शनिवार, 14 जनवरी 2012

पुस्तक परिचय-16 : मछली मरी हुई

पुस्तक परिचय-16

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1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7. मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी, 11. आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श, 12. स्मृतियों में रूस13. अन्या से अनन्या 14. सोनामाटी 15. मैला आंचल
मछली मरी हुई
मनोज कुमार
pratinidhi-kahaniyan-rajkamal-chaudharyसमकालीन हिंदी उपन्यास लेखकों में राजकमल चौधरी का नाम विशिष्ट है। बिहार के सहरसा जिले के महिसी ग्राम में 13 दिसंबर वर्ष 1929 को जन्मे राजकमल चौधरी लंबी उम्र नहीं पा सके। 19 जून 1967 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। मात्र अड़तीस वर्ष के जीवन में उन्होंने जहां एक ओर साठोत्तर हिंदी कविता को एक नई दिशा दी वहीं लगभग दर्जन भर उपन्यासों द्वारा यह प्रमाणित किया है कि उनका रचना संसार न केवल कथ्य के स्तर पर बल्कि शिल्प के स्तर पर भी परंपरागत ढांचे को तोडकर एक नये रूप को दिखाता है। उनके जैसा लेखक किसी विचारधारा विशेष में सीमित रह नहीं सकता है, क्योंकि विचारधारा से अधिक वह मानवीयता के पक्ष पर जोर देते हैं। वह सही मायनों में उत्तर आधुनिक लेखक कहे जा सकते हैं।
राजकमल ने अपने बहुचर्चित उपन्यास “मछली मरी हुई” में नारी विमर्श का मुद्दा जिस तरह उठाया उस पर विवाद और तरह-तरह की चर्चाएं हुईं। आलोचकों ने तो यहां तक कहा कि उनके सभी उपन्यासों की तरह इसमें भी शराब, क़बाब और सैक्स का ही वर्चस्व है। हो सकता है आलोचकों के साहित्यिक मानदंड पर राजकमल का रचना संसार खरा नहीं उतर पाया हो फिर भी उनकी बौद्धिक क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता है। वे मर्यादाओं और मूल्यों के बंधन में बंधने वाले लेखक कभी नहीं रहे।
इस उपन्यास में उन्होंने कलकत्ता के औद्योगिक और व्यावसायिक जीवन का चित्रण किया है जो अनुभव आधारित है, लेखक अपनी ओर से पुस्तक के शुरू में ही कह देता है कि “उपन्यास में वर्णित सूचनाएं संयोग और कु-अवसर से प्राप्त हुईं हैं, इच्छित अनुभव से नहीं !” पिछली बड़ी लड़ाई के बाद, कलकत्ता शहर में नई पीढ़ी के व्यापारियों की एक जमात नए-से-नया व्यापार करने के लिए चौरंगी, डलहौजी-स्कवायर, महात्मा गाँधी रोड, धर्मतल्ला और पुरानी क्लाइव स्ट्रीट में, अमरीकी शैली के ऊँचे दफ्तरों में बैठ गई थी।
----निर्मल पद्मावत इसी जमात का एक व्यापारी है।
वह इस उपन्यास का मुख्य पात्र है। पूरी कहानी निर्मल के इर्द-गिर्द घूमती है। निर्मल एक अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी है और पेशे से बड़ा व्यापारी। वह घूस नहीं देता, दलाली से उसे नफ़रत है। किसी क्लब में या सभा-सोसयटी में शामिल नहीं होता। झूठ बोलना नहीं जानता, शराब नहीं पीता, ताश नहीं खेलता, ... उसका कोई मित्र भी नहीं है।
देश-विदेश घूम लेने के बाद निर्मल कलकत्ता में बस गया है। 30 मंज़िला ‘कल्याणी मेंशन’ में रहता है, बिज़नेस के दांव-पेंच और ख़ुद में पूरी तरह उलझा हुआ। इतनी बड़ी पूँजी और इतने बड़े ‘कल्याणी मैंशन’ का मालिक हो जाने के बाद भी निर्मल काले ‘संगमरमर की मूरत’ बनकर, वहीं का वहीं रुका क्यों रह गया - - यह इस छोटे-से उपन्यास का विषय नहीं है।
