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शनिवार, 17 दिसंबर 2011

पुस्तक परिचय-11 : आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श

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SDC11128_editedमनोज कुमार

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1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7. मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी |

नाट्य विमर्शनाटक और रंगमंच मनुष्य जाति का पहला और सदियों तक एकमात्र सशक्त और जीवन्त जन-माध्यम रहा है। इसके स्वरूप और सरोकार लगातार बदलते रहे। मुग़ल काल में रंगमंच उपेक्षित रहा। अंग्रेज़ों के आगमन के साथ नाटक व्यवसाय पारसी रंगमंच के रूप में विकसित हुआ। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय इप्टा ने रंगकर्म को आगे बढ़ाया। लब्धप्रतिष्ठित नाट्य-समीक्षक डॉ. जयदेव तनेजा जी ने “आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श” पुस्तक में ऐसे नाटककारों और नाटकों की समीक्षा की है जो वर्षों से अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। इन भारतीय नाटककारों का आधुनिक नाट्य-परिदृश्य को बनाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, जगदीशचन्द्र माथुर, भीष्म साहनी, बी.एम. शाह, बादल सरकार, जे.पी. दास, विजय तेन्दुलकर, महेश एल्कुंचवार आदि के दीर्घजीवी अथवा कालजयी उन श्रेष्ठ नाट्यलेखों को तनेजा जी ने समीक्षा के लिए चुना है, जो अपनी बहुमंचीयता से अपनी महत्ता, प्रासंगिकता और बहुअर्थगर्भी सार्थकता सिद्ध कर चुके हैं और जिनकी संभावनाएं अभी चुकी नहीं हैं।

डॉ. जयदेव तनेजा रचित यह पुस्तक पांच खंडों में बंटी है। पहले खंड में भारतीय परिप्रेक्ष्य में, नाटक के विविध रूपों, आधुनिकता और समाज और नाटक में स्त्री विमर्श पर लेख हैं। दूसरे खंड में संस्कृत, लोक और पारसी नाटकों के आधुनिक रंग प्रयोगों पर चर्चा की गई है। इसी खंड में जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, जगदीशचन्द्र माथुर, भीष्म साहनी, बी.एम. शाह की विशेष रंग-दृष्टि पर प्रकाश डाला गया है। तीसरे खंड में , बादल सरकार, जे.पी. दास, विजय तेन्दुलकर, महेश एल्कुंचवार की रचनात्मकता के साथ उनके वैचारिक दृष्टिकोण पर समग्रतः नज़र डाली गई है। चौथे खंड में बहुमंचित प्रमुख आधुनिक नाटकों के सरोकारों, समस्याओं, शक्ति और सीमाओं की समीक्षा प्रस्तुत की गई है। पांचवें और अंतिम खंड में मीरा कान्त, नादिरा ज़हीर बब्बर, शाहिद अनवर और मानव कौल के नाट्य़ कर्म पर विशेष रूप से आलोचनात्मक दृष्टिपात किया गया है।

यह पुस्तक नाटक-रंगमंच समन्वित उस संश्लिष्ट रंग-समीक्षा दृष्टि की ओर इशारा करने की पहल करती है, जिसके बिना किसी भी नाटक का वास्तविक और सन्तुलित मूल्यांकन हो ही नहीं सकता। लेखक ने पुरानी नाट्यकृतियों को साहित्य-रंगमंच सम्पृक्त नई दृष्टि से विश्लेषित एवं पुनर्मूल्यांकित किया है। इस पुस्तक में नाट्य समीक्षक तनेजा जी ने ध्रुवस्वामिनी, अन्धायुग, लहरों के राजहंस, पगला घोड़ा, इला, कोमल गान्धार, अग्नि और बरखा और गुलाम बादशाह – हस्तिनापुर कृतियों की समृद्ध संभावनाओं का उद्घाटन करते हुए भावी नाट्य-परिदृश्य का संकेत भी दिया है।

चिरजीवी नाटककार मोहन राकेश के रंग-शिल्प और प्रदर्शन, बादल सरकार की रंग यात्रा, जे.पी. दास और ओड़िया नाटक, विजय तेन्दुलकर – पुनरावलोकन और महेश एल्कुंचवार की अन्तर्यात्रा के बहाने यह पुस्तक समकालीन हिन्दी/भारतीय रंगकर्म की उस गम्भीर, वैविध्यपूर्ण और व्यापक सर्जनात्मक छटपटाहट को भी उजागर करती है, जो किसी भी सार्थक रचना-कर्म की बुनियादी शर्त है।

इस पुस्तक में नाट्य समीक्षक जयदेव तनेजा ने कुछ उभर चुके और उभर रहे उन युवा नाटककारों, जैसे मीरा कन्त, नादिरा ज़हीर बब्बर, शाहिद अनवर, मानव कौल, आदि की चर्चा भी की है, जिसे वे भावी भारतीय नाट्य-कर्म की समृद्ध संभावना के रूप में पहचाना है।

