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शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

नया नाटक


नाट्य साहित्य – नया नाटक 

 मनोज कुमार

हिंदी का नया नाटककार पश्चिम के नाट्य प्रयोगों से बहुत ही प्रभावित हुए। ब्रेख्ट के महाकाव्यात्मक रंगमंच, बेकेट के ‘अब्सर्ड’ (विसंगत) नाट्य लेखन की शैली, अस्तित्ववादी चेतना के नाटक की संवेदना और शिल्प ने इन पर बहुत प्रभाव डाला। प्रभाव क्या कई बार तो यह अनुकरण मात्र लगता है।  ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी मूलभूमि की  समकालीनता को समझने का प्रयास ही नहीं किया जा रहा है।  भारतीय यथार्थ के संदर्भ में ये नाटक बहुत अजनबी लगने लगते हैं। अपनी जमीन की संस्कृति से मानों कोई संबंध ही नहीं है। बस ऐसा लगता है कि पाश्चात्य रंग प्रयोगों का अनुकरण ही लक्ष्य हो, इससे शैली शिल्प के स्तर पर अभूतपूर्व प्रयोग किए जाने लगे। फिर भी प्रस्तुतिकरण के स्तर पर हिंदी नाटक बहुत समृद्ध हुआ।

इस काल में हिंदी के नये नाटककार और रंग निर्देशक समकालीन पश्चिमी रंग प्रयोग विज्ञान से बहुत कुछ सीख कर उसे हिंदी नाट्य सृजन और प्रस्तुतियों में अधिकाधिक अपनाने लगे। इन्हें बर्तोल ब्रेख्ट के आक्रोश गर्भित रंगमंच (Angry theatre) और महाकाव्यात्मक रंग-प्रयोग (Epic theatre) आयनेस्को और बेकेट के विसंगत रंग-प्रयोग (Absurd theatre) काफ़ी प्रभावित करते रहे। उस समय का नाटककार, साहित्यकार और नागरिक जिस तरह का अंतर्द्वन्द्व महसूस कर रहा था, उसकी अभिव्यक्ति में पश्चिम की ये रंग-शैलियां बहुत ही सहायक सिद्ध हुईं। एक ओर सामाजिक खिंचाव और दूसरी ओर दिशाहीनता के कारण अंतर्द्वन्द्व था। इस अंतर्द्वन्द्व को नाट्यबद्ध करने के लिए नाटककार को पश्चिम के अस्तित्ववादी दर्शन से भे प्रेरणा मिली।

नया नाटक अस्तित्ववादी दर्शन की वैचारिक पृष्ठभूमि में रचा गया है। इस दार्शनिक चिंतन की दो कोटियां हैं –
  1. धर्ममूलक अस्तित्ववाद (Religious existendialoism)
धर्ममूलक अस्तित्ववाद के प्रवर्तक किर्केगाद थे। इस विचारधारा के अनुसार मनुष्य के जीवन में आज व्यर्थ-बोध समा गया है। इस व्यर्थता-बोध के मूल में आतंक भरा मन मनस्ताप (Anxiety) है। इस आतंक के मूल में नैराश्य है। इस नैराश्य के मूल में धर्मिक विश्वास का बीज अंतर्निहित है।

  1. अनीश्वर मूलक अस्तित्ववाद
अनीश्वर मूलक अस्तिववाद के प्रवर्तक सार्त्र थे। सार्त्र ने किर्केगाद के अस्तित्ववादी सूत्र के केवल अंतिम शब्द को बदल दिया है। उसने धार्मिक विश्वास की जगह पर व्यक्ति स्वातंत्र्य को रख दिया है। उसने यह माना है कि चुनाव करने की स्वतंत्रता मनुष्य जाति की एक दुखद नियति है। स्वतंत्रता मानव प्रकृति का सहज रूप है। चुनने में स्वतंत्र होना उसकी जीवोचित प्रकृति भी है और आंतरिक संकट को जन्म देने वाली नियति भी है। उसकी इस स्वतंत्र इच्छा शक्ति पर तकनीकी उपकरणों और निरर्थक सिद्ध हो गए प्रचलित सभी आदर्शवादी दर्शनों के आयाचित दबाव ने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है।

