सुमित्रानंदन पंत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुमित्रानंदन पंत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 20 मई 2012

सुमित्रानंदन पंत जी के जन्म दिन पर

clip_image001

पंत

clip_image002

: 20 मई 1900 को अल्मोड़ा जनपद के कौसानी नामक गांव में हुआ था। इन्हें जन्म देने के तुरंत बाद इनकी माता सरस्वती देवी परलोक सिधार गईं। लालन-पालन दादी और बुआ ने किया। उनके बचपन का नाम था गुसाई दत्त। उनके पिता गंगा दत्त चाय बागान के मैनेजर थे। दस साल की उम्र में उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रा नंदन पंत रख लिया।

clip_image003 : प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। 1911 से आठ वर्षों तक अल्मोड़ा के राजकीय हाई स्कूल में नवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। 1918 में काशी आ गए। वहां क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। हाई स्कूल की परीक्षा 1920 में पास की। मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए और म्योर कॉलेज में दाखिला लिया। 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

clip_image004 :: पिता के असामयिक निधन से उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। पहले कंवर नरेश सिंह के साथ कालाकांकर में रहकर कई वर्षों तक काव्य-रचना में लीन रहे। फिर 1934 में फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर भट्ट ने उन्हें अपने चित्र ‘कल्पना’ के गीत लिखने के लिए मद्रास आमंत्रित किया। 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। कई वर्षों तक भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए 1950 में इलाहाबाद में स्थायी बस गए। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में प्रोड्यूसर और फिर हिन्दी सलाहकार के रूप में भी कार्य किया।

clip_image005 : 1961 में इन्हें भारत सरकार की ओर से ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1961 में ही ‘कला और बूढ़ा चांद’ पर इन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। ‘चिदम्बरा’ पर 1969 में इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मनित किया गया। भारत सरकार की हिन्दी-विरोधी नीति और अपने हिन्दी प्रेम के कारण अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए इन्होंने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि लौटा दी।

clip_image006 : 28 दिसम्बर 1977 को इनका निधन हो गया।

:: clip_image007::

:: काव्य रचनाएँ :: कविता-संग्रह : वीणा(1927), ग्रंथी (1919), उच्छवास(1920), पल्लव(1928), गुंजन (1932), युगांत, युगांतर, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा, लोकायतन, सत्यकाम, मुक्तियज्ञ, तारापथ, मानसी, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा, वाणी, रश्मिबंध, समाधिता, किरण वीणा, गीत हंस, गंध वीथी, पतझड़, अवगुंठित, ज्योत्सना, मेघनाद वध।

:: उपन्यास :: हार (15 वर्ष की अवस्था में ही लिख डाला था)

:: निबंध संग्रह :: आधुनिक कवि

:: रेडियो रुपक :: ज्योत्सना

:: clip_image008::

पंत जी हिन्दी के छायावादी युग चार के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रकृति के एक मात्र माने जाने वाले सुकुमार कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी बचपन से ही काव्य प्रतिभा के धनी थे और 16 वर्ष की उम्र में अपनी पहली कविता रची “गिरजे का घंटा”। तब से वे निरंतर काव्य साधना में तल्लीन रहे।

कवि या कलाकार कहां से प्रेरणा ग्रहण करता है इस बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए पंत जी कहते हैं, “संभवतः प्रेरणा के स्रोत भीतर न होकर अधिकतर बाहर ही रहते हैं।” अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हें। शब्द, शिल्प, भाव और भाषा के द्वारा कवि पंत प्रकृति और प्रेम के उपादानों से एक अत्यंत सूक्ष्य और हृदयकारी सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं, किंतु उनके शब्द केवल प्रकृति-वर्णन के अंग न होकर एक दूसरे अर्थ की गहरी व्यंजना से संयोजित हैं। उनकी रचनाओं में छायावाद एवं रहस्यवाद का समावेश भी है। साथ ही शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों का प्रभाव भी है।

clip_image009

‘उच्छ्वास’ से लेकर ‘गुंजन’ तक की कविता का सम्पूर्ण भावपट कवि की सौन्दर्य-चेतना का काल है। सौन्दर्य-सृष्टि के उनके प्रयत्न के मुख्य उपादान हैं – प्रकृति, प्रेम और आत्म-उद्बोधन। अल्मोड़ा की प्रकृतिक सुषमा ने उन्हें बचपन से ही अपनी ओर आकृष्ट किया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मां की ममता से रहित उनके जीवन में मानो प्रकृति ही उनकी मां हो। उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा के पर्वतीय अंचल की गोद में पले बढ़े पंत जी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि उस मनोरम वातावरण का इनके व्यक्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा

मेरे मूक कवि को बाहर लाने का सर्वाधिक श्रेय मेरी जन्मभूमि के उस नैसर्गिक सौन्दर्य को है जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ जिसने छुटपन से ही मुझे अपने रूपहले एकांत में एकाग्र तन्मयता के रश्मिदोलन में झुलाया, रिझाया तथा कोमल कण्ठ वन-पखियों ने साथ बोलना कुहुकन सिखाया।

पंतजी को जन्म के उपरांत ही मातृ-वियोग सहना पड़ा।

नियति ने ही निज कुटिल कर से सुखद

गोद मेरे लाड़ की थी छीन ली,

बाल्य ही में हो गई थी लुप्त हा!

