मैं एक नौ वर्ष के बालक का छोटा सा अनुभव आपसब के साथ बांटना चाहूँगा । इस बालक ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढ़ी और तीन पैसे ले कर ईदगाह जाने वाले बालक कि मजबूरी से दुखी कोमलमन बालक कई दिन तक गुमसुम रहा वो बालक मै था। ये मेरा स्वयं का अनुभव है. ऐसे अनगिनत मायूस अनुभवों से भरा है मेरा बचपन। इस कथा साहित्य ने मेरी बाल सुलभ मुस्कान, हंसी, मेरा बचपन मुझसे छीन लिया। इससब से उबर परिपक्व होने में जवान होने के बाद भी मुझे बरसों लगा गए। --- पन्डित सूर्यकान्त ”
मंगलवार, 31 जुलाई 2012
जन्म दिवस पर - प्रेमचंद की देन
मैं एक नौ वर्ष के बालक का छोटा सा अनुभव आपसब के साथ बांटना चाहूँगा । इस बालक ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढ़ी और तीन पैसे ले कर ईदगाह जाने वाले बालक कि मजबूरी से दुखी कोमलमन बालक कई दिन तक गुमसुम रहा वो बालक मै था। ये मेरा स्वयं का अनुभव है. ऐसे अनगिनत मायूस अनुभवों से भरा है मेरा बचपन। इस कथा साहित्य ने मेरी बाल सुलभ मुस्कान, हंसी, मेरा बचपन मुझसे छीन लिया। इससब से उबर परिपक्व होने में जवान होने के बाद भी मुझे बरसों लगा गए। --- पन्डित सूर्यकान्त ”
रविवार, 20 मई 2012
सुमित्रानंदन पंत जी के जन्म दिन पर
: 20 मई 1900 को अल्मोड़ा जनपद के कौसानी नामक गांव में हुआ था। इन्हें जन्म देने के तुरंत बाद इनकी माता सरस्वती देवी परलोक सिधार गईं। लालन-पालन दादी और बुआ ने किया। उनके बचपन का नाम था गुसाई दत्त। उनके पिता गंगा दत्त चाय बागान के मैनेजर थे। दस साल की उम्र में उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रा नंदन पंत रख लिया।
: प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। 1911 से आठ वर्षों तक अल्मोड़ा के राजकीय हाई स्कूल में नवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। 1918 में काशी आ गए। वहां क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। हाई स्कूल की परीक्षा 1920 में पास की। मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए और म्योर कॉलेज में दाखिला लिया। 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।
:: पिता के असामयिक निधन से उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। पहले कंवर नरेश सिंह के साथ कालाकांकर में रहकर कई वर्षों तक काव्य-रचना में लीन रहे। फिर 1934 में फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर भट्ट ने उन्हें अपने चित्र ‘कल्पना’ के गीत लिखने के लिए मद्रास आमंत्रित किया। 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। कई वर्षों तक भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए 1950 में इलाहाबाद में स्थायी बस गए। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में प्रोड्यूसर और फिर हिन्दी सलाहकार के रूप में भी कार्य किया।
: 1961 में इन्हें भारत सरकार की ओर से ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1961 में ही ‘कला और बूढ़ा चांद’ पर इन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। ‘चिदम्बरा’ पर 1969 में इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मनित किया गया। भारत सरकार की हिन्दी-विरोधी नीति और अपने हिन्दी प्रेम के कारण अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए इन्होंने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि लौटा दी।
: 28 दिसम्बर 1977 को इनका निधन हो गया।
:: काव्य रचनाएँ :: कविता-संग्रह : वीणा(1927), ग्रंथी (1919), उच्छवास(1920), पल्लव(1928), गुंजन (1932), युगांत, युगांतर, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा, लोकायतन, सत्यकाम, मुक्तियज्ञ, तारापथ, मानसी, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा, वाणी, रश्मिबंध, समाधिता, किरण वीणा, गीत हंस, गंध वीथी, पतझड़, अवगुंठित, ज्योत्सना, मेघनाद वध।
:: उपन्यास :: हार (15 वर्ष की अवस्था में ही लिख डाला था)
:: निबंध संग्रह :: आधुनिक कवि
:: रेडियो रुपक :: ज्योत्सना
पंत जी हिन्दी के छायावादी युग चार के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रकृति के एक मात्र माने जाने वाले सुकुमार कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी बचपन से ही काव्य प्रतिभा के धनी थे और 16 वर्ष की उम्र में अपनी पहली कविता रची “गिरजे का घंटा”। तब से वे निरंतर काव्य साधना में तल्लीन रहे।
कवि या कलाकार कहां से प्रेरणा ग्रहण करता है इस बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए पंत जी कहते हैं, “संभवतः प्रेरणा के स्रोत भीतर न होकर अधिकतर बाहर ही रहते हैं।” अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हें। शब्द, शिल्प, भाव और भाषा के द्वारा कवि पंत प्रकृति और प्रेम के उपादानों से एक अत्यंत सूक्ष्य और हृदयकारी सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं, किंतु उनके शब्द केवल प्रकृति-वर्णन के अंग न होकर एक दूसरे अर्थ की गहरी व्यंजना से संयोजित हैं। उनकी रचनाओं में छायावाद एवं रहस्यवाद का समावेश भी है। साथ ही शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों का प्रभाव भी है।
‘उच्छ्वास’ से लेकर ‘गुंजन’ तक की कविता का सम्पूर्ण भावपट कवि की सौन्दर्य-चेतना का काल है। सौन्दर्य-सृष्टि के उनके प्रयत्न के मुख्य उपादान हैं – प्रकृति, प्रेम और आत्म-उद्बोधन। अल्मोड़ा की प्रकृतिक सुषमा ने उन्हें बचपन से ही अपनी ओर आकृष्ट किया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मां की ममता से रहित उनके जीवन में मानो प्रकृति ही उनकी मां हो। उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा के पर्वतीय अंचल की गोद में पले बढ़े पंत जी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि उस मनोरम वातावरण का इनके व्यक्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा
“मेरे मूक कवि को बाहर लाने का सर्वाधिक श्रेय मेरी जन्मभूमि के उस नैसर्गिक सौन्दर्य को है जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ जिसने छुटपन से ही मुझे अपने रूपहले एकांत में एकाग्र तन्मयता के रश्मिदोलन में झुलाया, रिझाया तथा कोमल कण्ठ वन-पखियों ने साथ बोलना कुहुकन सिखाया। ”
पंतजी को जन्म के उपरांत ही मातृ-वियोग सहना पड़ा।
नियति ने ही निज कुटिल कर से सुखद
गोद मेरे लाड़ की थी छीन ली,
बाल्य ही में हो गई थी लुप्त हा!