जगदीशचन्द्र माथु और मोहन राकेश संवेदना की नई भूमि पर नए प्रयोग शिल्प के द्वारा नाट्य-लेखन की नया रूप देना शुरु किया। यहीं से नए नाटक लिखने का दौर शुरु हुआ। माथुर जी का ‘कोणार्क’ और राकेश जी का ‘लहरों का राजहंस’ और ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिन्दी नया नाटक आधुनिक रूप में परिलक्षित हुए हैं। विगत नाट्य-परंपरा से भिन्न संवेदना और शिल्प के नाटक आज़ादी के बाद के वर्षों में भी न सिर्फ़ विकसित होते रहे बल्कि आंतरिकता के जटिल संसार को प्रतिबद्धता के साथ स्थापित करने के कारण गंभीर सर्जनात्मक नाट्य सर्जन से आभासित भी होते रहे। समय के साथ नये नाटक की सृजनशीलता बाह्य यथार्थ के स्थान पर आंतरिक यथार्थ को रूपायित करने की चेष्टा करने लगी। व्यक्ति के गहरे अंतर्द्वन्द्व, उलझाव और भटकाव के माध्यम से वर्तमान जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्ति प्रदान की गई। लोक-ग्राह्यता की तुलना में व्यक्तिगत विशेषता को अधिक महत्व दिया गया। अस्तित्व की खोज के नाम पर मनुष्य के आचरण, व्यवहार या क्रियाओं का एक ऐसा गड्ड-मड्ड संसार प्रस्तुत किया गया, जो दिशाहीन होने की व्याकुलता की ही संवेदना भरता है।

उल्लेखनीय नाम –

उपेन्द्रनाथ अश्क : पैंतरे (1952), अंजो दीदी (1954), अंधी गली (1954), बड़े खिलाड़ी
विष्णु प्रभाकर : डॉक्टर, अब और नहीं, युगे-युगे क्रांति
धर्मवीर भारती : अंधा युग (1955),
डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल : अंधा कुआं (1955), मादा कैक्टस (1959), सुंदर रस (1959), तीन आंखों वाली मछली (1960), सूखा सरोवर (1960), रक्त कमल (1962), रातरानी (1962), दर्पन (1963), सूर्यमुख (1968), कलंकी (1969), मिस्टर अभिमन्यु (1971), करफ़्यू (1972), राम की लड़ाई, नरसिंह कथा, एक सत्य हरिश्चन्द्र आदि।
मोहन राकेश : आषाढ़ का एक दिन (1958), लहरों के राजहंस (1963), आधे अधूरे (1969)।
सुरेन्द्र वर्मा : द्रोपदी (1970), सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, सेतुबंध, आठवां सर्ग, छोटे सैयद बड़े सैयद
‘अज्ञेय’ : उत्तर प्रियदर्शी
ललित सहगल : हत्या एक आकार की
बृजमोहन शाह : त्रिशंकु, शह पे मात
डॉ. शंकर शेष : एक और द्रोणाचार्य, घरौंदा    , खजुराहो का शिल्पी, फंदी, बंधन अपने-अपने
रेवतीशरण शर्मा : राजा बलि की नई कथा, अपनी धरती,
दया प्रकाश सिन्हा : कथा एक कंस की, इतिहास चक्र
गिरिराज किशोर : नरमेध, प्रजा ही रहने दो,
सुशील कुमार सिंह : सिंहासन खाली है
मुद्राराक्षस : मरजीवा, तेंदुआ, तिलचट्टा, योर्स फ़ेथफुली, गुफ़ाएं, संतोला,
रमेश बख्शी : वामाचार
मन्नू भंडारी : बिना दीवारों के घर
नरेश मेहता : सुबह के घंटे. खंडित यात्राएं
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : बकरी, लड़ाई, कल भात आएगा, अब ग़रीबी हटाओ
मृदला गर्ग : एक और अजनबी
कमलेश्वर : अधूरी आवाज़
अमृत राय : चिंदियों की एक झालर
भीष्म साहनी : हानुश, कबिरा खड़ा बाज़ार में
नरेन्द्र कोहली : शंबूक की हत्या,
मणिमधुकर : इकतारे की आंख, बुलबुल सराय, खेला पोलमपुर
शरद जोशी : एक था गधा उर्फ़ अलादाद खां, अंधों का हाथी

