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मंगलवार, 17 मई 2011

ऐतिहासिक उपन्यास

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हिन्दी उपन्यासों के विकास के दौर में इतिहास संबंधी एक नए दृष्टिकोण का उदय हुआ। इस कोटि के उपन्यासों में भारतीय इतिहास के उन अध्यायों और घटनाओं को चित्रित किया गया है, जिनसे वर्तमान को नयी दिशा और प्रेरणा मिलती है।

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वृन्दावन लाल वर्मा (1889-1969) ने हालाकि सामाजिक उपन्यास भी लिखे हैं, लेकिन उनका नाम ऐतिहासिक उपन्यासों लेखन में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके ‘संगम’ (1928), ‘लगन’ (1929), ‘प्रत्यागत’ (1929), और ‘कुंडलीचक्र’ (1932) सामाजिक उपन्यास और ‘गढ़ कुंडार’ ((1929), ‘विराटा की पद्मिनी’ (1936), ‘झांसी की रानी’ (1937), जैसे उपन्यास स्वतंत्रता के पहले और ‘कचनार’, ‘मृगनयनी’, ‘अहिल्याबाई’, ‘भुवन विक्रम’, ‘माधव जी सिंधिया’. ‘रामगढ़ की रानी’, ‘महारानी दुर्गावती’ आदि उपन्यास स्वतंत्रता के बाद लिखे गए है।

वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यासों में इतिहास के तथ्यों की रक्षा की है और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना का प्रसार किया है। उनमें इतिहास और कल्पना का समन्वय दिखायी पड़ता है। इन उपन्यासों में लेखक का अभीष्ट विभिन्न सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में जीवन का आदर्शात्मक यथार्थ निरूपण भी है।

‘झांसी की रानी’ तथ्याश्रयी और विवरणात्मक उपन्यास है जबकि ‘मृगनयनी’ मे तत्कालीन परिवेश को उसकी समग्रता के साथ आकलन किया गया है। उपन्यासकार ने ग्वालियर के महाराज मानसिंह और गांव की मृगनयनी के प्रेम के ताने बाने में उस समय के समय के सांस्कृतिक वातावरण को उसके विभिन्न आयामों में चित्रित करके उस कालखंड को जीवंत बना दिया है। तत्कालीन धर्म, राजनीति, चित्रकला, संगीतकला और वास्तुकला को उनके ब्यौरे ने सजीवता प्रदान किया है।

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हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ एक अभिनव प्रयोग है। ऐतिहासिक जीवनवृत्त से जुड़ी कुछ घटनाओं के उपयोग के बावज़ूद यह न तो आत्मकथा है, न जीवनी। प्रयोगशीलता इसकी प्रमुख विशेषता है। भरत के सांस्कृतिक यथार्थ को चित्रित करने वाला यह अनूठा ऐतिहासिक उपन्यास है। इसके अलावा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘चारुचन्द्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’ सातवें और आठवें दशक में प्रकाशित हुए।

द्विवेदी जी के उपन्यास इतिहास के तथ्यों पर आधारित नहीं है, उनमें कल्पना के आधार पर ऐतिहासिक वातावरण की सृष्टि की गई है। वे किसी कालखंड को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ उसे आज की ज्वलंत समस्याओं के साथ भी जोड़ते चलते हैं।

‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में मध्यकालीन जड़ता पर प्रहार किया गया है। अलंकृत शैली में लिखे जाने के बावज़ूद भी यह गद्यात्मक है, काव्यत्मकता ही इसकी भाषा और वस्तु दोनों है।

‘चारुचन्द्रलेख’ अनाकर्षक है और इसका विन्यास बिखरा-बिखरा लगता है। इसमें द्विवेदी जी ने कुतूहल, विस्मय, रोमांस और रहस्य की सृष्टि की है।

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यशपाल जी का ‘दिव्या’ एक काल्पनिक ऐतिहासिक उपन्यास है। उन्होंने ने इसे मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखा है। इस उपन्यास की नायिका दिव्या अनेक प्रकार के संघर्ष झेलती है। यह एक रोमांस विरोधी उपन्यास है। यशपाल जी की दिव्या भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा से इस मामले में अलग है कि जहां चित्रलेखा को परिस्थितियों के कारण जीवन में कोई राह नहीं सूझती, वही दिव्या में राह की खोज है। ‘अमिता’ यशपाल जी का दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। किन्तु इसमें वह ऊंचाई नहीं है जो ‘दिव्या’ में है।

