बापू लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बापू लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 13 नवंबर 2011

प्रेरक प्रसंग-11 : नियम भंग कैसे करूं?

clip_image001clip_image001

clip_image001[5]

प्रस्तुत-कर्ता : मनोज कुमार

1929 की बात है। एक दिन गांधी जी को किसी विशेष कारण से शाम की प्रार्थना में पहुंचने में एक मिनट की देरी हो गई। आश्रम के प्रवेश द्वार पर जब वे पहुंचे तो वहां मौज़ूद व्यक्ति ने छोटा दरवाज़ा खोल दिया। उसने बापू से कहा कि आप प्रवेश कर जाएं। पर गांधी जी भीतर नहीं गए, वहीं खड़े रहे।

जब प्रार्थना समाप्त हुई तो वे प्रार्थना-स्थल पर पहुंचे। उन्होंने अपने भाषण में भाग न ले सकने का कारण बताते हुए कहा,

“मैं प्रर्थना-सभा में कैसे आ सकता था? प्रार्थना तो शुरु हो चुकी थी। मैंने ही तो यह नियम बनाया है कि प्रार्थना शुरु होने के बाद, प्रार्थना-सभा में कोई प्रवेश न करे। इसलिए तीनों प्रवेश द्वार पर जालीदार छोटे-छोटे दरवाज़े लगवा दिए गए हैं, जिन्हें बंद करने से दूर से ही पता चल जाए किए प्रार्थना शुरु हो गई है।”

बापू कहा करते थे, “प्रार्थना तो मेरी खुराक है। मैं पानी और खाने के बिना कई दिनों तक रह सकता हूं, लेकिन प्रार्थना के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता।”

DSCN1592उनका कहना था, कि जो मनुष्य आखिरी समय में जिसका चिन्तन करेगा, उसी की गति पाएगा। मतलब अन्त में राम का चिन्तन किया और राम-नाम लिया, तो वह राम को पाएगा। इस पर किसी ने उनसे पूछा कि जब ऐसा है तो फिर दिन में दो बार आप प्रार्थना क्यों करते है, बल्कि आखिर की घड़ी में राम-राम शब्द बोलेंगे, तो भी तो सद्गति हो ही जाएगी न।

गांधी जी ने उसे समझाया, “बात तो तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। यह समझ लेना चाहिए कि जिसने जीवन-भर राम-नाम का जप नहीं किया, उसके मुंह से आखिर में राम-नाम निकलेगा ही नहीं। आन्तिम समय में मुंह से राम-नाम निकले इसके लिए तो जीवन राममय बनाना होगा, तभी यह सम्भव है।”

बापू के मुंह से आन्तिम शब्द निकले थे --- हे राम! हे राम!

कितना राममय था बापू का सारा जीवन!

***

 

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

बापू

बापू

- रामधारी सिंह दिनकर

संसार पूजता जिन्हें तिलक, रोली, फूलों के हारों से,

मैं उन्हें पूजता आया हूँ बापू ! अब तक अंगारों से।

 

अंगार, विभूषण यह उनका विद्युत पीकर जो आते हैं,

ऊँघती शिखाओं की लौ में चेतना नयी भर जाते हैं।

 

उनका किरीट, जो कुहा-भंग करके प्रचण्ड हुंकारों से,

रोशनी छिटकती है जग में जिनके शोणित की धारों से।

 

झेलते वह्नि के वारों को जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,

सहते ही नहीं, दिया करते विष का प्रचण्ड विष से उत्तर।

 

अंगार हार उनका, जिनकी सुन हाँक समय रुक जाता है,

आदेश जिधर का देते हैं, इतिहास उधर झुक जाता है।

 

आते जो युग युग में मिट्टी का चमत्कार दिखलाने को,

ठोकने पीठ भूमण्डल की नभ-मंडल से टकराने को।

 

अंगार हार उनका, जिनके आते ही कह उठता अम्बर,

‘हम स्ववश नहीं तबतक जबतक धरती पर जीवित है यह नर’।

 

अंगार हार उनका कि मृत्यु भी जिनकी आग उगलती है,

सदियों तक जिनकी सही हवा के वक्षस्थल पर जलती है।

 

पर तू इन सब से परे; देख तुझको अंगार लजाते हैं,

मेरे उद्वेलित-ज्वलित गीत सामने नहीं हो पाते हैं।

रविवार, 28 अगस्त 2011

मानव सेवा

प्रेरक प्रसंग – 1

clip_image001

सेवाग्राम आश्रम में एक दिन सुबह एक व्यक्ति बापू की झोपड़ी में आया। बापू उसे पहचान गये। वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता था और कई बार जेल हो आया था। वे थे पंडित परचुरे शास्त्री। वे संस्कृत के महान विद्वान थे। उनको कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से वे काफ़ी परेशान रहते थे। अछूत की भांति इधर-उधर घूमते रहते थे। तकलीफ़ काफ़ी बढ़ गई और वे अपने जीवन से उकता चुके थे। उन्होंने निश्चय किया कि वे अनशन करके अपना प्राण त्याग देंगे। वे हरिद्वार में बहुत दिनों तक एकांतवास भी करते रहे। उस दिन वे पैदल चलकर बापू के दर्शन करने आए थे।

बापू की बातें सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए। बोले, “अब मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं। मैं वह सूत भी लाया हूं जो मैंने आपके लिए काता है। मैं आपको ख़ुद भेंट करना चाहता था। मैं आज रात एक पेड़ के नीचे आराम करूंगा। सुबह चला जाऊंगा।”

गांधी जी ने शास्त्री जी से कहा, “यह तुमने क्या सोच लिया। तुम्हें उपवास करके प्राण नहीं त्यागना है। मैं ऐसा नही करने दूंगा।”

DSCN1459बापू पर उसकी श्रद्धा का बहुत प्रभाव पड़ा। पूरी रात वे सोचते रहे कि उसे जाने दें या आश्रम में ही रख लें। आखिर उन्होंने निश्चय किया कि उसे आश्रम में ही रखेंगे। गांधी जी ने अपनी कुटिया से क़रीब 200 फुट की दूरी पर परचुरे शास्त्री जी के लिए एक कुटीर बनवाया। इस प्रकार वे दिन रात उनकी देख भाल करते थे। जब भी टहलते हुए उधर से गुज़रते उनका हाल-चाल पूछते। क्या खाना-पीना है, यह सब उन्हें बताते।

हर दिन की तरह एक दिन जब गांधी जी उनके पास गए और उनका हाल चाल पूछा तो शास्त्री जी ने बताया, “रात को बड़ा कष्ट हुआ। दर्द बहुत हो रहा था और नींद भी नहीं आई।”

गांधी जी अपनी कुटिया वापस आए और धूप में एक खटिया डाली। शास्त्री जी को बुला कर उस पर लिटाया। सरसों के तेल से उनकी मालिश करने लगे। पूरी एकाग्रता, प्यार और स्नेह से बात भी करते गए और उनकी मालिश भी। यह क्रम रोज़ ही चलता गया। शास्त्री जी को काफ़ी राहत मिली। फ़ायदा भी होने लगा।