मातृ अंचल की अभय छाया मुझे।
मां की कमी उन्हें काफी सालती रही और प्रकृति माँ की गोद का सहारा मिला तो मानों वे उसके लाड़ से अपने आप को पूरी तरह सरोबार कर लेना चाहते थेः
“मातृहीन, मन में एकाकी, सजल बाल्य था स्थिति से अवगत,
स्नेहांचल से रहित, आत्म स्थित, धात्री पोषित, नम्र, भाव-रत
हालाकि पंत जी ने गद्य की भी कई विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई लेकिन मूलतः वे कविता के प्रति ही समर्पित थे। 1918 से 1920 तक की उनकी अधिकांश रचनाएं ‘वीणा’ में छपी हैं। यद्यपि अपनी आरंभिक रचनाओं ‘वीणा’ और ‘ग्रंथि’ से पंत जी ने काव्यप्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा ज़रूर पर एक छायावादी कवि के रूप में इनकी प्रतिष्ठा ‘पल्लव’ से ही मिली। ‘पल्लव’ की अधिकांश रचनाएं कॉलेज में पढने जब वे प्रयाग आए, उसी दौरान लिखी गईं। पंत जी कहते हैं, “शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेज़ी कवियों से बहुत-कुछ मैंने सीखा। मेरे मन में शब्द-चयन और ध्वनि-सौन्दर्य का बोध पैदा हुआ। ‘पल्लव’-काल की प्रमुख रचनाओं का आरम्भ इसके बाद ही होता है।”
प्रकृति-सौन्दर्य और प्रकृति-प्रेम की अभिव्यंजना “पल्लव” में अधिक प्रांजल तथा परिपक्व रूप में हुई है। इस संग्रह के द्वारा पंत जी प्रकृति की रमणीय वीथिका से होकर काव्य के भाव-विशद सौन्दर्य प्रासाद में प्रवेश पा सके। छायावाद के कवियों ने सृजन को मानव-मुक्ति चेतना की ओर ले जाने का काम किया। सुमित्रानंदन पंत ने रीतिवाद का विरोध करते हुए ‘पल्लव’ की भूमिका में कहा कि ‘मुक्त जीवन-सौंदर्य की अभिव्यक्ति ही काव्य का प्रयोजन है।’
पल्लव को आलोचक भी छायावाद का पूर्ण उत्कर्ष मानते हैं। डॉ. नगेन्द्र का मानना है, “‘पल्लव’ की भूमिका हिंदी में छायावाद-युग के आविर्भाव का ऐतिहासिक घोषणा-पत्र है।” भाव, भाषा, लय और अलंकरण के विविध उपकरणों का बड़ी कुशलता से इसमें समावेश किया गया है। ‘पल्लव’ में प्राकृतिक रहस्य की भावना ज्ञान की जिज्ञासा में परिणत हो गयी है। इसकी सीमाएं छायावादी अभिव्यंजना की सीमाएं हैं। इसमें पंत जी कल्पना द्वारा नवीन वास्तविकता की अनुभूति प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे थे। इसके साथ ही इसमें मानव जीवन की अनित्य वास्तविकता के भीतर सत्य को खोजने का प्रयत्न भी है, जिसके आधार पर नवीन वास्तविकता का निर्माण किया जा सके।
कवि पंत की रचनाओं को देख कर ऐसा लगता था जैसे वे स्वयं प्रकृति स्वरूप थे। उनकी विभिन्न रचनाओं में ऐसा लगता है जैसे कवि प्रकृति से बात कर रहा हो, अनुनय कर रहा हो, प्रश्न कर रहा हो। मानों प्रकृति कविमय हो गई है और कवि प्रकृतिमय हो गया है। प्रकृति से परे सोचना उनके लिए असंभव सा थाः-
“छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया।
बाले! तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूँ लोचन॥ ”
कवि सम्राट पंत जी ने स्वयं माना कि छायावाद वाणी की नीरवता है, निस्तब्धता का उच्छ्वास है, प्रतिभा का विलास है, और अनंत का विलास है। अपनी संकुचित परिभाषा के कारण कुछ लोग पंत की रचनाओं में भी केवल पल्लव और पल्लव में भी कुछेक कविताओं को ही छायावाद के अंतर्गत स्वीकार करते हैं। मौन निमंत्रण में अज्ञात की जिज्ञासा होने के कारण रहस्यवाद है, अभिव्यक्ति की सूक्ष्मता के कारण छायावाद है और कल्पनालोक में स्वच्छंद विचरण करने के कारण स्वच्छंदतावाद भी है। पंत का रहस्य भावना ‘अज्ञात’ की लालसा के रूप में व्यक्त हुई है। पंत सीमित ज्ञान की सीमा को तोड़कर प्रकृति और जगत के प्रति जिज्ञासु की तरह देखते हैं। पंत का बालक मन हर चीज से सवाल पूछता है।
प्रथम रशमि का आना रंगिणि
तूने कैसे पहचाना
‘गुंजन’, विशेषकर ‘युगांत’ में आकर पंत की काव्य यात्रा का प्रथम चरण समाप्त हो जाता है। ‘गुंजन’-काल की रचनाओं में जीवन-विकास के सत्य पर पंत जी का विश्वास प्रतिष्ठित हो जाता है।
सुन्दर से नित सुन्दरतर, सुन्दरतर से सुन्दरतम
सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर सुन्दर जग जीवन!
