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गुरुवार, 26 मई 2011

श्रीकांत वर्मा की पुण्य-तिथि पर …

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जीवन परिचय

जन्म : कवि, कथाकार, समालोचक एवं संसद सदस्य श्रीकांत वर्मा का जन्म छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 18 सितम्बर 1931 को हुआ था।

शिक्षा : प्रारम्भिक शिक्षा के लिए उनका दाखिला बिलासपुर के एक अंग्रेज़ी स्कूल में कराया गया लेकिन वहां का वातावरण उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने उस स्कूल को छोड़ दिया और नगर पालिका के स्कूल से शिक्षा ग्रहण की। मैट्रिक पास कर लेने के बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्हें इलाहाबाद भेजा गया। वहां उन्होंने क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिला लिया। पर वहां उन्हें घर की याद सताने लगी और बिलासपुर वापस लौट आए। यहीं पर बी.ए. तक की पढ़ाई पूरी की। प्राइवेट से नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. किया।

कार्यक्षेत्र : पिता राजकिशोर वर्मा वकील थे। हलाकि यह एक सम्पन्न परिवार था, फिर भी श्रीकांत वर्मा को काफ़ी कठिन दिन देखने पड़े। 1952 तक बेकारी झेलते रहे। घर की आर्थिक स्थिति ख़राब थी। स्कूल शिक्षक की नौकरी शुरु की। परिवार में सबसे बड़े थे इसलिए परिवार की जिम्मेदारी भी उन पर आ पड़ी। 1954 में उनकी भेंट मुक्तिबोध से हुई। उनकी प्रेरणा से बिलासपुर में नवलेखन की पत्रिका ‘नयी दिशा’ का संपादन करना शुरु किया। 1956 से नरेश मेहता के साथ प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘कृति’ पत्रिका का दिल्ली से संपादन एवं प्रकाशन करते थे। 1956 से लेकर 1963 तक का समय उनके लिए संघर्ष का काल था। 1964 में रायपुर की सांसद मिनी माता ने उन्हें दिल्ली के अपने सरकारी आवास में रहने के लिए बुला लिया, जहां वे अगले ग्यारह साल तक रहे। दिल्ली में वे पत्रकारिता से जुड़े। 1965 से 1977 तक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के प्रकाशन समूह से निकलने वाली पत्रिका ‘दिनमान’ में उन्होंने विशेष संवददाता की हैसियत से काम किया। बाद में वे कॉंग्रेस की राजनीति में सक्रिय हो गए और उन्हें ‘दिनमान’ से अलग होना पड़ा। 1969 में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के काफ़ी क़रीब आये। वे कॉंग्रेस के महासचिव थे। 1976 में वह मध्यप्रदेश से राज्य सभा में निर्वाचित हुए। 1980 में कॉंग्रेस प्रचार समीति के अध्यक्ष थे। 1985 में राजीव गांधी के काल में उन्हें महासचिव के पद से हटा दिया गया।

मृत्यु : जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें बीमारियों ने भी घेर रखा था। अमेरिका में वे कैंसर के इलाज कराने के लिए गए। 26 मई 1986 को न्यूयार्क में उनका निधन हो गया।

पुरस्कार : उन्हे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिसमें ‘मगध’ काव्य संग्रह पर साहित्य अकादमी तथा मध्य प्रदेश का शिखर समान भी शामिल है।

:: प्रमुख रचनाएं ::

:: काव्य रचनाएँ :: भटका मेघ (1957), मायादर्पण (1967), दिनारंभ (1967), जलसाघर (1973), मगध (1983), और गरुड़ किसने देखा (1986)।

:: उपन्यास :: दूसरी बार (1968)।

:: कहानी-संग्रह :: झाड़ी (1964), संवाद (1969), घर (1981), दूसरे के पैर (1984), अरथी (1988), ठंड (1989), वास (1993), और साथ (1994)।

:: यात्रा वृत्तांत :: अपोलो का रथ (1973)।

:: संकलन :: प्रसंग

:: आलोचना :: जिरह (1975)।

:: साक्षात्कार :: बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में (1982)।

:: अनुवाद :: ‘फैसले का दिन’ रूसी कवि आंद्रे बेंज्नेसेंस्की की कविता का अनुवाद है।

:: साहित्यिक योगदान ::

मुक्तिबोध के बाद की पीढ़ी की कविता का मिजाज़ श्रीकांत वर्मा की काव्यकृतियों से पहचाना जा सकता है। बेचैनी, तनाव, नाराज़गी, विरोध आदि उनकी कविता का प्रमुख गुण है। आरंभ में तो उन्होंने रोमांटिक आवेग वाली कविताएं लिखीं लेकिन बाद में राजनीतिक, सामाजिक विसंगतियों का अपनी कविताओं में जम कर खुलासा किया है। सातवें दशक के राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ ने कविता की दिशा को पलट दिया। नयी कविता के अभिजात्य का मिथ दूर हो गया था। इसलिए समय और समाज के यथार्थ को व्यक्त करने के लिए श्रीकांत जी को नयी काव्यभूमि की खोज करनी पड़ी।

विलासपुर एक कस्बा है और यही कस्बाई देशजता उनके जीवन और लेखन में मौज़ूद रही। इसको तोड़ने की भी उन्होंने कोशिश की पर कस्बाई संवेदन उनके व्यक्तित्व में अपनी जड़ें गहरी जमा चुकी थी। उनके चाचा नंदकिशोर वर्मा विलासपुर की एक जमींदारी केंदा के दीवान थे। केंदा के घने जंगलों के परिवेश ने उनके बाल मन पर अमिट छाप छोड़ी। इस प्रभाव से उनके लेखन में पहाड़, नदी, जंगल, तालाब की स्मृतियां हमेशा आती रही।

वे काफ़ी संवेदनशील भी थे। एक खास तरह का अकेलापन उनके जीवन का एक हिस्सा था। इस अकेलेपन से रिसता हुआ अवसाद उनके व्यक्तित्व में भरा हुआ था। अंतिम दौर की अपनी कविताओं के द्वारा वे काव्य के उन प्रतिमानों को भी तोड़ते रहे जिन्हें वे स्वयं अपनी कविताओं से बनाते थे। ‘मगध’ और ‘गरुड़ किसने देखा’ एक ऐसे कवि की की करुणा की पुकार है जो युग संधि पर खड़ा अपने समय के मनुष्य, समाज, राजनीति, इतिहास और काल के प्रति बेहद निर्मम होकर उसके संकट को परिभाषित करना चाहता है।

पत्रकारिता और राजनीति के कारण उन्होंने देश-विदेश की यात्रा की और कई महान लेखकों-बुद्धिजीवियों के सम्पर्क में आए। उनकी वैचारिक मुठभेड़ प्रगतिवादियों, प्रगतिवाद विरोधियों और अधुनिकतावादियों से होती रहती थी। शुरु में मुक्तिबोध के प्रभाव से उनका मार्क्सवाद को ओर झुकाव था लेकिन हंगरी की घटनाओं के कारण मार्क्सवाद से उनका मोहभंग हुआ। वे प्रगतिविरोधी नहीं थे। उनपर डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवादी चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ा। उनका मानना था कि साहित्य एक सीमा तक ही समाज को प्रभावित कर पाता है। उसे बदलने का माध्यम राजनीति ही हो सकती है। वे नेहरू जी के आधुनिक समाज बनाने के विचारों से सहमत थे। वे विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास का समर्थन करते थे।

मूलतः कवि होते हुए भी श्रीकांत वर्मा ने कविता के साथ-साथ कहानियां भी लिखीं। उनकी कहानियां उनकी कविता की पूरक हैं। वर्मा जी खुद स्वीकार करते हुए कहते हैं,

“कविता लिखते हुए मेरे हाथ सचमुच कांप रहे थे। तब मैंने कहानियां भी लिखनी आरंभ की – यह सोचकर कि रचना से रचना की कम्पन कुछ कम होगी। और यह सच है कि मैंने कथा-साहित्य के बतौर जो कुछ लिखा उससे मेरी आत्महीनता कुछ कम हुई; क्योंकि जैसे-जैसे मैं लिखता गया, संसार में पैठता गया। संसार में पैठना ही मुक्ति है। प्रवेश गिरफ़्तारी नहीं, आज़ादी है। ग़ुलामी है गमन, बहिर्गमन। कविताओं ने मुझे जो दुनिया दी थी, मेरी कहानी उसी का विस्तार है, उसी का एक और रूप जिसे मैं कविताओं के माध्यम से पहचान नहीं पा रहा था।”

कहानियों के पात्र उसी यथार्थ से जूझते हैं जिस यथार्थ को श्रीकांत वर्मा कविता में व्यक्त कर रहे थे। नयी कहानी आन्दोलन से अलग हटकर उन्होंने सामाजिक यथार्थ के भीतर जूझ रहे अभिशप्त चेहरों को उजागर किया है। वे नयी कहानी के ढ़ांचे को तोडकर कहानी विधा को बदलते नये यथार्थ से जोड़ने का प्रयत्न करते हैं। उनकी कहानियां नयी कहानी के दौर में प्रेम भरे खेल के मैदान से बाहर जाकर ठंड, झाड़ी, अरथी, शवयात्रा और घर जैसे सामाजिक यथार्थ की अविस्मरणीय दुनिया रचती हैं।

अपने एक मात्र उपन्यास ‘दूसरी बार’ के द्वारा वे साबित करना चाहते हैं कि आज प्रेम मानवीय दुनिया से बहिष्कृत हो गया है।

श्रीकांत वर्मा ने गद्य की विभिन्न विधाओं आलोचना, डायरी, यात्रा वृत्तांत और साक्षात्कार आदि में अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया है। उन्होंने विदेशी साहित्य का भी अनुवाद किया।

श्रीकांत वर्मा की ख्याति एक ऐसे लेखक के रूप में है जिसने अपने युग के उत्थान-पतन, नैराश्य, द्वन्द्व, अवसाद तथा अन्धकार को एक जबर्दस्त आवेग के साथ पेश किया है। उनका लेखन एक अनवरत चलने वाली बहस और जिरह है, कभी दूसरों से, कभी खुद से।

शनिवार, 7 मई 2011

कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्म दिन पर …

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बंग्ला साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर व महान विभूति विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर, एक व्यक्ति का नहीं एक युग का नाम है।

टैगोर बीसवीं शताब्दी के शुरुआती चार दशकों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में ध्रुवतारे की तरह चमकते रहे। वे कवि भी थे, उपन्यासकार भी, चित्रकार भी थे, संगीतकार भी।

