मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष
मनोज कुमार
मुगल शासन व्यवस्था में उतराधिकार का कोई नियम नहीं था। फलतः सुलतान के मरते ही शहजादे गद्दी के लिए आपस में संघर्ष किया करते थे। मुगल साम्राज्य के इतिहास में गद्दी के दावे के लिए अनेक गृह युद्ध हुए हैं जिन्होंने मुगलों की शक्ति और प्रतिष्ठा को भारी क्षति पहुंचाई।
बाबर और हुमायूं ने भारत में मुगल राजवंश की स्थापना तो कर दी थी परंतु वे इसे स्थायित्व नहीं दे पाये। अकबर ने इस काम को पूरा किया। उसने राज्य के विस्तार के अलावा इसके सुदृढ़ीकरण की भी व्यवस्था की पर उसके जीवनकाल में ही जहांगीर ने गद्दी पर अधिकार करने के लिए विद्रोह कर दिया था, अकबर ने उसे समझा-बुझाकर शांत किया था।
जहांगीर के शासनकाल में शहजादों के विद्रोह ने बड़ा विकृत रूप धारण कर लिया। उसके शासनकाल में पहला विद्रोह शहजादा खुसरो का हुआ था परंतु जहांगीर ने अपनी काबिलियत से उसे दबा दिया। खुसरो की सहायता करने के अपराध में जहांगीर ने सिखों के गुरू अर्जुन देव जी को फांसी की सजा दी। इससे मुगल सिख संबंध अच्छे नहीं रहे। खुसरो के विद्रोह से ज्यादा महत्वपूर्ण खुर्रम का विद्रोह था। नूरजहां अपने दामाद शहरयार को गद्दी दिलवाना चाहती थी। इसलिए शहजादा खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। हालांकि उसने बाद में जहांगीर से माफी मांग ली पर उसके इस विद्रोह के कारण मुगलों को कंधार खोना पड़ा।
शाहजहां ने अपने भाइयों व भतीजों का वध करके गद्दी हासिल की थी। बाप के चरण चिह्नों पर चलते हुए औरंगजेब ने भी यही इतिहास दुहराया। खुद औरंगजेब के शासनकाल में शहजादों के विद्रोह ने सम्राट को परेशान किये रखा। ऐसे विनाशकारी संघर्षों में धन-जन की भारी हानि हुई और साम्राज्य को गहरा धक्का लगा। इन सभी गद्दी के दावों के लिए हुए युद्धों में से जो शाहजहां के बेटों के बीच लड़ा गया, वह कई अर्थों में विशिष्ट था। पहली बात तो यह कि शासक के जीवित रहते हुए उत्तराधिकार का जो विद्रोह हुआ, वह शाहजहां के समय में जितने लंबे समय तक चला और जितने विस्तृत क्षेत्र में यह संघर्ष हुआ, ऐसा इसके पूर्व कभी नहीं हुआ। इस संघर्ष में एक विद्रोही राजकुमार विजयी होता है और स्वयं सत्ता संभाल लेता है। जब मुगलकाल में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष की बात होती है तो हमारा ध्यान बरबस यहीं आ टिकता है।
यह लड़ाई 1657-58 ई. के बीच हुई थी। हालांकि औरंगजेब के चार बेटे थे, पर यह लडाई मुख्य रूप से शाहजहां के पुत्र दारा और औरंगजेब के बीच लड़ी गई थी। दारा सबसे बड़ा था और हमेशा शाहजहां के साथ रहता था तथा उत्तरी भारत का उत्तराधिकारी भी था। वह उदार और दयालु स्वाभाव का था। शाहजहां उससे बहुत प्यार करता था। दूसरा बेटा शाह शुजा बंगाल का शासक था लेकिन वह अकर्मण्य एवं विलासी था। तीसरा औंरगजेब दक्षिण का शासक था। वह सैनिक गुणों एवं कूटनीतिज्ञता में माहिर था। चौथा मुराद गुजरात एवं मालवा का शासक था। उसमें भी सैनिक एवं प्रशासनिक योग्यता का अभाव था।