यह रंगकर्मियों, शोधार्थियों, अध्यापकों और छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी और रंगपरिवेश के जिज्ञासु पाठकों/इतिहासकारों के लिए एक दिलचस्प, प्रामाणिक और संग्रहणीय दस्तावेज़ ग्रन्थ है। इस पुस्तक की एक और बात जो बहुत ही आकर्षित करती है, वह यह है कि हितोपदेश की तरह या आचार्य रजनीश के प्रवचन में जो शैली है, वह शैली यहां भी प्रस्तुत किया गया है। नाट्य इतिहास भी साहित्य के सृजनात्मक विधा में ढल जाए तो क्या कहने ! यह विलक्षण प्रयोग लेखक की क्षमाता को दर्शाता है।

इस पुस्तक में भाषा का ऐसा तरल प्रवाह है कि इसे पढ़ते समय,एक उपन्यास के पढ़ने का जो सुख मिलता है, वह इस पुस्तक को पढ़ने में मिलता है। भाषा की तरल खिलखिलाहट में गंभीर और ठस्स चिंतन भी बोधगम्य होकर सामने आता है। इसलिए नाटक, खासकर भारतीय परिदृश्य में आधुनिक नाटक, को समझने के लिए यह पुस्तक आम पाठकों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है।

समयबद्ध रचना ही कालजयी रचना होती है। समयबद्धता, या समय के परिवर्तन के साथ नाटक के परिवर्तनों की आहटों की पहचान, उसकी रूपाकृति की एक-एक भंगिमा पर इनका दृष्टिकोण हमें नाटकों के स्वरूप का एक-एक कोना, एक-एक रेशा दिखाता है, जिससे नाटक की बदलती शैली और बदलता जीवन को देखने में भरपूर मदद मिलती है। उनके अनुसार –

“हमें अच्छा लगे या न लगे, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ नए नाटक का रूपाकार, मुहावरा और मिजाज तो बदलेगा ही। उसकी संरचना और प्रस्तुति-शैली भी निरन्तर बदल रही है। यदि नाटक और रंगमंच को ज़िन्दा रखना है, तो इसे समय के अनुरूप बदलना भी होगा और निरन्तर नए प्रयोग भी करने होंगे।”

... और अंत में यही कहना चाहूंगा कि आम पाठक जिन्हें नाटक के प्रति कौतूहल है, उन्हें यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिए।

*** ***

पुस्तक का नाम

आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श

लेखक

डॉ. जयदेव तनेजा

प्रकाशक

राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड

संस्करण

पहला संस्करण : 2010

मूल्य

400 रुपये

पेज

312

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

नुक्कड़ नाटक

नाटक साहित्य

नुक्कड़ नाटक

मनोज कुमार

आज़ादी के बाद जनवादी मंच शिथिल पड़ने लगा। जन नाट्य मंच के रंग-निर्देशक उत्पल दत्त, बलराज साहनी आदि और रंगकर्मी एवं अभिनेता फ़िल्मों में चले गए। इसके परिणामस्वरूप 1960 तक जन नाट्य मंच के रंगमंचीय सांस्कृतिक क्रियाकलाप बंद हो गए। लेकिन जन नाट्य मंच ने जो सामाजिक न्याय की चेतना जगाई थी, वह समाजवादी राजनीतिक संगठनों के विकास के नये-नये रूपों में प्रकट होती रही। देश में भुखमरी, ग़रीबी, शोषण और अन्याय के खिलाफ़ जनता में असंतोष तो था ही विद्रोह के स्वर भी मुखरित होते रहे। हड़ताल और प्रदर्शन भी होता था। इसी चेतना के परिप्रेक्ष्य में बीसवीं सदी के सातवें दशक में नुक्कड़ नाटकों का नया रंग-प्रयोग शुरु हुआ।

शिक्षित-अशिक्षित जनता को जगाने-झकझोरने और सोचने-समझने के लिए नुक्कड़ नाटकों की भूमिका काफ़ी सराहनीय रही। परंपरागत रंगमंचीय प्रस्तुतियों से अलग नुक्कड़ नाटक एक नया रंग प्रयोग था। इस शैली के नाट्य प्रदर्शन के लिए किसी प्रेक्षागृह की ज़रूरत नहीं थी। किसी प्रकार की साज की भी आवश्यकता नहीं थी। रोज़मर्रा की स्थानीय ज़िन्दगी की विडंबनाओं, विसंगतियों और अंतर्विरोधों को सामने रखना इस तरह के नाटकों का लक्ष्य था। अभिनय में शरीक़ होने वाले पात्र जिस वेश में होते उसी वेश में अभिनय में भाग लेते। उनका रंगमंच तो झुग्गी-झोंपड़ी के बीच कोई ख़ाली जगह, क़स्बा या नगर का कोई नुक्कड़ या चौराहा या गांव की चौपाल, स्कूल का मैदान या कॉलेज का लॉन कुछ भी हो जाता था। नुक्कड़ नाटक मंडली के किसी एक अभिनेता की आवाज़ या पुकार पर भीड़ इकट्ठी हो जाती, दर्शक एक घेरा बना देते। नाटक शुरु हो जाता। दर्शकों से घिरा कोई पात्र संवाद शुरु करता। लोगों को लगता अरे! यह तो मेरे बीच का ही कोई पात्र है। वे यह भी महसूस करते कि यह तो हमें भी साझेदारी के लिए यह उत्साहित करता है। दर्शक भीड़े में आते-जाते रहते हैं। इस तरह परंपरागत रंगमंचीय साधन-प्रसाधन और किसी भी साज-सज्जा के बगैर खुले स्थान में सम्पन्न होने वाला नाट्य व्यापार नुक्कड़ नाटक काफ़ी प्रसिद्ध हुआ।