कल्याणी निर्मल का पहला प्रेम है। वहीं, वेश्यावृत्ति में पड़ी कल्याणी निर्मल को नकार डॉक्टर रघुवंश से शादी कर लेती है। निर्मल को अस्वीकार करने की कल्याणी के पास एक वजह है, और इसी एक वजह से निर्मल ताउम्र जूझता रहता है। (आप उपन्यास पढ़िए जान जाएंगे)
उपन्यास दिलचस्प है। दिलचस्प इसलिए कि इसका विषय यह भी नहीं है कि उसी कल्याणी मेंशन की उन्तीसवीं मंजिल पर रह रही शीरीं, जो पहले शीरीं मेहता थी, दो साल से शीरीं पद्मावत हो गई है, और उसको, एक साधारण पुरुष की साधारण पत्नी बनकर, जीवित रहने का अधिकार मिला या नहीं, प्रश्न उलझा और अनसुलझा-सा है। शिरीं जिसे बीते हुए का पाछतावा नहीं, आगे होनेवाले की फ़िक्र नहीं और उसके लिए जीने का एकमात्र तरीक़ा रह गया है, वर्तमान को जिए जाना। पहले अंधेरा था, फिर अंधेरा होगा, अभी अगर रोशनी की एक हलकी-सी भी किरण बाक़ी है, तो उसे जी लो। यह किरण ज़िन्दगी है। ... और उसकी ज़िन्दगी भी उपन्यास का विषय नहीं है।
इस उपन्यास में विषय नहीं है, विषय-प्रस्ताव है - - मात्र विषय-प्रस्ताव !
प्रस्ताव देह जनित दुर्बलता विशेषकर स्त्री समलैंगिकता और यौनाचारों में डूब गई हुई स्त्रियों के बारे में है। इस विषय पर हिंदी में, बहुत कम ही लिखा गया है। शीरीं समलैंगिक है। समलैंगिक आचरणों में लिप्त रहकर भी वह समझ नहीं पाती कि क्या कर रही है, और किस मतलब से कर रही है......करती है अवश्य, लेकिन नींद में, नशे में, अनजाने कर लेती है। और, अपने कुसंस्कारों और अंधेपन में जकड़ी हुई, अधिक ‘धार्मिक’ और अधिक संत्रास’ बनी रहती है।
इसके पात्र की तरह यह उपन्यास भी असाधारण है। उपन्यास के ही शब्दों को लें, तो ‘असाधारण बनना, ‘एब्नार्मल’ बनना, अधिक कठिन नहीं है। आदमी शराब की बोतल पीकर असाधारण बन सकता है। दौलत का थोड़ा-सा नशा, यौन-पिपासाओं की थोड़ी-सी उच्छृंखलता, थोड़े-से सामाजिक-अनैतिक कार्य आदमी को ‘एब्नॉर्मल’ बना देते हैं। कठिन है साधारण बनना, कठिन है अपनी जीवन-चर्या को सामान्यता-साधारण में बाँधकर रखना।’’
अपने मनोरोग से जूझते हुए नायक निर्मल एक और सह नायिका प्रिया का बलात्कार कर देता है, जो उसकी पहली प्रेमिका कल्याणी की बेटी है। अपनी मर्दानगी को पाकर निर्मल शीरीं के पास वापस आता है और शीरीं एक मर्द को पाकर, जो उसका पति भी है, कोई पुराना गीत गुनगुनाती है ..
‘‘बरसात हुई। जल भर आया...
सूखी पड़ी नदी में फिर जल भर आया...
नीली मछली मरी हुई,
जी उठी। प्राण में प्यार, प्यार में प्यास,
प्यास से मरी हुई नीली मछली
के लिए
नदी में जल भर आया।
बरसात हुई!’’
इस पुस्तक की समीक्षा करते हुए  MADHAVI SHARMA GULERI ने सही ही कहा है कि हालांकि रजकमल चौधरी की इस प्रसिद्ध कृति “मछली मरी हुई” का कोई विषय नहीं है, या यूँ कहें कि कोई एक विषय नहीं है, फिर भी कहीं भटकाव नहीं दिखता। कल्याणी, डॉक्टर रघुवंश, प्रिया और शीरीं के पात्रों का चित्रण अच्छा है। हो सकता है एक स्वस्थ दृष्टिकोण युक्त पाठक के लिए शायद यह उपन्यास गले के नीचे न उतरे लेकिन मछली मरी हुई उपन्यास आख़िर तक बांधे रखता है। पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि इसे 45 साल पहले सोचा, लिखा गया होगा। ताज़ग़ी बरक़रार है। भाषा में सौंदर्य है, और प्रवाह भी। कुल मिलाकर साधारण, सरल लहज़े में असाधारण बात कह देना राजकमल जी के लेखन की ख़ासियत है और यह उपन्यास एक सफल उपन्यास कहा जा सकता है।