मातृ अंचल की अभय छाया मुझे।

मां की कमी उन्हें काफी सालती रही और प्रकृति माँ की गोद का सहारा मिला तो मानों वे उसके लाड़ से अपने आप को पूरी तरह सरोबार कर लेना चाहते थेः

मातृहीन, मन में एकाकी, सजल बाल्य था स्थिति से अवगत,

स्नेहांचल से रहित, आत्म स्थित, धात्री पोषित, नम्र, भाव-रत

हालाकि पंत जी ने गद्य की भी कई विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई लेकिन मूलतः वे कविता के प्रति ही समर्पित थे। 1918 से 1920 तक की उनकी अधिकांश रचनाएं ‘वीणा’ में छपी हैं। यद्यपि अपनी आरंभिक रचनाओं ‘वीणा’ और ‘ग्रंथि’ से पंत जी ने काव्यप्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा ज़रूर पर एक छायावादी कवि के रूप में इनकी प्रतिष्ठा ‘पल्लव’ से ही मिली। ‘पल्लव’ की अधिकांश रचनाएं कॉलेज में पढने जब वे प्रयाग आए, उसी दौरान लिखी गईं। पंत जी कहते हैं, “शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेज़ी कवियों से बहुत-कुछ मैंने सीखा। मेरे मन में शब्द-चयन और ध्वनि-सौन्दर्य का बोध पैदा हुआ। ‘पल्लव’-काल की प्रमुख रचनाओं का आरम्भ इसके बाद ही होता है।”

प्रकृति-सौन्दर्य और प्रकृति-प्रेम की अभिव्यंजना “पल्लव” में अधिक प्रांजल तथा परिपक्व रूप में हुई है। इस संग्रह के द्वारा पंत जी प्रकृति की रमणीय वीथिका से होकर काव्य के भाव-विशद सौन्दर्य प्रासाद में प्रवेश पा सके। छायावाद के कवियों ने सृजन को मानव-मुक्ति चेतना की ओर ले जाने का काम किया। सुमित्रानंदन पंत ने रीतिवाद का विरोध करते हुए ‘पल्लव’ की भूमिका में कहा कि मुक्त जीवन-सौंदर्य की अभिव्यक्ति ही काव्य का प्रयोजन है।

पल्लव को आलोचक भी छायावाद का पूर्ण उत्कर्ष मानते हैं। डॉ. नगेन्द्र का मानना है, “‘पल्लव’ की भूमिका हिंदी में छायावाद-युग के आविर्भाव का ऐतिहासिक घोषणा-पत्र है।” भाव, भाषा, लय और अलंकरण के विविध उपकरणों का बड़ी कुशलता से इसमें समावेश किया गया है। ‘पल्लव’ में प्राकृतिक रहस्य की भावना ज्ञान की जिज्ञासा में परिणत हो गयी है। इसकी सीमाएं छायावादी अभिव्यंजना की सीमाएं हैं। इसमें पंत जी कल्पना द्वारा नवीन वास्तविकता की अनुभूति प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे थे। इसके साथ ही इसमें मानव जीवन की अनित्य वास्तविकता के भीतर सत्य को खोजने का प्रयत्न भी है, जिसके आधार पर नवीन वास्तविकता का निर्माण किया जा सके।

कवि पंत की रचनाओं को देख कर ऐसा लगता था जैसे वे स्वयं प्रकृति स्वरूप थे। उनकी विभिन्न रचनाओं में ऐसा लगता है जैसे कवि प्रकृति से बात कर रहा हो, अनुनय कर रहा हो, प्रश्न कर रहा हो। मानों प्रकृति कविमय हो गई है और कवि प्रकृतिमय हो गया है। प्रकृति से परे सोचना उनके लिए असंभव सा थाः-

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया।

बाले! तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूँ लोचन॥

कवि सम्राट पंत जी ने स्वयं माना कि छायावाद वाणी की नीरवता है, निस्तब्धता का उच्छ्वास है, प्रतिभा का विलास है, और अनंत का विलास है। अपनी संकुचित परिभाषा के कारण कुछ लोग पंत की रचनाओं में भी केवल पल्लव और पल्लव में भी कुछेक कविताओं को ही छायावाद के अंतर्गत स्वीकार करते हैं। मौन निमंत्रण में अज्ञात की जिज्ञासा होने के कारण रहस्यवाद है, अभिव्यक्ति की सूक्ष्मता के कारण छायावाद है और कल्पनालोक में स्वच्छंद विचरण करने के कारण स्वच्छंदतावाद भी है। पंत का रहस्य भावना ‘अज्ञात’ की लालसा के रूप में व्यक्त हुई है। पंत सीमित ज्ञान की सीमा को तोड़कर प्रकृति और जगत के प्रति जिज्ञासु की तरह देखते हैं। पंत का बालक मन हर चीज से सवाल पूछता है।

प्रथम रशमि का आना रंगिणि

तूने कैसे पहचाना

‘गुंजन’, विशेषकर ‘युगांत’ में आकर पंत की काव्य यात्रा का प्रथम चरण समाप्त हो जाता है। ‘गुंजन’-काल की रचनाओं में जीवन-विकास के सत्य पर पंत जी का विश्वास प्रतिष्ठित हो जाता है।

सुन्दर से नित सुन्दरतर, सुन्दरतर से सुन्दरतम

सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर सुन्दर जग जीवन!

clip_image010

उनकी काव्य यात्रा का दूसरा चरण ‘युगांत’, ‘युग-वाणी’ और ‘ग्राम्या’ को माना जा सकता है। इस काल तक आते-आते कवि स्थायी वास्तविकता के विजय-गीत गाने को लालायित हो उठता है और उसके लिए आवश्यक साधना को अपनाने की तैयारी करने लगता है, उसे ‘चाहिए विश्व को नव जीवन’ का अनुभव भी होने लगता है।

