शनिवार, 19 नवंबर 2011

पुस्तक परिचय –7 : मुक्तिबोध की कविताएं

पुस्तक परिचय 7

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मुक्तिबोध की कविताएं

मनोज कुमार

इस सप्ताह, 13 नवम्बर को गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म दिन था। उनकी याद में एक पुस्तक पढ़ डाली, “मुक्तिबोध की कविताएं”, संपादक त्रिलोचन शास्त्री। सोचा इस अंक में उसी पुस्तक से आपका परिचय कराया जाए।

मुक्तिबोध के जीवनकाल में उनका एक भी कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया। 13 नवम्बर 1917 को श्योपुर, ग्वालियर में जन्मे मुक्तिबोध की मृत्यु 11 सितंबर 1964 को लंबी बीमारी के बाद नई दिल्ली में हुई, तब उनकी उम्र 47 की भी नहीं हुई थी। उन्होंने दो सौ से अधिक कविताएं लिखी हैं। 1964 में “चांद का मुंह टेढ़ा है”, उनकी लंबी कविताओं का एक संकलन निकला। प्रकाशित होने के कुछ दिनों पहले उनका देहावसान हो चुका था। इस संग्रह की भूमिका श्रीकांत वर्मा और शमशेरबहादुर सिंह ने लिखी थी। इसके बाद उनकी कविताओं का संकलन “भूरी-भूरी खाक धूलि” प्रकाशित हुआ। इस परिप्रेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि शास्त्री जी ने इस संकलन को प्रकाशित कर बड़ा ही नेक काम किया है। उन्होंने मुक्तिबोध की अंतिम काल खंड की रचनाओं पर ध्यान दिया है। प्रस्तुत संकलन मुक्तिबोध की शक्ति और उपलब्धियों को प्रस्तुत करने में सफल हुआ है।

IMG_1951इस संकलन की ‘अंधेरे में’, ‘ब्रह्मराक्षस’, ‘चम्बल की घाटी’, ‘चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन’, ‘ये आये, वो आये’, ‘भूल-ग़लती’, ‘दिमाग़ी गुहान्धकार का ओराँग-उटाँग!’, ‘इसी बैलगाड़ी को’, ‘ओ काव्यात्मन्‌फणिधर’, ‘मानव-निर्झर की झर-झर कंचन-रेखा’, ‘जीवन की लौ’, ‘पीला तारा’, ‘ज़िन्दगी का रास्ता’, ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’, और ‘एक आत्म-वक्तव्य’ जैसी महत्वपूर्ण कविताओं को पढ़कर यह स्पष्ट है कि मुक्तिबोध एक कठिन समय के कवि हैं। उन्होंने अपने सच को कठिन वैचारिक और भावात्मक संघर्ष से पाया और कविता में चरितार्थ किया।

संकलन की कविताओं में विषय-वैविध्य है। उनकी कविताएं सोचती-विचारती कविताएं हैं। इस संकलन की एक कविता “ओ काव्यात्मन्‌फणिधर” में उन्होंने अपनी कविता का उद्देश्य बतलाया है। उनका उद्देश्य वह रोशनी फैलाना है, जिससे लोग ब्रह्म के असली चेहरे को पहचान सकें। इस ब्रह्म की विशेषता यह है कि इसकी कृपा से धनी और धनी तथा ग़रीब और ग़रीब होते जाते हैं। यह व्यक्ति को आत्मकेन्द्रीत बनाकर उसे शेष विश्व से अलग कर देता है।

उस ब्रह्मदेव का दर्शन सभी कर सकेंगे

जिसकी छत्रच्छाया में रह

अधिकाधिक दीप्तिमान होते

धन के श्रीमुख,

पर, निर्धन एक-एक सीढ़ी नीचे गिरते जाते

उनकी कविताएं अन्य प्रगतिशील कवियों से अलग होते हुए भी प्रगतिविरोधी नहीं हैं। समय का यथार्थ उनकी कविता में पूरे कलात्मक सन्तुलन के साथ मौज़ूद है। “चांद का मुंह टेढ़ा है” एक प्रसिद्ध ही नहीं, प्रतिनिधि कविता है। इस कविता में वे भारत को एक बड़े परिदृश्य में देखते हैं, यानी तीसरी दुनिया के ऐसे पिछड़े हुए देश के रूप में, जो अपने निर्माण के लिए नवउपनिवेशवाद के चंगुल से निकल कर स्वतंत्र विकास के मार्ग पर चलने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस लंबी कविता में अज़ादी के बाद के भारत की बिगड़ती हुई सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का संत्रास कवि व्यक्त करता है। किन्तु संत्रास के वातावरण में कवि का संघर्षशील जन रुकता नहीं, वह उसे तोड़ता हुआ मशाल की तरह आगे बढ़ता जाता है।

कितना समय लगेगा

सुबह होगी कब और

मुश्किल होगी दूर कब!!