कोलकाता के जोड़ासांको के प्रिन्स द्वारकानाथ ठाकुर के तीन पुत्र थे – देवेन्द्रनाथ, गिरिन्द्रनाथ और नगेन्द्रनाथ। महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर और शारदादेवी के समृद्ध, शिक्षित और धर्म-परायण परिवार में 7 मई 1861, मंगलवार को प्रातः तीन बजे रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म हुआ। ‘मेरे बचपन के दिन’ नामक पुस्तक में उन्होंने अपने बाल्यकाल की घटनाओं का बड़ा मनोरंजक वृत्तांत लिखा है। वे अपने सात भाइयों में सबसे छोटे थे। उनकी आरंभिक शिक्षा ‘बंगाल एकेडमी’ में हुई पर वहां का वातावरण रास नहीं आने के कारण स्कूल जाने से मना कर दिया। आगे की पढ़ाई घर पर ही हुई। 13 वर्ष की अवस्था में 8 मार्च, 1874 को उनके सिर से मां का साया हट गया। अंग्रेज़ी की पढ़ाई के लिए 1878 में इंगलैंड भेजे गए। वहां से लौटे तो 9 दिसम्बर 1883 को कुमारी मृणालिनी के साथ उनका विवाह हुआ। दुर्भाग्य कि 1902 से 1907 के बीच पत्नी (नवम्बर, 1902), पुत्री (1903), पुत्र एवं पिता (1905) एक-एक कर संसार से विदा हो गए। इस विकट दुख ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी और वे पूरे संसार को ही अपना परिवार समझने लगे।

पराधीन भारत को स्वतंत्र कराने में जुट गए और गांधी जी के सत्य-अहिंसा आन्दोलन को सहयोग प्रदान किया।

साहित्य की विभिन्न विधाओं, संगीत और चित्रकला में सतत सृजनरत रहते हुए उन्होंने अंतिम सांस तक सरस्वती की साधना की और भारतवासियों के लिए ‘गुरुदेव’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

मृत्यु : 7 अगस्त 1941 को दिन के बारह बजकर सात मिनट पर वे बैकुण्ठवासी हो गए।

वे संस्कृत, बंगाली और अंग्रेज़ी सहित कई भाषाओं के विद्वान्‌ थे। 1876 में ‘ज्ञानाकुंर’ में इनका पहला लेख, जो भुवनमुहनी नामक एक पुस्तक की आलोचना थी, छपा। इसके बाद ‘वनफूल’ नामक एक कविता भी इसमें छपी। इसके बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1877 से ‘भारती’ में लिखना शुरु किया।

उन्होंने जनजागरण और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया और शांतिनिकेतन जैसी शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की। बोलपुर से दो मील की दूरी पर महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने ‘शान्ति निकेतन आश्रम’ की स्थापना की थी। 1901 में कविगुरु ने अपने शैक्षणिक सिद्धान्तों के प्रयोग स्वरूप वहीं पर ‘शान्तिनिकेतन’ विद्यालय की स्थापना की। 22 दिसम्बर 1918 को अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय विश्वभारती की स्थापना की। इसमें पूरी दुनिया के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने और विभिन्न विषयों पर शोध करने आते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को प्रकृति-प्रेम, मानवतावाद और विश्वसमन्वय की शिक्षा प्रदान करना है।

1911 में भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मण’ लिखा और उसी साल उन्होंने ब्रह्मसमाज की पत्रिका ‘तत्वबोध प्रकाशिका’ में इसे ‘भारत विधाता’ शीर्षक से प्रकाशित किया था। इस पत्रिका का सम्पादन गुरुदेव ही करते थे।

1911में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 27 दिसंबर को इसे गाया गया।

शुरु में इस पर आरोप लगाया जाता रहा कि यह जार्ज पंचम की अभ्यर्थना में लिखा गया है। कहा तो यहां तक गया कि गीत में जार्ज पंचम को ही भारत भाग्य विधाता कहा गया है।

यह संयोग ही था कि जिस अधिवेशन में यह गाया गया उसी अधिवेशन में जार्ज पंचम का अभिनंदन करने का निर्णय लिया गया था। अभिनंदन करने का कारण था कि उन्होंने बंगभंग के फैसले को रद्द करने का ऐलान किया था।

गुरुदेव ने इन विवादों का ज़ोरदार विरोध किया और कहा कि ‘भारत भाग्य विधाता’ और ‘जय हे’ का भारत के जनगण के लिए ही व्यवहार किया गया है। यह गीत देश के जनगण के लिए समर्पित है।

गुरुदेव ने स्वयं 1905 में बंगभंग के ख़िलाफ़ कलकत्ता में निकले ऐतिहासिक जुलूस का नेतृत्व किया था। उसी दौरान उन्होंने ‘बंगलार माटि बंगलार जल’ शीर्षक गीत लिखा था।

  • प्रमुख रचनाएं :
    • कहानियां : लगभग 42 कहानियों के सृजन का इन्हें श्रेय प्राप्त है। ‘घाटेर कथा’, ‘पोस्टमास्टर’, ‘एक रात्रि’, ‘खाता’, ‘त्याग’, ‘छुट्टी’, ‘काबुलीवाला’, ‘सुभा’, ‘दुराशा’, ‘नामंज़ूर गल्प’, ‘प्रगति-संहार’ (अंतिम कहानी) आदि उनकी महत्वपूर्ण कहानियां हैं।
    • कहानी संग्रह : छोटा गल्प, कल्पचारिती, गल्पदशक, गल्पगुच्छ (5 भागों में) और गल्पसप्तक।
    • गीत-संग्रह / काव्य-संग्रह : भानुसिंह ठाकुर की पदावली (छद्मनाम भानुसिंह से 16 वर्ष की अवस्था में लिखा) , वनफूल, कविकाहिनी, रुद्रचंड, भग्नहृदय, शैशवसंगीत, `संध्या संगीत’, ‘कालमृगया’, ‘प्रभातसंगीत’, ‘छवि ओ गान (1884), ‘कड़ि ओ कोमल’ (1886), ‘मानसी’ (1890), ‘सोनारतरी’, ‘चित्रा’(1896), ‘चैताली’(1896), ‘कथा’ (1900), ‘काहिनी’, ‘कणिका’, ‘शक्तेर क्षमा’, ‘आकांक्षा’, ‘क्षणिका’, ‘कल्पना’, ‘स्वप्न’, ‘नैवेद्य’ (1901), ‘स्मरण’ (1902), ‘शिशु’ (1902), ‘खेया’ (1905), ‘गीतांजलि (1910), ‘गीतिमाल्य’(1914), ‘गीतालि’ (1914), ‘वलाका’ (1916), ‘पलातक (1918), ‘लिपिका’ (1919), `पूरबी’ (1924),
    • गीति-नाटिका / नाटक : वाल्मीकि प्रतिभा, प्रकृतिर प्रतिशोध (प्रथम नाट्य प्रयास), ‘मायार खेला’, ‘राजा ओ रानी’, ‘विसर्जन’ (1890), ‘चित्रांगदा’ (1891), ‘विदाय अभिशाप’(1894), `गांधारीर-आवेदन’, ‘नरकवास’, ‘कर्ण-कुन्ती संवाद’ (1897), `सती’, ‘चिरकुमार सभा’, ‘मालिनी’, ‘शरदोत्सव’ (1908), ‘प्रायश्चित’ (1909), ‘राजा’ (1910), अचलयातन (1911), ‘डाकघर’ (1912), ‘गुरु’ (1917), ‘फाल्गुनी’ (1915), ‘मुक्तधारा’ (1922), ‘वसन्तोत्सव’ (1922), ‘वर्षामंगल’ (1922), ‘शेषवर्षण’ (1925), ‘शोध-बोध’ (1925), ‘नटीर पूजा’ (1925), ‘रक्त-करवी’ (1926) ‘नटराज’ (1927), ‘नवीन’ (1927), ‘सुन्दर’ (1927),
    • उपन्यास : ‘बहू ठाकुरानीर हाट (1881, पहला उपन्यास), ‘राजर्षि’ (1887), ‘चोखेर बाली’, ‘नौका डूबी’ (1905), ‘गोरा’(1910), ‘चतुरंग’ (1915), ‘घरे-बाहिरे’ (1915), योगायोग (1927), `शेषेर कविता’ (1927) ।
    • निबन्ध व विचार, संस्मरण : 1883 से 1887 के बीच विविध प्रसंग, आलोचना, समालोचना, चिट्ठी-पत्री, ‘योरोप यात्रीर डायरी’ (1891), ‘छिन्नपत्र’ (1912), ‘जीवनस्मृति’ (1911), ‘साधना’ (1914), ‘नेशनलिज़्म’ (1917), ‘परसनालिटी’ (1917), ‘क्रियेटिव यूनिटी’ (1922),

प्रकृति, प्रेम, ईश्वर के प्रति निष्ठा, आस्था और मानवतावादी मूल्यों के प्रति समर्पण भाव से सम्पन्न ‘गीतांजलि’ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की सर्वाधिक प्रशंसित और पठित पुस्तक है। इसकी रचना उन्होंने 1910 में की थी, जिसका प्रथम प्रकाशन नवम्बर 1912 में हुआ। विश्वविश्रुत कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की इस कालजयी कृति के गीत पिछली एक सदी से भी ज़्यादा से बंग्लाभाषी जनों की आत्मा में बसे हुए हैं। इसी पर उन्हें 13 नवम्बर, 1913 को विश्व का सर्वोच्च नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

‘रश्मिरथी’ के रचयिता ‘दिनकर’

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की पुण्य तिथि 24 अप्रैल के अवसर पर हमने कल एक आलेख प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है


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[19012010014[4].jpg]डॉ. रमेश मोहन झा

मो. नं. 09433204657

डॉ० रमेश मोहन झा जे.एन.यू नई दिल्ली से एम.ए, एम.फिल प्राप्त प्रसिद्द आलोचक प्रो० नामवर सिंह के निर्देशन में पीएच.डी कर संप्रति हिंदी शिक्षण योजना, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, कोलकाता से संबद्ध हैं !! वागर्थ, दस्तावेज, प्रतिविम्ब, कथादेश, कथाक्रम, साक्षात्कार प्रभृति हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में आलेख समीक्षा आदि का नियमित प्रकाशन!