चूंकि चारों बेटे चार अलग-अलग क्षेत्र के शासक थे तो ऐसा प्रतीत होता है कि शायद शाहजहां अपने बेटों के बीच राज्य का बंटवारा करना चाहता था। पर वास्तविकता क्या थी, कहा नहीं जा सकता। स्थिति ऐसी थी कि उत्तराधिकार की समस्या पर कभी भी लड़ाई हो सकती थी क्योंकि चारों के पास सैनिक थे और चारों गद्दी के लिए लालायित थे। ऐसी स्थिति में 16 सितंबर, 1657 ई. में शाहजहां जब सख्त बीमार पड़ा और उसके बचने की उम्मीद न के बराबर थी, तब चारों बेटों-दारा, शुजा, औरंगजेब और मुराद के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया क्योंकि वे अपनी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे। सिंहासन प्राप्त करने की महत्वकांक्षा वाले उसके सभी पुत्र अपनी अपनी योजनाएं बनाने लगे। इसकी शुरूआत शुजा ने की। उसने बंगाल में स्वयं को सम्राट घोषित कर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। फिर क्या था – मुराद भी खुद को शासक घोषित कर दिल्ली की ओर चल पड़ा। औरंगजेब ने खुद को शासक तो घोषित नहीं किया, पर दिल्ली की ओर इस घोषणा के साथ चल पड़ा कि वह अपने बीमार पिता को देखने जा रहा है।
इधर शाहजहां की बीमारी के समय दारा उसके साथ दिल्ली में ही था। उसने शाहजहां की बीमारी की खबर को रोकने के प्रयास किए। साथ ही पिता को लेकर दिल्ली से आगरा आ गया। पर परिणाम उलटा हुआ। लोगों में यह अफवाह फैल गई कि शाहजहां वास्तव में मर गया है और दारा इस खबर को छिपाकर खुद को बादशाह घोषित करना चाहता है। इस बीच दारा की सेवा-सुश्रुषा में शाहजहां थोड़ा ठीक हुआ। उसे जब उत्तराधिकारी के संघर्ष की जानकारी लगी, तो उसने अपने बेटों को पत्र लिखा कि अपने-अपने क्षेत्र वापस लौट जाएं। वे स्वस्थ हैं। इस पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। बल्कि औरंगजेब ने कहा कि यह पत्र जाली है। इधर शाहजहां ने संघर्ष टालने के इरादे से दारा को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया। पर इसका प्रभाव दारा के अन्य भाइयों पर विपरीत ही पड़ा और वे गद्दी पर अधिकार प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो उठे।
इतिहास भी तो अपने आप को दुहराता है। मुगलों के बीच उत्तराधिकार का मामला, अधिकांशतः तलवारों के द्वारा ही निर्धारित हुआ था। शाहजहां ने भी तो खुद इस रास्ते गद्दी पाई थी। फिर उसके बेटे कहां चूकने वाले थे। युद्ध एवं रक्तपात अवश्यंभावी था। पर इस बार इसमें एक विशेषता थी। पहले के उत्तराधिकार का संघर्ष सम्राट की मृत्यु के पश्चात हुआ था। इस बार यह तब होने जा रहा था जबकि शाहजहां अभी जीवित था। इस युद्ध में न सिर्फ उसके चार बेटे ही लड़े बल्कि उसकी बेटियां ने भी परोक्ष रूप से हिस्सा लिया। जहांआरा ने दारा शिकोह की सहायता की तो रोशन आरा ने औरंगजेब की मदद की तथा गौहन आरा ने मुराद बख्श का पक्ष लिया।
औरंगजेब ने मुराद को अपने पक्ष में मिलाकर आपस में राज्य का बंटवारा कर लेने का समझौता किया तथा दोनों की मिलीजुली सेना आगरा की तरफ़ कूच कर कई। उधर शाह शुजा भी बनारस तक आ पहुंचा था। तब शाहजहां एवं दारा के पास उनको युद्ध में पराजित करने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्होंने अपनी सेना भेजने का निश्चय किया।
