "जुबान को लगाम दो दुल्हिन, नही तो बहुत ख़राब होगा। तब से समझा रहे हैं, हमारा गुस्सा अभी नही देखी हो तुम !"

अरे बाप रे बाप ! हमारे मुंह से इतना निकला नहीं कि वह नागिन की तरह और मंगरुआ नाग सांप की तरह हमारे ऊपर फुंफकार छोड़ने लगा ! कहने लगा, "हे... इतना रोब मत दिखाओ, भैय्या ! क्या कर लोगे गुस्सा आ गया तो ? अभी उसका मरद जिंदा है !"

सिंघपुर वाली का हाथ पकड़ कर बोला, "इसका हाथ पकड़े हैं रक्षा के लिए। हमारे रहते जो कोई भी इसपर आँख उठाएगा उसकी आँख निकाल लेंगे।"

अभी तक मंगरुआ से हाथ छुड़ा रही सिंघपुर वाली भी उसी के सीने से चिपक कर लगी हमारी तरफ़ हाथ चमकाने। फिर दोनों हाथ में हाथ दिए अंधेरे में घर की राह पकड़ लिए।

हमने अपनी खीझ खखोरन काका पर ही उतारा। बोले, "लो काका जी, आपका बेटा-पतोहू तो गए हाथ में हाथ धरे ! और हम बीच मे बेकार में लबरा बन गए!”

उधर भीड़ में से बादल को छांट कर निकलते हुए सूरज की तरह शकुंतला फुआ प्रकट होते हुए बोली, "हाँ रे बेटा ! मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !! औरत-मरद के बीच में तो बोलना ही बेकार है। देखा तीन दिन से कित्ता नौटंकी कर रहे थे। अभी समझाने वाले पर ही पलट गए। तुरत रूठना-मनाना, रेल में कटना, पोखर में डूबना और क्षण में ही कैसे सब को बुरबक बना गलबहियां डाले चले गए !!! सच मे, मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !! देखा लैला-मजनू ने कैसे सबको लबरा बना दिया !!!"

फुआ तो एक बार कह के चुप हो गयीं। लेकिन वहाँ खड़े सारे बच्चे तो कविता ही बना दिया।" मियां-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !!" पढ़-पढ़ के लगे हमारी ओर देख कर ताली बजाने। अब आपही बताइये, इस बात पर गुस्सा आएगा कि नही ? क्या नाजायज़ है हमारा गुस्सा ?? तभी से हमने उल्टे हाथ से कान पकड़ा कि अब किसी की पंचायती नही करेंगे। ख़ास कर मियाँ-बीवी का तो भूल कर भी नहीं।

लेकिन एक बात है। हम लबरा बने तो बने। एक कहावत भी तो बन गया, "मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !!" (सांय-बहू के झगड़ा, पंच बने लबड़ा)

मतलब ::

करीबी लोगों की छोटी-छोटी बातों में दखल देना बेवकूफी ही है।

 

हाँ तो हुज़ूर ! हम तो एक बार लबरा बन ही चुके हैं ! आप दोबारा मत बनाइएगा। और इस कहानी पर अपनी राय ज़रूर दीजिएगा !!!

तो अब चलते हैं। जय राम जी की !! मिलेंगे अगले रविवार को ... और बताएंगे कि कहानी कैसे बनी?

पुराने लिंक

  1. कहानी ऐसे बनी-१ :: नयन गए कैलाश ! 
  2. कहानी ऐसे बनी- 2 : 'न राधा को नौ मन घी होगा... !' 
  3. कहानी ऐसे बनी – 3 "जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!" 
  4. कहानी ऐसे बनीं-४ :: जग जीत लियो रे मोरी कानी ! … 
  5. कहानी ऐसे बनी–५ :: छोड़ झार मुझे डूबन दे !  
  6. कहानी ऐसे बनी– 6 -"बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ?" 
  7. कहानी ऐसे बनी– 7 :: मरद उपजाए धान ! तो औरत बड़ी लच्छनमान !!   
  8. कहानी ऐसे बनी– 8 :: न कढी बना न बड़ी! 
  9. कहानी ऐसे बनी-९ :: गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े ! 
  10. कहानी ऐसे बनी-१०::चच्चा के तन ई बधना देखा और बधना के तन चच्चा देखे थे।

रविवार, 12 सितंबर 2010

कहानी ऐसे बनी – 3 "जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!"

देसिल बयना – 3


"जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!"