आधुनिक हिन्दी काव्य के पुरोधा, मिट्टी की सुगंध के अमर गायक, प्राची के आलोकधन्वा और युगधर्म की हुंकार राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का ‘रश्मिरथी’ कथावस्तु, शील निरुपण और संवाद योजना की दृष्टि से एक लब्ध प्रतिष्ठित प्रबंध काव्य ही नहीं अपितु काव्य प्रयोजन की दृष्टि से भी स्वयं युगधर्म की हुंकार माना जा सकता है। छायावाद की कुहेलिका को चीरकर आधुनिक हिन्दी काव्य कमल को जीवन की वास्तविकता एवं मिट्टी की गंध से परिपूरित करने वाले मानवतावादी ‘दिनकर’ का हृदय ‘कुरुक्षेत्र’ में युद्ध के लिए युद्ध का तांडव करने के कारण घबड़ा गया। तब उन्होंने रश्मिरथी के कर्ण के बहाने दलितों, पीड़ितों के उद्धार का आदर्श प्रस्तुत करके अपने को पीड़ा मुक्त करने का प्रयास किया है। ‘रश्मिरथी’ का प्रयोजन या उद्देश्य तो सूर्य के प्रकाश या चांद की चादनी या फूलों की ख़ुश्बू या धन्वा की टंकार के समान इस काव्य के नायक महारथी महादानी कर्ण के शील संदेश और आदर्श में सन्निहित है। काव्य के चतुर्थ सर्ग में देवराज इन्द्र के संदर्भ में कर्ण ने जो अपने संदेश और आदर्श की व्याख्या की है, वही वस्तुतः इस काव्य का उद्देश्य या प्रयोजन की रीढ़ की हड्डी है।


फिर कहता हूं नहीं व्यर्थ राधेय यहां आया है,

एक नया संदेश विश्व के हित वह भी लाया है।

मैं उनका आदर्श कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे,

पूछेगा जग किन्तु पिता का नाम न बोल सकेंगे।

जिनका निखिल विश्व में, कोई कहीं न अपना होगा,

मन में उमंग लिए चिरकाल कल्पना होगा।

वस्तुतः यही वह मूल प्रयोजन है जो इस पौराणिक काव्य की आधुनिक युग जीवन को गौरव और अर्थकत्ता प्रदान करता है। साथ ही आर्थिक विषमता, रंगभेद, नीति, जाति, कुल सम्प्रदाय एवं साम्राज्यवाद से पीड़ित विश्व-मानव से रिश्ता जोड़ता है।

‘रश्मिरथी’ एक ऐसी रचना है जिसके पौरुष में पुनीत अनल में जातिवाद, संप्रदायवाद जलकर खाक हो जाते हैं। यह काव्य दैववाद के प्रत्याख्यान की जगह मानवतावाद की स्थापना का पुण्य प्रयास है, नियतिवाद का विरोध और कर्मवाद का जयघोष है। मानवीय उद्यम के द्वारा पृथ्वी पर स्वर्ग उतारने की सफल साधना है। इस स्वार्थपूर्ण सृष्टि से आत्मदान का शंखनाद एवं मानव की उच्चाभिलाषा एवं कर्म का दर्प-स्फीत जयगान है।

विप्र वेशधारी छली देवराज इन्द्र को कवच-कुंडल दान के पूर्व महादानी कर्ण ने अपनी करूण जीवन गाथा का वर्णन करते हुए विश्व को एक नया संदेश और आदर्श प्रदान किया है। जीवन जय के लिए कर्ण ने शूरधर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा है –


“कि शूर जो चाहे कर सकता है,

और नियति भाल पर पुरुष पांव निज धर सकता है।”

मानवशक्ति का निवास स्थान, वंश या कुल नहीं अपितु वीर पुरुषों का पृथुल वक्ष है। इस काव्य में उन्होंने संदेश दिया है कि चाहे धर्म धोखा दे या पुण्य ज्वाला बन जाए, लेकिन “मनुष्य तब भी न कभी सुपथ से टल सकता है।” विजय मानव का लक्ष्य है। लेकिन विजय तिलक लिए कुपथ पर चलना पाप है।

इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ मानवतावाद की स्थापना पर ज़ोर देते हुए भाग्यवाद की जगह कर्मवाद का शंखनाद है। देवराज इन्द्र को चुनौती देते हुए कर्ण ने कहा है,


विधि ने था क्या लिखा भाग्य में यह खूब जानता हूं मैं,

बाहों को कहीं भाग्य से बलि मानता हूं मैं,

महाराज, उद्यम से विधि का अंक उलट जाता है,

किस्मत का पासा पौरूष से हार पलट जाता है।

‘रश्मिरथी’ समता और मानवता के धरातल पर खड़ा महाकवि ‘दिनकर’ का युगधर्मी शंखनाद है जिसकी गूंज से विषमताओं और रूढ़ियों की बेड़ियां खुल जाती हैं और वसुंधरा पर कर्ण के सपनों के अनुसार एक नए समाज के सूर्योदय की संभावना बढ़ जाती है।

रविवार, 24 अप्रैल 2011

दिनकर जी की पुण्य तिथि पर …

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जन्म : रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के मुंगेर (अब बेगूसराय) ज़िले के सिमरिया गांव में बाबू रवि सिंह के घर 23 सितम्बर 1908 को हुआ था।

शिक्षा और कार्यक्षेत्र : ढाई वर्ष की उम्र में पिता जी का देहांत हो गया। गांव से लोअर प्राइमरी कर मोकामा से मैट्रिक किया। 1932 में पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज से इतिहास में बी.ए. (प्रतिष्ठा) की परीक्षा पास करने के बार वे कुछ दिनों के लिए बरबीघा उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक का काम किए। उसके बाद सरकारी नौकरी में चले आए और निबन्धन विभाग के अवर-निबंधक के रूप में 1934 से 1942 तक रहे। 1943 से 1945 तक सांग पब्लिसिटी ऑफीसर, फिर जनसम्पर्क विभाग के उपनिदेशक पद पर 1947 से 1950 तक रहे। उसके बाद उन्होंने 1950 से 1952 तक लंगट सिंह महाविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर के हिन्दी प्रध्यापक के अध्यक्ष पद को संभाला।

स्वंत्रता मिली और पहली संसद गठित होने लगी तो वे कांग्रेस की ओर से भारतीय संसद के सदस्य निर्वाचित हुए और राज्यसभा के सदस्य के रूप में 1952 से 1963 तक रहे। 1963 से 1965 तक भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। अंततः 1965 से 1972 तक भारत सरकार के गृह-विभाग में हिन्दी सलाहकार के रूप में हिन्दी के संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए काफ़ी काम किया।

पुरस्कार व सम्मान :

१. कुरूक्षेत्र के लिए काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार सम्मान मिला

२. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया।

३. 1959 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्म विभूषण से किया विभूषित किया।

४. भागलपुर विश्वविद्यालय के तात्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने इन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि प्रदान की।

५. 1972 में ‘उर्वशी’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मृत्यु : 24 अप्रैल 1974 को हृदय गति रुक जाने से उनका देहांत हो गया।


 

:: प्रमुख रचनाएं ::

:: काव्य रचनाएँ :: चक्रवाल, रेणुका , हुंकार, द्वन्द्वगीत, रसवंती, सामधेनी, कुरुक्षेत्र, बापू, धूप और धुआं, रश्मिरथी, नील कुसुम, नये सुभाषित, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, हाहाकार,आत्मा की आंख, हारे को हरिनाम, संचयिता तथा रश्मि लोक।

:: गद्य रचनाएं :: मिट्टी की ओर, अर्द्धनारीश्वर, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय, शुद्ध कविता की खोज, रेती के फूल, उजली आग, काव्य की भूमिका, प्रसाद, पंत और मैथिली शरण गुप्त, लोकदेव नेहरू, हे राम, देश-विदेश, साहित्यमुखी।

:: साहित्यिक योगदान ::

‘दिनकर’ जी के मानस पर तुलसीदास जी के ‘रामचरितमानस’ और मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं का काफ़ी प्रभाव पड़ा। देश का स्वतंत्रता संग्राम, विश्व-स्तर पर स्वातन्त्र्य-कामियों के संघर्ष, गांधी जी के कार्य और विचार, लेनिन के नायकत्व में निष्पादित क्रान्ति, भगत सिंह की और गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादतें, स्वामी सहजानन्द सरस्वती का किसान आन्दोलन, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, द्वितीय विश्वयुद्ध, आदि ने उनके मन पर गहरी छाप छोप छोड़ा।

‘दिनकर’ जी का मुख्य आधार है कविता। बारदोली सत्याग्रह के दौरान उनकी सर्वप्रथम प्रकाशित रचना ‘बारदोली विजय’ रीवां (मध्य प्रदेश) की ‘छात्र-सहोदर’ नामक पत्रिका में छपी थी, जिसमें राष्ट्रीयता के गीत थे।

1929 में पुस्तक रूप में ‘प्रणभंग’ नामक पहलाखण्ड-काव्य प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने लिखा था,

तोड़ी प्रतिज्ञा कृष्ण ने, विजयी बनाने पार्थ को

अघ ने क्या, नय छोड़ना लखकर स्वजन के स्वार्थ को।

‘रे रोक युधिष्ठिर को न यहां, जाने दे उनको स्वर्ग धीर, पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।’ पंक्तियों के रचयिता राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध दिनकर जी को राष्ट्रीयता का उद्घोषक और क्रान्ति का उद्गाता माना जाता है। उन्होंने आज़ादी के आंदोलन के दौतान लिखना शुरु किया था। ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘सामधेनी’ आदि की कविताएं स्वतंत्रता सेनानियों के लिए बड़ी प्रेरक साबित हुईं।

श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,

मां की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।

युवती के लज्जा-वसन बेच जब व्याज चुकाये जाते हैं,

मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं,

पापी महलों का अहंकार तब देता मुझको आमंत्रण,

झन-झन-झन-झन-झन-झनन-झनन।

1935 में प्रकाशित ‘रेणुका’ में ‘दिनकर’ जी के राष्ट्रीय चेतना के प्रखर स्वर के साथ ही रोमांटिकता और कोमल भावनाओं की क्षीण धारा भी प्रकट हुई है।

फूलों की क्या बात? बांस की हरियाली पर मरता हूं।

अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूं।

वह कोमल भावना ‘रसवन्ती’ में सुविकसित होती है। यह इनकी वैयक्तिक भावनाओं से युक्त श्रृंगार परक काव्य-संग्रह है।

पड़ जाता चस्का जब मोहक, प्रेम-सुधा पीने का,

सारा स्वाद बदल जाता है, दुनिया में जीने का।

मंगलमय हो पंथ सुहागिनी, यह मेरा वरदान,

हरसिंगार की टहनी-से, फूलें तेरे अरमान।

वही कोमल भावना ‘उर्वशी’ के रूप में मनमोहिनी सिद्ध हुई। ‘उर्वशी’ हिन्दी साहित्य का गौरव-ग्रन्थ है। यह कामाध्यात्म संबंधी महाकाव्य है, जिसमें प्रेम या काम भाव को आध्यात्मिक भूमि पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया गया है।


 

जब से हम-तुम मिले, न जानें कितने अभिसारों में


 

रजनी कर श्रृंगार सितासित नभ में घूम चुकी है,

जानें, कितनी बार चन्द्रमा को, बारी-बारी से,

अमा चुरा ले गयी और फिर ज्योत्सना ले आयी है।

राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय स्वाभिमान का सबसे ज्वलन्त रूप प्रकट हुआ है उनकी सुविख्यात लम्बी कविता ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में। इसमें कवि ने राष्ट्रीय गौरव की रक्षा के लिए भारतीय जनता के शौर्यभाव को जगाने के लिए अत्यंत ओजभाव से युक्त वाणी का प्रयोग किया है।

वे देश शांति के सबसे शत्रु प्रबल हैं,

जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल हैं,

हैं जिनके उदर विशाल, बांह छोटी है,

भोथरे दांत, पर जीभ बहुत मोटी है।

औरों के पाले जो अलज्ज पलते हैं,

अथवा शेरों पर लदे हुए चलते हैं।

युद्ध और शान्ति की समस्या का द्वन्द्व ‘कुरुक्षेत्र’ में व्यक्त हुआ है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो

उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो

गद्य में भी वे अप्रतिम रहे हैं। उनका गहन अध्ययन और सुगम्भीर चिन्तन गद्य में मार्मिक अभिव्यक्ति पाता है। उनके गद्यों में विषयों की विविधता और शैली की प्रांजलता के सर्वत्र दर्शन होते हैं। उनका गद्य साहित्य काव्य की भांति ही अत्यंत सजीव और स्फ़ूर्तिमय है तथा भाषा ओज से ओत-प्रोत। उन्होंने अनेकों अनमोल ग्रंथ लिखकर हिन्दी साहित्य की वृद्धि की। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत ‘संस्कृति के चार अध्याय’ एक महान ग्रंथ है। इसमें उनकी गहन गवेषणा, सूक्ष्म अन्वेषण, भारतीय संस्कृति से उद्दाम प्रेम प्रकट हुआ है।

मानवता के प्रति प्रतिबद्धता, दलितों की दुर्दशा पर उत्साहपूर्ण रोष, गहन भारत-प्रेम और भारत-धर्म के परिपूर्णतम अभिव्यक्ति उनके साहित्य के सुन्दरतम लक्षण हैं।

दलित हुए निर्बल सबलों से, मिटे राष्ट्र उजड़े दरिद्र जन,

आह! सभ्यता आज कर रही असहायों का शोणित शोषण।

क्रान्ति-धात्रि कविते! जाग उठ, आडम्बर में आग लगा दे;

पतन, पाप, पाखण्ड जलें, जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे।

उन्होंने काव्य, संस्कृति, समाज, जीवन आदि विषयों पर बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।

ऋण-शोधन के लिए दूध-घी बेच-बेच धन जोड़ेंगे,

बूंद-बूंद बेचेंगे, अपने लिए नहीं कुछ छोड़ेंगे।

शिशु मचलेंगे, दूध देख, जननी उनको बहलाएगी,

मैं फाड़ूंगा हृदय, लाज से आंख नहीं रो पायेगी।

इतने पर भी धनपतियों की उनपर होगी मार,

तब मैं बरसूंगी बन बेबस के आंसू सुकुमार।

उनका अन्तिम कविता-संग्रह ‘हारे को हरि नाम’ 1971 में प्रकाशित हुआ।

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

प्रेमचंद साहित्यिक योगदान - 3

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                                                   मनोज कुमार

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यथार्थवाद से तात्पर्य उस दृष्टिकोण का है जिसमें कलाकार अपने व्यक्तित्व को यथासंभव तटस्थ रखते हुए वस्तु को, जैसी वह है वैसी ही देखता है और चित्रित करता है – अर्थात्‌ यतार्थवाद के लिए वस्तुगत दृष्टिकोण अनिवार्य है।


 


कलाकार जब वस्तु पर अपने भाव और कल्पना का आरोप कर देता है और उसको स्वप्नों के रंगीन आवरण में लपेटकर देखता है और चित्रित करता है, तो उसका दृष्टिकोण रोमानी हो जाता है।


कलाकार जब वस्तु पर अपने भाव और विवेक का आरोप कर देता है और उसे अपने आदर्श के अनुकूल गढ़ता है उसका दृष्टिकोण आदर्शवादी बन जाता है।


प्रेमचंद का व्यक्तित्व साधारण और व्यावहारिक था। साथ ही उनके जीवन के आदर्श भी प्रत्यक्ष और सुनिश्चित थे। अतएव उन्होंने व्यावहारिक धरातल पर ही आदर्शवाद की प्रतिष्ठा की है। उनका आदर्शवाद रोमानी आदर्शवाद नहीं है, व्यावहारिक आदर्शवाद है। उन्होंने बहुत विस्तृत क्षेत्र का चित्रण किया है। निम्न और मध्यम श्रेणी के पात्रों के चित्रण में उन्हें सफलता मिली। यथार्थ और आदर्श के चित्रण के समन्वय से इस चित्रण में एक स्वाभाविकता है। उनका मानना था कि यथार्थवाद हमारी आंखें खोल देता है तो आदर्शवाद ऊंचा उठाकर किसी मनोरम स्थान पर पहुंचा देता है। किसी देवता की कामना करना मुमकिन है लेकिन उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है। यथार्थ और आदर्श के समन्वय से उन्होंने अपने पात्रों में सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा की। मानवीय दुर्बलता उनके पात्रों में मिलती है। लेकिन ऐसी दुर्बलताएं ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। अन्यथा निर्दोष चरित्र तो देवताओं में ही मिल सकता है। साहित्य में होरी, धनिया और गोबर जैसे 'सर्वहारा' पात्रों को स्थान दिलाने का श्रेय भी प्रेमचंद को ही है।

पुरातन काल से चले आ रहे आदर्श साहित्य को प्रगतिवाद का यथार्थ मुँह चिढाने लगा था। प्रेमचंद ने प्रगतिवादी साहित्य को नयी दिशा दी --
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद।

सेवासदन की कुलीन नायिका सुमन अभाव और कुरूतियों के दंश से तबायफ हो जाती है किन्तु देह का सौदा नहीं करती। यही था प्रेमचंद का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद।

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प्रेमचंद का साहित्य ग़रीब जनता का साहित्य है। उन्होंने जीवन को बहुत नज़दीक से देखा था। गरीबी, संघर्ष व त्‍याग का जीवन अपनाते हुए उन्‍होंने कई बार बड़े से बड़े प्रलोभन ठुकरा दिए। देहाती किसान के रूप में सादा जीवन व्‍यतीत करने वाले प्रेमचंद में अंहकार नाम मात्र का भी नहीं था। जीवन की सभी प्रकार की कटुता सहकर भी वे हमेशा प्रसन्‍नचित आगे बढ़ते रहे। वे गरीबी में जन्‍में, अभावों में पले बढ़े और दरिद्रता से जूझते हुए ही संसार से चले गए।

उनके उपन्यासों में निम्न और मध्यम श्रेणी के गृहस्थों के जीवन का बहुत सच्चा रूप मिलता है। ग्रामीण जीवन को उन्होंने बिना किसी वाद की ओर देखे अपने उपन्यासों में चित्रित किया है। वे अपने पात्रों को ऐसा सजीव चित्र देते हैं कि पाठक की उससे सहानुभूति सहज ही प्राप्त हो जाती है। पुरुष-पात्रों के साथ-साथ उन्हें नारी-पात्र के चरित्र चित्रण में भी सफलता मिली है। सच तो यह है कि समाज के सभी वर्ग के पात्रों का चरित्र अपने-अपने अनुरूप समान स्थान पाता है।

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उनका सबसे प्रधान गुण है उनकी व्यापक सहानुभूति। उनके व्यक्तित्व का मानव पक्ष अत्यंत विकसित था। इनके उपन्यास और कहानियों में समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व है, चाहे अभिजात वर्ग हो या उच्च वर्ग हो, चाहे मध्यम वर्ग और दलित वर्ग हो। सत्‌ और असत्‌, भला और बुरा दो सर्वथा भिन्न वर्ग करके पात्र निर्माण करने की अस्वाभिक प्रथा को उन्होंने तोड़ा।

डॉ. नगेन्द्र का मत है,

“इसका अर्थ यह नहीं कि उनको सत्‌-असत्‌ की चेतना नहीं थी। नहीं, यह चेतना उनकी सर्वथा निर्भ्रांत थी और इस विषय में उनका दृष्टिकोण पूर्णतया निश्चित और स्थिर था। परंतु उनके मन में घृणा नहीं थी। उनके मन में मानव के प्रति सहज आत्मीय भाव था। वे उसके पाप से अवगत थे। पाप का उन्होंने निर्मम होकर तिरस्कार किया है, परन्तु पाप को छोड़ उन्होंने कभी पापी से घृणा नहीं की।”

इस संदर्भ में राजेन्द्र यादव के भी विचार सामने रख लें,

“मूलतः उनकी समस्या तत्कालीन दृष्टि से वांछनीय-अवांछनीय, शुभ-अशुभ के चुनाव की है। परिणति वांछनीय और शुभ की ओर उन्मुख होने की है। वह समस्या और उसका हल साथ ही देते हैं।”

रूढ़ियों की छाया में उनके मानसिक विकारों और धार्मिक भावनाओं के शरणागत शोषण के विकृत व्यवहारों आदि का सजीव चित्रण देखने को मिलता है। उन्होंने पूंजीवादियों और ज़मींदारों के दोषों को क्षमा नहीं किया, किंतु साथ ही उनकी तकलीफ़ों के प्रति भी वे निर्मम नहीं थे। एक ओर उन्हें होरी आदि के शोषण की चिन्ता है, तो दूसरी ओर रायसाहब के शोषण की भी। हर वर्ग अपने ऊपर वाले वर्ग से शोषण का शिकार है। यदि एक वर्ग अपने को दुखी और शोषित समझता है, तो शोषक वर्ग उससे परे नहीं है। हर वर्ग के अपने-अपने आदर्श के बहाने हैं। उनकी अलग-अलग कुण्ठाएँ हैं। प्रेमचन्द उन सबके प्रति सजग हैं। समग्र भारतीय समाज उनका पात्र है। उनके मनोवैज्ञानिक चित्रण पाठक को झकझोरते हैं।

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प्रेमचन्द पहले रचनाकार हैं जिन्होंने सामाजिक जीवन के विभिन्न चरित्रों को मनोवैज्ञानिक तरीके से चित्रित किया और उनके पात्र मानवीय संवेदना की प्रतिमूर्ति लगने लगे। उनकी कहानियाँ मनोरंजन के उद्देश्य से ऊपर उठकर सम्पूर्ण समाज के यथार्थ को उजागर करती हुई सामने आईं। उनकी कहानियों में आदर्श और यथार्थ का अन्तर्द्वन्द्व है। अपनी प्रारम्भिक कहानियों में वे आदर्शों से नियंत्रित होने वाले रचनाकार लगते हैं। लेकिन बाद की कहानियों में उन्होंने यथार्थ का चित्रण करते हुए, हालांकि ये कहानियाँ समस्यामूलक रही हैं, आदर्श समाधान प्रस्तुत करना बन्द कर दिया। यह उनकी रचनाओं में रिक्ति नहीं बनी बल्कि ये वैचारिक मंथन के रूप में पाठकों को झकझोरने लगीं और ये रचनाएं अपने उत्कर्ष को प्राप्त करती अधिक प्रभावशाली साबित हुईं। ‘पूस की रात’ और 'कफन' जैसी कहानियों में उनकी बदली हुई वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट देखा जा सकता है। उनकी बाद की कहानियाँ घटना प्रधान न होकर चरित्र प्रधान हैं जिनमें पात्रों की मनोवृत्तियों का वास्तविक चित्रण नितांत सहज रूप में देखने को मिलता है। उनका स्वयं कथन है -
'कोई घटना तब तक कहानी नहीं होती जब तक कि वह किसी मनोवैज्ञानिक सत्य को व्यक्त न करे।'
इस कथन से उनकी कहानियों में आए विकास को समझा जा सकता है।