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राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) ने शैतान की आंख, 1923, विस्मृति के गर्भ में, 1923, सोने की ढ़ाल, 1923, बाइसवीं सदी, सिंह सेनापति, जीने के लिए, जय यौधेय, भागो नहीं, दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, राजस्थान निवास, विस्मृत यात्री, दिवोदस, आदि उपन्यास लिखे जिनमें ‘सिंह सेनापति’ और ‘जय यौधेय’ मार्क्सवादी दृष्टि से लिखे गए ऐतिहासिक उपन्यास हैं, जिनमें लिच्छवी गण और यौधेय गण के संघर्ष चित्रित हैं।

महापंडित की उपाधि से विख्यात, अविश्रांत यात्री, तत्वान्वेषी, इतिहासविद्‌ और युगपरिवर्तनकामी साहित्यकार के रूप में राहुल सांस्कृत्यायन जी को जाना जाता है। हिंदी की सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले राहुल जी ने ‘चरैवेति, चरैवेति’ का सत्य अपने जीवन में साकार किया।

जीवन पर्यंत ज्ञान पिपासु रहे राहुल सांस्कृत्यायन खुले दिमाग के मार्क्सवादी थे। उन्होंने समाजवाद को पुस्तकों से ही नहीं जीवन से भी सीखा। राहुल जी मार्क्सवादी चेतना से अनुप्राणित होकर द्वान्द्वात्मक भौतिकवाद के आधार पर इतिहास का विश्लेषण करने वाले उपन्यासकार हैं।

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रांगेय राघव ने भी ‘मुर्दों का टिला’ मार्क्सवादी दृष्टि से लिखा है और इसमें मोहनजोदाड़ो के गणतंत्र का चित्रण किया गया है।

चतुरसेन शास्त्री

चतुरसेन शास्त्री ने अपने उपन्यासों ‘वैशाली की नगरवधु’, ‘सोमनाथ’ और ‘वयं रक्षामः’ में भारतीय संस्कृति का संश्लिष्ट चित्र प्रस्तुत किया है। ‘वैशाली की नगरवधू’  में लिच्छवी गणतंत्र की चर्चा मिलती है। इस उपन्यास में आधुनिक नगर जीवन के सहारे तत्कालीन इतिहास की प्रमाणिकता को संदिग्ध बना दिया गया है।

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यह काल हिन्दी उपन्यास का स्थापना काल था। एक ओर इस काल में जहां प्रेमचंद द्वारा हिन्दी उपन्यास को साहित्य का दर्ज़ा दिलाया गया, वहीं दूसरी ओर जैनेन्द्र ने उसे आधुनिक बनाया। प्रसाद, कौशिक, उग्र, भगवतीचरण वर्मा, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, निराला आदि ने अपने-अपने ढ़ंग से उसे समृद्धि प्रदान कर बाद के दिनों में आने वाले उपन्यासकारों का मार्गदर्शन किया।

शनिवार, 6 नवंबर 2010

साहित्यकार - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - परम्परा एवं आधुनिकता के बीच समन्वय

मनोज कुमार

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जिनके बचपन का नाम बैजनाथ द्विवेदी था का जन्म श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 (19 अगस्त, 1907) को ओझवलिया, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पं. अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। माता श्रीमती ज्योतिष्मती थीं। 1927 ई. में श्रीमती भगवती देवी के साथ विवाह हुआ। इनके सात पुत्र-पुत्रियां थे। इन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से ज्योतिष और संस्कृत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1929 ई में संस्कृत साहित्य में शास्त्री और 1930 में ज्योतिष विषय लेकर शास्त्राचार्य की उपाधि पाई।