नुक्कड़ नाटक में किसी स्थानीय मुद्दे को लक्ष्य कर नाटक रचे जाते हैं। साथ ही उसे वे व्यापक सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं और विसंगतियों पर कटाक्ष करने का आधार बनाते हैं। समसामयिक जीवन की अनुचित अमानवीय और अन्यायपूर्ण घटना को नुक्क्ड़ नाटक के नाटककार केन्द्र बनाकर उस पर कटाक्ष भरी टिप्पणी करते हैं। भाषा हास्य-व्यंग्य की रहने एक नई मानवीय सोच जगाने में क़ामयाबी के साथ-साथ उससे लोगों का मनोरंजन भी होता है। हम देखते हैं कि रोज़ ही कुछ न कुछ बेतुका घटित होते रहता है। कहीं धार्मिक अंधविश्वास के कारण तो कहीं राजनीतिक दाँव-पेच के कारण, कहीं आर्थिक घोटाला तो कहीं अमानुषिक अत्याचार। ये हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। इसी यथार्थ को नाटकीय ढ़ंग से नाट्यधर्मी प्रस्तुत करते हैं। नुक्कड़ नाटक में जाति-पांति, ऊंच-नीच, सांप्रदायिकता, दहेज, भ्रष्टाचार और हर तरह के शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई।

शिल्प का आधार तो लोक नाट्यों की नृत्य गान प्रधान ही होती है, लेकिन उसमें आलोचनात्मक टिप्पणी प्रधान संवाद रहने से इसमें एक नया आयाम जुड़ जाता है। इसे ब्रेख्ट की नाट्य़ प्रदर्शन शैली से लिया गया है। यही इसकी शैली का एक मौलिक पक्ष भी है। सामूहिक गीत की शैली में सामाजिक-राजनीतिक व्यस्था पर टिप्पणी करना वर्तोल ब्रेख्ट के एपिक रंगमंच का एक महत्वपूर्ण अंग है। ब्रेख्ट ने समूहगान की जिस प्रकार से राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था पर आलोचनात्मक टिप्पणी के लिए प्रयोग किया, उसी का अनुकरण नुक्कड़ नाट्य प्रेमियों ने भी अपना लिया। इसीलिए सामान्य लोक-नाटक से नुक्कड़ नाटक अधिक गंभीर और सार्थक रंगकर्म प्रतीत होता है।

भारतीय रंगमंच के क्षेत्र में नुक्कड़ नाटक के रंग प्रयोग का श्रेय बादल सरकार को है। ‘जुलूस’, ‘हत्यारे’, ‘औरत’, ‘मशीन’, आदि प्रसिद्ध नुक्कड़ नाटक हैं। आज तो लगभग सभी प्रमुख नगरोंमें नुकड़ नाटक प्रदर्शित होते हैं। जनता को अपने जीवन परिवेश के प्रति सजग करने में नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन का योगदान सराहनीय है।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

जनवादी नाटक

नाटक साहित्य

जनवादी नाटक

मनोज कुमार

ग्राम्यजीवन का स्तर का स्तर ऊंचा करने के उद्देश्य से साम्यवादी चेतना का रंगमंचों पर भी प्रभाव पड़ा। समसामयिक जीवन की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि समस्याओं को नाटक का कथानक बनाया जाने लगा। ऐसे यथार्थवादी नाटकों की एक शाखा, जो राजनीतिक स्तर पर मार्क्सवादी विचारधारा के प्रतिबद्ध थी, जनवादी नाटक कहा जाने लगा। 1942-43 में इस विचारधारा से जुड़े विचारकों और कलाकारों ने जन नाट्य संघ (इप्टा - इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) की स्थापना की।

जनवादी नाटकों का मूलतः लक्ष्य था साम्राज्यवादी और पूंजीवादी नीतियों का घोर विरोध करना। संकीर्णता की सभी सीमाओं को तोड़ते हुए सम्पूर्ण पिछड़े जनसमाज को साथ लेकर चलना इनका अभीष्ट था। सत्ताधारी राजनीति की गतिविधि से उत्पन्न विभीषिकाओं का चित्रण कर लोगों को सचेत करना जनवादी नाटककारों का लक्ष्य था। ये समस्याओं की केवल ऊपरी सतह पर ही नहीं बल्कि गहराई में जाकर विवेचन करते थे। जनता को आकृष्ट करने के लिए वे लोक मुहावरे, लोकगीत, लोकनृत्य और लोक कथा का सहारा लेते थे।