नवीन जीवन तथा युग-परिवर्तन की धारणा को सामाजिक रूप देने की कोशिश ‘युगान्त’ में सक्रिय रूप में सामने आई है। ‘युगान्त’ की अधिकांश कविताएं कवि की तीखी भाव चेतना के परिवर्तन का संकेत देती हैं। यह परिवर्तन वस्तुवादी चेतना के प्रति अधिक आग्रहशील दिखता है। “द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र, हे स्रस्त, ध्वस्त, हे शुष्क शीर्ण” में जहां ओजपूर्ण आवेश है वहीं गा कोकिल में नवीन जीवन पल्लवों से सौन्दर्य-मंडित करने का भी आग्रह है।

गा कोकिल, बरसा पावक कण

नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन –

झरे जाति-कुल; वर्ण-पर्ण धन –

व्यक्ति-राष्ट्र-गत राग-द्वेष-रण –

झरें-मरें विस्मृत में तत्क्षण –

गा कोकिल, गा, मत कर चिन्तन -

‘ग्राम्या’ प्रगतिशील आन्दोलन के प्रभाव के अन्तर्गत लिखी हुई रचना है। इसमें मार्क्सवाद, श्रमिक-मज़दूर, किसान-जनता के प्रति इन्होंने भावभीनी सहानुभूति प्रकट की है।

जगती के जन-पथ कानन में

तुम गाओ विहग अनादि गान।

चिर-शून्य शिशिर-पीड़ित जग में,

निज अमर स्वरों से भरो प्राण।

‘ग्राम्या’ 1940 की रचना है, जब प्रगतिवाद हिन्दी साहित्य में घुटनों के बल चलना सीख रहा था। पंत जी कहते हैं, “‘ग्राम्या’ में मेरी क्रान्ति-भावना मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित ही नहीं होती, उसे आत्मसात्‌ कर प्रभावित करने का भी प्रयत्न करती है।”

भूतवाद उस धरा स्वर्ग के लिए मात्र सोपान,

जहां आत्म-दर्शन अनादि से समासीन अम्लान।

इन सब के साथ-साथ आदर्श तथा यथार्थ के बीच व्यवधान पंत जी के भीतर बना ही रहा। कवि के मन में आदर्श और यथार्थ की चिन्तन-धाराओं का संघर्ष तथा मंथन चलता रहा। डॉ.. नगेन्द्र ने ठीक ही कहा है,

“मार्क्सवाद में श्री सुमित्रानंदन पंत का व्यक्तित्व अपनी वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं पा सकता।”

clip_image011

शीघ्र जी फिर वे अपने परिचित पथ पर लौट आये। मार्क्सवाद का भौतिक संघर्ष और निरीश्वरवाद पंत जैसे कोमलप्राण व्यक्ति का परितोष नहीं कर सकते थे। काव्य यात्रा के तीसरे चरण की रचनाओं ‘स्वर्णकिरण’, ‘स्वर्णधूलि’, ‘युग पथ’, ‘अतिमा’, ‘उत्तरा’ में वे महर्षि अरविन्द से प्रभावित होकर आध्यात्मिक समन्वयवाद की ओर बढ़ते दिखते हैं। कवि की अनुभूति वस्तु जगत को समेटती हुई उस बौद्धिक चेतना से ऊपर उठकर एक सूक्ष्म अतिमानवीय चेतना को ग्रहण करती लगती है।

सामाजिक जीवन से कहीं महत्‌ अंतर्मन,

वृहत्‌ विश्व इतिहास, चेतना गीता किंतु चिरंतन।

इस चरण को पंत जी के चेतना-काव्य का चरण कहा जा सकता है। इसमें उन्होंने मानवता के व्यापक सांस्कृतिक समन्वय की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

भू रचना का भूतिपाद युग हुआ विश्व इतिहास में उदित,

सहिष्णुता सद्भाव शान्ति से हों गत संस्कृति धर्म समन्वित।

clip_image012

पंत जी की कव्य यात्रा का चौथा चरण ‘कला और बूढ़ा चांद’ से लेकर ‘लोकायतन’ तक की है। इसमे उनकी चेतना मानवतावाद, खासकर विश्व मानवता की ओर प्रवृत्त हुई है। इन रचनाओं में लोक-मंगल के लिए कवि व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य के महत्व को रेखांकित करता है।

हमें विश्व-संस्कृति रे, भू पर करनी आज प्रतिष्ठित,

मनुष्यत्व के नव द्रव्यों से मानस-उर कर निर्मित।

‘लोकायतन’ कविवर पंत के लोक-कल्याण संबंधी नेक इरादे का भव्य एवं कलात्मक साक्षात्कार कराता है। अरविन्द दर्शन से प्रभावित होकर पंत की चेतना इस चरण में फिर से वापस लौटकर अपने प्रथम चरण की चेतना से जुड़ जाती है। अरविन्द दर्शन के प्रभाव में आने के बाद पंत को भौतिकता और आध्यात्मिकता के समन्वय का एक ठोस आधार प्राप्त हो गया।

समग्र रूप से देखें तो पाते हैं कि कवि के चिंतन में अस्थिरता है। निराला और पंत की जीवन-दृष्टि और काव्य-चेतना की तुलना करें तो हम पाते हैं कि निराला की जीवन-दृष्टि का लगातार एक निश्चित दिशा में विकास होता है जबकि पंत का दृष्टि विकास एक दिशा में न होकर उसमें कई मोड़ आते हैं। कभी वे प्रकृति में रमे रहते हैं तो कभी मार्क्सवाद, अरविन्द दर्शन और गांधीवाद की गलियों के चक्कर लगाते हैं। ‘ग्रंथि’ से ‘पल्लव’ और ‘पल्लव’ से ‘गुंजन’, ‘ज्योत्सना’ और ‘युगांत’ में वे क्रमशः शरीर से मन और मन से आत्मा की ओर बढ़ रहे थे। बीच में ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में आत्म-सत्य की अपेक्षा वस्तु-सत्य पर बल देते हैं। ‘स्वर्णकिरण’, और ‘स्वर्णधूलि’ में फिर से वे आत्मा की ओर मुड़ जाते हैं।