8 नवम्बर, 1930 को हिंदी शिक्षक के रूप में शांतिनिकेतन में कार्यारम्भ किया। वहीं 1930 से 1950 तक हिन्दी-भवन में अध्यक्ष का कार्य करते रहे। अभिनवभारती ग्रन्थमाला का संपादन, कलकत्ता में 1940-46 के बीच किया। विश्वभारती पत्रिका का संपादन 1941-47 तक किया। इन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्मानार्थ डॉक्टर ऑफ लिट्‌रेचर की उपाधि 1949 में दिया गया। सन् 1950 में काशी हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर और हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्ति हुई। विश्वभारती, विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव काउन्सिल के सदस्य 1950-53 काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष 1952-53 साहित्य अकादेमी दिल्ली की साधारण सभा, काशी के हस्तलेखों की खोज (1952) तथा साहित्य अकादेमी से प्रकाशित नेशलन बिब्ल्योग्रेफी 1954 के निरीक्षक। राजभाषा आयोग के राष्ट्रपति मनोनीत सदस्य 1955 ई। सन् 1957 में राष्ट्रपति द्वारा पद्मभूषण उपाधि से सम्मानित।

1960-67 के दौरान, पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ में हिंदी प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष। सन् 1962 में पश्चिम बंग साहित्य अकादेमी द्वारा टैगोर पुरस्कार। 1967 के बाद पुनः काशी हिंदु विश्वविद्यालय में, जहाँ कुछ समय तक रैक्टर के पद भी रहे। 1973 में केंद्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत। जीवन के अतिंम दिनों में ‘उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान’ के उपाध्यक्ष रहे। 19 मई 1979 को देहावसान ।

द्विवेदी जी, सरल, उदार एवं विनोद प्रिय व्यक्तित्व वाले थे। उनका अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बंगला, आदि भाषाओं का गहरा अध्यन था उन्हें। इसके अलावा भाषा, इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्मशास्त्र आदि विषयों का गहरा ज्ञान था।

द्विदी जी का पांडित्य इनके निबंधों में अत्यंत सहज-सरल बनकर प्रकट हुआ है। निबंधकला की दृष्टि से हिन्दी-निबंधकारों में इनका स्थान बहुत ऊंचा है। द्विवेदी जी की भाषा में भाषण-शैली का प्रवाह और ओज है। संस्कृत, अंग्रेज़ी, ऊर्दू आदि शब्दों का इन्होंने निस्संकोच प्रयोग किया है। द्विवेदी जी का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। विषयानुकूल भाषा उनकी विशेषता थी। अपनी संस्कृतनिष्ठ भाषा के होते हुए भी वे आवश्यकतानुसार देशी विदेशी शब्दों के प्रयोग से नहीं चूके। उन्होंने शब्दों के मर्म को पहचान कर मनचाहा अर्थ सम्प्रेषित कराया। इस प्रकार द्विवेदी जी हिन्दी साहित्य के ऐसे अध्येता हैं जिनमें सर्जन शक्ति की नूतनता, चिन्तन की गम्भीरता, पुरातन और नूतनता का समन्वय है।

आधुनिक युग के मौलिक निबंधकार, उत्कृष्ट समालोचक एवं सांस्कृतिक विचारधारा के प्रमुख उपन्यासकार आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में दार्शनिक तत्वों की प्रधानता रहती है। द्विवेदी जी की भाषा शुध्द साहित्यिक खड़ी बोली है। उन्होंने भाव और विषय के अनुसार ही भाषा का प्रयोग किया है। ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘भारतीय धर्मसाधना’, ‘सूरदास’, ‘कबीर’ आदि ग्रंथ उनके साहित्य की परख और इतिहास बोध की प्रखरता को एखांकित करते हैं। ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पलता’ ‘कुटज’ आदि निबंध संग्रह उनको एक सर्वोत्तम ललित निबंधकार और भारतीय संस्कृति के उद्गाता के रूप में रेखांकित करते हैं।

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी सांस्कृतिक इतिहास की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति करने वाले कालजयी उपन्यासकार थे। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के साथ ही ‘पुनर्नवा’, ‘चारूचन्द्रलेखा’ और ‘अनामदास का पोथा’ जैसे ऐतिहासिक उपन्यास द्विवेदी जी की कलात्मक क्षमता के साथ ही उनके प्रखर इतिहास बोध को भी रेखांकित करते हैं। इन उपन्यासों द्वारा उन्होंने बोध के स्तर पर ऐतिहासिकता और पौराणिकता की रक्षा करते हुए अपने युग और समाज के सच को भी उजागर किया है।