उनकी काव्य यात्रा का दूसरा चरण ‘युगांत’, ‘युग-वाणी’ और ‘ग्राम्या’ को माना जा सकता है। इस काल तक आते-आते कवि स्थायी वास्तविकता के विजय-गीत गाने को लालायित हो उठता है और उसके लिए आवश्यक साधना को अपनाने की तैयारी करने लगता है, उसे ‘चाहिए विश्व को नव जीवन’ का अनुभव भी होने लगता है।
नवीन जीवन तथा युग-परिवर्तन की धारणा को सामाजिक रूप देने की कोशिश ‘युगान्त’ में सक्रिय रूप में सामने आई है। ‘युगान्त’ की अधिकांश कविताएं कवि की तीखी भाव चेतना के परिवर्तन का संकेत देती हैं। यह परिवर्तन वस्तुवादी चेतना के प्रति अधिक आग्रहशील दिखता है। “द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र, हे स्रस्त, ध्वस्त, हे शुष्क शीर्ण” में जहां ओजपूर्ण आवेश है वहीं गा कोकिल में नवीन जीवन पल्लवों से सौन्दर्य-मंडित करने का भी आग्रह है।
गा कोकिल, बरसा पावक कण
नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन –
झरे जाति-कुल; वर्ण-पर्ण धन –
व्यक्ति-राष्ट्र-गत राग-द्वेष-रण –
झरें-मरें विस्मृत में तत्क्षण –
गा कोकिल, गा, मत कर चिन्तन -
‘ग्राम्या’ प्रगतिशील आन्दोलन के प्रभाव के अन्तर्गत लिखी हुई रचना है। इसमें मार्क्सवाद, श्रमिक-मज़दूर, किसान-जनता के प्रति इन्होंने भावभीनी सहानुभूति प्रकट की है।
जगती के जन-पथ कानन में
तुम गाओ विहग अनादि गान।
चिर-शून्य शिशिर-पीड़ित जग में,
निज अमर स्वरों से भरो प्राण।
‘ग्राम्या’ 1940 की रचना है, जब प्रगतिवाद हिन्दी साहित्य में घुटनों के बल चलना सीख रहा था। पंत जी कहते हैं, “‘ग्राम्या’ में मेरी क्रान्ति-भावना मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित ही नहीं होती, उसे आत्मसात् कर प्रभावित करने का भी प्रयत्न करती है।”
भूतवाद उस धरा स्वर्ग के लिए मात्र सोपान,
जहां आत्म-दर्शन अनादि से समासीन अम्लान।
इन सब के साथ-साथ आदर्श तथा यथार्थ के बीच व्यवधान पंत जी के भीतर बना ही रहा। कवि के मन में आदर्श और यथार्थ की चिन्तन-धाराओं का संघर्ष तथा मंथन चलता रहा। डॉ.. नगेन्द्र ने ठीक ही कहा है,
“मार्क्सवाद में श्री सुमित्रानंदन पंत का व्यक्तित्व अपनी वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं पा सकता।”
शीघ्र जी फिर वे अपने परिचित पथ पर लौट आये। मार्क्सवाद का भौतिक संघर्ष और निरीश्वरवाद पंत जैसे कोमलप्राण व्यक्ति का परितोष नहीं कर सकते थे। काव्य यात्रा के तीसरे चरण की रचनाओं ‘स्वर्णकिरण’, ‘स्वर्णधूलि’, ‘युग पथ’, ‘अतिमा’, ‘उत्तरा’ में वे महर्षि अरविन्द से प्रभावित होकर आध्यात्मिक समन्वयवाद की ओर बढ़ते दिखते हैं। कवि की अनुभूति वस्तु जगत को समेटती हुई उस बौद्धिक चेतना से ऊपर उठकर एक सूक्ष्म अतिमानवीय चेतना को ग्रहण करती लगती है।
सामाजिक जीवन से कहीं महत् अंतर्मन,
वृहत् विश्व इतिहास, चेतना गीता किंतु चिरंतन।
इस चरण को पंत जी के चेतना-काव्य का चरण कहा जा सकता है। इसमें उन्होंने मानवता के व्यापक सांस्कृतिक समन्वय की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।
भू रचना का भूतिपाद युग हुआ विश्व इतिहास में उदित,
सहिष्णुता सद्भाव शान्ति से हों गत संस्कृति धर्म समन्वित।
पंत जी की कव्य यात्रा का चौथा चरण ‘कला और बूढ़ा चांद’ से लेकर ‘लोकायतन’ तक की है। इसमे उनकी चेतना मानवतावाद, खासकर विश्व मानवता की ओर प्रवृत्त हुई है। इन रचनाओं में लोक-मंगल के लिए कवि व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य के महत्व को रेखांकित करता है।
हमें विश्व-संस्कृति रे, भू पर करनी आज प्रतिष्ठित,
मनुष्यत्व के नव द्रव्यों से मानस-उर कर निर्मित।
‘लोकायतन’ कविवर पंत के लोक-कल्याण संबंधी नेक इरादे का भव्य एवं कलात्मक साक्षात्कार कराता है। अरविन्द दर्शन से प्रभावित होकर पंत की चेतना इस चरण में फिर से वापस लौटकर अपने प्रथम चरण की चेतना से जुड़ जाती है। अरविन्द दर्शन के प्रभाव में आने के बाद पंत को भौतिकता और आध्यात्मिकता के समन्वय का एक ठोस आधार प्राप्त हो गया।
समग्र रूप से देखें तो पाते हैं कि कवि के चिंतन में अस्थिरता है। निराला और पंत की जीवन-दृष्टि और काव्य-चेतना की तुलना करें तो हम पाते हैं कि निराला की जीवन-दृष्टि का लगातार एक निश्चित दिशा में विकास होता है जबकि पंत का दृष्टि विकास एक दिशा में न होकर उसमें कई मोड़ आते हैं। कभी वे प्रकृति में रमे रहते हैं तो कभी मार्क्सवाद, अरविन्द दर्शन और गांधीवाद की गलियों के चक्कर लगाते हैं। ‘ग्रंथि’ से ‘पल्लव’ और ‘पल्लव’ से ‘गुंजन’, ‘ज्योत्सना’ और ‘युगांत’ में वे क्रमशः शरीर से मन और मन से आत्मा की ओर बढ़ रहे थे। बीच में ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में आत्म-सत्य की अपेक्षा वस्तु-सत्य पर बल देते हैं। ‘स्वर्णकिरण’, और ‘स्वर्णधूलि’ में फिर से वे आत्मा की ओर मुड़ जाते हैं।