फिर भी ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’ जैसी रचनाओं द्वारा पंत जी छायावादी काव्य-धारा को सम्पन्न बनाया। वे छायावादी कविता के अनुपम शिल्पी हैं। उनकी भाषा में कोमलता और मृदुलता है। हिन्दी खड़ी बोली के परिष्कृत रूप को अधिक सजाने-संवारने में इनका योगदान उल्लेखनीय है। भाषा में नाद व्यंजना, प्रवाह, लय, उच्चारण की सहजता, श्रुति मधुरता आदि का अद्भुत सामंजस्य हुआ है। शैली ऐसी है जिसमें प्रकृति का मानवीकरण हुआ है। भावों की समुचित अभिव्यक्ति के लिए अत्यंत सहज अलंकार विधान का सृजन उन्होंने किया। नये उपमानों का चयन इनकी प्रमुख विशेषता है। उनकी कविताओं में प्राकृतिक उपमानों का सर्वथा एक नया रूप देखने को मिलता है। जैसे

पौ फटते, सीपियाँ नील से

गलित मोतियां कान्ति निखरती

या

गंध गुँथी रेशमी वायु

या

संध्या पालनों में झुला सुनहले युग प्रभात

इसी तरह उन्होंने छाया को, परहित वसना”, “भू-पतिता” “व्रज वनिता” “नियति वंचिता” “आश्रय रहिता” “पद दलिता” “द्रुपद सुता-सी कहा है। इस तरह उन्होंने भाषा को एक नया अर्थ-संस्कार दिया।

ध्वन्यार्थ व्यंजना, लाक्षणिक और प्रतीकात्मक शैली के उपयोग द्वारा उन्होंने अपनी विषय-वस्तु को अत्यंत संप्रेषणीय बनाया है। शिल्प इनका निजी है। पंत जी की भाषा शैली भावानुकूल, वातावरण के चित्रण में अत्यंत सक्षम और समुचित प्रभावोत्पादन की दृष्टि से अत्यंत सफल मानी जा सकती है।

उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। आकर्षक और कोमल व्यक्तित्व के धनी कविवर सुमित्रा नंद पंत जिस तरह से अपने जीवन काल में सभी के लिए प्रिय थे उसी तरह से आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। प्रकृति का परिवर्तित रूप सदा पंतजी में नित नीवन कौतूहल पैदा करता रहा। उन्होंने सबकुछ प्रकृति में और सब में प्रकृति का दर्शन किया। यही कारण है कि वे प्रकृति के सुकुमार चितेरे थे और अंत में शास्वत सत्य की जिज्ञासा उन्हें अरविंद दर्शन, स्वामी रामकृष्ण आदि के विचारों की ओर खींच ले गई। इस प्रकार उन्होंने काव्य सृजन से वे चारों पुरूषार्थ उपलब्ध किए जो काव्य का फल हैं। अंत में ‘आंसू’ की ये पंक्तियां ...

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।

उमड़ कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।

clip_image013

clip_image014

चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।


गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।


चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।


वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

सोमवार, 1 अगस्त 2011

मैं नहीं चाहता चिर सुख


सुमित्रानन्दन पन्त 


की कविता-3


मैं नहीं चाहता चिर सुख


मैं नहीं  चाहता चिर सुख,
मैं नहीं  चाहता चिर दुःख,
सुख-दुख की खेल मिचौनी
खोले  जीवन अपना मुख।

सुख-दुख  के मधुर मिलन से
यह   जीवन  हो   परिपूरन,
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन !

जग पीड़ित  है अति दुख से,
जग पीड़ित  रे, अति सुख से,
मानव  जग   में  बँट  जाएँ
दुख सुख से औ’ सुख दुख से !

अविरत दुख  है  उत्पीड़न,
अविरत सुख भी  उत्पीड़न,
दुख-सुख की निशा-दिवा में
सोता-जगता  जग-जीवन !

यह साँझ-उषा   का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का ;
चिर  हास-अश्रुमय  आनन
रे, इस मानव जीवन का !

बुधवार, 27 जुलाई 2011

मोह


सुमित्रानन्दन पन्त
मोह

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले ! तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन ?
                      भूल अभी से इस जग को !
तज कर तरल तरंगों को,
इन्द्रधनुष  के  रंगों  को,
                तेरे भ्रूभंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन ?
                       भूल अभी से इस जग को !
कोयल का वह कोमल बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल,
कह, तब तेरे ही प्रिय स्वर से कैसे भर लूँ सजनि ! श्रवण ?
                          भूल अभी से इस जग को !
ऊषा सस्मित किसलय दल,
सुधारश्मि  से  उतरा  जल,
      ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन ?
                         भूल अभी से इस जग को !
***
{‘पल्लव’ से ... }

शनिवार, 16 जुलाई 2011

प्रेम


सुमित्रानन्दन पन्त

प्रेम

मैंने
गुलाब की
मौन शोभा को देखा!
उससे विनती की
तुम अपनी
अनिमेष सुषमा की
शुभ्र गहराइयों का रहस्य
मेरे मन की आँखों में
खोलो!
      मैं अवाक्‌ रह गय!
      वह सजीव प्रेम था!
      मैंने सूँघा,
      वह उन्मुक्त प्रेम था!
      मेरा हृदय
      असीम माधुर्य से भर गया
मैंने
 गुलाब को
 ओठों से लगाया!
 उसका सौकुमार्य
 शुभ्र अशरीरी प्रेम था !
   मैं गुलाब की
 अक्षय शोभा को
     निहारता रह गया!
                        [‘कला और बूढ़ा चाँद’ से]