दारा के पुत्र सुलेमान शिकोह के नेतृत्व में एक सेना शाह सुजा को पराजित करने के लिए भेजी गई और दूसरी सेना राजा जसवंतसिंह के नेतृत्व में मालवा की तरफ़ औरंगजेब एवं मुराद के खिलाफ युद्ध के लिए भेजी गई। सुलेमान शिकोह की सेना के हाथों शाह शुजा की पराजय हुई और वह बंगाल भाग गया परंतु अप्रैल, 1658 में राजा जसवंत सिंह के नेतृत्ववाली शाही सेना को औरंगजेब एवं मुराद के विरूद्ध धरमत के युद्ध में मुंह की खानी पड़ी। वास्तव में जसवंतसिंह को यह जानकारी नहीं थी कि उसे औरंगजेब एवं मुराद की मिलीजुली सेना का सामना करना पड़ेगा। वह तो सिर्फ मुराद की सेना की उम्मीद कर रहा था। फलतः उचित संसाधनों के अभाव में उन दोनों के संगठित सैन्य बल का मुकाबला वह नहीं कर पाया। यह विजय मुराद एवं औरंगजेब की हौसला अफजाई के लिए काफी थी । अब वे आगरा की तरफ बढ़ेब।
परिस्थिति की गंभीरता को भांपकर दारा ने भी मैदान ए जंग में कूदने का निर्णय लिया। उसने एक विशाल सेना इकट्ठी की एवं अपने बागी भाइयों का सामना करने चल दिया। जून, 1658 में दोनों पक्षों की सामूगढ़ में भिड़ंत हुई। औरंगजेब एवं मुराद की सेना एवं उनकी युद्ध-कुशलता के आगे दारा टिक न सका। उसकी बुरी तरह से हार हुई। निराश-हताश दारा शाहजहां से भी मिलने का साहस न जुटा सका और अपने परिवार के साथ दिल्ली की तरफ भाग गया और वहां से लाहौर चला गया। इस प्रकार औरंगजेब और मुराद की स्थिति काफी मजबूत हो गई। सामूगढ़ की लड़ाई ने दारा का भविष्य निर्धारित कर दिया। औरंगजेब ने आगरे के किले पर अधिपत्य जमाया तथा अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाकर कैदखाने में डाल दिया, जहां शाहजहां अपनी मृत्यु पर्यन्त जनवरी 31,1666 ई. तक कैद में ही रहा। बाप बेटे के बीच पत्रों का आदान-प्रदान तो होता था पर दोनों में कभी आमना-सामना नहीं हुआ।
औरंगजेब काफी महत्त्वाकांक्षी था। उसने अपनी और गद्दी के बीच आनेवाली हर बाधा को दूर करने का निश्चय किया। आगरा के किले पर फतह के बाद औरंगजेब ने दारा पर खास ध्यान केंद्रित नहीं किया। अब उसके सामने मुख्य बाधा थी – मुराद एवं उसका सैन्य बल। मुराद स्वतंत्र रूप से रहने लगा था। अतः औरंगजेब को उसकी तरफ़ से खतरे का एहसास था। उसी तरह मुराद भी उसकी तरफ शंका की दृष्ष्टिकोण रखता थे। औरंगजेब ने अपने रास्ते से मुराद को हटाने का निर्णय लिया। उसने मुराद को कई बार दावत पर बुलाया, पर हर बार मुराद नकार जाता था। एक बार शिकार से लौटते हुए मथुरा के निकट एक रात की दावत के औरंगजेब के नयौते को उसने अपने एक अधिकारी की सलाह पर स्वीकार कर लिया। उस अधिकारी को औरंगजेब ने धन देकर अपनी तरफ मिला लिया था। मुराद को खासी तगड़ी दावत खाने को मिली। तत्पश्चात एक सुंदर दासी को मुराद की मालिश करने को भेजा गयास। काफी चालाकी से उसने मुराद को गहरी नींद सुला दिया एवं उसके सभी शस्त्र उसके पास से हटा दिए। इस प्रकार निहत्था मुराद आसानी से बंदी बना लिया गया।
औरंगजेब मथुरा से दिल्ली आ गया। बिना किसी प्रतिरोध के उसने दिल्ली पर अधिपत्य जमाया और राज्यभिषेक कर खुद को सम्राट घोषित कर दिया। दारा सामूगढ़ की हार के बाद भटकता रहा था। बाद में उसे भी पकड़ कर बंदी बना लिया गया तथा मृत्यु दंड दे दिया गया। शुजा भी बनारस की लड़ाई के बाद बंगाल लौटा। वहां भी औरंगजेब के द्वारा तंग किए जाने पर आसाम से होते हुए बर्मा गया और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।
सन 1658 तक औरंगजेब के सभी विरोधी खत्म हो गये। गद्दी के सभी दावेदार समाप्त हो गए। उसकी स्थिति काफी मजबूत हो गई। उसने शाहजहां को बंदी बना लिया था और स्वयं को शासक घोषित कर चुका था।