फिर भी ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’ जैसी रचनाओं द्वारा पंत जी छायावादी काव्य-धारा को सम्पन्न बनाया। वे छायावादी कविता के अनुपम शिल्पी हैं। उनकी भाषा में कोमलता और मृदुलता है। हिन्दी खड़ी बोली के परिष्कृत रूप को अधिक सजाने-संवारने में इनका योगदान उल्लेखनीय है। भाषा में नाद व्यंजना, प्रवाह, लय, उच्चारण की सहजता, श्रुति मधुरता आदि का अद्भुत सामंजस्य हुआ है। शैली ऐसी है जिसमें प्रकृति का मानवीकरण हुआ है। भावों की समुचित अभिव्यक्ति के लिए अत्यंत सहज अलंकार विधान का सृजन उन्होंने किया। नये उपमानों का चयन इनकी प्रमुख विशेषता है। उनकी कविताओं में प्राकृतिक उपमानों का सर्वथा एक नया रूप देखने को मिलता है। जैसे
“पौ फटते, सीपियाँ नील से
गलित मोतियां कान्ति निखरती”
या
“गंध गुँथी रेशमी वायु”
या
“संध्या पालनों में झुला सुनहले युग प्रभात”
इसी तरह उन्होंने छाया को, “परहित वसना”, “भू-पतिता” “व्रज वनिता” “नियति वंचिता” “आश्रय रहिता” “पद दलिता” “द्रुपद सुता-सी ” कहा है। इस तरह उन्होंने भाषा को एक नया अर्थ-संस्कार दिया।
ध्वन्यार्थ व्यंजना, लाक्षणिक और प्रतीकात्मक शैली के उपयोग द्वारा उन्होंने अपनी विषय-वस्तु को अत्यंत संप्रेषणीय बनाया है। शिल्प इनका निजी है। पंत जी की भाषा शैली भावानुकूल, वातावरण के चित्रण में अत्यंत सक्षम और समुचित प्रभावोत्पादन की दृष्टि से अत्यंत सफल मानी जा सकती है।
उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। आकर्षक और कोमल व्यक्तित्व के धनी कविवर सुमित्रा नंद पंत जिस तरह से अपने जीवन काल में सभी के लिए प्रिय थे उसी तरह से आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। प्रकृति का परिवर्तित रूप सदा पंतजी में नित नीवन कौतूहल पैदा करता रहा। उन्होंने सबकुछ प्रकृति में और सब में प्रकृति का दर्शन किया। यही कारण है कि वे प्रकृति के सुकुमार चितेरे थे और अंत में शास्वत सत्य की जिज्ञासा उन्हें अरविंद दर्शन, स्वामी रामकृष्ण आदि के विचारों की ओर खींच ले गई। इस प्रकार उन्होंने काव्य सृजन से वे चारों पुरूषार्थ उपलब्ध किए जो काव्य का फल हैं। अंत में ‘आंसू’ की ये पंक्तियां ...
वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।
उमड़ कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।
चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।
गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।
चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।
वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।
रविवार, 27 नवंबर 2011
प्रेरक प्रसंग–13 : सौ सुधारकों का करती है काम अकेली मधुशाला
प्रस्तुतकर्ता : मनोज कुमार
आज इस ब्लॉग पर प्रेरक प्रसंग पोस्ट करने का दिन है।
आज डॉ. हरिवंश राय बच्चन का जन्म दिन है।
सोचा क्यों न उनकी आत्मकथा “क्या भूलूं क्या याद करूँ” से कोई प्रसंग लूं जो प्रेरक भी हो और उनके प्रति श्रद्धांजलि भी। तो लीजिए उसी पुस्तक का एक अंश प्रस्तुत है ...
***
मेरा जन्म 27 नवम्बर 1907 को हुआ। मेरा नाम हरिवंश राय रक्खा गया, घर पर मुझे बच्चन नाम से पुकारा जाता। हरिवंश नाम रखने का विशेष कारण था। मेरे से पहले के दो बच्चे अल्पायु में ही चल बसे थे। तब पंडित रामचरण शुक्ल ने प्रताप नारायण (पिता) को यह सलाह दी कि अब मेरी माता गर्भवती हों तब वे हरिवंश पुराण सुनें। घंटों पति-पत्नी गांठ जोड़कर परिवार के पुरोहित से हरिवंश पुराण की कथा सुनते, ‘पुत्रप्रद संतान गोपाल यंत्र’ की पूजा करते।
***
मेरे होने और जीने के लिए मेरी माता ने और भी बहुत-से दाय-उपाय, टोटके-टामन आदि किए। मेरे जन्म के पूर्व मुहल्ले की किसी बड़ी-बूढ़ी ने उन्हें सलाह दी थी कि तुम्हारे लड़के नहीं जीते तो अब जब लड़का हो तो उसे किसी चमारिन-धमारिन के हाथ बेच देना और मन से उसे पराया समझकर पालना-पोसना। उन दिनों बच्चा जनाने के लिए हमारे यहां लछमिनियां चमारिन आती थी। मैं पैदा हुआ तो मेरी मां ने पांच पैसे में मुझे लछमिनियां चमारिन के हाथों बेच दिया और उनके बतासे मंगाकर खा लिए। कहते हैं, साल-भर पहले लछमिनियां का अपना एक मात्र लड़का कुछ महीने का होकर गुजर गया था और उसका दूध सूख गया था, पर जैसे ही उसने मुझे अपनी गोद में लिया उसकी छाती कहराई और उसने बारह दिन तक मुझे अपना दूध पिलाया। मैं उसे चम्मा कहता था, अपनी मां को अम्मा। वह मुझे अपनी मां से अधिक सुन्दर लगती थी। मुझे मोल लेने के बाद चम्मा के कोई संतान नहीं हुई। किसी रूप में यदि उसकी वत्सलता का कोई आधार हो सकता था तो एक मैं – उसका होकर भी कितना न उसका !