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी इतिहास, मनुष्य और लोक को केंद्र में रखकर भारत की भाषा समस्या पर मौलिक चिंतन करने वाले लोकवादी भाषा चिंतक और भाषा नियोजक भी थे। उनका कहना था भाषा का मूलभूत प्रयोजन है संप्रेषण। भाषा साधारणतः शब्दों के सामान्य अर्थ का ही कारबार करती है। प्रत्येक शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त करता है, वह सामान्य अर्थ होता है। परंतु संवेदनशील रचनात्मक साहित्यकार, सामान्य अर्थों से संतुष्ट नहीं होता। वह सामान्य अर्थों को व्यक्त करने वाली भाषा के माध्यम से ही अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लोकचित्त में संप्रेषित करने के लिए व्याकुल रहता है।

उन्होंने परंपरा और इतिहास-बोध की सहायता से समसामयिक भाषा-समस्या को भी सुलझाने के सूत्र अपने निबंधों में दिए हैं। “हिंदी तथा अन्य भाषाएँ” शीर्षक निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विस्तार से उन सभी विषयों पर प्रकाश डाला है; जिन पर विचार करना भाषा-नियोजन की आधारभूत आवश्यकता है। जैसे

१. हिंदी का संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं से संबंध,

२. हिंदी का हिंदीतर प्रदेशों की आधुनिक भाषाओं के साथ संबंध,

३. हिंदी का उसकी जनपदीय बोलियों के साथ संबंध,

४. हिंदी का उर्दू के साथ संबंध और

५. हिंदी और अंग्रेजी का संबंध।

“भाषा, साहित्य और देश” तथा “मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है” में व्याख्यायित हिंदी भाषा के संदर्भ में भी उनके दो मुख्य वक्तव्य सदा ध्यान में रखने योग्य हैं :-

१. ’हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।’

२. ’हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।’

इसी प्रकार “नई समस्याएँ” शीर्षक निबंध में भी संस्कृत और हिंदी भाषा के परस्पर संबंधों के सांस्कृतिक एवं जातीय आधार को विशेषतः रेखांकित किया गया है। तटस्थ भाषावैज्ञानिक की तरह चिंतन करते हुए कहा है कि कई कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। इस मिथ का निराकरण करते हुए वे याद दिलाते हैं कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही रही है। द्विवेदी जी के इस मत से सहमत न होने का कोई कारण नहीं है कि यह भाषा संस्कृत थी। वे याद दिलाते हैं कि भारतवर्ष का जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ उत्तम है, जो कुछ रक्षणीय है, वह इस भाषा के भंडार में संचित किया गया है।

द्विवेदी जी के अनुसार हिंदी की असली शक्ति लोक की शक्ति है। उनका मत है कि“हिंदी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।”

द्विवेदी जी ने परम्परा एवं आधुनिकता के बीच समन्वय कर एक नई दिशा प्रदान की। उनके अनुसार मरे हुए बच्चे को गोद में दबाये रखने वाली बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती। साथ ही यह भी मानना था कि यह भी नहीं होना चाहिए कि हम नयी अनुसंधिता के नशे में चूर होकर अपना सरबस खो दें। द्विवेदी जी के निबंध ललित शैली में लिखे गये हैं जिनमें संस्कृति की पुष्टि, सरसता, गहनता, अनुभूति की संवेदना आदि के दर्शन होते हैं। उन्होंने जीवन के गतिशील तत्वों को पहचान कर भारतीय सांस्कृतिक यात्रा की। उन्होंने बाणभट्ट की आत्म कथा लिख कर संस्कृत वाङ्मय से हिन्दी कथा साहित्य को पुष्ट किया। उन्होंने शब्दों के मर्म को पहचान कर मनचाहा अर्थ सम्प्रेषित कराया। इस प्रकार द्विवेदी जी हिन्दी साहित्य के ऐसे अध्येता हैं जिनमें सर्जन शक्ति की नूतनता, चिन्तन की गम्भीरता, पुरातन और नूतनता का समन्वय है।

 