मार्क्सवादी विचारधारा में जिसे सर्वहारा वर्ग कहा गया है, उसी के लिए यहां ‘जन’ शब्द का प्रयोग हुआ। जन नाट्य संघ के कलाकारों ने हिंदी, बंगला, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओं में लोगों के बीच जनवादी चेतना जगाने के लिए नाट्य प्रदर्शन स्थानीय भाषा में करते रहे। शुरु में इस नाटक संघ का मुख्य उद्देश्य दूसरे विश्वयुद्ध का विरोध प्रदर्शन था। हिटलर का अधिनायकवाद सर्वहारा वर्ग के हितों का विरोधी था। इसी उद्देश्य से सरवालकर कृत नाटक “दादा” और जाफ़री कृत नाटक “यह ख़ून किसका है” जन नाट्य मंच द्वारा मुंबई में खेला गया। बाद में इस मंच द्वारा ऐसे नाटक प्रस्तुत किए गए जिनमें सर्वहारा वर्ग के शोषण के मार्मिक चित्र प्रकट थे। इनका उद्देश्य था लोगों में व्यवस्था के ख़िलाफ़ जनाक्रोश जगाना। 1944 में बंगाल के मानव निर्मित अकाल ने इस नव चेतना के लिए उर्व भूमि प्रदान की।

जन नाट्य मंच के अधिक सार्थक नाटक बंगला में साहित्य में ही रचे गए। विजन भट्टाचार्य के नाटक “जबानबन्दी” और “नवान्न” ने इस तरह के सृजन को गति प्रदान की। इनके अनुकरण पर हिंदी, मराठी, गुजराती आदि में भी इसी ढ़र्रे पर नव लेखन का सिलसिला चला।

कुछ महत्त्वपूर्ण नाटक

सज्जाद ज़हीर कृत “तूफान से पहले” – 1946 में इस नाटक को उपेन्द्र नाथ अश्क मे निर्देशन में खेला गया।

ख़्वाज़ा अहमद अब्बास कृत “मैं कौन हूं?” – 1947 में इस नाटक की रचना हुई।

राजेन्द्र सिंह बेदी कृत “नकले मकानी”, “जादू की कुर्सी (1948)

हबीब तनवीर कृत : “शतरंज के मोहरे”, आगरा बाज़ार

विश्वामित्र कृत : “दखन की रात” (1949)

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : बकरी

आज़ादी के बाद के जनवादी नाटककारों ने बंटवारे के समय की सम्प्रदायिक अमानवीयता को अपने नाटकों का विषय बनाया। भीष्म साहनी कृत “भूत गाड़ी” इस दौर का बहुचर्चित हिंदी जनवादी नाटक है।

हिंदी जन नाट्य मंच ने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों का रूपांतर करके पर प्रस्तुत किया। जनवादी मंच पर ‘गोदान’, ‘सेवासदन’, ‘कर्मभूमि’, ‘कफ़न’, ‘ईदगाह’, ‘सवा सेर गेहूँ’ का सफल मंचन किया गया। राजेन्द्र सिंह रघुवंशी ने नाट्य रूपांतर तैयार किया।

उत्पलदत्त के नाटकों “पीरअली’’ और “प्लानिंग” का भी हिंदी जन नाट्य मंच के रंगर्मियों ने जगह-जगह मंचन किया। जन नाट्य मंच पर अभिनीत नाटकों में अधिकांश की कोई विधिवत पांडुलिपी नहीं होती थी। लेखक प्रदर्शन के लिए नाटक का एक काम चलाऊ ढ़ाँचा तैयार कर देते थे, रंग निर्देशक और अभिनेता उसमें अपने ढ़ंग से रंगभर कर प्रस्तुत करते थे। ‘इप्टा’ ने नाटक की विषयवस्तु और अभिनेताओं की क्षमता पर बल देकर, बिलकुल सादे काले परदे के सामने नाटक करके, यांत्रिक और दिखावटी सज्जा के मोह पर पहला तीव्र आघात किया। ‘इप्टा’ के नाटक साधनहीनता के बावज़ूद, अपने कथ्य और तात्कालिकता, सार्थकता तथा गंभीरता के बल पर प्रभावी हुए।

जन नाट्य मंच की प्रदर्शन शैली लोक नाट्य की प्रदर्शन के काफ़ी क़रीब थी इसलिए इसमें माटी के अभिनय की गंध मिलती थी। इसने न्यायमूलक नवचेतना को जगाया। नई मानवीयता की दृष्टि को आगे बढाया। हालाकि मार्क्सवाद से प्रतिबंधित राजनीतिक चेतना के कारण इसे व्यापक स्वीकृति नहीं मिली और 1960 तक आते-आते इस रंगमंच के क्रियाकलाप लगभग समाप्त हो गए, फिर भी नया नाटक लेखन की समाजोन्मुखी धारा को प्रभावित करने में इसका काफ़ी योगदान है। दशरथ ओझा कहते हैं, “यदि जनवादी नाटक ग्रामीण जीवन के भिन्न वर्गों में कलह के स्थान पर सौमनस्य स्थापित करने का मार्ग निकाल पाता तो इसका भविष्य उज्ज्वल होता। महान नाट्य कृतियां समाज को विश्रृंखल नहीं करतीं अपितु जोड़ती चलती हैं ; उनका उद्देश्य नैराश्य को दूर कर जिजीविषा उत्पन्न करना होता है।”