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

नया नाटक और जगदीशचंद्र माथुर

नाट्य साहित्य

नया नाटक और जगदीशचंद्र माथुर

सृजनशीलता का नया रूप प्रकट करने वाला नया नाटक संबंधों के आंतरिक यथार्थ की खोज करता है। यह बाह्य यथार्थ की जगह आंतरिक यथार्थ को नाटक में रूपायित करता है। व्यक्ति के गहरे अंतर्द्वन्द्व, उलझाव, भटकाव आदि के माध्यम से वर्तमान जीवन की दशाओं को व्यंजित करता है। शैली शिल्प के स्तर पर इस तरह के नाटक में प्रतीकात्मक प्रस्तुतिकरण की जाती है। इससे नाट्य-वस्तु अधिक व्यंजक और काव्यात्मक स्वरूप ग्रहण करती है। नया नाटककार अधुनिकता व्यंजक संवेदना को व्यक्त करने के लिए मिथकीय या पौराणिक प्रसंगों को नयी तार्किकता के साथ प्रस्तुत करता है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिम में लोगों की मानसिकता ऐसी हो गई थी जिसमें आध्यात्मिक चिंतन और सामाजिक व्यवस्था लोगों को निरर्थक लगने लगा था। मूल्यहीनता, अनास्था, बढ़ते जा रहे थे। जीवन विसंगतियों से भरा लगने लगा था। मानवीय विघटन थी। उलझाव और संत्रास से मानव त्रस्त था। आक्रोश व्यंजक ब्रेखट की रंगचेतना संत्रास के सामाजिक या बाहरी चेहरे को मामूली आदमी का संत्रास रूपायित करने लगीं। जबकि दूसरी तरफ़ अस्तित्ववादी और विसंगत नाटककार व्यक्तिविशेष के आंतरिक संत्रास और उलझाव को नाट्यबद्ध करने लगे।

ब्रेख्ट की धारणा पर व्यक्तित्वखोजी मानव की झलक सबसे पहले जगदीश चन्द्र माथुर के ‘कोणार्क’ (1946) में देखने को मिलती है। माथुर जी 1941 बैच के आई.ए.एस. थे। बिहार के हाजीपुर अनुमंडल में एस.डी.ओ. नियुक्त हुए। अपने कर्मशील जीवन के तीस वर्ष उन्होंने वैशाली, नालंदा, मिथिला और मगध के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण में लगाए। प्रतिवर्ष होने वाले भव्य वैशाली महोत्सव की परिकल्पना उन्हीं की थी। आकाशवाणी के महानिदेशक के तौर पर उन्होंने देश की सभी भाषाओं और कला-साहित्य की प्रतिभाओं को उससे जोड़ा। उन्होंने ‘दस तस्वीरें’ और ‘जिन्होंने जीना जाना’ रेखाचित्र की रचना की। ‘परम्पराशील नाट्य तथा प्राचीन भाषा नाट्य संग्रह’ शोध-प्रबंध लिखा। 12 वर्ष की आयु में ‘मूर्खेश्वर राजा’ नामक प्रहसन लिखा। 14-15 वर्ष की उम्र में ‘लवकुश’ और ‘शिवाजी’ नामक एकांकी की रचना की। 19 वर्ष की आयु में चर्चित ‘मेरी बांसुरी’ एकांकी की रचना की। इनके एकांकी संग्रह हैं, - ‘भोर का तारा’ और ‘ओ मेरे सपने’।