कवि कोकिल विद्यापति के लेखिनी की बानगी, "देसिल बयना सब जन मिट्ठा !"
दोस्तों हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतीम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रहे इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समतीपुरी।
देसिल बयना (1) 'नयन गए कैलाश ! कजरा के तलाश !!' मतलब आधारविहीन उपयोगिता।
देसिल बयना – (2) 'न राधा को नौ मन घी होगा... !' -- किसी कार्य के लिए अपर्याप्त सामर्थ्य या संसाधनहीनता

गंगा, कमला, बागमती, कोशी और गंडक के प्रसस्त अंचल तिरहुत में एक कहावत है, "जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!" अब भी कहावत है तो यूँ ही नहीं है ! कैसे बनी कहावत... क्या है इसका मतलब... यह सब जानने के लिए आपको चलना पड़ेगा मेरे साथ रेवाखंड !

-- करण समस्तीपुरी
तिरहुत के गण्डकी पुर में एक मनोरम गाँव है, रेवाखंड ! उसी गाँव में एक किसान रहता है! उसने एक कुत्ता और एक गधा पाल रक्खा था ! वो अपने जानवरों को बहुत प्यार करता था। जानवर भी अपने मालिक को बहुत चाहते थे। एक दिन किसान की घरवाली कुत्ते को खाना देना भूल गयी! कुत्ता नाराज़ हो गया!
संयोग से उसी रात किसान के घर में कुछ चोर घुस आये ! पर नाराज़ कुत्ता बोला ही नहीं! गधे ने उसे भौंकने को कहा तो उसने जवाब दिया कि उसे खाना नहीं मिला है इसीलिए वह काम नहीं करेगा. लेकिन गधे ने सोचा, "अगर शोर नहीं किया तो मालिक के घर चोरी हो जायेगी। सो वह खुद जोर-जोर से ढेंचू ढेंचू करने लगा। दिन भर का थका मांदा किसान सो रहा था। बेचारा चिढ कर उठा और गधे को दे दना दन... दे दना दन... पीट दिया। गधा चुप हो गया।
सुबह किसान सो कर उठा तो घर का सारा सामान गायब पा कर उसे समझते देर न लगी कि रात गधा क्यूँ ढेंचू ढेंचू कर रहा था। लेकिन अब उसे गुस्सा कुत्ते पे आया ! अगर कुत्ते ने भौंका होता तो चोरी भी नहीं होती और बेचारे गधे को मार भी नहीं पड़ती ! गुस्से में बौखलाया किसान वही रात बाला डंडा उठाया और कुत्ते पर भी दोहरा बजा दिया। गधा समझ नहीं पाया लेकिन आप तो समझदार हो !
तो समझे कि नहि ???
अजी !
भौंकना कुत्ते का काम था लेकिन गधे ने वो किया इसीलिये उस पर डंडे बजे और कुत्ते ने गधे वाला काम किया इसीलिये उसे भी डंडे पड़े ! इसीलिए कहते हैं, “जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे” !!
हा... हा... हा... … !!!                                                                           चित्र आभार गूगल सर्च

रविवार, 5 सितंबर 2010

कहानी ऐसे बनी- 2 : 'न राधा को नौ मन घी होगा... !'

देसिल बयना – 2


'न राधा को नौ मन घी होगा... !'

कवि कोकिल विद्यापति के लेखिनी की बानगी, "देसिल बयना सब जन मिट्ठा !"
दोस्तों हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतीम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रहे इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहा हूँ। प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी !!               - करण समस्तीपुरी
देसिल बयना (1) 'नयन गए कैलाश ! कजरा के तलाश !!'
 मतलब आधारविहीन उपयोगिता।
आइये, आज मैं आपको लिए चलते हैं वृंदा-वन! ये कहानी है, राधा-कृष्ण और व्रज-वनिताओं की। कृष्ण तो अपनी मधुर रास लीला के लिए प्रसिद्ध हैं ही! गोकुल के ग्वाल बाल और बालाओं को कृष्ण से बहुत प्यार था। कृष्ण भी इन के साथ गोकुल की गलियों में खूब धूम मचाते थे।
इधर श्री कृष्ण अपने बाल सखाओं सहित गो चारण को जाते थे, उधर से व्रज बालाएं पानी भरने या दही बेचने के बहाने चल पड़ती थीं यमुना तट। फिर कालिंदी के कूल कदम्ब के डारन और हरे भरे वृन्दावन में शुरू होती थी गोपी-किशन की अलौकिक रास लीला। गोपियाँ कृष्ण- प्रेम की बावली थी। और राधा तो सबसे ज़्यादा। कृष्ण भी राधा से उतना ही प्यार करते थे। पीताम्बर धारी सांवरे जैसे ही अपने अरुण अधर से हरित बांस की बांसुरी लगाते थे तो "इन्द्रधनुष दुति" हो जाती थी। इतना प्रकाश होता था मानो नौ मन घी के दिए जल रहे हों। फिर क्या मुरली की मनोहर धुन एवं दिव्य प्रकाश में गोपियाँ सुध-बुध बिसरा कर नाचने लगती थी।
किंतु एक दिन ऐसा आ ही गया, जब कृष्ण को अपने जन्म का हेतु पूरा करने जाना पड़ा मथुरा.... !! गोकुल की गलियाँ सूनी। वृन्दावन में पतझर। यमुना का जल उष्ण। मनुष्य तो मनुष्य गायें भी बेहाल। अति मलीन वृषभानु कुमारी राधा तो आधा भी नही रही। चन्द्रवदनी का हँसना बोलना सब बंद। सब तो सामान्य हुए या होने की कोशिश करते रहे। लेकिन राधा बेचारी क्या करे? सबो ने समझाया लेकिन राधा नाचे कैसे... ? उसमे तो नृत्य की ऊर्जा आती है श्री कृष्ण के वेनुवादन से निःसृत प्रकाश से। अन्यथा उतने प्रकाश के लिए नौ मन घी के दिए जलाने पड़ेंगे।
इसीलिये लोग कहने लगे न राधा को नौ मन घी होगा, न राधा नाचेगी !!!
कालांतर में उक्ति किसी कार्य के लिए अपर्याप्त सामर्थ्य या संसाधनहीनता के लिए रूढ़ हो गयी।

