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मंगलवार, 26 जून 2012

आज मुझसे बोल, बादल

आज मुझसे बोल, बादल


हरिवंशराय बच्चन

आज मुझसे बोल, बादल!

तम-भरा तू, तम-भरा मैं,
ग़म-भरा तू, ग़म भरा मैं,
आज तू, अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें,   राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

भेद यह मत देख दो पल --
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु , तेरी बूंद है अनमोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

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बुधवार, 21 मार्च 2012

यह पपीहे की रटन है


हरिवंशराय बच्चन

11. यह पपीहे की रटन है

यह पपीहे की रटन है !

बादलों  की घिर घटाएं
भूमि की लेती बलाएं ,
खोल दिल देती दुआएं देख किस उर में जलन है?
यह पपीहे की रटन है !

जो  बहा  दे, नीर आया,
आग का फिर तीर आया,
वज्र भी बेपीर आया कब रुका इसका वचन है?
यह पपीहे की रटन है !

यह न पानी से बुझेगी,
यह न पत्थर से दबेगी,
यह न शोलों से डरेगी, यह वियोगी की लगन है!
यह पपीहे की रटन है !
***

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012


हरिवंशराय बच्चन

10. साथी, सो न, कर कुछ बात

साथी, सो न, कर कुछ बात !

बोलते    उडुगण   परस्पर,
तरु  दलों  में मन्द ‘मरमर’,
बात  करतीं सरि-लहरियां कूल से जल-स्नात!
साथी, सो न, कर कुछ बात !

बात  करते   सो  गया  तू,
स्वप्न  में फिर  खो गया तू,
रह  गया  मैं  और  आधी  बात, आधी रात!
साथी, सो न, कर कुछ बात !

पूर्ण  कर   दे  वह  कहानी,
जो   शुरू  की  थी  सुनानी,
आदि  जिसका हर निशा  में, अन्त चिर अज्ञात!
साथी, सो न, कर कुछ बात !
***

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

कहते हैं तारे गाते हैं


हरिवंशराय बच्चन

9. कहते हैं तारे गाते हैं

कहते  हैं,  तारे  गाते हैं!

सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते  हैं,  तारे  गाते हैं!

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित  ओस-कणों में  तारों के नीरव आंसू  आते हैं!
कहते  हैं,  तारे  गाते हैं!

ऊपर देव, तले मानवगण,
नभ में दोनों गयन-रोदन,
राग  सदा  ऊपर को उठता, आंसू  नीचे झर जाते हैं!
कहते  हैं,  तारे  गाते हैं!
***

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

तुम तूफ़ान समझ पाओगे?


हरिवंशराय बच्चन

8. तुम तूफ़ान समझ पाओगे

तुम तूफ़ान समझ पाओगे?

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता ‘हरहर --- इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफ़ान समझ पाओगे?

गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता  इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफ़ान समझ पाओगे?

तोड़-मरोड़  विटप-लतिकाएं,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएं,
जाता है अज्ञात दिशा को! हटो विहंगम, उड़ जाओगे!
तुम तूफ़ान समझ पाओगे?

बुधवार, 25 जनवरी 2012

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ !

डॉ. हरिबंशराय बच्चन

अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ !

वृक्ष हों भले खड़े,
हों  घने,  हों बड़े,
एक पत्र-छांह भी मांग मत, मांग मत, मांग मत !
अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ !

तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी ! -- कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ !
अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ !

यह महान दृश्य है ---
चल    रहा  मनुष्य  है
अश्रु-स्वेद-रक्त   से     लथपथ,     लथपथ,   लथपथ !
अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ !

रविवार, 27 नवंबर 2011

प्रेरक प्रसंग–13 : सौ सुधारकों का करती है काम अकेली मधुशाला

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प्रस्तुतकर्ता : मनोज कुमार

आज इस ब्लॉग पर प्रेरक प्रसंग पोस्ट करने का दिन है।

आज डॉ. हरिवंश राय बच्चन का जन्म दिन है।

सोचा क्यों न उनकी आत्मकथा “क्या भूलूं क्या याद करूँ” से कोई प्रसंग लूं जो प्रेरक भी हो और उनके प्रति श्रद्धांजलि भी। तो लीजिए उसी पुस्तक का एक अंश प्रस्तुत है ...

हरिवंशराय बच्चन

***

मेरा जन्म 27 नवम्बर 1907 को हुआ। मेरा नाम हरिवंश राय रक्खा गया, घर पर मुझे बच्चन नाम से पुकारा जाता। हरिवंश नाम रखने का विशेष कारण था। मेरे से पहले के दो बच्चे अल्पायु में ही चल बसे थे। तब पंडित रामचरण शुक्ल ने प्रताप नारायण (पिता) को यह सलाह दी कि अब मेरी माता गर्भवती हों तब वे हरिवंश पुराण सुनें। घंटों पति-पत्नी गांठ जोड़कर परिवार के पुरोहित से हरिवंश पुराण की कथा सुनते, ‘पुत्रप्रद संतान गोपाल यंत्र’ की पूजा करते।