'कफन' कहानी उनके इस वैचारिक विकास का उत्कर्ष है। इसमें ग्रामीण कृषक की दुरावस्था का चित्रण है। किसानों की आर्थिक विपन्नता जमीदारों - साहूकारों के शोषण का नतीजा नहीं है बल्कि यह आर्थिक विषमता मूलक समाज की संरचना है। यह कहानी उस सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करती है जो मनुष्य के जिन्दा रहने पर उसका शोषण होने देती है और मर जाने पर खोखली नैतिकता का जामा पहन उसके अंतिम संस्कार के लिए उपाय करती है, सहयोग करती है।

मुख्य पात्र जो कि निकम्मे हैं, कोई काम-धाम नहीं करते। उनकी सोच है कि जो निकम्मे नहीं है उनकी भी स्थिति कमोवेश यही है, बेहतर नहीं। वे इस फलसफे पर जीवन यापन करते हैं कि जी-तोड़ मेहनत करके मरना कहाँ की बुद्धिमानी है। यह कहानी कर्मफल के सिध्दांतों पर प्रश्न उठाती है। भौतिकतावादी जीवन के चरम पर आज मानवीय संवेदना आत्मकेन्द्रित होकर शून्य होती जा रही है। प्रेमचन्द ने इसे आज से पचहत्तर वर्ष पूर्व ही चित्रित कर दिया था। यह प्रेमचन्द की सर्वाधिक त्रासदपूर्ण कहानी है जो जीवन की व्यर्थता और निस्सारता को व्यंजित करती है। एक व्यक्ति जिसका जीवन पशु से भी बदतर है उसके लिए जीवन का सबसे बड़ा सच भूख है। और भूख का मनोविज्ञान उसे कितना संवेदना शून्य बना सकता है, वह इस कहानी के माध्यम से अभिव्यक्त है। राजेन्द्र यादव इसे बुधिया के कफन की कहानी नहीं बल्कि मृत नैतिकबोध के कफन की कहानी मानते हैं।

प्रेमचन्द का मनोविज्ञान अन्य मनोविश्लेषणात्मक विचाराधारा के लेखकों से कदाचित भिन्न है। उनका मनोविश्लेषण समाधान मूलक नहीं है, बल्कि वे जीवन के सत्य को उद्धाटित करते हुए मानसिक परिस्थितियों का चित्रण करने में मनोवैज्ञानिक स्पर्श देते हैं। उनकी इस शैली से कहानी की मूल संवेदना प्रखर होती जाती है।

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मुंशी प्रेमचंद अपनी सरल भाषा और व्‍यावहारिक लेखन के कारण पाठकों में शुरू से ही प्रिय रहे हैं। उनकी सी चलती और पात्रों के अनुरूप रंग बदलने वाली भाषा पहले नहीं देखी गई। उर्दू और हिन्दी के कृत्रिम भेद-भाव को दूर करके सरल शब्दों और मुहावरों का प्रयोग किया। प्रेमचंद की भाषा सरल, सजीव, और व्‍यावहारिक है। उसे साधारण पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं। उसमें आवश्‍यकतानुसार अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी आदि के शब्‍दों का भी प्रयोग है, प्रेमचंद की भाषा भावों और विचारों के अनुकूल है।

डॉ. नागेन्‍द्र के अनुसार उनके उपन्‍यासों की भाषा की खूबी यह है कि शब्‍दों के चुनाव एवं वाक्‍य योजना की दृष्टि से उसे सरल एवं बोलचाल की भाषा कहा जाता है। पर भाषा की इस सरलता को निर्जीवता, एकरूपता एवं अकाव्‍यत्‍मकता का पर्याय नहीं समझा जाना चाहिए।

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प्रेमचंद कालजयी रचनाकार थे। उन्‍होंने समाज के विभिन्‍न वर्गों की विषमता को अपने साहित्य में दिखाया है साथ ही मानवीय संवेदना को भी साहित्‍य से जोड़ने की कोशिश की है। शिक्षा में हो रहे भ्रष्‍टाचार से लेकर स्‍त्री विमर्श के विषय को बड़े ही सरल ढंग से साहित्‍य के माध्‍यम से उन्होंने उठाने की चेष्‍टा की है। प्रेमचंद ने जो कुछ भी लिखा है उसे आज के बुद्धिजीवी सिर्फ प्रासंगिक मानकर अपना पल्‍ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनके यर्थाथवाद को कोई समझने की कोशिश नहीं करता।

सेवासदन के गांधीवादी प्रेमचंद गबन में मार्क्सवादी विचारधारा में ढलते दीखते हैं लेकिन गोदान तक आते-आते वामपंथ से भी उनका मोहभंग हो चुका है। मंगलसूत्र पूरा नहीं हुआ... वरना क्या पता इसमें समाजवाद की भी पोल खुल जाती। जीवन के अंत में मृत्यु-शैय्या पर पड़े प्रेमचंद का जैनेन्द्र से यह कहना कि “अब आदर्श से काम नहीं चलेगा” शायद उनकी आशाओं और दृढ़ विश्वासों के स्खलन का सूचक है।

हिन्दी साहित्य का यह प्रकाश स्‍तंभ, जो जीवन मूल्‍यों को बताता था आज हमारे बीच नहीं है पर यह तो निश्चित है कि वे देश के महान व सर्वोत्तम रत्‍न थे। उन्‍होंने जनवादी लेखनी को नया आयाम दिया। हिंदी साहित्‍य में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। जीवन को कसौटी पर कसने के लिए उन्‍होंने एक मापदंड दिया। उनके साथ खड़े होने का मतलब मुक्ति के साथ खड़ा होना है। वे लेखनी के माध्‍यम से भविष्‍य का मार्ग दर्शन भी करते थे। उनके दिखाए जीवन का मूल्‍य भुलाया जा रहा है। उनका मानना था कि साहित्य को राजनीति से आगे होना चाहिए लेकिन आज ऐसा नहीं है। प्रेमचंद का साहित्य आज भी प्रासंगिक है। उनकी कहानियों में आम आदमी की संवेदना है। प्रेमचंद ने अपने साहित्‍य के माध्‍यम से मानवीय मूल्‍यों को स्‍थापित करने का गंभीर प्रयास किया। प्रेमचंद के उपन्‍यासों में आम आदमी का चरित्र दिखाई देता है।

प्रेमचंद का साहित्‍य साम्राज्‍यवाद और उपनिवेशवाद का विरोधी था अंग्रेजी शासन की शोषणमूलक नीतियों के विरूद्ध उन्‍होंने आवाज उठाई। उन्होंने अपनी कहानियों में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है। तभी तो उन्हें क़लम का सिपाही, कथा सम्राट, उपन्यास सम्राट आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है।

                ***             

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

प्रेमचंद साहित्यिक योगदान-2

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                                                IMG_0568                           मनोज कुमार

 

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प्रेमचंद के साहित्य पर सर्वत्र शिव का शासन है – सत्य और सुंदर शिव के अनुचर होकर आते हैं। उनकी कला स्वीकृत रूप में जीवन के लिए थी और जीवन का अर्थ भी उनके लिए वर्तमान सामाजिक जीवन था। वे कभी वर्तमान से दूर नहीं गए। प्रेमचंद ने जीवन का गौरव राग नहीं गाया, न ही भविष्‍य की हैरत-अंगेज कल्‍पना की। उन्होंने न तो अतीत के गुण गाए और न ही भविष्य के मोहक सपनों का भ्रमजाल अपने पाठकों के सामने फैलाया। वे ईमानदारी के साथ वर्तमान काल की अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे। उन्होंने देखा कि बंधन भीतर का है, बाहर का नहीं। एक बार अगर ये किसान, ये ग़रीब, यह अनुभव कर सकें कि संसार की कोई भी शक्ति उनको दबा नहीं सकती तो वे निश्चय ही अजेय हो जाएंगे। अपने मौजी पात्र (मेहता) से कहलवाते हैं,

“मैं भूत की चिंता नहीं करता, भविष्य की परवाह नहीं करता। भविष्य की चिंता हमें कायर बना देती है। भूत का भार हमारी कमर तोड़ देता है। हममें जीवनी शक्ति इतनी कम है कि भूत और भविष्य में फैला देने से वह क्षीण हो जाती है। हम व्यर्थ का भार अपने ऊपर लाद कर रूढ़ियों और विश्वासों तथा इतिहासों के मलबे के नीचे दबे पड़े हैं। उठने का नाम नहीं लेते।”


 

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समय के सच्चे और ईमानदार कलाकार थे। उन्होंने समाज की विषमताओं पर कुठाराघात किया।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था,

“अगर आप उत्तर भारत की समस्‍त जनता के आचार-व्‍यवहार, भाषा-भाव, रहन सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आप को नहीं मिल सकता। समाज के विभिन्‍न आयामों को उनसे अधिक विश्‍वसनीयता दिखा पाने वाले परिदर्शन को हिंदी-उर्दू की दुनियां नहीं जानती।”

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आर्यसमाज और गांधी जी के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आन्दोलन को उन्होंने अपने उपन्यासों में स्थान दिया। रंगभूमि का सूरदास गांधीवादी विचारधारा का प्रतीक है। डॉ. नगेन्द्र के अनुसार

``गांधी-दर्शन के अहिंसा-संबंधी अतिवादों को प्रेमचंद ने सदैव अपनी यथार्थ दृष्टि द्वारा अनुशासित रखा है और उसकी आध्यात्मिकता को ठोस भौतिक सिद्धांतो द्वारा।”


 

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प्रेमचंद का साहित्‍य सामाजिक जागरूकता के प्रति प्रतिबद्ध है उनका साहित्य आम आदमी का साहित्‍य है। सामाजिक सुधार संबंधी भावना का प्रबल प्रवाह उन्हें कभी-कभी एक कल्पित यथार्थवाद की ओर खींच ले जाता है फिर भी कल्पना और वायवीयता से कथासाहित्य को निकालकर उसे समय और समाज के रू-ब-रू खड़ा करके वास्तविक जीवन के सरोकारों से जोड़ा। इनकी कहानियों में जहां एक ओर रूढियों, अंधविश्‍वासों, अंधपरंपराओं पर कड़ा प्रहार किया गया है वहीं दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं को भी उभारा गया है। अपने जीवन काल में वे विभिन्न सुधारवादी और पराधीनता की स्थितिजन्य नव जागरण प्रवृत्तियों से प्रभावित रहे हैं, यथा - आर्यसमाज, गाँधीवाद, वामपंथी विचारधारा आदि। लेकिन समाज की यथार्थगत भूमि पर उसकी सहज प्रवृत्ति में ये प्रवृत्तियाँ जितनी समा सकती है, उतनी ही मिलाते हैं, ठूस कर नहीं भरते। इसीलिए चित्रण में जितनी स्वाभाविकता प्रेमचन्द में देखने को मिलती है, अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' में तो यह अपनी पराकष्ठा पर पहुँच गई है। यदि प्रेमचन्द युग का आरम्भ 'सेवासदन' में है, तो उसका उत्कर्ष 'गोदान' में। आदर्शों और विचारधाराओं को वे अपने पात्रों पर थोपते नहीं हैं, बल्कि अन्तर्मन या अन्तरात्मा की आवाज की तरह स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होने देते हैं।