रविवार, 29 अगस्त 2010

कहानी ऐसे बनी-१ :: नयन गए कैलाश !

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कहानी ऐसे बनी

नयन गए कैलाश !

.करण समस्तीपुरी
हा... हा... हा.... ! राम-राम !! हा... हा....हा... हा.... !!!! अरे बाप रे बाप ... हा... हा... हा... हा... !!! आप भी सोच रहे होंगे कि करण समस्तीपुरी का दिमाग  ख़राब हो गया है क्या.... ? परंतु बात ही ऐसी है कि हंसी रुक ही नहीं रही है.... !!! आप भी सुन के ठहाका लगा ही दीजियेगा.... !
आज-कल तो जिसे देखो वही शहर-बाजार में ही रहने लगा है। आप लोग तो साहब-हुक्मरान हैं। परमानेंट शहरी। सावन-भादों क्या समझ मी आएगा। किन्तु चौमासा आते ही गाँव-घर में अभी भी हरियाली छा जाती है। झमाझम बरसते पानी में सिर पर बिचरा (धान का छोटा पौधा) और काँधे पर कुदाल लिए धानरोपनी के लिए जाते किसान और पीछे से भोजन लेकर चलती उनकी पत्नी.... ! हरे-पीले रंग-बिरंग के मेढक सब टर्र-टायं-टर्र-टायं कर के जो तान छोड़ता है कि आदमी तो आदमी पेड़-पौधों के तरु-शिखा तक नाचने लगते हैं। उस पर से यदि पुरबा हवा चल पड़ी तो, लहरिया लूटो हो राजा... !
चास-धानरोपनी हो गया। घर में लकड़ी-काठी समेटा गया फिर तो मौजा ही मौजा... ! क्या स्त्री और क्या पुरुष.... ! सब मिल-जुल कर जो छेड़-छाड़, हंसी-ठिठोली करते हैं कि मन आनंद से भीग जाता है। ताल-पचीसी , झूला-कजरी, चौमासा के तान मृदंग के थाप और बांसुरी के तान... वाह रे वाह.... समझिये कि पूरा गाँव ही वृन्दावन। नहीं कदम तो बगीचे में आम-कटहल, बरगद-पीपल जो भी मजबूत पेड़ मिल गया उसी में मोटी रस्सी टांग दिए और हो गए शुरू, "झूला लगे कदम के डारि, झूले कृष्ण-मुरारी ना.... !"
उस दिन आधी रात से ही आसमान फार के  मुसलाधार बारिश हो रही थी। हमारे टोले के सभी लोग बर्कुरबा और  खिलहा चौरी में तड़के ही हल-बैल छोड़ दिए थे। दोपहर तक धानरोपनी कर के आ गए। फिर घुघनी लाल की पत्नी और चम्पई बुआ घरक  पूरब वाले बगीचे में झूला का प्लान बनाई।  झिगुनिया और  नौरंगी लाल तुरत रस्सी-गद्दा लेकर बढ़ गए। एक बात तो मालूम ही होगा .... मौसम-बयार कैसा भी हो स्त्रियों को श्रृंगार से मन नहीं भरता। वो गीत में भी कहते हैं न....
"बरसे सावन के रस-झिसी पिया संग खेलब पचीसी ना...  !
मुख में पान,   नयन   में  काजल,   दांत में  मिसी       ना... !!"
बरसात में भी काजल-मेहँदी के बिना बात नहीं बनती।  बिना श्रृंगार के झूला कैसे झूलेगी। ऊपर से यहाँ तो टोला भर की स्त्रियों के बीच फैशन का कम्पेटीशन  होगा। किसकी मेहँदी सज रही थी, किसका पाउडर चमक रहा था। किसकी चुरी खनक रही थी और किसका लपेस्टिक लहक रहा था.... ।