समय का कण-कण

गगन की कालिमा से

बूंद-बूंद चू रहा

तड़ित्‌उजाला बन।

मुक्तिबोध की दृष्टि समाज-केन्द्रीत रहती थी। वे सामाजिक प्रश्नों या स्थितियों का सामना निरन्तर करते हैं। वे उन रचनाकारों में से नहीं हैं हो पाठक का मनोरंजन करते हैं। उनकी रचनाएं कल्पनाविहार कराने के बजाए व्याकुल और अशांत कर देती हैं। वे पाठक को सावधान देखना पसंद करते हैं। वे चाहते थे कि पाठक स्वयं उद्बुद्ध हो। पाठक अपनी आंखों से सत्य के देखे, जैसा है वैसा देखे। इसीलिए समकालीन जीवन के हॉरर की तीव्रतम अभिव्यक्ति के बावज़ूद उनकी कविता एक गहरे आत्मविश्वास की उपज हैं।

मुक्तोबोध आत्मसंघर्ष के कवि हैं। वे आज की सभी अमानवीयता के विरुद्ध मनुष्य की अन्तिम विजय का भरोसा दिलाती हैं। “ब्रह्मराक्षस” कविता में आत्मसंघर्ष प्रखर रूप में मिलता है। यह संघर्ष सिर्फ़ उनका न होकर पूरे मध्यवर्ग का है। इस कविता में आत्मसंघर्ष व्यक्ति और समाज, आत्मा और विश्व तथा बाहर और भीतर के बीच है।

... ये गरजती, गूंजती, आंदोलिता

गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियां, अतः

उद्भ्रांत शब्दों के नए आवर्त में

हर शब्द निज प्रतिशब्द को भी काटता,

वह रूप अपने बिंब से ही जूझ

विकृताकार-कृति

है बन रहा

ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहां।

न सिर्फ़ “ब्रह्मराक्षस” में बल्कि अन्य कविताओं में भी उनका खुरदरा शिल्प साबित करता है कि उन्होंने अपनी दार्शनिक चिंताओं को सृजन की चिंताओं में गुम्फित किया। उनकी कविता चिंतन से गहरा सरोकार रखती है। वे ज्ञान को संवेदना में और संवेदना को ज्ञान में रूपांतरित करने में एकसाथ सफल होते हैं।

... अतिरेकवादी पूर्णता

की ये व्यथाएं बहुत प्यारी हैं ...

ज्यामितिक संगति-गणित

की दृष्टि से कृत

भव्य नैतिक मान

आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक भान

... अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना

कब रहा आसान

मानवी अंतर्कथाएं बहुत प्यारी हैं!!

मुक्तिबोध की कविता अपने समय का जीवित इतिहास है। “अंधेरे में” शीर्षक कविता एक सशक्त और मार्मिक कविता उनके नागपुर जीवन के बहुत सारे संदर्भ अपने अंदर समेटे है। सबसे महत्वपूर्ण है एंप्रेस मिल के मज़दूरों की हड़ताल और उन पर चलाई गई गोलियां। गोलीकांड के समय एक अखबार के रिपोर्टर की हैसियत से वे घटनास्थल पर मौज़ूद थे। यह एक लंबी कविता है, लगभग चालीस पृष्ठों की। उनकी लंबी कविताएं न खण्ड काव्य हैं न महा काव्य। इन कविताओं में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो किसी और कवि में नहीं पाई जातीं।

मुक्तिबोध लगातार सरलीकरण के विरुद्ध रहे। सत्य का सरलीकरण संभव भी नहीं है। हां सत्य को निजता से आगे ले जाकर सामान्य बनाते हुए उसका सामान्यीकरण करना ज़रूर अपेक्षित है। कविता का आरंभ बड़ी जटिल परिस्थितियों में हुआ करता है। मुक्तिबोध सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं का वर्णन भी व्यक्ति को छोड़कर नहीं करते। उनका मानना था कि समाज के साथ व्यक्ति को महत्व नहीं दिया गया, तो चित्रण सामान्यीकृत होकर भी प्रभावहीन हो जाएगा। इस कविता में एक व्यक्ति भी है जिसकी काव्य-नायक के रूप में चर्चा की गई है। वह कहता है,