'सेवासदन' और 'कायाकल्प' में जहाँ साम्प्रदायिक समस्या उठाई गई है, वहीं 'सेवासदन', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' और 'गोदान' में अन्तर्जातीय विवाह की। समाज में नारी की स्थिति और अपने अधिकारों के प्रति उनकी जागरूकता इनके लगभग सभी उपन्यासों में देखने को मिलती है।'गबन' और 'निर्मला' में मध्यम वर्ग की कुण्ठाओं का बड़ा ही स्वाभाविक और सजीव चित्रण किया गया है। हरिजनों की स्थिति और उनकी समस्याओं को 'कर्मभूमि' में सर्वोत्तम रूप से उजागर किया गया है।



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जीवन की काममूलक ग्रंथियां कहीं अधिक विषम और सूक्ष्म-गहन होती हैं। साहित्य में कामाश्रित स्वप्न-कल्पनाओं का असाधरण योग रहता है। प्रेमचंद ने इस विषय में अद्भुत स्वास्थ्य का परिचय दिया है। उनके अनुसार काम जीवन की एक प्रमुख प्रवृत्ति है परंतु वह समग्र जीवन नहीं है, और न जीवन का साध्य ही। काम को उन्होंने तिरस्कार नहीं किया, परंतु उसको प्रतिपाद्य का दर्ज़ा कभी नहीं दिया। स्वस्थ-साधारण जीवन के लिए कामोपभोग आवश्यक है, परंतु वह जीवन का उद्देश्य किसी भी रूप में – और किसी भी दशा में नहीं हो सकता, व्यक्ति को उसमें खो नहीं जाना चाहिए। ऐसा करने पर स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है।


 

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प्रेमचंद पावन प्रेम के उपासक थे। ऐसा प्रेम जो मानसिक गंदगी को दूर करता है, जो मिथ्याचार को हटा देता है, जो अपनी ज्योति से तामसिकता का ध्वंस करता है। उनके अनुसार यह प्रेम ही मनुष्य को सेवा और त्याग की ओर बढ़ाता है। जहां सेवा और त्याग नहीं है वहां प्रेम भी नहीं है। सच्चा प्रेम त्याग में ही अभिव्यक्ति पाता है।

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प्रेमचंद के जीवन-दर्शन का मूल तत्व है मानववाद। यह मानववाद सर्वथा व्यावहारिक है। उनका मानववाद एकांत नैतिक है। उनका मानववाद सुधारवाद से आगे नहीं बढ़ पाया। वे स्वभाव से विचारक और कर्मठ थे। उनके चेतना का धरातल व्यावहारिक रहा। उन्होंने अपने युग जीवन का व्यावहारिक दृष्टि से अर्थात्‌ सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अध्ययन किया और उसी दृष्टि से उसके समाधान की भी खोज की।

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अपनी कहानियों में प्रेमचन्द ने अपनी स्वाभाविक भूमि की विरासत को वैसे ही सुरक्षित रखा जैसे अपने उपन्यासों में। उनके सजग द्रष्टापन की उपस्थिति वहाँ भी है। वे 'कफन' के घीसू और माधव हों या 'ईदगाह' का हामिद हो या 'बूढ़ी काकी', उनकी यथार्थ मानसिकता के प्रति प्रेमचन्द जी पूरी तरह सजग हैं। चाहे हामिद ने भले ही अपनी तार्किक प्रतिभा से अपने चिमटे को अन्य बच्चों के खिलौनों से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया हो, लेकिन उन खिलौनों के प्रति उसकी ललक प्रेमचन्द से छुपी नहीं है। घटनाक्रम की स्वाभाविकता का कोई जवाब नहीं

 

 

 
ज़ारी …..!

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रविवार, 17 अप्रैल 2011

प्रेमचंद : साहित्यिक योगदान-1

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मनोज कुमार

धनपत राय उर्दू में नवाब राय के नाम से अफ़साना-निगारी करते थे। वतन-परस्ती के ज़ज़्बे से लबरेज़ उनकी किताब 'सोज़े-वतन' बरतानि हुकूमत को हज़म नहीं हुई। 'सोज़े-वतन' की हज़ारों प्रतियां क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया। नवाब की कलम पर हुकूमत की पाबन्दी हो गयी थी। नवाब भूमिगत हो गए किन्तु कलम चलती रही। लिपि बदल गयी, जुबान कमोबेश वही रहा। तेवर वही रहे और जज्बे में कोई तबदीली मुमकिन थी क्या ?

1936 में लखनऊ में एक अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,

“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है। उनके पात्रों में में ऐसी व्यक्तिगत विशेषताएं मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित होता था कि कुछ इसी तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को हमने कहीं देखा है।

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे,

“मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।”

उनके हृदय में इतनी वेदनाएं, इतने विद्रोह भाव, इतनी चिन्गारिया थी कि वे उसे संभाल नहीं सकते थे। उनका हृदय अगर उसे प्रकट नहीं कर देता तो वे शयद पहले ही बंधन तोड़ देते। धूर्तता और मक्कारी से अनभिज्ञ, विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे। लाखों-करोडों भूखे, नंगे, निर्धनों की वे ज़बान थे। धार्मिक ढ़कोसलों को ढ़ोंग मानते थे और मानवता को सबसे बड़ी वस्तु।

उनके उपन्यासों में उठाई गई प्रत्येक समस्या के मूल में आर्थिक विषमताओं का हाथ है। उनके उपन्यासों में प्रत्येक घटना इसी विषमता को लेकर आगे बढती है। शायद पहली बार, उनके द्वारा ही शोषित, दलित एवं ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। इनमें मुख्य रूप से किसान, मज़दूर और स्त्रियां हैं। सेवासदन, ग़बन, कर्मभूमि, निर्मला, प्रेमाश्रम और गोदान इन सबमें मूल रूप में वही आर्थिक और नैतिक समस्याएं हैं। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा ने अनमेल विवाह की स्थिति पैदा की। धनाभाव के कारण मुंशी तोताराम के परिवार में संघर्ष चलते हैं। ‘ग़बन’ के नायक रामनाथ और ‘गोदान’ के होरी को भी आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। प्रेमचंद ने जो अभिशाप देखा था, अपने जीवन में भोगा था, उसी को उन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया।

डॉ. नगेन्द्र कहते हैं,

“गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।”

प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य में युग प्रवर्तक रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। वे युगदृष्टा हैं। वे अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अस्थिरता से भलीभाँति परिचित थे। उनके समय स्वतंत्रता संग्राम के कारण देश की राजनीति में सत्ता व जनता के मध्य टकराव जारी था तो समाज में सामंती-महाजनी सभ्यता अपने चरम पर थी। शोषण और शोषित के बीच खाई बढ़ती जा रही थी। गरीब त्रासदपूर्ण जीवन जीने के लिए विवश था। प्रेमचन्द ने मध्य और निर्बल वर्ग की नब्ज पर हाथ रखा और उनकी समस्याओं, जैसे विधवा विवाह, अनमेल विवाह, वेश्यावृत्ति, आर्थिक विषमता, पूँजीवादी शोषण, महाजनी, किसानों की समस्या तथा मद्यपान आदि को अपनी कहानी का कथानक बनाया। तत्कालीन परिस्थितियों में शायद ही कोई ऐसा विषय छूटा हो जिसे प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं में जीवंत न किया हो।

(ज़ारी …!)

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

उपन्यास साहित्य – प्रेमचंद : जीवन परिचय

उपन्यास साहित्य

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हिन्दी उपन्यास साहित्य की चर्चा के क्रम में अब तक हमने १. अनुदित उपन्यास, २. आरंभिक हिन्दी उपन्यास ३. तिलस्मी-ऐयारी, जासूसी, ऐतिहासिक और भावप्रधान उपन्यास तथा ४. प्रेमचंद युगीन उपन्यास की चर्चा की है।

आगे की चर्चा करने के पहले प्रेमचंद जी के जीवन परिचय और उनके साहित्यिक योगदान की चर्चा ज़रूरी है।

मुंशी प्रेमचंद का जन्म एक गरीब घराने में काशी से चार मील दूर बनारस के पास लमही नामक गाँव में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। उनका असली नाम श्री धनपतराय था। उनकी माता का नाम आनंदी देवी था। आठ वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें मातृस्नेह से वंचित होना पड़ा। परिवार में उर्दू पढ़ने की परम्‍परा के कारण बचपन से हिन्‍दी उर्दू पढ़ने का शौक लग गया। हाई स्‍कूल की पढ़ाई के दौरान उनका विवाह हो गया और गृहस्‍थी का भार आ पड़ा दुःख ने यहां ही उनका पीछा नहीं छोड़ा। चौदह वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। उनके पिता मुंशी अजायबलाल डाकखाने में मुंशी थे। १५ वर्ष की अवस्था में इनका विवाह कर दिया गया, जो दांपत्य जीवन में आ गए क्लेश के कारण सफल नहीं रहा। घर में यों ही बहुत गरीबी थी। ऊपर से सिर से पिता का साया हट जाने के कारण उनके सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। ऐसी परिस्थिति में पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा रोटी कमाने की चिन्ता उनके सिर पर आ पड़ी। फिर भी अपने बल-बूते से पढ़े। बी.ए. किया।

विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ा कर किसी तरह उन्होंने न सिर्फ़ अपनी रोज़ी-रोटी चलाई बल्कि मैट्रिक भी पास किया। मैट्रिक पास करते-करते उनकी आर्थिक स्थिति यहां तक पहुंच चुकी थी कि अपना निर्वाह वे पुरानी पुस्तकें बेच कर भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने स्कूल में मास्टरी शुरु की। यह नौकरी करते हुए उन्होंने एफ. ए. और बी.ए. पास किया। एम.ए. भी करना चाहते थे, पर कर नहीं सके। शायद ऐसा सुयोग नहीं हुआ।

स्कूल मास्टरी के रास्ते पर चलते–चलते सन 1921 में वे गोरखपुर में डिप्टी इंस्पेक्टर स्कूल थे। जब गांधी जी ने सरकारी नौकरी से इस्तीफे का नारा दिया, तो प्रेमचंद ने गांधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित हो, सरकारी नौकरी छोड़ दी। रोज़ी-रोटी चलाने के लिए उन्होंने कानपुर के मारवाड़ी स्कूल में काम किया। पर कुछ दिनों बाद ही त्‍यागपत्र देकर पत्रिकाओं का संपादन करने लगे।

प्रेमचंद ने बाल विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया तथा उनके साथ सुखी दांपत्य जीवन जिए।

प्रेमचंद ने 1901 मे उपन्यास लिखना शुरू किया। कहानी 1907 से लिखने लगे। उर्दू में नवाबराय नाम से लिखते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों लिखी गई उनकी कहानी सोज़ेवतन 1910 में ज़ब्त की गई , उसके बाद अंग्रेज़ों के उत्पीड़न के कारण वे प्रेमचंद नाम से लिखने लगे। 1923 में उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना की। 1930 में हंस का प्रकाशन शुरु किया। इन्होने 'मर्यादा', 'हंस', जागरण' तथा 'माधुरी' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया।