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

काव्य प्रयोजन :: आधुनिक काल

काव्य प्रयोजन :: आधुनिक काल

द्विवेदी युग

इस युग में रीतिवाद विरोधी अभियान चला। मकसद था हिन्दी कविता को दरबारी काव्य की रूढियों से मुक्त करना! आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इस आंदोलन को गति प्रदान की। उनका मानना था कि साहित्य की महत्ता लोकजागरण की चेतना से सम्बद्ध है। साहित्य में जो शक्ति है वह तो, तलवार और बम में भी नहीं है। उनके अनुसार लोकजागरण के लिए साहित्य से बढकर कोई दूसरा  समर्थ माध्यम नहीं है।

मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस आंदोलन को आगे बढाया। उन्होंने कविता के प्रयोजन को बताते हुए कहा
(१)
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
(२)
है जिस कविता का काम लोकहित करना
सद्भावों से मन मनुज मात्र का भरना
पहले तो कांता सदृश हृदय का हरना
फिर प्रकटित करना विमल ज्ञान का झरना

(३)
अर्पित हो मेरा मनुज काय
बहुजन हिताय बहुजन हिताय
(४)
संदेश नहीं मैं स्वर्गलोक का लाया
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया
इस तरह से इनके साहित्य का उद्देश्य लोकमंगल भावना को हम पाते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रस की लोकमंगलवादी व्याख्या की। उन्होंने कलावाद-रूपवाद का विरोध किया, साथ ही विरुद्धों के सामंजस्य सिद्धांत का समर्थन किया। उन्होंने तुलसीदास और उनके ‘रामचरितमानस’ को लोकमंगल की साधनावस्था का प्रतिमान माना तथा विद्यापति और बिहारीलाल को सिद्धावस्था का कवि कहा।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साहित्य का प्रयोजन “लोकचिंता” को मानते थे। उनके प्रिय कवि हैं कबीर। इनका मानना था कि लोकचिंताओं से जुड़कर ही रचनाकार को लोक को दिशा-दृष्टि देनी चाहिए।

छायावाद के कवियों ने सृजन को मानव-मुक्ति चेतना की ओर ले जाने का काम किया। सुमित्रानंदन पंत ने रीतिवाद का विरोध करते हुए ‘पल्लव’ की भूमिका में कहा कि मुक्त जीवन-सौंदर्य की अभिव्यक्ति ही काव्य का प्रयोजन है।

जयशंकर प्रसाद का कहना था आनंद और लोकमंगल दोनों का सामंजस्य ही सृजन-धर्म है - “श्रेयमयी प्रेम ज्ञानधारा”।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने नवजागरण परंपरा का विस्तार किया और रूढिवाद का विरोध।

महादेवी वर्मा के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है मानव करुणा का विस्तार।

प्रगतिवाद ने रूढिवादिता का विरोध किया और मार्क्सवादी समाज-चिंतन को अपनाया।
प्रेमचंद के अनुसार रचनाकार समाज में आगे चलने वाली मशाल होता है। अतः साहित्य का उद्देश्य जनता की चेतना को जाग्रत करना तथा परिष्कृत करना होता है।
प्रगतिवाद एक निश्चित तत्ववाद को सूचित करता है। ऐसे साहित्य में विषय-वस्तु या अंतर्वस्तु को अधिक महत्व दिया जाता है। रूप को, कला-विन्यास को कम। इनके मतावलंबियों के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है प्रतिक्रियावादी शक्तियों के लोक-विरोधी, जन-विरोधी चरित्र का भंडाफोर और मनुष्य का, मनुष्यता का विकास-परिष्कार-प्रसार। अर्था‍त्‌ उपयोगितावाद-यर्थार्थवाद की महत्वप्रतिष्ठा।
डॉ. रामविलास शर्मा ने लोकमंगलवादी चिंतन-दृष्टि का विकास ही साहित्य का प्रयोजन माना।

गजानन माधव मुक्तिबोध ने साहित्य को जनता के लिए जनजागरण का अस्त्र माना और उन्होंने अपनी रचनाओं, “चांद का मुंह टेढा है” और “भूरी-भूरी खाक धूल” द्वारा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी चिंतन का विरोध किया।

नयीकविता युग तथा समकालीन युग के विद्वानों, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा आदि, कवियों के मतानुसार साहित्य का प्रयोजन मानव-व्यक्तित्व का समग्र विकास, मानव-स्वाधीनता की रक्षा, मुक्त-चिंतन का विकास है।