***

मेरे होने और जीने के लिए मेरी माता ने और भी बहुत-से दाय-उपाय, टोटके-टामन आदि किए। मेरे जन्म के पूर्व मुहल्ले की किसी बड़ी-बूढ़ी ने उन्हें सलाह दी थी कि तुम्हारे लड़के नहीं जीते तो अब जब लड़का हो तो उसे किसी चमारिन-धमारिन के हाथ बेच देना और मन से उसे पराया समझकर पालना-पोसना। उन दिनों बच्चा जनाने के लिए हमारे यहां लछमिनियां चमारिन आती थी। मैं पैदा हुआ तो मेरी मां ने पांच पैसे में मुझे लछमिनियां चमारिन के हाथों बेच दिया और उनके बतासे मंगाकर खा लिए। कहते हैं, साल-भर पहले लछमिनियां का अपना एक मात्र लड़का कुछ महीने का होकर गुजर गया था और उसका दूध सूख गया था, पर जैसे ही उसने मुझे अपनी गोद में लिया उसकी छाती कहराई और उसने बारह दिन तक मुझे अपना दूध पिलाया। मैं उसे चम्मा कहता था, अपनी मां को अम्मा। वह मुझे अपनी मां से अधिक सुन्दर लगती थी। मुझे मोल लेने के बाद चम्मा के कोई संतान नहीं हुई। किसी रूप में यदि उसकी वत्सलता का कोई आधार हो सकता था तो एक मैं – उसका होकर भी कितना न उसका !

***

चम्मा की मृत्यु मेरे लड़कपन में ही हो गई थी। उसने इच्छा प्रकट की कि अंत समय पर मेरे हाथों से ही उसके मुंह में तुलसी गंगाजल डाला जाए। दूसरे दिन चम्मा की अर्थी उठी तो किसी ने मुझे कमर से उठाकर मेरा कंधा उसकी अर्थी से छुला दिया। बचपन में चम्मा की झोपड़ी में खेलने-खाने और उसकी ममतामयी आंखों के नीचे तरह-तरह की शैतानी करने की धुंधली-धुंधली-सी स्मृति अब भी मेरे साथ है।

IMG_1961मुझे गर्व है कि मेरी तो एक मां चमारिन चम्मा थी। एक दिन नगर में आयोजित किसी प्रीतिभोज में मैंने अछूतों की पंगत में बैठकर कच्चा खाना खा लिया। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। संतोष का अनुभव हुआ। पर मेरे संबंधियों और नातेदारों को यह खबर बड़ी नागवार गुज़री। उन्होंने व्यंग्य से कहा कि आखिर इसने चमारिन की छाती का दूध पिया था, उस कुसंस्कार का कुछ असर होना था। मेरे मन से बहुत पहले ही अछूतों को अछूत समझने की बात बिलकुल उठ गई थी। जब स्वतंत्र रूप से अपना घर हुआ तो अक्सर चमार ही मेरे खाना बनानेवाले रहे। मुझे आश्चर्य और क्रोध तो तब होता जब घर की कहारिन चमार के छुए बर्तनों को मांजने से इन्कार कर देती। मुझे लगता है कि मेरे पूर्वजों ने अछूतों का अपमान करके जो पाप किया था उसका यत्किंचित प्रायश्चित मैं कर रहा हूं। सामाजिक स्तर पर कोई सुधार हो, इसके पूर्व व्यक्ति-व्यक्ति को निर्भिकता और साहस के साथ आगे बढ़ना होगा।

इधर मैं सोचने लगा हूं कि अछूतों के साथ या उनके हाथ का खाना-पीना अथवा उनके लिए मन्दिरों का द्वार खोल देना केवल रूमानी औपचारिकताएं अथवा प्रदर्शन हैं। समाज में उनको अपना यथोचित स्थान तभी मिलेगा जब उनमें शिक्षा का व्यापक प्रचार हो और उनका आर्थिक स्तर ऊपर उठे। साथ ही जाति की श्रृंखला को ऊपर से नीचे तक टूटना नहीं तो ढीली होना होगा। जाति की जड़, अर्थहीन और हानिकारक रूढ़ियों से निम्नवर्ग के लोग उतने ही जकड़े हैं जितने उच्च वर्ग के लोग। एक छोटा-सा क़दम इस दिशा में यह उठाया जा सकता है कि लोग अपने नाम के साथ अपनी जाति का संकेत करना बन्द कर दें। वे अपने नाम के साथ अपनी जाति न जोड़ें – अपने को राम प्रसाद त्रिपाठी नहीं; केवल राम प्रसाद कहें।

***

और अब मधुशाला से बच्चन जी के विचार ...IMG_1962

दुतकारा मस्जिद ने मुझको

कहकर   है   पीनेवाला,

ठुकराया  ठाकुरद्वारे  ने

देख  हथेली  पर  प्याला,

कहां ठिकाना मिलता जग में

भला  अभागे  काफिर को?

शरणस्थल बनकर न मुझे यदि

अपना    लेती    मधुशाला।

***

कभी नहीं सुन पड़ता ‘इसने,

हा,  छू  दी  मेरी  हाला’

कभी न कोई कहता, ‘उसने

जूठा  कर  डाला  प्याला’;

सभी जाति के लोग यहां पर

साथ   बैठकर   पीते  हैं;

सौ  सुधारकों का करती है

काम   अकेली मधुशाला।

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

आज मुझसे दूर दुनिया


आज मुझसे दूर दुनिया

हरिवंशराय बच्चन


आज मुझसे दूर दुनिया !

भावनाओं से विनिर्मित,
कल्पनाओं से सुसज्जित,
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया !
आज मुझसे दूर दुनिया !

बात पिछली भूल जाओ,
दूसरी नगरी बसाओ’ --
प्रेमियों के प्रति रही है, हाय, कितनी क्रूर दुनिया !
आज मुझसे दूर दुनिया !

वह समझ मुझको न पाती,
और  मेरा  दिल  जलाती,
है चिता की राख कर में मांगती सिन्दूर दुनिया !
आज मुझसे दूर दुनिया !