जन्म

19 अगस्त, 1907

मृत्यु

19 मई 1979

स्थान

ग्राम-ओझौलिया, ज़िला-बलिया, उत्तर प्रदेश

शिक्षा

हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से ज्योतिष और संस्कृत से उच्च शिक्षा।

वृत्ति

1930 से 1950 तक शांतिनिकेतन के हिंदी-भवन में अध्यक्ष, 1950 से 1960 तक हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष। इसके बाद पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ में अद्यक्ष एवं प्रोफ़ेसर (1960-67)

सम्मान

1. 1949 में लखनऊ वि. वि. से डी. लिट की उपाधि से सम्मानित।

2. राष्ट्रपति द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित (1957 में)

3. पश्चिम बंग साहित्य अकादमी से टैगोर पुरस्कार द्वारा सम्मानित (1966)

4. साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत (1973)।

5. सदस्यता-

अ..विश्व भारती वि. वि. की एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य (1950-53)

आ. काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष (1952-53)

इ. साहित्य अकादमी दिल्ली की साधारण सभा और प्रबंध समिति के अध्यक्ष।

ई. नागरी प्रचारिणी सभा (काशी) के हस्तलिखित लेखों की खोज (1952) तथा साहित्य अकादमी से प्रकाशित नेशनल जिबिलियोग्राफी (1954) के निरीक्षक

उ. जीवन के अंतिम दिनों तक उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष,

कृतियां

उपन्यास

बाणभट्ट की आत्मकथा ,पुनर्वा अनामदास का पोथा,चारु-चंद्रलेख

आलोचना

सूर साहित्य, कबीर, कालिदास की लालित्य योजना, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, साहित्य का मर्म, प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद, मेघदूत, एक पुरानी कहानी, मध्यकालीन धर्म साधना , सहज साधना

निबंध संकलन

साहित्य सहचर, कल्प लता, विचार और वितर्क, अशोक के फूल, विचार-प्रवाह, आलोक पर्व, कुटज

साहित्येतिहास

हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, नाथ सम्प्रदाय। साहित्यसहचर, हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास

सम्पादित

पृथ्वीराज रासो., संदेश रासकनाथ सिध्दों की बानियां।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

काव्य प्रयोजन :: आधुनिक काल

काव्य प्रयोजन :: आधुनिक काल

द्विवेदी युग

इस युग में रीतिवाद विरोधी अभियान चला। मकसद था हिन्दी कविता को दरबारी काव्य की रूढियों से मुक्त करना! आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इस आंदोलन को गति प्रदान की। उनका मानना था कि साहित्य की महत्ता लोकजागरण की चेतना से सम्बद्ध है। साहित्य में जो शक्ति है वह तो, तलवार और बम में भी नहीं है। उनके अनुसार लोकजागरण के लिए साहित्य से बढकर कोई दूसरा  समर्थ माध्यम नहीं है।

मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस आंदोलन को आगे बढाया। उन्होंने कविता के प्रयोजन को बताते हुए कहा
(१)
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
(२)
है जिस कविता का काम लोकहित करना
सद्भावों से मन मनुज मात्र का भरना
पहले तो कांता सदृश हृदय का हरना
फिर प्रकटित करना विमल ज्ञान का झरना

(३)
अर्पित हो मेरा मनुज काय
बहुजन हिताय बहुजन हिताय
(४)
संदेश नहीं मैं स्वर्गलोक का लाया
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया
इस तरह से इनके साहित्य का उद्देश्य लोकमंगल भावना को हम पाते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रस की लोकमंगलवादी व्याख्या की। उन्होंने कलावाद-रूपवाद का विरोध किया, साथ ही विरुद्धों के सामंजस्य सिद्धांत का समर्थन किया। उन्होंने तुलसीदास और उनके ‘रामचरितमानस’ को लोकमंगल की साधनावस्था का प्रतिमान माना तथा विद्यापति और बिहारीलाल को सिद्धावस्था का कवि कहा।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साहित्य का प्रयोजन “लोकचिंता” को मानते थे। उनके प्रिय कवि हैं कबीर। इनका मानना था कि लोकचिंताओं से जुड़कर ही रचनाकार को लोक को दिशा-दृष्टि देनी चाहिए।