बड़का कक्का के दालान पर टपकू भाई हरमुनिया टेर रहे थे। सुखाई ढोलकी पर ताल दे रहा था और हम भी वहीं मजीरा टुनटुना रहे थे। महिलाओं  का झुण्ड वहीं बन रहा था। पूरा टोला इकट्ठा हो जाए तो झूला झूलने जायेंगे। महिला मंडली के सरदार बड़की काकी ही तो थी। अरे रे रे .... कोई पनिहारन बन के... तो कोई मनिहारन बन के.... कोई गुज़री बन के तो कोई सिपाहन बन के.... सज-धज के आने लगी। किसी की सजावट में एक चुटकी कमी नहीं रहना चाहिए। बड़की काकी खुद से सब को परख रही थी और जो भी कमी उनको नज़र आता, अपने श्रृंगारदानी से भर देती थी। काकी की तीनो बहुएं भी साज-श्रृंगार में लगी हुई थी। समझिये कि काकी का दरवाज़ा नहीं हुआ कि वो शहर में क्या कहते हैं.... हाँ ! ब्यूटी-परलर हो गया।
सब  सज-धज के तैयार हो गयी तो काकी जोर से सबको पुकार के बोली, "सब तैयार हो गयी न.... अब चलो!"
"अरे बड़की भौजी ! अरे इतना जल्दी क्या है अरे.... ठहरिये-ठहरिये... ! हम भी आ रहे हैं।", उत्तर की तरफ़ से  छबीली मामी बोलती हुई धरफराते हुए चली आ रही थी।
"मार हरजाई..... तो मार..... छि..... !" काकी और छबीली मामी का हंसी-मजाक इलाका-फेमस है।
रसभरी ठिठोली वहाँ भी हो गया फिर काकी बोली, "ऐ छैल-छबीली ! अब चलो भी... ! नहीं तो अंधरिया में झूलते रहना.... !"
"अरे क्या हड़बड़ी मचा रखी हो.... कोई इन्तज़ार कर रहा है क्या....? जरा तैय्यार तो होने दो !"
मामी की बात पर महिलाएं मुँह में आँचल दबा के हंस पड़ीं थी। फिर मामी के केश में गजरा लगा के काकी बोली, "अब बाग़ में चलें हेमा मालिनजी....?"
मामी अपनी आँखों से मोटा चश्मा हटा के बोली, "अरे भौजी ! हमरे अधबयस रूप में नजर-गुजर नहीं लग जाएगा क्या.... ?" फिर एक आँख दबा के बोली थी, “जरा काजल तो लगाने दो !"
"धत्‌ तेरे के... ! 'नयन गए कैलाश  और कजरा के तलाश !!' आँख गया जहन्नुम में और ई मोटका चश्मा के भीतर काजल लगाएगी.... !!" हा....हा.... हा.... ! ही....ही....ही....ही..... !! ओ...होह्हो.....हो...हो.... !!! काकी जिस अदा से बाया हाथ नाचा के बोली थी कि नयी दुल्हने भी आँचल के नीचे से ही खिल्खिला के हंस पड़ीं। खें......खें....खें........ !!! हे....हे....हे....हे... !!!!" हम तो मजीरा पटक के हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। हो...हो...हो...हो.... बड़का कक्का भी पेट पकड़ कर हंस रहे थे। अरे बाप रे बाप..... "नयन गए कैलाश ! कजरा के तलाश !!" ही....ही...ही....ही.... ! आज वही दृश्य याद आ गया इसीलिए हँसते-हँसते बेदम हैं हम तो..... हें....हें...हें....हें.... !!
अरे महाराज ! उस के बाद तो यह कहावत ही बन गया, 'नयन गए कैलाश ! कजरा के तलाश !!' मतलब आधारविहीन उपयोगिता। जब आँख है ही नहीं तो काजल का क्या काम ? काजल लगाने से आँख की शोभा बढती है नाकि चश्मे की। सो जब आधार ही नहीं रहा तो उपयोगी साधन का उपयोग भी हम कहाँ करेंगे ? इसीलिए पहले आधार जरूरी है फिर अन्य संसाधन। समझे...? तो यही था आज का देसिल बयना। खाली ठहाके मत लगाइए। अर्थ भी समझते जाइए। नहीं तो बस, "नयन गए कैलाश ! कजरा के तलाश !!”