उपसंहार
इस प्रकार हम पाते हैं कि हिन्दी चिंतन परंपरा में लोकमंगलवादी मानव सत्यों से साक्षात्कारवादी दृष्टि ही साहित्य का प्रयोजन रही है। रचनाकार का मानवतावाद रचना की अर्थ-व्यंजना में निहित रहता है।
हिन्दुस्तान में संस्कृति का आधारभूत तत्व है - “सुरसरि सम सबका हित होई।” अर्थात्‌ गंगा की तरह सभी को अपने में मिलाना और गंगा बना देना। लोक-कल्याण और आनंद दो अलग नाम हैं परन्तु तत्त्वतः दोनों एक हैं, दोनों का मूल प्रयोजन है – लोक के साथ जीना, लोक-चिंता के साथ जीना।
अपने हृदय को लोक के हृदय में मिला देना ही “रस दशा” है। इसका अर्थ है हृदय की मुक्तावस्था, भावयोग दशा, साधारणीकरण या समष्टिभावना का आनंद। हिन्दी काव्यशास्त्र का प्रयोजन इसी हिन्दुस्तानी लय से ओत-प्रोत है।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि काव्य का प्रयोजन है लोकमंगल भावना अर्थात्‌ मनुष्यता का विकास। जिसमें मानव के प्रति गहरे सामाजिक सरोकार हों। रचनाकार मानवता के प्रति करुणा और सहानुभूति की चेतना का विस्तार कर अपने-पराए की भेद-बुद्धि को मिटाता है और मानवतावाद की दृष्टि का प्रचार करता है। लोकजागरण और लोक-कल्याण ही जीवन का सत्य  है, शिव है, सुन्दर है। और यही है साहित्य का प्रयोजन!

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

साहित्यकार-४ :: कवि सम्राट सुमित्रानंदन पंत – प्रकृति के सुकुमार कवि


साहित्यकार-४ ::