छायावाद के कवियों ने सृजन को मानव-मुक्ति चेतना की ओर ले जाने का काम किया। सुमित्रानंदन पंत ने रीतिवाद का विरोध करते हुए ‘पल्लव’ की भूमिका में कहा कि मुक्त जीवन-सौंदर्य की अभिव्यक्ति ही काव्य का प्रयोजन है।

जयशंकर प्रसाद का कहना था आनंद और लोकमंगल दोनों का सामंजस्य ही सृजन-धर्म है - “श्रेयमयी प्रेम ज्ञानधारा”।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने नवजागरण परंपरा का विस्तार किया और रूढिवाद का विरोध।

महादेवी वर्मा के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है मानव करुणा का विस्तार।

प्रगतिवाद ने रूढिवादिता का विरोध किया और मार्क्सवादी समाज-चिंतन को अपनाया।
प्रेमचंद के अनुसार रचनाकार समाज में आगे चलने वाली मशाल होता है। अतः साहित्य का उद्देश्य जनता की चेतना को जाग्रत करना तथा परिष्कृत करना होता है।
प्रगतिवाद एक निश्चित तत्ववाद को सूचित करता है। ऐसे साहित्य में विषय-वस्तु या अंतर्वस्तु को अधिक महत्व दिया जाता है। रूप को, कला-विन्यास को कम। इनके मतावलंबियों के अनुसार साहित्य का उद्देश्य है प्रतिक्रियावादी शक्तियों के लोक-विरोधी, जन-विरोधी चरित्र का भंडाफोर और मनुष्य का, मनुष्यता का विकास-परिष्कार-प्रसार। अर्था‍त्‌ उपयोगितावाद-यर्थार्थवाद की महत्वप्रतिष्ठा।
डॉ. रामविलास शर्मा ने लोकमंगलवादी चिंतन-दृष्टि का विकास ही साहित्य का प्रयोजन माना।

गजानन माधव मुक्तिबोध ने साहित्य को जनता के लिए जनजागरण का अस्त्र माना और उन्होंने अपनी रचनाओं, “चांद का मुंह टेढा है” और “भूरी-भूरी खाक धूल” द्वारा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी चिंतन का विरोध किया।

नयीकविता युग तथा समकालीन युग के विद्वानों, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा आदि, कवियों के मतानुसार साहित्य का प्रयोजन मानव-व्यक्तित्व का समग्र विकास, मानव-स्वाधीनता की रक्षा, मुक्त-चिंतन का विकास है।

उपसंहार
इस प्रकार हम पाते हैं कि हिन्दी चिंतन परंपरा में लोकमंगलवादी मानव सत्यों से साक्षात्कारवादी दृष्टि ही साहित्य का प्रयोजन रही है। रचनाकार का मानवतावाद रचना की अर्थ-व्यंजना में निहित रहता है।
हिन्दुस्तान में संस्कृति का आधारभूत तत्व है - “सुरसरि सम सबका हित होई।” अर्थात्‌ गंगा की तरह सभी को अपने में मिलाना और गंगा बना देना। लोक-कल्याण और आनंद दो अलग नाम हैं परन्तु तत्त्वतः दोनों एक हैं, दोनों का मूल प्रयोजन है – लोक के साथ जीना, लोक-चिंता के साथ जीना।
अपने हृदय को लोक के हृदय में मिला देना ही “रस दशा” है। इसका अर्थ है हृदय की मुक्तावस्था, भावयोग दशा, साधारणीकरण या समष्टिभावना का आनंद। हिन्दी काव्यशास्त्र का प्रयोजन इसी हिन्दुस्तानी लय से ओत-प्रोत है।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि काव्य का प्रयोजन है लोकमंगल भावना अर्थात्‌ मनुष्यता का विकास। जिसमें मानव के प्रति गहरे सामाजिक सरोकार हों। रचनाकार मानवता के प्रति करुणा और सहानुभूति की चेतना का विस्तार कर अपने-पराए की भेद-बुद्धि को मिटाता है और मानवतावाद की दृष्टि का प्रचार करता है। लोकजागरण और लोक-कल्याण ही जीवन का सत्य  है, शिव है, सुन्दर है। और यही है साहित्य का प्रयोजन!