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पुस्तक का नाम मछली मरी हुई
लेखक राजकमल चौधरी
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
संस्करण पहला संस्करण : 1994
दूसरा संस्करण : 2009
मूल्य 125
पेज 171

13 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी समीक्षा की है आपने!
    मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. अच्छी श्रृंखला के अंतर्गत अच्छा पुस्तक परिचय!!

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी...हमने भी इसका पहला संस्करण पढ़ा है

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  4. बेशक आपका यह कथन विचारणीय है कि राजकमल उत्तर-आधुनिक लेखक थे.

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  5. aap acchhi acchhi pustakon ke parichay aur sameeksha dekar hame utsaahit n kah kar mujhe lalchaye kahna chaahiye ki lalchaye rakhte hain aur main bata nahi sakti ki vah sabhi prasang kitne dino tak dil-o-dimag me kalrav kiye rakhte hain lekin mazboori is kadar ki vo books ham padh nahi paate....abhi tak mere dimag se manu bhandari ki khud par likhi pustak ke prasang nahi chhate hain....

    aap ko ek suggestion hai ya request kah lijiye...ki ye book selling ka kaam shuru kar dijiye..ya library hi khol lijiye ...taki mujh jaiso ko kitabon k liye kahin aur bhatakna na pade. :-) ab to jealousy hone lagi hai ki aap itni acchhi acchhi books padh pate hain.

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    1. @ अनामिका जी,

      जितनी पुस्तकों का परिचय इस स्तंभ में दिया गया है, वे सारी हमारी लाइब्रेरी में हैं। आपका स्वागत है।

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  6. अच्छी समीक्षा की है आपने ...विषय थोडा अलग हटकर लग रहा है
    मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ

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  7. पुस्तक परिचय में ऐसी पुस्तक से रु बी रु कराया है जिसका विषय अद्भुत है ..या ये कहें कि एक विषय न हो कर बहुत से विषयों को समेटा होगा कथाकार ने .. पढ़ने को ललायित हूँ यह पुस्तक .. देखिये कब मौका लगता है .. आभार

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  8. राजकमल चौधरी का यह उपन्यास उस समय का चित्रण है जब भारत में भी यूरोप में पनपे बिटल्स और हिप्पी आन्दोलन की लहर पहुंचने लगी थी। नयी कविता और साठोत्तरी कविता में बहुत कुछ ऐसा मिलेगा। जीवन को खोजा जा रहा था...जीवन में भटकन थी...तभी हरे रामा-हरे कृष्णा जैसी फिल्मों के बारे भी सोचा गया।

    खैर,मच्छली मरी हुई, पुस्तक की समीक्षा के साथ आपने राजकमल चौधरी का जीवन वृत्त भी बताया है। राजकमल प्रकाशन भी इन्हीं का है।

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  9. समीक्षा हमेशा की तरह संतुलित है और पाठक में पढ़ने की उत्सुकता पैदा करती है।

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  10. महोदय,
    इस पुस्तक की समीक्षा मैंने अपने ब्लॉग पर की थी, जिसका कुछ अंश यहां 'कॉपी' किया गया है. ऐसा करने से पहले क्या आपने संदर्भ देना ज़रूरी नहीं समझा?

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    1. आभार अपका।
      आपकी समीक्षा पढ़ी थी। उसी से प्रेरित होकर पुस्तक पढ़ी थी।

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