मानों मेरे कारण ही लग गया

मार्शल लॉ वह,

मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया,

मानो मेरे कारण ही दुर्घट

हुई वह घटना।

उनकी कविताएं गहरे नैतिक बोध से अनुप्राणित हैं। “भूल-ग़लती” एक नैतिक कविता है। इसमें कवि का आशय मध्यवर्गीय व्यक्ति की उस प्रवृत्ति से है, जिससे प्रेरित होकर वह व्यक्तिगत हित-सिद्धि के लिए सच्चाई और ईमानदारी को तिलांजलि देकर नाना प्रकार के समझौते करता है। इस कविता द्वारा कवि यह दिखलाना चाहता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ-भावना एक बहुत ही ताकतवर चीज़ होती है। उसके लिए न सच्चाई का कोई महत्व होता है, न किसी कोमल मानवीय भावना का।

भूल-ग़लती

आज बैठी है जिरहबख़्तर पहनकर

तख्त पर दिल के;

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,

आंखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर-सी;

खड़ी हैं सिर झुकाए

सब कतारें

बेजुबां बेबस सलाम में,

अनगिनत खंभों व मेहराबों-थमे

दरबारे-आम में।

प्रचलित लोकप्रिय छन्द उनके यहां नहीं है। शब्द योजना में भी वे हिंदी के कवियों से अलग हैं, बिल्कुल मौलिक। मुक्त छन्द में व्यंजना और स्पष्टता और सफाई आने लगती है। उनकी काव्य—भाषा की व्यंजना में शक्ति और गति पर्याप्त मात्रा में मिलती है। मुक्तिबोध याथार्थ-द्रष्टा होने के कारण सच्चे अर्थों में युगद्रष्टा कवि थे। दूसरे कवियों की कविता जहां आत्मसंघर्ष से शून्य है, वहां मुक्तिबोध में तीखा आत्मसंघर्ष है। उनकी कविताएं आशा और आस्था के स्वर के साथ समाप्त होती हैं।

पुस्तक का नाम : मुक्तिबोध की कविताएँ

संपादक : त्रिलोचन शास्त्री

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, रवीन्द्र भवन, 35, फीरोज़शाह मार्ग, नई दिल्ली- 110001

मूल्य: 75 रु.

पृष्ठ : 191

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7 टिप्‍पणियां:

  1. मुक्तिबोध की कविताएँ यथार्थ के धरातल पर लिखी गयी हैं ... अच्छा लगा यह पुस्तक परिचय ... आभार

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  2. मनोज कुमार जी,नमस्कार,
    साहित्य जगत में मुक्तिबोध की अपनी एक अलग ही पहचान है। बचपन से ही उनके मन में ज्ञान की तलाश थी, धन की नही । मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, एवं तर्कशास्त्र की समस्याओं में वे ढलती परंपराओं एवं भविष्य के बीच अपना रास्ता तलाशते रहे । वे गुंफित भावना और कल्पना के कवि थे । उनको पढ़ना आसान काम नही है । उनके द्वारा लिखित आलोचनात्मक पुस्तक "नए साहित्य का सौदर्यशास्त्र " थोड़ा पढ़ा हूँ । अच्छी जानकारी से परिचित हुआ था । आपके पोस्ट से उनके बारे में जितना भी जानता था ,उससे भी अधिक जानकारी मिली । धन्यवाद।

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  3. आपके ब्लॉग से हमेशा नयी जानकारी मिलती है ।
    मुक्तिबोध जी के बारें में बताने हेतु धन्यवाद ।

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  4. यथार्थ के कठोर धरातल पे लिखी मुक्तिबोध की रचनाएं बहुत प्रभावित करती हैं ... आकी समीक्षा ने पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगा दी है ..

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  5. मुक्तिबोध कठिन समय के कवि नहीं मेरे लिए तो बड़े ही कठिन कवि रहे हैं.. दरअसल बचपन/युवा काल में जिन कवियों को न समझ पाने के कारण उनके विषय में "कठिन कवि" जैसी धारणा बन गयी उनमें मुक्तिबोध भी रहे हैं... जब समझ पैदा हुई (पता नहीं इतनी समझ अभी भी पैदा हो पाई है या नहीं) तब पढ़ नहीं पाया!
    आभार आपका, इस शुरुआत के लिए!

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  6. कामायनी पर मुक्तिबोध की एक पुस्तक बहुत पहले पढ़ा था। उसे पढ़ने के बाद फिर इन्हें पढ़ने की कभी इच्छा ही नहीं हुई। आज उनके विषय में जानकर सुखद लगा।

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  7. अभी तक मुक्तिबोध को पढ़ना संभव न सका है.आभार पुस्तक परिचय का.

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