कुछ समय के लिए इनकी नियुक्ति उड़ीसा में हुई थी। वही इन्होंने ‘कोणार्क’ की रचना की। इस नाटक में मंचीय सार्थकता और नयी जटिल जीवनानुभूतियों की नाटकीय रचनात्मकता लक्षित होती है। इसमें नायिका नहीं है। नायक सर्वहारा वर्ग का एक श्रमिक है। उसके चरित्र में मामूली न्याय से वंचित सामाजिक अस्तित्व के प्रति गहरी चिंता मिलती है। विभिन्न प्रकार के पात्रों, घटनाओं आदि को इसमें इस प्रकार संयोजित किया गया है कि वे विशिष्ट नाटकीय स्थिति में संश्लिष्ट हो उठते हैं। कोणार्क का निर्माण एक गहरे अंतर्द्वन्द्व का परिणाम है, एक प्रकार का उदात्तीकरण है। शिल्पी विशु की रचना की रचना-प्रक्रिया अनेक तरह के अंतःसंघर्षों से प्रेरित है – एक विशेष बिन्दु पर पहुंच कर तो परिवेश का संघर्ष अंतःसंघर्ष से मिल कर इतना उद्वेलनपूर्ण हो उठा है कि रचयिता विशु अपनी रचना का विध्वंस स्वयं कर देता है। कलाकार का युग-युग से मौन पौरुष, जो सौंदर्य-सृजन क्के सम्मोहन में अपने को भूल जाता है, कोणार्क के खंडन में फूट निकलता है।

माथुर जी का दूसरा ऐतिहासिक नाटक है ‘शारदीया’ (1959)। उन्होंने नागपुर के म्यूज़ियम में पांच गज की एक साड़ी देखी जिसका वजन मात्र पांच तोला था। इसे मराठों और हैदरबाद के निज़ाम के बीच 1795 में हुए खुर्दा युद्ध में बन्दी बने एक अज्ञात व्यक्ति ने ग्वालियर क़िले के तहख़ाने में आजीवन कारावास का दंड भुगतते हुए बुना था। लेखक ने ग्वालियर क़िले का वह कक्ष देखा और बाहर-भीतर के अंधेरे, अकेलेपन, घुटन और बेड़ियों में जकड़े उस कलाकार तथा उसकी प्रेमिका की सजीव-साकार कल्पना कर डाली। इसका नायक नरसिंह राव अर्ध-ऐतिहासिक पात्र है। प्रेम और सर्जनात्मक प्रक्रिया का प्रश्न इसमें उठाया गया है। इसमें जहां एक ओर भाषा की सरलता है वहीं दूसरी ओर नाटकीय स्थितियों की तीव्रतापूर्वक प्रस्तुति है।

माथुर जी का तीसरा नाटक ‘पहला राजा’ (1969) है। यह नाटक ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि पर आधारित होने पर भी युगीन संदर्भों से जुड़ा है। माथुर जी ने आधुनिक समय की समस्याओं, विसंगतियों और जटिलताओं को अन्योक्ति-नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है। नाटक में घटनाओं और पात्रों की प्रतीकात्मकता काफ़ी प्रभावित करती है। पौराणिक संदर्भ को लेकर उनकी चौथी कृति ‘दशरथनंदन’ (1974) और पांचवीं कृति ‘रघुकुल रीति’ (मरणोपरान्त) है।

इन नाटकों माथुर जी ने अन्तश्चेतना की भूमिका में स्थित तथ्य के अनुसंधान के लिए मनोविज्ञान का संबल ग्रहण किया और तार्किकता का सहारा लिया। इनकी नाट्य-कला में विविध रंग-शैलियों के सार्थक तत्त्वों का रचनात्मक प्रयोग, काव्यात्मकता, भावेश, तरलता, प्रगतिशील दृष्टिकोण, सामाजिक सरोकार और रंग-शिल्प के दिलचस्प प्रयोग दिखाई पड़ते हैं। भारतीय रंग-परंपरा के साथ इन्होंने पश्चिमी त्रासद-तत्त्व का सुन्दर सामंजस्य स्थापित किया।

संदर्भ ग्रंथ

१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र, सह सं. डॉ. हरदयाल २. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली – खंड ९ ३. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारीप्रसाद द्विवेदी ४. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. श्याम चन्द्र कपूर ५. हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ६. मोहन राकेश, रंग-शिल्प और प्रदर्शन – डॉ. जयदेव तनेजा ७. हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास – डॉ. दशरथ ओझा ८. रंग दर्शन – नेमिचन्द्र जैन ९. कोणार्क – जगदीश चन्द्र माथुर १०. जयशंकर प्रसाद : रंगदृष्टि नाटक के लिए रंगमंच – महेश आनंद ११. अन्धेर नगरी में भारतेन्दु के व्यक्तित्व के स र्जनात्मक बिन्दु – गिरिश रस्तोगी, रीडर, हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्व विद्यालय १२. रंगमंच का सौन्दर्यशास्त्र – देवेन्द्र राज अंकुर १३. दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज - देवेन्द्र राज अंकुर १४. आधुनिक भारतीय नाट्य-विमर्श – जयदेव तनेजा