जीवन के अन्तिम दिनों के एक वर्ष छोड़कर, सन् (33-34) जो बम्बई की फिल्मी दुनिया में बीता, उनका पूरा समय बनारस और लखनऊ में गुजरा, जहाँ उन्होंने अनेक पत्र पत्रिकाओं का सम्पादन किया और अपना साहित्य सृजन करते रहे ।

8 अक्टूबर 1936 को जलोदर रोग से उनका देहावसान हुआ।

प्रेमचंद का रचना संसार

उपन्यास- वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा-सदन(१९१६), प्रेमाश्रम(१९२२), निर्मला(१९२३), रंगभूमि(१९२४), कायाकल्प(१९२६), गबन(१९३१), कर्मभूमि(१९३२), गोदान(१९३२), मनोरमा, मंगल-सूत्र(१९३६-अपूर्ण)।
कहानी-संग्रह- प्रेमचंद ने कई कहानियाँ लिखी है। उनके २१ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे जिनमे ३०० के लगभग कहानियाँ है। ये शोजे वतन, सप्त सरोज, नमक का दारोगा, प्रेम पचीसी, प्रेम प्रसून, प्रेम द्वादशी, प्रेम प्रतिमा, प्रेम तिथि, पञ्च फूल, प्रेम चतुर्थी, प्रेम प्रतिज्ञा, सप्त सुमन, प्रेम पंचमी, प्रेरणा, समर यात्रा, पञ्च प्रसून, नवजीवन इत्यादि नामों से प्रकाशित हुई थी।

प्रेमचंद की लगभग सभी कहानियों का संग्रह वर्तमान में 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित किया गया है।

नाटक- संग्राम(१९२३), कर्बला(१९२४) एवं प्रेम की वेदी(१९३३)

जीवनियाँ- महात्मा शेख सादी, दुर्गादास, कलम तलवार और त्याग, जीवन-सार(आत्म कहानी)
बाल रचनाएँ - मनमोदक, कुंते कहानी, जंगल की कहानियाँ, राम चर्चा।

अनुवाद : इनके अलावे प्रेमचंद ने अनेक विख्यात लेखकों यथा- जार्ज इलियट, टालस्टाय, गाल्सवर्दी आदि की कहानियो के अनुवाद भी किया।

(अगले अंक में हम प्रेमचंद जी के साहित्यिक योगदान की चर्चा करेंगे)

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

शमशेर बहादुर सिंह – जन्म दिवस पर

शमशेर बहादुर सिंह - जन्मशती के मौके पर

IMG_0568मनोज कुमार

13 जनवरी 1911 को मुजफ्फरनगर के एलम ग्राम में जन्मे शमशेर बहादुर सिंह की आज सौंवी वर्षगांठ है। हम उनके जन्म दिन पर उनको याद करते विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। १२ मई १९९३ को उनकी मृत्यु हुई।

कुछ प्रमुख कृतियाँ

कुछ कविताएं (1959), कुछ और कविताएं (1961), चुका भी हूँ मैं नहीं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता: अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988)

1977 में "चुका भी हूँ मैं नहीं " के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के "तुलसी" पुरस्कार से सम्मानित। सन् 1987 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा "मैथिलीशरण गुप्त" पुरस्कार से सम्मानित।

शमशेर को आधुनिक दौर का सबसे जटिल कवि माना गया है। मतलब यह कि शमशेर की कविताओं को समझने में आलोचकों को मुश्किल होती रही है। इसका एक प्रमुख कारण तो यह है कि वे आलोचकों द्वारा बनाए गए सांचे में फिट नहीं बैठते। उन्हें समझने के लिए साहित्य-कला-जीवन के बारे में उनकी मान्यताओं को ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है।

यह सही है कि उनकी काव्य संवेदना सरल नहीं है। उन्होंने १९४९ में अपना पहला कविता-संग्रह ‘उदिता’ तैयार कर लिया लिया था, पर अह उस साल छप नहीं सका।  उन दिनों वे अत्यंत निजी-भाव की कविताएं लिख रहे थे। ‘उदिता’ में उन्होंने कहा भी है कि वे उस पाठक का ख़्याल रखकर लिखते हैं, जो उनकी हंसी-ख़ुशी और दुख-दर्द की आवाज़ सुनता और समझता है। उनकी आरंभिक कविताएं छायावादी और उत्तर-छायावादी काव्य संस्कारों से निर्मित हुई।

रह जाते हैं सिहर-सिहर

मृदु कलिका के विस्मित गात:

बहका फिरता मधुप अधीर,

तितली अस्थिर गति अवदात।

कोई अपने सुख-दुख भूल

सूने पथ पर राग-विहीन,

विस्मृति के बिखराता फूल

फिर आया है मूक-मलीन।

अपने ऊपर निराला और पंत के गहरे प्रभाव की चर्चा करते हुए उन्होंने यह कहा भी है कि हिन्दी की ओर उनका खिंचाव भी इन्हीं दोनों कवियों के कारण हुआ। अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हुए शमशेर ने लिखा था-

भूल कर जब राह- जब-जब राह.. भटका मैं

तुम्हीं झलके हे महाकवि,

सघन तम की आंख बन मेरे लिए।

घने अंधेरे में शमशेर के लिए आंख बन निराला इसलिए झलके कि दोनों का जीवन साम्य लिये हुए था। एक जैसा आर्थिक और भावात्मक अभाव। बचपन में मां की मृत्यु, युवाकाल में पत्नी की मृत्यु, अनियमित रोजगार और अकेलापन। पत्नी की मृत्यु के बाद जीवन में गहरे हो गए अकेलेपन में हिन्दी कविता शमशेर से छूट-सी गई थी। ऐसे में बच्चन से उनकी मुलाक़ात हुई। बच्चन उनको इलाहाबाद ले आए। ‘निशानिमंत्रण’ की कविताओं ने उनपर प्रभाव डाला और उन्होंने ‘निशानिमंत्रण के कवि से’ कविता में कहा,

यह खंडहर की सांस

तुम जिसे भर रहे वंशी में -

है तंग घुटी-सी सुबह

लाल सफेद सिहाह!

मत गाओ यह गीत

मैं बिखर पड़ूंगा पागलपन में

ओ देर अजान मुसाफ़िर

यह हंसी मरुस्थल की है।

वे बहुत ही एकांत-प्रिय थे। उनका यह निजीपन उनकी कविताओं को एक अलग स्वर और स्वरूप प्रदान करता है। एकाकीपन उनके लिए उतनी ही ठोस हक़ीक़त था, जितनी उनके लिए मौत। उनके सम्पूर्ण काव्य में जिस गहन वेदना की अंतर्धारा प्रवहमान है वह उनकी वास्तविक जीवन-परिस्थितोयों से उत्पन्न हैं। अपने अकेलेपन को अपने युग के साथ जोड़कर एक बहुत ही जटिल एकाकीपन की रचना उन्होंने अपने लिए की थी। ‘आधी रात’ कविता में कहते हैं,

बहुत धीरे-धीरे

बजे हैं बा .. sरा s …

गिना है रुक रुक कर मैंने

बा  र  ह  बा  र

सुनो!

अब भी वैसे ही हवा में

बा  रा  बज रहे हैं …

(बादल घिरे हुए हैं दिन भर।)

एक  का  ए  क्‌

श्‍वान भूकने लगे!

गा उठा बिरहा कोई दूsर जाता पथ

पर …

नीम के सन्नाटे में एकाएक जोड़ा

ओल्लुओं का चीख उठा

प्री   ई   अ,   प्री   ई   अ, ! प्रईअ!

उन्होंने अर्थ को ज़्यादा से ज़्यादा छोड़कर कविता लिखी। इसके चलते उनकी कविताओं की दुरूहता बढती ही चली गई।

एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है
कितनी ऊंची घासें चांद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ
फिर क्यों
दो बादलों के तार
उसे महज उलझा रहे हैं?

अशोक वाजपेयी ने ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ की भूमिका में कहा है,

“शमशेर की कविताओं का आप किसी अन्य अभिप्राय के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते। वह अपने अत्यंतिक अर्थ में परम नैतिक कविता है, प्रार्थना की तरह पवित्र …।”

वाह जी वाह!

हमको बुद्धू ही निरा समझा है!

हम समझते ही नहीं जैसे कि

आपको बीमारी है :

आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं,

और बढ़ते हैं तो बस यानी कि

बढ़ते ही चले जाते हैं-

दम नहीं लेते हैं जब तक बि ल कु ल ही

गोल न हो जाएं,

बिलकुल गोल ।

वे कविओं के कवि थे। चित्रात्मकता, ऐंद्रियता, मितकथन, कविता में मौन की जगह आदि उनकी कविता की विशेषता है। वे आत्मविलोपन और आत्म-अवमूल्यन के कवि हैं। यह एक आध्यात्मिक विनय है। उन्हें सौंदर्य का कवि माना गया है। कविता लिखने के साथ वे चित्र भी बनाते थे। उनका मानना था कि कलाकार का नज़रिया सौंदर्यात्मक ही हो सकता है और कुछ नहीं, भले ही वह राजनीतिक विषय पर लिख रहा हो। कलाकार किसी जाहिरी रूप को अभिव्यक्त नहीं करता, वह उसके कलात्मक रूप को अभिव्यक्त करता है।

मोटी, धुली लॉन की दूब,

साफ़ मखमल की कालीन।

ठंडी धुली सुनहरी धूप।

हलकी मीठी चा-सा दिन,
मीठी चुस्की-सी बातें,
मुलायम बाहों-सा अपनाव।

पलकों पर हौले-हौले
तुम्हारे फूल से पाँव

मानो भूलकर पड़ते
हृदय के सपनों पर मेरे!

अकेला हूँ आओ!