***
चम्मा की मृत्यु मेरे लड़कपन में ही हो गई थी। उसने इच्छा प्रकट की कि अंत समय पर मेरे हाथों से ही उसके मुंह में तुलसी गंगाजल डाला जाए। दूसरे दिन चम्मा की अर्थी उठी तो किसी ने मुझे कमर से उठाकर मेरा कंधा उसकी अर्थी से छुला दिया। बचपन में चम्मा की झोपड़ी में खेलने-खाने और उसकी ममतामयी आंखों के नीचे तरह-तरह की शैतानी करने की धुंधली-धुंधली-सी स्मृति अब भी मेरे साथ है।
मुझे गर्व है कि मेरी तो एक मां चमारिन चम्मा थी। एक दिन नगर में आयोजित किसी प्रीतिभोज में मैंने अछूतों की पंगत में बैठकर कच्चा खाना खा लिया। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। संतोष का अनुभव हुआ। पर मेरे संबंधियों और नातेदारों को यह खबर बड़ी नागवार गुज़री। उन्होंने व्यंग्य से कहा कि आखिर इसने चमारिन की छाती का दूध पिया था, उस कुसंस्कार का कुछ असर होना था। मेरे मन से बहुत पहले ही अछूतों को अछूत समझने की बात बिलकुल उठ गई थी। जब स्वतंत्र रूप से अपना घर हुआ तो अक्सर चमार ही मेरे खाना बनानेवाले रहे। मुझे आश्चर्य और क्रोध तो तब होता जब घर की कहारिन चमार के छुए बर्तनों को मांजने से इन्कार कर देती। मुझे लगता है कि मेरे पूर्वजों ने अछूतों का अपमान करके जो पाप किया था उसका यत्किंचित प्रायश्चित मैं कर रहा हूं। सामाजिक स्तर पर कोई सुधार हो, इसके पूर्व व्यक्ति-व्यक्ति को निर्भिकता और साहस के साथ आगे बढ़ना होगा।
इधर मैं सोचने लगा हूं कि अछूतों के साथ या उनके हाथ का खाना-पीना अथवा उनके लिए मन्दिरों का द्वार खोल देना केवल रूमानी औपचारिकताएं अथवा प्रदर्शन हैं। समाज में उनको अपना यथोचित स्थान तभी मिलेगा जब उनमें शिक्षा का व्यापक प्रचार हो और उनका आर्थिक स्तर ऊपर उठे। साथ ही जाति की श्रृंखला को ऊपर से नीचे तक टूटना नहीं तो ढीली होना होगा। जाति की जड़, अर्थहीन और हानिकारक रूढ़ियों से निम्नवर्ग के लोग उतने ही जकड़े हैं जितने उच्च वर्ग के लोग। एक छोटा-सा क़दम इस दिशा में यह उठाया जा सकता है कि लोग अपने नाम के साथ अपनी जाति का संकेत करना बन्द कर दें। वे अपने नाम के साथ अपनी जाति न जोड़ें – अपने को राम प्रसाद त्रिपाठी नहीं; केवल राम प्रसाद कहें।
***
और अब मधुशाला से बच्चन जी के विचार ...
दुतकारा मस्जिद ने मुझको
कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने
देख हथेली पर प्याला,
कहां ठिकाना मिलता जग में
भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि
अपना लेती मधुशाला।
***
कभी नहीं सुन पड़ता ‘इसने,
हा, छू दी मेरी हाला’
कभी न कोई कहता, ‘उसने
जूठा कर डाला प्याला’;
सभी जाति के लोग यहां पर
साथ बैठकर पीते हैं;
सौ सुधारकों का करती है
काम अकेली मधुशाला।
सोमवार, 7 मार्च 2011
‘अज्ञेय’ जी के जन्म दिन पर (जन्मशती)
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911-1987)
:: जीवन परिचय ::
जन्म : ‘अज्ञेय’ जी का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसया (कुशीनगर) नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ था। अज्ञेय जी के पिता श्री हीरानन्द पुरातत्व विभाग में उच्च पदाधिकारी थे। पिताजी उस समय खुदाई शिविर में रहते थे। वहीं ‘अज्ञेय’ जी का जन्म हुआ। इनका बचपन अधिकतर पिता के साथ श्रीनगर, लाहौर, पटना, नालंदा, लखनऊ, मद्रास, उटकमंड आदि बहुत से स्थानों में बीता। फलस्वरूप इनकी शिक्षा व्यवस्थित रूप से किसी एक स्थान पर नहीं हुई।
शिक्षा : इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा विद्वान पिता की देख-रेख में घर पर ही संस्कृत, फारसी, अँग्रेज़ी और बँगला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ हुई। अज्ञेय जी ने 1925 में पंजाब से एंट्रेंस, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से विज्ञान में इंटर तथा 1929 में लाहौर के फॉरमन कॉलेज से बी एस सी की परीक्षा पास की। अंगरेज़ी विषय में एम.ए. पढाई करते समय दिल्ली षडयंत्र केस तथा अन्य अभियोग के सिलसिले में वे भूमिगत हुए पर बाद में पकड़े गए और दो वर्ष तक नज़रबंद रहे। इस तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण पढ़ाई पूरी न हो सकी। इन्होंने किसान आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया। 1930 से 1936 तक के दौरान इनका अधिकांश समय विभिन्न जेलों में कटे।