गद्दी के उत्तराधिकार के इस संघर्ष का परिणाम बहुत बुरा रहा। ढेर सारे लोग मारे गए। इसके कारण साम्राज्य को आर्थिक एवं सैनिक, दोनों की भारी क्षति पहुंची। एक वर्ष तक मुगल साम्राज्य इसमें उलझा रहा। इससे साम्राज्य विरोधियों का मनोबल काफी बढ़ा। मराठा अपनी शक्ति को बढ़ाने लगे। उत्तर पश्चिमी सीमा पर अफगानियों ने विद्रोह किया। इस बीच दक्षिण भारत से भी मुगल साम्राज्य का ध्यान हटा रहा।
दूसरी ओर उत्तराधिकार के इस संघर्ष में इसकी सफलता अभूतपूर्व थी। इसकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि भविष्य में सत्ता पर अधिकार करने के लिए उत्तराधिकार का फैसला तलवार द्वारा ही संभव है।
इस तरह उत्तराधिकार का यह संघर्ष, मुगल साम्राज्य के लिए तात्कालिक और दूरगामी, दोनों ही तरह से, हानिकारक सिद्ध हुआ । औरंगजेब का 50 वर्ष का शासनकाल शांति और सुव्यवस्था की जगह समस्याओं का काल रहा। औरंगजेब के अंत तक साम्राज्य की एकाग्रता एवं संगठन समाप्त हो चुका था और महान मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया था। और उस पतन के बीज उत्तराधिकार के संघर्ष में ही छिपे थे। यह संघर्ष धीरे धीरे साम्राज्य को खोखला करता गया और एक दिन वह बीज विशाल वृक्ष बन कर उसके पतन की राह प्रशस्त कर गया।

पक्षियों का प्रवास-2
इन विदेशी मेहमानों का सफरनामा भी कम रोचक नहीं है। आखिर कैसे ये निरीह अपना कार्यक्रम, देश व दिशा तय करते हैं? बत्तख (डक्स), सामुद्रिक (गल्स) एवं समुद्र तटीय पक्षी रात या दिन किसी भी समय अपनी यात्रा करते हैं। पर कुछ पक्षी जैसे कौए, अबाबील, रोबिन, बाज, नीलकंठ, क्रेन, मुर्गाबी (लून्स), जलसिंह (पेलिकन्स), आदि केवल दिन में ही उड़ान भरते हैं। अपनी लम्बी उड़ान के दौरान ये कुछ देर के लिए उचित जगह पर चारे की खोज में रुकते हैं। किन्तु अबाबील और बतासी तो अपने आहार कीट-पतंगों को उड़ते-उड़ते ही पकड़ लेते हैं। दिन में उड़ने वाले पक्षी झुंड में चलते हैं। बत्तख, हंस एवं बगुले में झुंड काफी संगठित होता है। इन्हें टोली का नाम दिया जा सकता है। जबकि अबाबील का झुंड काफी बिखरा-बिखरा होता है।
अधिकांश पक्षी रात में ही लंबी यात्रा करना पसंद करते हैं। इस श्रेणी में बाम्कार (थ्रशेज), एवं गोरैया (स्पैरो) जैसे छोटे-छोटे पक्षी आते हैं। ये अंधेरे में अपने शत्रुओं से बचते हुए यात्रा करते हैं। इसके अलावा एक और बात महत्त्वपूर्ण है, यदि ये पक्षी दिन में यात्रा करें तो रात होते-होते काफी थक जाएंगे। अतः अगली सुबह ऊर्जाहीन इन पक्षियों को अपने आहार प्राप्त करने में काफी दिक़्क़त होगी। यह उनके लिए प्राणघातक भी साबित हो सकता है। जबकि रात को चलते हुए सवेरा होते-होते ये उचित जगह पर थोड़ा विश्राम भी कर लेते हैं, फिर भोजनादि की तलाश में जुट जाते हैं। रात होते ही आगे की यात्रा पर पुनः निकल पड़ते हैं।
अपनी प्रवासीय यात्रा के दौरान ये पक्षी कितनी दूरी तय करते हैं यह उनकी स्थानीय परिस्थिति एवं प्रजाति के ऊपर निर्भर करता है। इनके द्वारा तय की गई यात्रा की दूरी मापने के लिए पक्षी विज्ञानी इन्हें बैंड लगा देते हैं या फिर इनके ऊपर रिंग लगा देते हैं। फिर जहां वे पहुंचते हैं, उसका उन्हें अंदाज़ा हो जाता है। और तब दूरी माप ली जाती है। आर्कटिक क्षेत्र के कुररी (टर्न) पक्षी को सबसे ज़्यादा दूरी तय करने वाला पक्षी माना जाता है। लेबराडोर की
