शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

पुस्तक परिचय – 19 : स्मृतियों में रूस

पुस्तक परिचय – 19

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1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7. मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी, 11. आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श, 12. स्मृतियों में रूस13. अन्या से अनन्या 14. सोनामाटी 15. मैला आंचल 16. मछली मरी हुई 17. परीक्षा-गुरू 18. गुडिया भीतर गुड़िया

स्मृतियों में रूस

मनोज कुमार

हमारे कई ऐसे बीते पल होते हैं जो अनुभव के रूप में हमारे वर्तमान में जीवित होते हैं। इनसे हमारा एक संबंध-सा बन जाता है। यह अतीत हमारे आज को मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करता है। इसकी सहायता से संस्मरणकार समय की धुंध में ओझल होती ज़िन्दगी को फिर से रचने का प्रयास करता है। आज हम आपका परिचय कराने जा रहे हैं शिखा वार्षणेय द्वारा रचित पुस्तक “स्मृतियों में रूस” से।

मेरा फोटोस्मृतियों में रूस” पुस्तक के ज़रिए शिखा वार्ष्णेय अपने पांच वर्षीय रूस के प्रवास को याद करती हैं। संबंधों की आत्मीयता और स्मृति की परस्परता ही संस्मरण की रचना प्रक्रिया का मूल आधार है। बारहवीं पास कर जब रूस में स्कॉलरशिप के साथ पढ़ाई करने के लिए चयन होता है, तो मन में खुशी के साथ डर भी समा जाता है। एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के संशय से भी सामना होता है। लेकिन उन सारी स्थितियों का समना करते हुए लेखिका अंततोगत्वा पहुंच ही जाती हैं रूस।

इस पुस्तक में बारह अध्याय हैं, जिनके शीर्षक भी बड़े रोचक हैं … दोपहर और नई सुबह, चाय दे दे मेरी मां, वो कौन थी, टर्निंग पॉइंट, स्टेशन की बेंच से एम एस यू की बेंच तक, टूटते देश में बनता भविष्य, कुछ मस्ती कुछ तफ़रीह, मॉस्को हर दिल के क़रीब, रूस और समोवार, हिन्द से दूर हिंदी, कोवस्काया रूस का प्राचीनतम नगर, टॉल्सटॉय, गोर्की और यह नन्हा दिमाग और स्वर्ण अक्षर और सुनहरे अनुभव।

IMG_3587इस पुस्तक के ज़रिए शिखा जी ने जीवन के लौकिक अनुभवों को संबंधों के प्रकाश में सहेजा है। संस्मरणकार के समक्ष अतीतता के साथ-साथ एक आत्मीय संबंध भाव तो होता ही है। एक साथ जीने और बीतने से मिला भाव संस्मरण लिखने के लिए आधार भूमि होती है। इस आधारभूमि पर रची इस पुस्तक में एक पांच वर्षीय परास्नातक का कोर्स करते वक़्त जो आश्चर्यजनक अनुभव हुए लेखिका ने उसे इस पुस्तक के द्वारा पेश किया है। कहती हैं, “एक-एक शब्द मैंने अनुभूति की स्याही में अपनी स्मृति की कलम को डुबो-डुबो कर लिखने का प्रयास किया है।”

यह पुस्तक साहित्य की संस्मरण विधा का एक सार्थक उदाहरण है। अपने सोवियत प्रवास के खट्टे कम मीठे अधिक अनुभवों को बहुत ही रोचकता के साथ एक सहज-सरल भाषा में प्रस्तुत करते हुए लेखिका ने उस देश में हो रहे आर्थिक-सामाजिक बदलाव को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। यात्रा-वृत्त एवं संस्मरण कुछेक रूप में एक दूसरे से जुड़े हैं। बल्कि यह कह सकते हैं कि संस्मरण का ही विशिष्ट रूप है। इस पुस्तक में शिखा जी अपने यात्रा-संस्मरण से हमें यदा-कदा परिचय कराती रहती हैं।

शिखा जी के संस्मरण के केन्द्र में घटनाओं और मनोभावों से बना हुआ अतीत है, जो पाठक के मन में कौतूहल उत्पन्न करता है। इस पुस्तक में वर्णित गतिशील स्मृतियों के साथ लेखिका के जीवन का उद्घाटन भी साथ-साथ चलता रहता है। हर अध्याय में संवेदनशीलता का होना उनके इस पुस्तक का प्रधान गुण है।

IMG_3588शिखा के अनुभव और रोमांच के साथ-साथ शैलीगत विशेषताओं ने निश्चित ही एक रचनाकार के रूप में इस किताब ने सफलता प्रदान की है। संस्मरण में उस देश-प्रदेश का भौगोलिक विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं महत्त्वपूर्ण घटनाएं शामिल होती हैं। इस पुस्तक में रूसी समाज, इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक चहल-पहल, पर्यावरण चिंता आदि समाहित कर यह साबित कर दिया है कि शिखा वार्ष्णेय एक सिद्धहस्त रचनाकार हैं और इस पुस्तक के वृत्तांत काफ़ी रोचक और पठनीय हैं।