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

विसंगत नाटक

नाटक साहित्य

विसंगत नाटक

मनोज कुमार

नया नाटक के बाद की धारा विसंगत नाटक की है। नये नाटक में लोक ग्राह्यता की तुलना में व्यक्तिगत विशेषता को ज़्यादा महत्व दिया गया। नये नाटककार का व्यक्ति चरित्र के आंतरिक द्वन्द्वों और उलझनों को चित्रित करने की ओर झुकाव अधिक था। कुछ नाटककारों ने समाज की समस्या और व्यक्ति के आंतरिक उल्झनों को जोड़ने का प्रयास भी किया। उदाहरण के लिए हम जगदीश चन्द्र माथुर के ‘कोणार्क’ और धर्मवीर भारती के ‘अन्धा युग’ को ले सकते हैं। किन्तु आगे के नाटककार विसंगत के ढ़र्रे पर अस्तित्वखोजी व्यक्ति चरित्रों की दिशाहीन क्रियाओं को प्रस्तुत करने के नए-नए प्रयोग करने में लग गए। इन नाटककारों ने मनुष्य के आचरण, व्यवहार या अभिव्यक्तियों का एक ऐसा गड्ड-मड्ड संसार प्रस्तुत किया है, जो दिशाहीन होने की व्याकुलता की ही संवेदना भरता है। जीवन के किसी सकारात्मक प्रवाह का संकेत नहीं देता है। मूल्यहीनता की दिशाहीन दुनिया में भटकने के लिए ही दर्शक को छोड़ दिया जाता है। अस्तित्व की खोज किसी सार्थक क्रांति के तहत नहीं की गई है। नाटककार की नाट्य सृष्टि ऐसी लगती है, जैसे हर स्तर पर स्तब्ध विवशता का बोध ही आज के मनुष्य की नियति है।

पश्चिम में बेकट का “वेटिंग फॉर द गोदो” एब्सर्ड नाटक के रूप में काफ़ी चर्चित हुआ था। इस तरह के नाटक में जीवन की विसंगतियों, अंधविश्वासों, ऊल-जलूल प्रसंगों को प्रदर्शित कर जीवन को ग्रस्त करने वाली दिशाहीनता का गहरा अहसास कराया जाता है।

हिंदी में भुवनेश्वर के “ऊसर” और “तांबे के कीड़े” एकांकियों में देखने को मिलता है। विपिन कुमार अग्रवाल का नाटक “कूड़े का पीपा”, “लोटन”, “राष्ट्र सम्राट”, “अपने देश में’, “मौत एक कुत्ते की”, बृजमोहन शाह के नाटक “त्रिशंकु”, “शह-ए-मात”, मोहन राकेश के नाटक “मैड डिलाइट”, “छतरियाँ”, मुद्राराक्षस के नाटक “तिलचट्टा”, “मरजीवा”, शरद जोशी के नाटक “अंधों का हाथी”, मणि मधुकर का नाटक “खेला पोलमपुर”, लक्ष्मीकान्त वर्मा कृत : अपना-अपना जूता, ललित सहगल कृत : हत्या एक आकार की, आदि कुछ बहुचर्चित विसंगत नाटक हैं।

नये नाटक के अस्तित्व खोजी चरित्र इसी आंतरिक संकट को मूर्त रूप में सामने लाते हैं। चाहे किर्केगार्द का धार्मिक विश्वास के कारण हो, चाहे सार्त्र के मानव-प्रकृति के स्वातंत्र्य के कारण हो, अस्तित्ववादी दर्शन यह तो मानता ही है कि आज के जीवन में व्यक्ति की अस्मिता का संकट है। अस्तित्ववादी समान रूप से यह मानते हैं कि मानव जीवन के विकास का ढ़ोंग करने वाले सारे आधारों-विज्ञान, तकनीकी विकास, ईश्वर, धर्म और नीति के प्रचलित प्रतिमान, समाज विकास की आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्थाएं आदि से आज के व्यक्ति का विकास जैसे पूरी तरह उठ गया है। वह अपने को एक शून्य में निराधार अनुभव करने लगा है। कटुता और नैराश्य से भरकर, परंपरा से मिले सब प्रकार के आधारों से निरपेक्ष होकर वह एक प्रयोगधर्मी रूप से अस्मिता को खोजना चाहता है। चरित्रों के आचरण का धर्मी प्रयोग रूप किसी भी प्रचलित आदर्श से संचालित न होने के कारण विसंगति-व्यंजक होता है या दिशाहीन सा ज्ञात होता है। इस प्रकार, अस्तित्ववादी दर्शन से प्रेरणा लेकर जो नाट्य सृजन हुआ उसे विसंगत नाटक (एब्सर्ड नाटक) कहा गया। हिंदी का नया नाटक भी इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में रचा जाने लगा। आठवें दशक में इस प्रवृत्ति की ओर झुकाव अधिक हुआ।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के पश्चिमी जीवन में जो यथार्थ उभर कर सामने आया, उसे अस्तित्ववादी दर्शन के प्रकाश में रचनाकार समझने का प्रयास करने लगे। उन्हें ऐसा लगा कि न ही कहीं कोई कथानक है, न ही कोई नायक है, न व्यवस्था है, न कोई निश्चित मूल्य ही है, न ही आत्म-सम्मान शेष है। यही बोध पश्चिम के प्रयोगधर्मी या विसंगत नाटकों और हिंदी के नए नाटकों में ढ़ाला जाने लगा।