‘प्रम की भावुकता’ को उन्होंने महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। न प्रेम सीमित है, न ही उनकी भावुकता का दायरा तंग है। प्रेम की भावुकता उन्हें कमज़ोर करने की जगह इन्सानों के साथ सही रिश्ते क़ायम करने में मदद करती है।

द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास

फिर भी मैं करता हूं प्यार

रूप नहीं कुछ मेरे पास

फिर भी मैं करता हूं प्यार

सांसारिक व्यवहार न ज्ञान

फिर भी मैं करता हूं प्यार

शक्ति न यौवन पर अभिमान

फिर भी मैं करता हूं प्यार

कुशल कलाविद् हूं न प्रवीण

फिर भी मैं करता हूं प्यार

केवल भावुक दीन मलीन

फिर भी मैं करता हूं प्यार ।

मैंने कितने किए उपाय

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

सब विधि था जीवन असहाय

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

सब कुछ साधा, जप, तप, मौन

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

कितना घूमा देश-विदेश

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

तरह-तरह के बदले वेष

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम ।

नम्रता और दृढता, फाकामस्ती और आत्मविश्वास से बना शमशेर का कवि-व्यक्तित्व अपनी पूरी गरिमा के साथ हमारे बीच मौजूद है। जन्मशती के मौके पर उनके इन गुणों को पहचानना, याद करना, और हो सके तो अपनाना, सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

साहित्यकार :: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

साहित्यकार

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म १८६४ में ज़िला रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के दौलतपुर ग्राम में हुआ था। गाँव की पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, ये अंग्रेजी पढने के लिए रायबरेली के सरकारी स्कूल में भर्ती हुए। बाद में रणजीत पुरवा (जिला उन्नाव ) ,फतेहपुर तथा उन्नाव के स्कूल में भर्ती हुए। लेकिन आर्थिक अवस्था ठीक न होनेके कारण उन्हें अपनी शिक्षा को बीच में ही रोक देना पड़ी। स्कूल की शिक्षा समाप्त कर इन्होंने रेल-विभाग में नौकरी कर ली। उस समय भी इनका स्वाध्याय बराबर चलता रहा। इन्होंने हिन्दी, उर्दू, अंगरेज़ी, बंगला, गुजराती तथा मराठी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।

कुछ समय बाद रेलवे की नौकरी छोड़कर सन्‌ १९०३ ई. में द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का संपादन शुरु किया। सत्रह वर्ष के सम्पादन काल में इन्होंने हिन्दी को नई गति तथा नई शक्ति दी। अनेक कवियों तथा लेखकों को इनसे प्रोत्साहन मिला। वास्तव में द्विवेदी जी व्यक्ति न होकर एक संस्था थे। समकालीन लेखकों एवं कवियों को सही मार्गदर्शन प्रदान करके हिन्दी भाषा एवं साहित्य को समृद्ध एवं जीवन्त बनाकर इन्होंने स्तुत्य कार्य किया।

सन्‌ १९३८ में इनकी मृत्यु हो गई।

द्विवेदी जी मुख्यतः निबंधकार और समालोचक थे। इन्होंने साहित्यिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, वैज्ञानिक आदि अनेक विषयों पर निबंध लिखे। वे कठिन-से-कठिन विषय को भी सरल बना देते थे। संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ अरबी और फ़ारसी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी इन्होंने बिनी किसी संकोच के किया। मुहावरों के प्रयोग की ओर भी इनकी रुचि थी।

द्विवेदी जी हिन्दी-साहित्य के इतिहास में युगप्रवर्तक के रूप में विख्यात हैं। इन्होंने गद्य की भाषा का परिष्कार किया और लेखकों की सुविधा के लिए व्याकरण और वर्तनी के नियम स्थिर किए। कविता में उस समय प्रायः ब्रज-भाषा का ही प्रयोग होता था। इन्होंने गद्य की भांति कविता में भी खड़ी बोली का प्रयोग किया। और, अन्य कवियों को खड़ी बोली में ही कविता करने की प्रेरणा दी। इन्हीं साहित्यिक सेवाओं के फलस्वरूप विद्वानों ने उन्हें ‘आचार्य’ पद से सम्मानित किया।

गद्य :: तरुणोंपदेश, हिन्दी कालिदास की समालोचना, वैज्ञानिक कोष, नाट्यशास्त्र, हिन्दी भाषा की उत्पत्ति, वनिता विलाप, साहित्य संदर्भ, अतीत -स्मृति, साहित्यालाप. ‘रसज्ञ रंजन’, ‘साहित्य-सीकर’, ‘साहित्य-संदर्भ’, ‘अद्भुत आलाप’, ‘संचयन’ इनके प्रसिद्ध निबंध-संग्रह हैं।

काव्य :: काव्य -मञ्जूषा, सुमन, कविता कलाप, ‘द्विवेदी-काव्यमाला’ में कविताएं संगृहित हैं।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

शमशेर के काव्‍य में प्रकृति

शमशेर के काव्‍य में प्रकृति
मनोज कुमार
शमशेर बहादुर सिंह के अनुसार कलाकार जीवन के किसी जाहिरी रूप को अभिव्‍यक्‍त नहीं करता, वह उसके कलात्‍मक रूप को अभिव्‍यक्‍त करता है। उन्‍हें जहां एक ओर मनोवैज्ञानिक यर्थाथवादी कवि माना गया वहीं दूसरी ओर आत्‍मपरक कवि भी कहा गया है। इसका उचित कारण है। उनकी रचनाओं में सामाजिक विषयों का फैलाव नहीं है। जीवन के छोटे-छोटे सुख-दुख, विचार, मनःस्थितियां, उनकी कविताओं का विषय बनती है। लेकिन इन्‍हें वे उनके पूरे संदर्भों में देखकर चित्रित करते हैं।
प्रकृति के अलग-अलग रंग शमशेर पर गहरा प्रभाव डालते रहे हैं। वे प्रायः रंगों और गतियों में ही प्राकृतिक रूपों को ढलता हुआ देखते हैं।
"उदिता" की भूमिका में शमशेर लिखते हैं –
"शामों की झुरमुट में, जब पच्छिम के मैले होते हुए लाल पीले बैगनी रंग हर चीज को लपेट कर अपने गढे मिलेजुले धुंधलके में खोने से लगते हैं आपने क्‍या उस वक्त भी ध्‍यान दिया है कि कैसे हर चीज एक खामोश राग में डूबने लगती है.....?"
आसमान और रंग उनकी कविताओं में विशेष रूप से प्रस्‍तुत होते रहे हैं। “उदिता" में शाम के समय के बादलों का चित्रण ... क्‍या चित्रकारी ही है! शमशेर जिस सूक्ष्‍मता से बादल और उस के बीच से आ रही किरणों के रंगों को पहचाना है वह किसी और कवि की रचनाओं में नहीं मिलता।
बादल अक्‍टूबर के
हल्‍के रंगीन ऊदे
मद्धम मद्धम
रुकते-से आ जाते
इ त ने पास अपने।
लग रहा है मानो तटस्‍थ भाव से दृश्‍य का अंकन वो नहीं करते बल्कि उनका मन इन प्राकृतिक चित्रों में घुला मिला है। यह इस कदर है कि यह बताना कठिन है कि प्राकृतिक दृश्‍य उनके मन पर असर डाल रहे हैं या कवि का मन ही प्रकृति को अपनी कल्‍पना के रंग में निहार रहा है। रंग के साथ साथ गति का विवरण और शब्‍दों को तोड़कर गति को विलंबित कर देने से धीरे धीरे सरकते बादलों का अद्भुत चित्र मिलता है।
‌एक्‌-इक पत्ता साकत्‌
ठै रा, संध्‍या भा में
सु न ता - सा कुछ किस को
इ त ने पास अपने ।
या दों की द्वा भा एँ
बा दल के भा लों पर
चमकी-सी लय होने
धीरे-धीरे-धीरे
इ त ने पास अपने।
जैसे क्षितिज के नीचे जाते सूरज का मंद प्रकाश अचानक बादलों के ऊपर चमक उठता है, वैसे ही मन में यादें कौंध जाती है। फिर उसी प्रकाश की तरह लय भी हो जाती है।
यर्थाथ दर्शन का शमशेर का अपना नजरिया है। शमशेर की कविता पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि शाम के धुंधलके में जब सारी चीजें गुम होने लगती है, तब कभी-कभी वक्‍त के बहते हुए धारे में एक ठहराव सा आता महसूस होता है।
शमशेर ने प्रकृति के कुछ अत्‍यंत अछूते बिंब और उनसे जुड़ी हुई अपनी खास संवेदना के चित्र हिंदी कविता को दिए हैं। जैसे इस चांद को देखिए
संवलाती ललाई में लिपटा हुआ
काफी ऊपर
तीन चौथाई खामोश गोल सादा चांद
आगे चलकर यह चांद जब कवि मन में उतर जाता है तो बिम्‍ब देखिए...
रात में ढलती हुई तमतमाई-सी
लाजभरी शाम के
अंदर
वह सफेद मुख
किसी ख्‍याल के बुखार का
चांद अपना रूप छोड़कर कवि की संवेदना में बदल जाता है। और कवि तब अपनी मनःस्‍थिति के अंदर के साथ साथ एक रेखा चित्र खींचता है ...
बादलों में दीर्घ पश्चिम का
आकाश मलिनतम।
ढके पीले पांव
जा रही रूग्णा संध्‍या।
... ... ... ...
नील आभा विश्‍व की
हो रही प्रति पल तमस।
बीमार शाम का पीलापन रात के गहरे अंधेरे में तबदील हो रहा है। पर ऐसा लगता है मानो शाम की खिड़की खुली रह गई है। जैसे शाम बीत गई है, कवि का भाव भी बीत चुका है। वह इस खुली खिड़की से झांकता है
विगत संध्‍या की
रह गई है एक खिड़की खुली।
झांकता है विगत किसका भाव।
इस खुली खिड़की के कारण कवि के मन पर छाया अंधेरा उसे पूरी तरह ग्रसित नहीं कर पाया है और वह कहता है ...
बादलों के घने नीले केश
चपलतम आभूषणों से
भरे लहरते हैं
बायु-संग सब ओर
बादल कवि को अब आभूषणों से सजे नीले लहराते देश की तरह लग रहे हैं। यानि शाम जब रात में ढलने लगी तो कवि का मन रूग्‍न नहीं है। कविता की भाव-भूमि देखिए कि आरंभ में अवसाद के कारण जो स्थिरता थी वही अब गति में बदल गया लगता है।
शमशेर की प्रकृति पर लिखी कविताओं को शमशेर के मन में पढ़ना होता है। उसकी भंगिमाएं और उसकी संवेदनाओं का संबंध तभी समझ आएगा। आधुनिक हिंदी कविता में इस तरह की अभिव्‍यक्ति और कहीं नहीं मिलती। तभी तो उन्‍हें बिम्‍बों का कवि कहा गया है।
शमशेर के लिए प्रकृति सामाजिक जटिलताओं में पलायन के बाद की शरण-स्‍थली नहीं है। वह उन्‍हें समाज की ओर लौटा ले जाती है। दरअसल प्रकृति उन पर चारों ओर से हमला करके उनकी इंद्रियों को उत्तेजित कर देती है। वह उनकी मानवीय संवेदना का विस्‍तार बन जाती है।
उड़ते पंखों की परछाइयां
हल्‍के झाड़ से धूप को समेटने की
कोशिश हो जैसे।
धूप को समेटने की कोशिश व्‍यर्थ है। यह अगर सिर्फ़ बाहर फैला हो तो समेटी भी जा सके पर –
धूप मेरे अंदर भी
इसलिए तो
कह कर कवि यह जताता है कि धूप को अलग करना कठिन है। शमशेर की प्रकृति संवेदना को अलग से पकड़ना भी उतना ही कठिन है। क्‍योंकि यह उनकी मानवीय संवेदना के अंदर धंसी है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति शमशेर के काव्‍य में यथार्थवादी ढंग से अंकित नहीं होती। अभिव्‍यक्‍त प्रकृति-चित्र में उनका मन इस कदर घुला-मिला रहता है कि यह बता पाना कठिन होता है कि प्राकृतिक दृश्‍य मन पर असर डाल रहा है या कवि मन ही प्रकृति को अपने ख्‍यालों के रंग से निहार रहा है।