कवि सम्राट सुमित्रानंदन पंत

– प्रकृति के सुकुमार कवि

जन्म :: 20 मई, 1900 को जन्म 
मृत्यु :: 28 दिसम्बर 1977 को
स्थान :: उत्तर प्रदेश के जिला अल्मोड़ा के कौसानी ग्राम।
शिक्षा :: प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। १९१८ में काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। १९२१ में महात्मा गांधी के आह्मवान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।
वृत्ति :: उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। १९३८ में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। १९५५ से १९६२ तक आकाशवाणी से जुडे रहे व मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया।
कृतियां :: काव्य के अलावा आपनें आलोचना, कहानी, आत्मकथा आदि गद्य विधाओं में भी रचनायें कीं।
कविता-संग्रह : उच्छवास(१९२०), पल्लव(१९२६), वीणा(१९२७), ग्रंथी (१९२९), गुंजन (१९३२), युगांत, युगांतर, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा, लोकायतन तथा सत्यकाम, मुक्तियज्ञ, तारापथ, मानसी, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा, पतझड़, अवगुंठित, ज्योत्सना, मेघनाद वध।
पंत जी हिन्दी के छायावादी युग चार के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।
हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रकृति के एक मात्र माने जाने वाले सुकुमार कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म 20 मई, 1900 को उत्तर प्रदेश के जिला अल्मोड़ा के कौसानी ग्राम की हरी भरी वादियों में हुआ था। जन्म के कुछ घंटे बाद ही वे मातृस्नेह से वंचित हो गए थे। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। उनके बचपन का नाम था गुसाई दत्त। उनके पिता गंगा दत्त चाय बागान के मैनेजर थे। दस साल की उम्र में उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रा नंदन पंत रख लिया। हाई स्कूल की परीक्षा पास कर 1919 की जुलाई में बीस साल की उम्र में प्रयाग आ गये। एक साल तक कॉलेज में पढ़ाई की फिर गांधीजी से प्रभावित हो, पढ़ाई छोड़ असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 
बचपन से ही काव्य प्रतिभा के धनी पंतजी ने 16 वर्ष की उम्र में अपनी पहली कविता रची “गिरजे का घंटा”। तब से वे निरंतर काव्य साधना में तल्लीन रहे। अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हें। शब्द, शिल्प, भाव और भाषा के द्वारा कवि प्रकृति और प्रेम के उपादानों से एक अत्यंत सूक्ष्य और हृदयकारी सौन्दर्य की सृष्टि करता है। किंतु उनके शब्द केवल प्रकृति-वर्णन के अंग न होकर एक दूसरे अर्थ की गहरी व्यंजना से संयोजित हैं। उनकी रचनाओं में छायावाद एवं रहस्यवाद का समावेश भी है। साथ ही शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों का प्रभाव भी है।
पंत काव्य में प्रकृति के अनेक मनोरम रूपों का मधुर और सरस चित्रण का अनूठा उदाहरण “आँसू की बालिका”, “पर्वत प्रदेश में पावस” आदि कविताओं में होता है जिनमें कवि की जन्मभूमि के प्राकृतिक सौन्दर्य का वैभव विद्यमान है। प्रेम और आत्म-उद्बोधन के सम्मिलन से प्रकृति-चित्रों का ऐसा अद्भुत आकर्षण अन्य कहीं नहीं मिलता।
“धँस गए धरा में समय शाल
उठ रहा धु्आँ, जल गया ताल
यों जलद यान में विचर-विचर
था इन्द्र खेलता इन्द्रजाल ”
और
“इस तरह मेरे चितेरे हृदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी
सरल शैशव की सुखद सुधि सी वही
बलिका मेरी मनोरम मित्र थी ”
(पर्वत प्रदेश में पावस)
अल्मोड़ा की प्रकृतिक सुषमा ने उन्हें बचपन से ही अपनी ओर आकृष्ट किया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मां की ममता से रहित उनके जीवन में मानो प्रकृति ही उनकी मां हो। उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा के पर्वतीय अंचल की गोद में पले बढ़े पंत जी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि उस मनोरम वातावरण का इनके व्यक्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा
“मेरे मूक कवि को बाहर लाने का सर्वाधिक श्रेय मेरी जन्मभूमि के उस नैसर्गिक सौन्दर्य को है जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ जिसने छुटपन से ही मुझे अपने रूपहले एकांत में एकाग्र तन्मयता के रश्मिदोलन में झुलाया, रिझाया तथा कोमल कण्ठ वन-पखियों ने साथ बोलना कुहुकन सिखाया। ”
कौसानी की उस घाटी का वर्णन पंत जी ने इन पंक्तियों में किया है
“उस फैली हरियाली में
कौन अकेली खेल रही माँ
वह अपने वय वाली में ”
“हिम प्रदेश” एवं “हिमाद्री” आदि रचनाओं में भी कौसानी के प्राकृतिक सौंदर्य के अनेक रूपों का चित्रण मिलता है। कविवर पंत यह स्वीकार करते हैं कि जब उनका काव्य कण्ठ भी नहीं फूटा था तभी से अल्मोड़ा की प्रकृति उस मातृहीन बालक को कवि-जीवन के लिए तैयार करने लगी थी। पेड़, पहाड़, फुल, भौंरे, गुंजन, पर्वत-प्रदेश, बरु की चोटियां, इन्द्रधनुष आदि ने उनकी रचना यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया। अपनी इन अनुभूतियों को कवि “हिमाद्री” शीर्षक रचना में प्रस्तुत करता हैः
“मुझ अंचलवासी को तुमने
शैशव में आशा दी पावन
नभ में नयनों को खो, तब से
स्वपनों का अभिलाषी जीवन
कब से शब्दों के शिखरों में
तुम्हें चाहता करता चित्रित”
“सोच रहा, किसके गौरव से मेरा यह अन्तर्जग निर्मित
लगता तब , हे प्रिय हिमाद्री
तुम मेरे शिक्षक रहे अपरिचित ”
मां की कमी उन्हें काफी सालती रही और प्रकृति माँ की गोद का सहारा मिला तो मानों वे उसके लाड़ से अपने आप को पूरी तरह सरोबार कर लेना चाहते थेः
“मातृहीन, मन में एकाकी, सजल बाल्य था स्थिति से अवगत,
स्नेहांचल से रहित, आत्म स्थित, धात्री पोषित, नम्र, भाव-रत
प्रकृति गोद में छिप, क्रीड़ा प्रिय, तृण तरू की बातें सुनता मन,
विहगों के पंखों पर करता, पार नीलिमा के छाया वन
रंगो के छींटों से नव दल गिरि क्षितिजों को रखते चित्रित,
नव मधु की फूलों कल वे ही मुझे गोद भरती सुख विस्मृत
कोयल आ गाती , मेरा मन जाने कब उड़ जता वन में,
षड्ऋतुओं की सुषमा अपलक तिरती रहती उर दर्पण में”
कवि पंत की रचनाओं को देख कर ऐसा लगता था जैसे वे स्वयं प्रकृति स्वरूप थे। उनकी विभिन्न रचनाओं में ऐसा लगता है जैसे कवि प्रकृति से बात कर रहा हो, अनुनय कर रहा हो, प्रश्न कर रहा हो। मानों प्रकृति कविमय हो गई है और कवि प्रकृतिमय हो गया है। पंतजी ने जीवन में कहीं भी दुराव, छिपाव नहीं था। उनका स्वाभाव सरल और मन निश्छल था। मन में प्रकृति के प्रति असीम आकर्षण था। प्रकृति से परे सोचना उनके लिए असंभव सा थाः-
“छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले तेरे बाल जाल में,
कैसे उलझा दूँ लोचन ”
ऐसा प्रतीत होता है कि उनके लिए रमणी के सौंदर्य की अपेक्षा प्रकृति के सौंदर्य में अधिक आकर्षण था। कवि अपनी दुर्बलताओं को खोल कर सामने रखता है तथा अपने प्रेम की पावनता को दृढ़ता के साथ प्रमाणित करता है। पुराने कवि अपने निजि प्रणय संबंध को सीधे ढ़ंग से व्यक्त करने में असमर्थ थे। सामाजिक नैतिकता के बंधन को अस्वीकार करते हुए पंत ने उच्छ्वास और आंसू की बालिका के प्रति सीधे शब्दों में अपना प्रणय प्रकट किया है – बालिका मेरी मनोरम मित्र थी।
कवि अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए ईश्वर से “याचना” भी करता है तो प्राकृतिक उपादानों के माध्यम सेः
“बना मधुर मेरा जीवन
नव-नव सुमनों से चुन-चुन कर
धूलि, सुरभि, मधुरस हिमकण,
मेरे उर की मृदु कलिका में
भर दे, कर दे, विकसित मन ”
“बादल” और “छाया” कविताओं में अद्भूत एवं विलक्षण कल्पना के दर्शन होते हैं जिससे हृदय चमत्कृत हो उठता है। उनकी प्रकृति संवेदना एवं कल्पना का अपूर्व मिश्रण देखने को मिलता है।
“बुद्बुद-द्युति तारक दल तरलित
तम के यमुना जल में श्याम
हम विशाल जम्बाल जाल से
बहते हैं, अमूल, अविराम। ”
(बादल)
उनकी कविताएँ संबोधनात्मक हैं। कवि प्रकृति के उपादानों को संबोधित कर उनसे बात-चीत करता रहता है। इसमें एक आत्मीयता झलकती है। संबोधनों से कवि सौंदर्य सृष्टि करता है जिससे उनकी रचनाओं का कलात्मक धरातल काफी विशाल हो जाता है। कुछ उदाहरण देखें “कहाँ कहाँ हे बसल विहंगिनि ” “ऐ अवाक् निर्ज की भारति”, “अहे निष्टुर परिवर्तन ” “कौन तुम अतुल, अरूप, अनाम ” आदि।
उनकी कविताओं में प्राकृतिक उपमानों का सर्वथा एक नया रूप देखने को मिलता है। जैसे
“पौ फटते, सीपियाँ नील से
गलित मोतियां कान्ति निखरती”
या
“गंध गुँथी रेशमी वायु”
या
“संध्या पालनों में झुला सुनहले युग प्रभात”
इसी तरह उन्होंने छाया को, “परहित वसना”, “भू-पतिता” “व्रज वनिता” “नियति वंचिता” “आश्रय रहिता” “पद दलिता” “द्रुपद सुता-सी ” कहा है। इस तरह उन्होंने भाषा को एक नया अर्थ-संस्कार दिया।
कवि पंत की संवेदनशील भावनाओं को प्रकृति का स्पर्श उनके हृदय में मंथन कर उन्हें जीवन के सत्य की खोज करने के लिए प्रेरित करता है। प्रकृति के परिवर्तनशील स्वाभाव में कवि अपनी “परिवर्तन” कविता में शास्वत जीवन की खोज करता जान पड़ता है –
“स्वर्ग की सुषमा जब साभार
धरा पर करती थी अभिसार
प्रसूनों का शाश्वत श्रृंगार
गूँज उठते थे बारम्बार
सृष्टि के प्रथमोद्गार
हाय सब मिथ्या बात
आता तो सौरभ का मधुमास
शिशिर में भरता सूनी साँस।”
तथा
“नित्य का यह अनित्य में नर्तन
विवर्तन जग, जग व्यावर्तन
अचिर में चिर का अन्वेषण,
विश्व का तत्वपूर्ण दर्शन । ”
और जब हृदय-मंथन अपहनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है तो उसे परिवर्तनशीलता में शाश्वत चिर सुन्दरतम सत्य का दर्शन होता हैः-
“गाता खग प्रातः उठकर-
सुन्दर सुखमय जन जीवन
गाता साखग सन्ध्या-तट-पर
मंगल, मधुमय जग जीवन ! ”
कवि प्रकृति के अपने कल्पनामय संसार में ही अपनी सारी इच्छाओं को संतुष्ट कर लेता हैः-
“वह ज्योत्सना से हर्षित मेरा,
कलित कल्पनामय संसार तारों के विस्मय से विकसित
विपुल भावनाओं का हार
सरिता के चिकने उपलों-सी
मेरी इच्छाएँ रंगीन,
वह अजानता की सुन्दरता,
वृद्ध विश्व का रूप नवीन ”
पंतजी ने सांसारिक वैभव से रहित जीवन जिया। सूनेपन का एक मीठा दर्द झलकता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति के उपादान बरबस ही उन्हें उनकी प्रेयसी की याद दिला देते हैं।
गहन व्यथा से रँगे साँझ के बादल
मौन वेदना रंजित फूलों के दल !
मधु समीर भी श्वास-गंध से चंचल
साँसें भर तुम्हें खोजती विह्वल
आँसू में नहाया सा ओसों का वन लगता मेरी ही जीवन का दर्पण
आध्यात्म ने भी उनको आकर्षित किया। अरविंद दर्शन में कवि वर्तमान मानव-जीवन के विषम संकट को व्यक्त करते हुए एक नये आदर्श भविष्य का चित्रण करता है। उनकी कई रचनाओं में अनुभूति के स्थान पर विचार को अधिक महत्व मिला है –
“तुम वहन कर सको जन मन में मेर विचार.
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार ।”
कवि सम्राट पंत जी ने स्वयं माना कि छायावाद वाणी की नीरवता है, निस्तब्धता का उच्छ्वास है, प्रतिभा का वीलास है, और अनंत का विलास है। अपनी संकुचित परिभाषा के कारण कुछ लोग पंत की रचनाओं में भी केवल पल्लव और पल्लव में भी कुछेक कविताओं को ही छायावाद के अंतर्गत स्वीकार करते हैं। मौन निमंत्रण में अज्ञात की जिज्ञासा होने के कारण रहस्यवाद है, अभिव्यक्ति की सूक्ष्मता के कारण छायावाद है और कल्पनालोक में स्वच्छंद विचरण करने के कारण स्वच्छंदतावाद भी है। पंत का रहस्य भावना ‘अज्ञात’ की लालसा के रूप में व्यक्त हुई है। पंत सीमित ज्ञान की सीमा को तोड़कर प्रकृति और जगत के प्रति जिज्ञासु की तरह देखते हैं। पंत का बालक मन हर चीज से सवाल पूछता है।
प्रथम रशमि का आना रंगिणि
तूने कैसे पहचाना
उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। आकर्षक और कोमल व्यक्तित्व के धनी कविवर सुमित्रा नंद पंत जिस तरह से अपने जीवन काल में सभी के लिए प्रिय थे उसी तरह से आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। प्रकृति का परिवर्तित रूप सदा पंतजी में नित नीवन कौतूहल पैदा करता रहा। उन्होंने सबकुछ प्रकृति में और सब में प्रकृति का दर्शन किया। यही कारण है कि वे प्रकृति के सुकुमार चितेरे थे और अंत में शास्वत सत्य की जिज्ञासा उन्हें अरविंद दर्शन, स्वामी रामकृष्ण आदि के विचारों की ओर खींच ले गई। इस प्रकार उन्होंने काव्य सृजन से वे चारों पुरूषार्थ उपलब्ध किए जो काव्य का फल हैं।

मेरी पसंद


मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
मैं नहीं चाहता चिर दुख;
सुख-दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख।

सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरण;
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन।
जग पीड़ित है अति-दुख से, जग पीड़ित रे अति-सुख से, मानव-जग में बँट जावें दुख सुख से औ’ सुख दुख से।
अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न,
दुख-सुख की निशा-दिवा में,
सोता-जगता जग-जीवन।
यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;
चिर हास-अश्रुमय आनन
रे इस मानव-जीवन का!