इस बोध ने शैली शिल्प के स्तर पर हिंदी के नए नाटककार को पश्चिम के सभी प्रचलित रंग प्रयोगों से, चाहे वह ब्रेख्ट की महाकाव्यात्मक रंग प्रणाली हो, चाहे व्यक्ति समस्याओं को मूर्तमान करने वाली विसंगत नाटक की रंग पद्धति हो, -- सबसे तत्व ग्रहण कर अपने नाटकों का सृजन करने के लिए प्रेरित किया। ब्रेख्ट की वाद्य, नृत्य, गान भरी अभिनय प्रणाली और विसंगत नाटक की प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण प्रणाली, दोनों शैलियों को हिंदी के नए नाटककारों मे अपनाया। किसी एक विशेष रंग शैली का ही शुरु से लेकर अंत तक अनुकरण हिन्दी नाटककारों ने नहीं किया। हिन्दी का नया नाटक, इस तरह से अपने ढ़ंग का प्रयोगधर्मी रंगमंच विकसित करने में समर्थ हुआ। फिर भी विसंगत नाटक के शैली शिल्प और संवेदना से वह अधिक प्रभावित हुआ है।

विसंगत नाटक का पतन क्यों?

दशरथ ओझा के अनुसार एब्सर्ड थियेट्रिकल नाट्य-कृतियों में कई ऐसी मूलभूत भूलें थीं, जो उनकी अकाल मृत्यु का कारण बनीं। ऐसे नाटककारों ने जल्दबाज़ी में आकर वैज्ञानिक सिद्धांतों का विरोध किया। एब्सर्ड नाटककारों का मानना था कि मनुष्य और उसका भाग्य सदा बदलता रहता है, और उसमें न तो कोई उद्देश्य होता और न उसका कोई पैटर्न है। ऐसे नाटककार ग़लत विचारों के पोषण में कल्पना शक्ति का दुरुपयोग करते रहे। विसंगत कहानियों के अनुचित प्रयोगों से उन भ्रान्त विचारों की पुष्टि की। उनमें जीवनदायिनी दृष्टि का अभाव था। यह कोई जीवन संदेश देते ही नहीं जिनको स्वीकार अस्वीकार करने का सोचा जा सके। इनका कोई पात्र ऐसा नहीं जिसके साथ सहानुभूति दिखाई जा सके। विचारों की कंगाली, पुनरावृत्ति की अनन्तता, आत्मघाती नाटकीय आविष्करण एब्सर्ड नाटक के विध्वंसक सिद्ध हुए। एब्सर्ड थियेटर की प्रशंसा और प्रसिद्धि का कारण थियेटर की अपनी विशेषताएं नहीं थीं। समय ही ऐसा था कि लोग उस मानसिकता को अंगीकार करने लगे।

इस विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि हालाकि आज के जीवन की संपूर्ण अराजकता का कोलाहल इन नाटकों की संरचना और भाषा में पाया जा सकता है फिर भी ये सभी विसंगतिवादी प्रयोग हमारे सांस्कृतिक-वैचारिक दृष्टिकोण से आरोपित और झूठी बौद्धिक मुद्रा के सैलाब हैं। हमारे देश की स्थिति अभी इतनी पतली और निचुड़ी हुई नहीं है कि हम सब इन अनुकरणात्मक प्रयोगों का साथ दे सकें। भरतीय नाटकों में गहरी हताशा का अंधेरा हमारे जीवनदर्शन के अनुकूल नहीं है। भारतीय दृष्टि में निराशा-पराजय एक संचारी चेतना है। वह स्थायी भाव-संस्कार कभी नहीं रही। स्थायी संस्कार तो आस्था का पुनर्लाभ ही है। जीव के मरने से जीवन नहीं मर जाता। हिन्दी-नाटकों का स्वर अस्तित्ववादी न रह कर सामाजिक परिवर्तन और आस्थावाद का रहा है।