कार्यक्षेत्र : अज्ञेय जी को 1936-1937 में `सैनिक' पत्रिका और पुनः कलकत्ता से निकलने वाले `विशाल भारत' के संपादन का दायित्व मिला। इसी पत्र के माध्यम से ये सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के नाम से साहित्य-जगत में प्रतिष्ठित हुए। `वाक्' और `एवरीमैंस' नामक पत्रिकाओं का भी आपने बड़ी कुशलता से संपादन किया। 1939 में उन्होंने ‘ऑल इंडिया’ रेडियो में नौकरी कर ली। लेकिन यह काम उन्हें बहुत उबाऊ लगा और इससे छुटकारा पाकर ये 1943 से 1946 तक अपने जीवन के तीन वर्ष ब्रिटिश सेना में बिताए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इन्हें कुछ दिनों तक असम और बर्मा के मोर्चों पर भी रहना पड़ा। इसके बाद 1947 में इलाहाबाद से `प्रतीक' नामक पत्रिका का सम्पादन शुरु किया। 1955-1956 में ये यूनेस्को के आमंत्रण पर पश्चिमी यूरोप की यात्रा पर गए। 1957-58 तक पूर्वेशिया की यात्राएँ कीं। इसके बाद अनेक बार भ्रमण और अध्यापन के सिलसिले में अज्ञेय जी विदेश गए। 1961 में इन्हें केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भारतीय संकृति और साहित्य के अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। यहां से इन्होंने पूरे अमेरिका का भ्रमण किया। 1966 में इन्होंने रूमामिया, यूगोस्लाविया, मंगोलिया, रूस आदि देशों की यात्राएं कीं। 1965 में इन्हें हिन्दी के प्रसिद्ध पत्र ‘दिनमान’ का संपादक नियुक्त किया गया। कुछ समय तक इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के निदेशक पद पर भी कार्य किया। इस प्रकार साहित्य के साथ ‘अज्ञेय’ जी ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पुरस्कार : (१) 1964 में `आँगन के पार द्वार' पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ। (२) 1978 में 'कितनी नावों में कितनी बार' शीर्षक काव्य ग्रंथ पर भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च पुरस्कार मिला।
मृत्यु : 4 अप्रैल 1987 को अज्ञेय जी का निधन हुआ।
:: प्रमुख रचनाएं ::
:: काव्य रचनाएँ :: भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, सुनहरे शैवाल, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूं, और ऐसा कोई घर आपने देखा है इत्यादि उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं।
:: उपन्यास :: शेखर: एक जीवनी (दो भागों में), नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।
:: कहानी-संग्रह :: विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप आदि।
:: यात्रा वृत्तांत :: अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।
:: निबंध संग्रह :: त्रिशंकु, आत्मनेपद, हिंदी साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, सबरंग और कुछ राग, लिखि कागद कोरे, जोग लिखी, अद्यतन, आल-बाल, आदि।
:: संस्मरण :: स्मृति लेखा
:: डायरियां : भवंती, अंतरा और शाश्वती।
:: विचार गद्य :: संवत्सर
:: गीति-नाट्य :: उत्तर प्रियदर्शी
:: अनुवाद :: त्याग पत्र (जैनेन्द्र) और श्रीकांत (शरदचन्द्र) उपन्यासों का अंग्रेज़ी में अनुवाद।
उनका लगभग समग्र काव्य सदानीरा (दो खंड) नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध केंद्र और परिधि नामक ग्रंथ में संकलित हुए हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के साथ-साथ अज्ञेय ने तारसप्तक, दूसरा सप्तक, और तीसरा सप्तक जैसे युगांतरकारी काव्य संकलनों का भी संपादन किया तथा पुष्करिणी और रूपांबरा जैसे काव्य-संकलनों का भी। वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध-संग्रहों के भी संपादक हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका-पुरूष थे जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।
:: साहित्यिक योगदान ::
अज्ञेय एक सफल कवि, उपन्यासकार, कहानीकार और आलोचक रहे हैं। इन सभी क्षेत्रों में वे शीर्षस्थ भी थे। छायावाद और रहस्यवाद के युग के बाद हिन्दी-कविता को नई दिशा देने में अज्ञेय जी का सबसे बड़ा हाथ है। हिन्दी के अनेक नए कवियों के लिए अज्ञेय जी प्रेरणा-स्रोत और मार्ग-दर्शक रहे हैं। आपकी रचनाओं का मूल स्वर दार्शनिक और चिन्तन-प्रधान है।
अज्ञेय जी की काव्य चेतना का मूल स्वर आत्मनिष्ठ और व्यक्तिवादी है। सैनिक सेवा और किसान आंदोलन से जुड़े रहकर भी वे सामान्य जनजीवन के साथ अपने को जोड़ नहीं पाए। सामाजिक जीवन से गहन रागात्मकता उनके काव्य में कहीं दिखाई नहीं देती। उनके प्रथम काव्य-संग्रह ‘भग्नदूत’ में प्रणय की अतृप्त आकांक्षा भविष्य की ‘अंधेरे की चिंताएं’ बनकर प्रकट हुई है। 1942 में प्रकाशित ‘चिंता’ प्रसाद की ‘कामायनी’ के चिंता सर्ग की गहरी छाप लिए हुए है। इसमें उन्होंने पुरुष और नारी के परस्पर संबंध को पति-पत्नी के सामाजिक संबंध तक सीमित न रखकर चिरंतन पुरुष और चिरंतन नारी के गतिशील संबंध के रूप में स्वीकार किया है। ‘इत्यलम्’ की भी यही स्थिति है।
अज्ञेय ‘मैं’ से दूरी बनाकर चलते हैं, लेकिन व्यक्तित्व की स्वतंत्रता का बोध पाठक को कराते हैं। एक स्तर पर उनकी कविता ही व्यक्तित्व की खोज की कविता का रूप ले लेती है। उनके आधुनिक बोध के मूल में व्यक्तित्व की खोज है। व्यक्तित्व की खोज बहुत कुछ अभिव्यक्ति की खोज है।