शनिवार, 10 सितंबर 2011

नया नाटक - संवेदना और शिल्प का नाटक

नाट्य साहित्य

नया नाटक - संवेदना और शिल्प का नाटक

स्वाधीनता के बाद हिंदी-गद्य की सर्वांगीण उन्नति हुई। भारत ने ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर आज़ादी की सुखद और स्फूर्तिदायक सांस ली। इसका परिणाम यह हुआ कि गद्य के क्षेत्र में नये आयामों का उद्घाटन हुआ। अपने मनोभावों को अभिव्यक्ति देने के लिए सर्वथा नवीन साहित्यरूपों का प्रश्रय लिया जाने लगा। नवनिर्माण पर बल दिया जाने लगा। कथ्य की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए सर्वथा नये प्रतीक, उपमान या बिंब ही प्रयुक्त नहीं हुए, बल्कि फ्लैशबैक, चेतना-प्रवाह आदि शैलियों का भी प्रयोग किया जाने लगा। कथानक को गौण मानने तथा पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण करने की प्रवृत्तियों के लेखक मानव-मन के सूक्ष्म से सूक्ष्म संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने में सफल हो सके। इस प्रकार जटिल से जटिलतर होते हुए जीवन-यथार्थ की प्रखर चेतनात्मक अभिव्यक्ति मिली। रचनाकार समस्याओं को यथार्थ की ज़मीन पर ही यथार्थ को देखने, झेलने और रचने को प्रेरित हुए। फलतः प्रचलित साहित्यरूपों की अभ्यस्तता को तिरस्कृत करते हुए नये सहित्यरूप, नयी अभिव्यक्तियां और नयी शैली जन्मी।

हिंदी नाटक भी रंगमंच और यथार्थ से जुड़कर नयी दिशा की ओर उन्मुख हुआ। जगदीशचन्द्र गुप्त और मोहन राकेश ने प्रसाद की नाट्य शैली का अनुकरण करते हुए रंग-शिल्प के नये प्रयोग किए। मंचीय सार्थकता और नयी जटिल जीवनानुभूतियों की नाटकीय रचनात्मकता के लिए इन्होंने संवेदना की नयी भूमियों का उद्घाटन किया। इन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक नाटकों मे लेखन में नये रंग भरे जिससे ‘नया नाटक’ लिखने की एक नई शुरुआत संभव हुई। इन्होंने नाटक लेखन को इस तरह से लिया कि नाटक लेखन और रंगमंच के बीच घनिष्ठ रिश्ता क़ायम हुआ। नाट्य कला में यह एक नया विकास था। संवेदना का स्वर भी आधुनिक बोध के नए स्वरूप को लिए था।

प्रसाद शैली से भिन्नता के कारण इनको हिंदी में नया नाटक या गंभीर नाटक लिखने की शुरुआत करने वाला नाटककार माना गया। धीरे-धीरे इस ढ़र्रे पर शिल्प और संवेदना से युक्त नाटक लिखने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। और फिर हिंदी में नया नाटक का दौर चल पड़ा। जगदीश चन्द्र माथुर कृत ‘कोणार्क’ (1951) और मोहन राकेश कृत ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1956), ‘लहरों के राजहंस’ (1963) में ऐतिहासिक कथानक का आधार तो था, लेकिन शिल्प और संवेदना का एक बदला हुआ आधुनिक रूप दिखा। इनमें समाज और व्यक्ति के जीवन की आंतरिकता के गहरे और जटिल यथार्थ का नाटकत्व प्रकट हुआ। इनमें मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ जीवन के यथार्थ का चित्रण किया हुआ है। एक और विशेषता यह है कि इनमें नाट्य-भाषा और अभिनय के बीच अभिन्न रिश्ता क़ायम किया गया। हिंदी में रंगमंच लेखन की यह एक नई शुरुआत थी।