संदर्भ ग्रंथ

१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र, सह सं. डॉ. हरदया, २. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली – खंड ९, ३. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारीप्रसाद द्विवेदी, ४. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. श्याम चन्द्र कपूर, ५. हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, ६. मोहन राकेश, रंग-शिल्प और प्रदर्शन – डॉ. जयदेव तनेजा, ७. हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास – डॉ. दशरथ ओझा, ८. रंग दर्शन – नेमिचन्द्र जैन, ९. कोणार्क – जगदीश चन्द्र माथुर, १०. जयशंकर प्रसाद : रंगदृष्टि नाटक के लिए रंगमंच – महेश आनंद, ११. अन्धेर नगरी में भारतेन्दु के व्यक्तित्व के स र्जनात्मक बिन्दु – गिरिश रस्तोगी, रीडर, हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्व विद्यालय, १२. रंगमंच का सौन्दर्यशास्त्र – देवेन्द्र राज अंकुर, १३. दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज - देवेन्द्र राज अंकुर, १४. आधुनिक भारतीय नाट्य-विमर्श – जयदेव तनेजा

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

नया नाटक


नाट्य साहित्य – नया नाटक 

 मनोज कुमार

हिंदी का नया नाटककार पश्चिम के नाट्य प्रयोगों से बहुत ही प्रभावित हुए। ब्रेख्ट के महाकाव्यात्मक रंगमंच, बेकेट के ‘अब्सर्ड’ (विसंगत) नाट्य लेखन की शैली, अस्तित्ववादी चेतना के नाटक की संवेदना और शिल्प ने इन पर बहुत प्रभाव डाला। प्रभाव क्या कई बार तो यह अनुकरण मात्र लगता है।  ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी मूलभूमि की  समकालीनता को समझने का प्रयास ही नहीं किया जा रहा है।  भारतीय यथार्थ के संदर्भ में ये नाटक बहुत अजनबी लगने लगते हैं। अपनी जमीन की संस्कृति से मानों कोई संबंध ही नहीं है। बस ऐसा लगता है कि पाश्चात्य रंग प्रयोगों का अनुकरण ही लक्ष्य हो, इससे शैली शिल्प के स्तर पर अभूतपूर्व प्रयोग किए जाने लगे। फिर भी प्रस्तुतिकरण के स्तर पर हिंदी नाटक बहुत समृद्ध हुआ।

इस काल में हिंदी के नये नाटककार और रंग निर्देशक समकालीन पश्चिमी रंग प्रयोग विज्ञान से बहुत कुछ सीख कर उसे हिंदी नाट्य सृजन और प्रस्तुतियों में अधिकाधिक अपनाने लगे। इन्हें बर्तोल ब्रेख्ट के आक्रोश गर्भित रंगमंच (Angry theatre) और महाकाव्यात्मक रंग-प्रयोग (Epic theatre) आयनेस्को और बेकेट के विसंगत रंग-प्रयोग (Absurd theatre) काफ़ी प्रभावित करते रहे। उस समय का नाटककार, साहित्यकार और नागरिक जिस तरह का अंतर्द्वन्द्व महसूस कर रहा था, उसकी अभिव्यक्ति में पश्चिम की ये रंग-शैलियां बहुत ही सहायक सिद्ध हुईं। एक ओर सामाजिक खिंचाव और दूसरी ओर दिशाहीनता के कारण अंतर्द्वन्द्व था। इस अंतर्द्वन्द्व को नाट्यबद्ध करने के लिए नाटककार को पश्चिम के अस्तित्ववादी दर्शन से भे प्रेरणा मिली।

नया नाटक अस्तित्ववादी दर्शन की वैचारिक पृष्ठभूमि में रचा गया है। इस दार्शनिक चिंतन की दो कोटियां हैं –
  1. धर्ममूलक अस्तित्ववाद (Religious existendialoism)
धर्ममूलक अस्तित्ववाद के प्रवर्तक किर्केगाद थे। इस विचारधारा के अनुसार मनुष्य के जीवन में आज व्यर्थ-बोध समा गया है। इस व्यर्थता-बोध के मूल में आतंक भरा मन मनस्ताप (Anxiety) है। इस आतंक के मूल में नैराश्य है। इस नैराश्य के मूल में धर्मिक विश्वास का बीज अंतर्निहित है।

  1. अनीश्वर मूलक अस्तित्ववाद
अनीश्वर मूलक अस्तिववाद के प्रवर्तक सार्त्र थे। सार्त्र ने किर्केगाद के अस्तित्ववादी सूत्र के केवल अंतिम शब्द को बदल दिया है। उसने धार्मिक विश्वास की जगह पर व्यक्ति स्वातंत्र्य को रख दिया है। उसने यह माना है कि चुनाव करने की स्वतंत्रता मनुष्य जाति की एक दुखद नियति है। स्वतंत्रता मानव प्रकृति का सहज रूप है। चुनने में स्वतंत्र होना उसकी जीवोचित प्रकृति भी है और आंतरिक संकट को जन्म देने वाली नियति भी है। उसकी इस स्वतंत्र इच्छा शक्ति पर तकनीकी उपकरणों और निरर्थक सिद्ध हो गए प्रचलित सभी आदर्शवादी दर्शनों के आयाचित दबाव ने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है।