‘हरी घास पर क्षण भर’ (1949), ‘बावरा अहेरी’ (1954)और ‘इंद्र धनु रौंदे हुए’ (1957) रचनाओं में अज्ञेय जी की व्यक्ति-चेतना निरंतर एक दर्शन के रूप में संघनित होते हुए दिखाई देती है। ‘अरी ओ करूणा प्रभामय’ के द्वारा ‘आंगन के पार द्वार’ (1961) तक आते-आते ‘अज्ञेय’ जी का व्यक्ति चिंतन भारत के विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों की तत्व-विचार संबंधी अवधारणओं के सार को अपने मनोनुकूल ढालकर एक नया दर्शन खड़ा करता है। इस संग्रह की ‘असाध्य वीणा’ शीर्षक कविता कवि ने बौद्ध कालीन परिवेश की सृष्टि कर जगतव्यापी मौन की एकात्मकता का प्रतिपादन किया है। इस कविता का वीणा वादक ‘केश कंबली’ भारतीय दर्शन का प्रसिद्ध अजित केशकंबली है, जो भौतिकवादी और सामाजिक विषमता को रेखांकित करने के लिए विख्यात है। लेकिन उसे ‘अज्ञेय’ जी ने अपनी व्यक्तिवादी चेतना की पुष्टि के लिए सामाजिक समता का अग्रदूत बना दिया है। उसकी वीणा की झंकृति से राजा-रानी, किसान-मज़दूर, जनता, तिजोरियां भरकर रखने वाले सेठ-साहूकार और रंक-भिखारी सभी समान रूप से आह्लादित होते हैं।
जिस उच्च मध्यवर्गीय वैयक्तिक चेतना को अज्ञेय ने अपने काव्य की विषयवस्तु बनाया है, उसका सीधा असर उनकी कविताओं के संरचना-शिल्प पर भी पड़ा है। भाषा की दृष्टि से प्रायः उन्होंने बोल-चाल की भाषा का ही प्रयोग अधिक किया है। लेकिन इन साधारण शब्दों में एक विशेष प्रकार की सांकेतिकता, लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, बिम्बधर्मिता आदि का समावेश किया है, वह इनकी काव्य-प्रतिभा का सशक्त प्रमाण है। ‘कलंगी बाजरे की’ शीर्षक कविता में नये उपमानों की आवश्यकता रेखांकित किया है। अज्ञेय आधुनिक युग के कवि थे। वे आधुनिक भाव-बोध के कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी दृष्टि में कविता का बहुत सारी चीज़ों के साथ संबंध बदल गया है। कविता में सिद्धांत के तौर पर अज्ञेय व्यक्तित्व से दूरी बनाने की बात करते हैं। आधुनिक भाव-बोध पहले से चले आ रहे काव्य-विधान से संभव नहीं था-
“ये उपमान मैले हो गए हैं
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच!
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है”
अपने समूचे काव्य में इन्होंने नवनिर्मित उपमानों के प्रयोग का जो कौशल दिखलाया है, वह पाठक को पूरी तरह चमत्कृत कर देता है।
‘पति-सेवा रत
सांझ
उचकता देख पराया चांद
ललाकर ओट हो गयी’
‘उड़ गयी चिड़िया
कांपी फिर
थिर
हो गयी पत्ती’
‘चांद चितेरा
आंक रहा है शरद नभ में
एक चीड़ का खाका’
अज्ञेय आधुनिक भावबोध के ऐसे कवि हैं जिन्होंने काव्यभाषा और काव्यशिल्प की दृष्टि से खड़ी बोली की हिन्दी कविता को नयी समृद्धि दी है। उन्होंने छायावादी संस्कारों के प्रभाव से मुक्त होने में वह नई काव्यभाषा अर्जित की जिससे प्रयोगवाद और आगे नयी कविता की पहचान बनी।
अज्ञेय ‘प्रयोगवाद’ नामक काव्य-आंदोलन के प्रवर्तक थे। साथ ही नयी कविता के अग्रणी कवि के रूप में उनका महत्व निर्विवाद है। उनकी रचनाओं में चमत्कारपूर्ण प्रयोग मिलता है। सामाजिक सरोकार तो है ही, साथ ही वैक्तिकता और सामाजिकता का द्वंद्व भी स्पष्ट है-
“यह दीप अकेला स्नेह-भरा
है गर्व-भरा मदमाता पर
इसको भी पंक्ति दे दो।”
वे एक “सांचे ढले समाज” की जगह “अच्छी कुंठा रहित इकाई” के पक्ष में हैं।
संवेदना के कवि के रूप में उनकी एकदम अलग पहचान है। उनकी कविता में प्रकृति, प्रेम, आत्मदान, मृत्यु जैसे अनुभव आधुनिक बोध और संवेदना का हिस्सा बन कर आते हैं-
“पार्श्व गिरि का नम्र, चीड़ों में
डगर चढती उमंगों-सी।
बिछी पैरों में नदी ज्यों दर्द की रेखा।
विहग-शिशु मौन नीड़ों में
मैंने आंख भर देखा।”
अधिकतर कवि सत्य को पहले से प्राप्त मानते हैं। वे सत्य को कहने के लिए शब्द को साधन के रूप में देखते हैं। परन्तु अज्ञेय तो कविता को सबसे पहले शब्द मानते हैं। वे सत्य को अन्वेषण का विषय मानते हैं और शब्द को भी। फिर मानते हैं कि दोनों शब्द और सत्य में निरंतर द्वंद्व की स्थिति बनी रहती है। परस्पर टकराकर नया काव्यत्व प्राप्त करते हैं। तनाव और द्वन्द्व की स्थिति में ही अज्ञेय को नया काव्योन्मेष उपलब्ध हो पाता है।
“ये दोनों जो
सदा एक-दूसरे से तनकर रहते हैं
कब, कैसे, किस आलोक-स्फुरण में
इन्हें मिला दूं –
दोनों जो हैं बंधु, सखा, चिर सहचर मेरे।”
अज्ञेय निर्वैयक्तिक संवेदना को महत्व देते हैं। अज्ञेय की प्रकृति, प्रेम, आत्मदान, मृत्यु संबंधी कविताओं में सब कुछ नयी प्रश्नशील निगाह से देखा जा रहा है। प्रकृति केवल अलंकरण तक सीमित नहीं है।
बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढती है।
उसकी कलियां हैं मेरी आंखें,
कोपलें मेरी अंगुलियों में अंकुराती हैं,
फूल-अरे, यह दिल में क्या खिलता है।
प्रेम ढर्रे से अलग है। वे कहते हैं प्रेम के क्षण दुहराए नहीं जाते। प्रेम बिना आशा, आकांक्षा के ही संभव है। यह आधुनिक बोध है प्रेम का।
“ओ प्यार! कहो, है इतना धीरज,
चलो साथ
यों: बिना आशा-आकांक्षा
गहे हाथ?”