पुस्तक का मुल्य 300 clip_image002  बहुत अधिक है, खास कर पृष्ठों की संख्या देखकर तो मुझे यही लगता है। यदि पुस्तक के फोटो रंगीन होते तो लगता कि चलो इतना मूल्य जायज है, लगता है डायमंड पॉकेट बुक्स वालों ने कुछ ज़्यादा ही ज़्यादती की है पाठकों के साथ। डायमंड वालों को इसका पेपर बैक संस्करण जल्द लाना चाहिए ताकि आम पाठको को भी यह पुस्तक सुलभ हो सके।

 

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पुस्तक का नाम

स्मृतियों में रूस

लेखिका

शिखा वार्ष्णेय

प्रकाशक

डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लिमिटेड

संस्करण

पहला संस्करण : 2012

मूल्य

300 clip_image002

पेज

76

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

गुणाढ्य की कथा - भाग-2


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आदरणीय पाठक गण आप सब को मैं, अनामिका सादर प्रणाम  करते हुए सर्वप्रथम आप सब के बीच एक ख़ुशी बांटना चाहती हूँ वो यह  कि हमारे राजभाषा ब्लॉग के कर्णधार श्री मनोज कुमार जी आज पटना में गृहमंत्रालय की तरफ से राजभाषा के क्रियान्वन में अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए सर्वश्रेष्ठ अधिकारी के रूप में पुरुस्कृत किये गए हैं.  हम सब की तरफ से उन्हें हार्दित बधाई....

                                                                                    झिंगूर दास 198

तो  लीजिये अब हाज़िर हूँ आपके समक्ष कथासरित्सागर से माल्यवान (गुणाढ्य )की कथा की अगली कड़ी लेकर. 


पिछले आठ अंकों में आपने कथासरित्सागर से शिव-पार्वती जी की कथावररुचि की कथा पाटलिपुत्र (पटना)नगर की कथाउपकोषा की बुद्धिमत्ता, योगनंद की कथा पढ़ी.....प्रथम अंक में हमने जाना था कि जब शिव जी पार्वती जी को कथा सुना रहे होते हैं तो उनके गण पुष्पदंत योगशक्ति से अदृश्य हो वह कथा सुन लेते हैं और पार्वती क्रोधवश पुष्पदंत को श्राप देती हैं ...पुष्पदंत के मित्र माल्यवान साहस कर उमा भगवती के चरणों पर माथा रख अपने मित्र का अपराध क्षमा करने का आग्रह करते हैं, लेकिन पार्वती क्रोधवश माल्यवान को भी शाप देती हैं जिससे पुष्पदंत और माल्यवान मनुष्य योनी पाकर धरती पर आये हैं, जहाँ पुष्पदंत को शाप-मुक्ति के उपाय हेतु काणभूति(सुप्रतीक नामक यक्ष)को वही कहानी सुनानी है और माल्यवान को काणभूति से यह कथा सुनकर मनुष्य योनी में इसका प्रचार करना है तभी इनकी मुक्ति संभव है. 

लेकिन काणभूति बृहत्कथा सुनाने से पहले माल्यवान की इस जन्म की कथा सुनना चाहता है...माल्यवान बताते हैं कि वह यहाँ प्रतिष्ठान प्रदेश के सुप्रतिष्ठित नामक नगर के एक ब्राह्मण सोमशर्मा की पुत्री श्रुतार्था के पुत्र गुणाढ्य हैं. गुणाढ्य दक्षिणापथ में विद्याएँ प्राप्त कर सुप्रतिष्ठित नगर लौटते हैं और राजा सातवाहन उनसे प्रसन्न हो अपना मंत्री नियुक्त कर लेते हैं.

राजा की एक रानी व्याकरण की पंडित थी. एक दिन उसने राजा को खरी खोटी सुना दी राजा लाज से गड़ गया. तब से राजा ने तय कर लिया कि या तो पांडित्य प्राप्त कर लूँगा या मर जाऊंगा. अब आगे...


गुणाढ्य की कथा - भाग-2 


राजा के अन्य मंत्री शर्ववर्मा ने गुणाढ्य को बताया - महाराज की रानियों में वह व्याकरण पंडिता रानी विष्णु शक्ति की बेटी है, उसी ने राजा का अपमान किया है. रानी की बात मन में लगने से राजा की व्याकरण पढने की और पंडित बनने की इच्छा हो गयी है.

अगले दिन गुणाढ्य और शर्ववर्मा राजा से मिलने जाते हैं . राजा कुछ नहीं बोलता.  गुणाढ्य राजा से पूछते हैं  - महाराज क्या बात है, अकारण आप उदास क्यों दिख रहे हैं ? तब भी राजा कोई उत्तर नहीं देता.