तटों से ये ग्यारह हज़ार मील की दूरी तय कर अन्टार्कटिका में जाड़े के मौसम में पहुंचते हैं। इतनी ही दूरी तय कर गर्मी में ये वापस लौट जाते हैं। इसी तरह की मराथन उड़ान भरने वाली अन्य प्रजातियां हैं सुनहरी बटान, टिटिहरी (सैंड पाइपर) एवं अबाबील। ये आर्कटिक क्षेत्र से अर्जेन्टिना तक की छह से नौ हज़ार मील की दूरी तय करते हैं। यूरोप के गबर (व्हाइट स्टौर्क) जाड़ों में आठ हज़ार माल की दूरी तय कर दक्षिण अफ्रीका पहुंच जाते हैं।
प्रवासी पक्षी अपने वतन लौटने की तैयारी लगभग दो सप्ताह पूर्व ही आरंभ कर देते हैं। सप्ताह पूर्व से अपना वजन घटाने हेतु सजग हो जाते हैं। यहाँ आए, ठहरे, प्रजनन में व्यस्त रहे, मौसम का लाभ लिया, शिशु के पंख खुलने लगे, उडने योग्य हुए और आबोदाना उठना शुरू। पक्षीविद् के अनुसार शुक्ल पक्ष की दूधिया चाँदनी में उडान के समय रोशनी में वे अपना निश्चित मार्ग सुगमता से देख सकते हैं। दिन में दिशाभ्रम, तेज धूप, असहनीय गर्मी तथा शत्रु भय के कारण शुक्ल पक्ष उनकी वापसी उडान का शुभ मुहूर्त होता है। इसलिये भी कि यात्रा के प्रत्येक चरण में रोशनी मिलती रहे। अपने वतन तक पहुँचने में अंतिम पडाव तक अथक निरन्तर सक्रिय व गतिशील बने रहें, इस उद्देश्य से विदाई पूर्व वजन घटाते हैं।
अपने वतन लौट चलने की तैयारी में जुटे प्रवासी जोरदार विशेष ध्वनि में अपने सभी सहयोगी मित्रों से ऊँची आवाज में लौट चलने
हेतु आमंत्रित करती है। इनके जाने के बाद तिनकों से सजे वीरान आशियाने तथा प्रजनन के वक्त के बचे अण्डों की खोलें इनके गुजरे वक्त के चश्मदीद गवाह होते हैं। जाते-जाते ये बेजुबान मेहमान हमें ढेरों संदेश दे जाते हैं।
पिंजड़े में बंद पंछी, क्या जाने आकाश को,
माइग्रेशन कहते हैं। शताब्दियों तक मनुष्य उनके इस रहष्य पर से पर्दा उठाने के लिए उलझा रहा। उत्सुकता एवं आश्चर्य से आंखें फाड़े आकाश में प्रवासी पक्षियों के समूह को बादलों की भांति उड़ते हुए देखता रहा। अनेको अनेक जीवों में प्रवास की घटना देखने को मिलती है, पर पक्षियों जैसी नहीं, जो इतनी दूर से एक देश से दूसरे देश में प्रवास कर जाते हैं। इस रहस्यमय यात्रा में पक्षी कहां जाते हैं इस कौतूहल को दूर करने के लिए मनुष्यों ने दूरबीन, रडार, टेलिस्कोप, वायुयान आदि का प्रयोग कर जानकारी एकत्र करना शुरु कर दिया। यहां तक कि जाल में उन्हें पकड़ कर, उनके ऊपर बैंड या रंग लगा कर अध्ययन किया गया। तब जाकर इस रहस्यमय घटना के बारे में पर्याप्त जानकारी मिली।
तलाश में भूमध्य रेखा पार कर दक्षिण अमेरिका या अफ्रीका के गर्म हिस्सों में प्रवास कर जाते हैं। अमेरिकी बटान (गोल्डेन प्लोवर) आठ हज़ार मील की दूरी तय कर अर्जेन्टीना के पम्पास क्षेत्र में नौ महीने गृष्म काल का व्यतीत करते हैं। इस प्रकार वे प्रवास कर साल भर गृष्म ऋतु का ही आनंद उठाते हैं। उन्हें जाड़े का पता ही नहीं होता। इसी प्रकार साइबेरिया के कुछ पक्षी भारत के हिमालय के मैदानी भागों में प्रवास कर जाते हैं। हुगली के हरिपाल जैसे अनजान व शांत इलाके में ये पक्षी आकर तीन से चार माह का प्रवास करते हैं। इस दौरान वे प्रजनन की क्रिया संपन्न करते हैं। बच्चों को जन्म देने के बाद वे पुन: वापस लौट जाते हैं। उत्तर प्रदेश के भी कई वन्य विहार, नदियों, झीलों आदि में ये अपना बसेरा बना लेते हैं। हंस (हेडेड गोज), कुररी (ब्लैक टर्न), चैती, छेटी बतख (कामन टील), नीलपक्षी (गार्गेनी), सराल (इवसलिंग), सिंकपर (पिनटेल) आदि पक्षी न सिर्फ दिखने में खूबसूरत होते हैं बल्कि अपनी दिलकश अदाओं के लिए भी जाने जाते हैं।