मृत्यु भय नहीं देती। उनके यहां मृत्यु का वरण है। डर नहीं है। प्रेम और मृत्यु अभिन्न हो जाते हैं यहां।
“सागर को प्रेम करना
मरण की प्रच्छन्न कामना है
मरण अनिवार्य है
प्रेम
स्वच्छंद वरण है”
एक ओर अहं का विलयन अज्ञेय का ज़रूरी सरोकार है तो दूसरी ओर व्यक्तित्व का तेजस अंश बचाए रखने की चिंता उन्हें सबसे अलग प्रमाणित करती है। जब वे लिखते हैं ‘सखि आ गये नीम को बौर’ तो वे परंपरा से हटते हैं। आम के पेड़ से बौर का संबंध न जोड़कर, नीम से जोड़ने के पीछे अभिव्यक्ति की नई आज़ादी का बोध है। अज्ञेय की स्वाधीन चिंता के निहितार्थ अनेक हैं।
मेरे छोटे घर – कुटीर का दिया
तुम्हारे मंदिर के विस्तृत आंगन में
सहमा-सा रख दिया।
अज्ञेय की कई कविताएं काव्य-प्रक्रिया की ही कविताएं हैं। उनमें अधिकतर कविताएं अवधारणात्मक हैं जो व्यक्तित्व और सामाजिकता के द्वंद्व को, रोमांटिक आधुनिक के द्वंद्व को प्रत्यक्ष करती है।
दु:ख सबको मांजता है
और –
चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किन्तु
जिनको मांजता है
उन्हें सीख देता है कि सबको मुक्त रखें।
जिजीविषा अज्ञेय का अधिक प्रिय काव्य-मूल्य है। वह संघर्ष की सार्थकता का पर्याय है। यह उन्हें एक नए मानववाद के कवि के रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है। यह सजग काव्य-बोध है।
“तू अंतहीन काल के लिए फलक पर टांक दे –
क्योंकि यह मांग मेरी, मेरी, मेरी है कि प्राणों के
एक जिस बुलबुले की ओर मैं हुआ हूं उदग्र, वह
अंतहीन काल तक मुझे खींचता रहे --------”
इस प्रकार के प्रतीकों, बिंबों और लाक्षणिक प्रयोगों से अज्ञेय ने अपनी शैली को अत्यंत आकर्षक बनाया है। शिल्प के संबंध में अज्ञेय जी की सबसे बड़ी विशेषता है, मौन का प्रयोग। हालाकि यह विशेषता उन्होंने पाश्चात्य काव्यधारा के प्रभाव से ग्रहण की है, फिर भी अपनी कविता में अवकाश-अंतराल छोड़कर मौन का अत्यंत मौलिक और कुशल प्रयोग भी किया है। ‘पहले मैं सन्नाटा बुनता हूं’ शीर्षक काव्य संग्रह में इस सन्नाटे या मौन का अत्यंत सफल प्रयोग अज्ञेय जी ने किया है। अझेय का काव्य आधुनिक अकेलेपन में जीना सिखाता है। उनके काव्य में शब्द का महत्व है और मौन का भी। मौन से ही सम्पूर्ण विश्व और प्रकृति के विराट संगीत से जुड़ाव की स्थिति बनती है।
श्रेय नहीं कुछ मेरा :
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में –
वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब कुछ को सौंप दिया था –
सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का था :
वह तो सब कुछ क्र तथता थी
महाशून्य
वह महामौन
अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय
जो शब्दहीन
“सब में गाता है।”
अज्ञेय जी का काव्य का संरचना शिल्प अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली है, जो इन्हें एक सजग रूपवादी कलाकार सिद्ध करता है। उन्होंने हिन्दी को नया रूप दिया लेकिन उनकी काव्य परंपरा विकसित नहीं हो पाई। अज्ञेय को दरकिनार करके हिन्दी साहित्य को नहीं पढा जा सकता। अज्ञेय को समझने के लिए एक तटस्थ दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। उनकी कविता का चिंतन पक्ष समझने की ज़रूरत है, वरना छंद और मौन के प्रति उनका विचार अधूरा रहेगा। उनकी काल संबंधी अवधारणाएं भारतीय हैं या यूरोपीय, यह भी देखना होगा। अधुनिकतावाद के बाद छायावाद आता है और अज्ञेय का काव्य उसको ब्रेक लगाने का काम करता है। लगातार यात्राओं के कारण अज्ञेय ने ट्रेन में चलते हुए कविताएं लिखीं। ‘अज्ञेय’ जी किसी एक स्थान पर स्थिर न रह पाने के बावज़ूद निरंतर साहित्य-रचना मे निरत रहे। हिंदी में सर्वाधिक रचना का श्रेय इन्हें प्राप्त है।