तब शर्व वर्मा राजा को एक किस्सा सुनाते हुए कहता है - महाराज आज मैंने सपने में देखा कि एक कमल आकाश से गिरा, उसके साथ कोई देवकुमार प्रकट हुआ, उसने कमल को खिला दिया, कमल के खिलते ही एक श्वेत-वस्त्र धारिणी एक देवी निकली और वह सीधे आपके मुख में चली गयी. इतना ही देख पाया और मेरी निद्रा टूट गयी, लेकिन महाराज अब मैं समझ गया हूँ कि वह देवी सरस्वती थीं, और उसने आपके मुख में वास करना आरम्भ कर दिया है - इसमें संदेह नहीं.

शर्ववर्मा की गप्प सुन कर राजा मुस्कुरा देता है और बोलता है - मैं मूर्ख हूँ. विद्या के बिना मुझे यह लक्ष्मी बिलकुल भी नहीं भाति. तुम लोग बताओ कि कोई व्यक्ति परिश्रम करके कितने दिनों में व्याकरण सीख सकता है ?

गुणाढ्य ने कहा - राजन, व्याकरण तो सभी विद्याओं का दर्पण है. नियम है कि बारह वर्ष तक व्याकरण का अध्ययन नियमित करना चाहिए, तभी व्याकरण आता है. पर मैं आपको छः वर्ष में व्याकरण का ज्ञान करा सकता हूँ.

यह सुनते ही शर्ववर्मा डाह के साथ बोलता है - हे महाराज, मैं आपको छः महीने में व्याकरण का ज्ञान करा सकता हूँ.

गुणाढ्य ने कहा - राजन,यह तो असंभव है. यदि शर्ववर्मा छः महीने में आपको व्याकरण सिखा दे तो मैं संस्कृत, प्राकृत और देशी भाषा तीनों का त्याग कर दूंगा.

शर्ववर्मा बोला - और यदि मैं ऐसा न कर पाया तो बारह वर्ष तक तुम्हारी पादुकाएं माथे पर धारण करूँगा.

बस फिर क्या था...जहाँ गुरु और चेला दोनों ही जनूनी मिल जाएँ तो सफलता तो झक्क मार कर पीछे आएगी ही.  स्वामी कुमार की कृपा से प्राप्त कातंत्र व्याकरण के सहारे शर्ववर्मा ने राजा को छह महीने में विद्याओं में पारंगत बना दिया. सारे राष्ट्र में उत्सव मनाया गया. घर घर पर पताकाएं फहरा रही थीं. राजा ने अपार धन-सम्पदा दे कर शर्ववर्मा की पूजा की और उसे नर्मदा के तट पर भृगु कच्छ (भड़ौच ) देश का राजा बना दिया. विष्णुशक्ति की पुत्री जिस रानी के कहने पर राजा को विद्याभ्यास की लगन लगी थी, उसे राजा ने अपनी पटरानी बना लिया.

गुणाढ्य शर्ववर्मा से शर्त हार गए और अपने वचन के अनुसार तीनों भाषाएं छोड़ कर मौन धारण कर लिया और विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए निकल पड़े. गुणाढ्य काणभूति को बताते हैं की देवी विध्यासिनी के कहने पर ही मैं तुमसे मिलने आया हूँ. विन्ध्य के वन में रह कर वहा के पुलिंदों से मैंने यह पिशाच भाषा सीखी है, जिसमे मैं अब बोल रहा हूँ. अब तुम मुझे ब्रहत्कथा सुनाओ, जिसे मैं इसी पैशाची भाषा में लिखूंगा. उसके बाद मेरी शाप मुक्ति हो पायेगी.

गुणाढ्य के द्वारा इस प्रकार अपनी कथा सुनाने पर काणभूति ने भी उसे वररुचि से सुनी हुई ब्रह्त्कथा सुनाई. गुणाढ्य ने उस ब्रह्त्कथा को सात वर्षों में सात लाख छंदों में पैशाची (प्राकृत) में लिखा. उस घोर वन में स्याही न मिलने के कारण मनस्वी गुणाढ्य ने अपने रक्त से ही वह विशाल कथा लिख डाली.सुना जाता है कि लिखते लिखते जब गुणाढ्य अपनी कथा पढने लगते, तो सुनने के लिए सिद्ध विद्याधरों का जमघट आकाश में लग जाया करता था.  इस प्रकार गुणाढ्य की कथा पूरी लिखी गयी, उस महाकथा को काणभूति ने सुना और गुणाढ्य कृत ब्रह्त्कथा ग्रन्थ को देखा. सुन कर और देख कर वह शाप से मुक्त हो गया. उसके साथ रहने वाले पिशाच भी उस कथा को सुन कर दिव्यलोक में पहुँच गए.

साथियों अभी मैं इस कथा को यहीं विश्राम देती हूँ...अगले अंक में इस कथा के प्रचार की कथा का वृतांत आपके समक्ष रखूंगी जो कि बहुत ही मार्मिक अनुभूतियाँ करता है.....तब तक के लिए आज्ञा दें.

नमस्कार !