(कूट्स) तथा ग्रेट ब्रिटेन के बैगनी अबाबीलों (स्वैलोज) पक्षियों में पाई जाती है। मौसम का असर इन पक्षियों पर इतना अधिक होता है कि इनकी भूरे रंग की पक्षति (प्लुमेज) सफेद हो जाती है और इनका आहार भी बदल जाता है। जाड़े में ये कीट-पतंगों की जगह टहनी पत्तों के खाकर अपना गुजारा करते हैं।
इस युग में रीतिवाद विरोधी अभियान चला। मकसद था हिन्दी कविता को दरबारी काव्य की रूढियों से मुक्त करना! आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इस आंदोलन को गति प्रदान की। उनका मानना था कि साहित्य की महत्ता लोकजागरण की चेतना से सम्बद्ध है। साहित्य में जो शक्ति है वह तो, तलवार और बम में भी नहीं है। उनके अनुसार लोकजागरण के लिए साहित्य से बढकर कोई दूसरा समर्थ माध्यम नहीं है।
मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस आंदोलन को आगे बढाया। उन्होंने कविता के प्रयोजन को बताते हुए कहा
चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच अन्य संत व धर्मोपदेशक जैसे संत नामदेव, व संत तुकाराम ने महाराष्ट्र में, संत ज्ञनेश्वर व संत दादू दयाल ने गुजरात में तथा बाद में गोस्वामी तुलसीदास, संत सूरदास एवं मीराबाई ने भक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाया। गोस्वामी तुलसी दास ने रामपंथ को बढ़ावा दिया। संत सूरदास संत वल्लभाचार्य के शिष्य थे। उन्होंने ब्रजभाषा में “सूरसागर” लिखा। उन्होंने श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार किया। रास्थान की मीराबाई एक संत ही नहीं कवयित्री भी थीं। हालाकि उनके बड़े अनुयायी नहीं हुए फिर भी उनके भक्ति-गीत बहुत ही महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय हैं।
महाराज छत्रपति शिवाजी के समकालीन संत तुकाराम महाराष्ट्र क्षेत्र में सक्रिय थे। उन्होंने भगवान बिठोवा की अर्चना को लोकप्रिय बनाया। उनका मंदिर पंढ़ारपुर में है। बाद में बिठोवा भगवान को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाने लगा। संत तुकाराम ने भी हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। संत तुकाराम के ही उपदेशों का प्रभाव था कि महारज शिवाजी मुस्लिम प्रजा के प्रति काफी उदार भाव रखते थे।
निर्गुण भक्ति की परंपरा में संत कबीर दास और गुरु नानक देवजी के साथ एक और नाम है संत दादू दयाल का। उन्होंने नैतिक शुद्धता पर बल दिया। उन्होंने भक्ति के द्वारा समाज सेवा एवं मानवतावादी दृष्टिकोण लोगों के सामने प्रस्तुत किए। विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों को भ्रातृत्व और प्रेम में बांधकर एक करने की कामना से उन्होंने एक अलग पंथ का निर्माण किया जो “दादू पंथ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। “दादू ग्रंथावली” में उनकी संकल्पनाएं संग्रहीत हैं।
वहीं ‘पद्मावत’ के रचयिता जायसी ने सता शक्ति के अभिमान पर प्रहार किया।
‘रमचरितमानस’ में संत तुलसी दास ने कहा है