साठोत्तर के वर्षों में प्रकृतिवादी यथार्थ पर बल दिया जाने लगा। इस तरह के नाटकों में मनोवैज्ञानिक यथार्थ के केन्द्र से मानवीय रिश्तों और उन रिश्तों की संवेदनात्मक स्थितियों को प्रकाशित किया गया। इसप्रकार स्पष्ट बाह्य यथार्थ से कुछ अलग हटकर व्यक्ति के आन्तरिक यथार्थ का चित्रण करना ‘नया नाटक’ की एक विशिष्ट प्रवृत्ति बनकर प्रकट हुई।

संवेदना और शिल्प का नाटक

नया नाटक आज़ादी के बाद सपनों के क्रमशः टूटने से उपजी विवशता और निराशा की संवेदना का नाटक है। बीसवीं सदी के छठे दशक के मध्य से हम पाते हैं कि शिक्षित जनमानस आंतरिक विघटन और घुटन का अनुभव करने लगा। मानव मन की पलने वाली आशाएं टूटीं। इससे एक मोहभंग की स्थिति पैदा हुई। नयी पीढ़ी में कुंठा, वर्जना, घुटन, संत्रास, निराशाएं और आशंका ने जन्म लिया। उसके पहले कुछ वर्षों तक ऐसी स्थिति नहीं था। हालाकि विभाजन का दंश और गांधी जी की हत्या कचोटती रही फिर भी आज़ादी मिलने का हर्ष था, पहली पंचवर्षीय योजना की आंशिक सफलता की ख़ुशी थी। इसलिए सामान्य शिक्षित व्यक्ति अपने को दिशाहीन नहीं समझता था। किंतु साठोत्तर काल तक आते-आते आंतरिक संकट बढ़ गए। रचनाकारों का ध्यान इस ओर गया। इसी आंतरिक संकट को मूर्त करने के लिए नया नाटक का विकास हुआ। आंतरिकता के जटिल संसार को रंगमंचीय प्रतिबद्धता के साथ रूपायित करने के कारण हिंदी का नया नाटक, गंभीर सर्जनात्मक नाट्य सर्जन का आभास देने लगा। (… ज़ारी ….)

उल्लेखनीय नाटक :

विशेष नाट्यप्रवृत्ति के आधार पर डॉ. गिरीश रस्तोगी ने इस प्रकार वर्गीकरण किया है -

भारतीय रंगतत्व अन्वेषक

लक्ष्मी नारायण लाल कृत : सूर्यमुख, एक सत्य हरिश्चन्द्र, मिस्टर अभिमन्यु, दर्पण, अब्दुल्ला दीवाना, सूखा-सरोवर, मादा कैक्टस, अंधा कुंआ, आदि।

गत्यवरोधक विध्वंसक

मोहन राकेश कृत : आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे

सूक्ष्म सौन्दर्यबोधक
सुरेन्द्र वर्मा कृत : द्रौपदी, सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, आठवां सर्ग

समकालीन चेतना संकेतक

गिरिराज किशोर कृत : प्रजा ही रहने दो

शैली अन्वेषक

मुद्राराक्षस कृत : मरजीवा, तिलचिट्टा, योर्स फेथफुली

विडम्बना उद्धारक

डॉ. शंकर शेष कृत : एक और द्रोणाचार्य

प्रयोग धर्मी

ज्ञानदेव अग्निहोत्री कृत : शुतुर्मुर्ग

रमेश बख्शी कृत : देवयानी का कहना है, तीसरा हाथी

हमीदुल्ला कृत विसंगत नाटक : उलझी आकृतियां, दरिन्दे, उत्तर उर्वशी।

बृजमोहन शाह कृत : त्रिशंकु

लोकशैली अन्वेषक

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कृत : बकरी

मणि मधुकर

कुछ अन्य महत्वपूर्ण नाटक :

ललित सहगल कृत : हत्या एक आकार की

अज्ञेय कृत : उत्तर प्रियदर्शी

दया प्रकाश सिन्हा कृत : कथा एक कंस की

रेवती शरन शर्मा कृत : राजा बलि की नयी कथा

नरेन्द्र कोहली कृत : शम्बूक की हत्या

सुशील कुमार सिंह कृत : सिंहासन ख़ाली है

काशी नाथ सिंह कृत : धोआस