जगदीशचन्द्र माथु और मोहन राकेश संवेदना की नई भूमि पर नए प्रयोग शिल्प के द्वारा नाट्य-लेखन की नया रूप देना शुरु किया। यहीं से नए नाटक लिखने का दौर शुरु हुआ। माथुर जी का ‘कोणार्क’ और राकेश जी का ‘लहरों का राजहंस’ और ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिन्दी नया नाटक आधुनिक रूप में परिलक्षित हुए हैं। विगत नाट्य-परंपरा से भिन्न संवेदना और शिल्प के नाटक आज़ादी के बाद के वर्षों में भी न सिर्फ़ विकसित होते रहे बल्कि आंतरिकता के जटिल संसार को प्रतिबद्धता के साथ स्थापित करने के कारण गंभीर सर्जनात्मक नाट्य सर्जन से आभासित भी होते रहे। समय के साथ नये नाटक की सृजनशीलता बाह्य यथार्थ के स्थान पर आंतरिक यथार्थ को रूपायित करने की चेष्टा करने लगी। व्यक्ति के गहरे अंतर्द्वन्द्व, उलझाव और भटकाव के माध्यम से वर्तमान जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्ति प्रदान की गई। लोक-ग्राह्यता की तुलना में व्यक्तिगत विशेषता को अधिक महत्व दिया गया। अस्तित्व की खोज के नाम पर मनुष्य के आचरण, व्यवहार या क्रियाओं का एक ऐसा गड्ड-मड्ड संसार प्रस्तुत किया गया, जो दिशाहीन होने की व्याकुलता की ही संवेदना भरता है।

उल्लेखनीय नाम –

उपेन्द्रनाथ अश्क : पैंतरे (1952), अंजो दीदी (1954), अंधी गली (1954), बड़े खिलाड़ी
विष्णु प्रभाकर : डॉक्टर, अब और नहीं, युगे-युगे क्रांति
धर्मवीर भारती : अंधा युग (1955),
डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल : अंधा कुआं (1955), मादा कैक्टस (1959), सुंदर रस (1959), तीन आंखों वाली मछली (1960), सूखा सरोवर (1960), रक्त कमल (1962), रातरानी (1962), दर्पन (1963), सूर्यमुख (1968), कलंकी (1969), मिस्टर अभिमन्यु (1971), करफ़्यू (1972), राम की लड़ाई, नरसिंह कथा, एक सत्य हरिश्चन्द्र आदि।
मोहन राकेश : आषाढ़ का एक दिन (1958), लहरों के राजहंस (1963), आधे अधूरे (1969)।
सुरेन्द्र वर्मा : द्रोपदी (1970), सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, सेतुबंध, आठवां सर्ग, छोटे सैयद बड़े सैयद
‘अज्ञेय’ : उत्तर प्रियदर्शी
ललित सहगल : हत्या एक आकार की
बृजमोहन शाह : त्रिशंकु, शह पे मात
डॉ. शंकर शेष : एक और द्रोणाचार्य, घरौंदा    , खजुराहो का शिल्पी, फंदी, बंधन अपने-अपने
रेवतीशरण शर्मा : राजा बलि की नई कथा, अपनी धरती,
दया प्रकाश सिन्हा : कथा एक कंस की, इतिहास चक्र
गिरिराज किशोर : नरमेध, प्रजा ही रहने दो,
सुशील कुमार सिंह : सिंहासन खाली है
मुद्राराक्षस : मरजीवा, तेंदुआ, तिलचट्टा, योर्स फ़ेथफुली, गुफ़ाएं, संतोला,
रमेश बख्शी : वामाचार
मन्नू भंडारी : बिना दीवारों के घर
नरेश मेहता : सुबह के घंटे. खंडित यात्राएं
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : बकरी, लड़ाई, कल भात आएगा, अब ग़रीबी हटाओ
मृदला गर्ग : एक और अजनबी
कमलेश्वर : अधूरी आवाज़
अमृत राय : चिंदियों की एक झालर
भीष्म साहनी : हानुश, कबिरा खड़ा बाज़ार में
नरेन्द्र कोहली : शंबूक की हत्या,
मणिमधुकर : इकतारे की आंख, बुलबुल सराय, खेला पोलमपुर
शरद जोशी : एक था गधा उर्फ़ अलादाद खां, अंधों का हाथी

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

नया नाटक और जगदीशचंद्र माथुर

नाट्य साहित्य

नया नाटक और जगदीशचंद्र माथुर

सृजनशीलता का नया रूप प्रकट करने वाला नया नाटक संबंधों के आंतरिक यथार्थ की खोज करता है। यह बाह्य यथार्थ की जगह आंतरिक यथार्थ को नाटक में रूपायित करता है। व्यक्ति के गहरे अंतर्द्वन्द्व, उलझाव, भटकाव आदि के माध्यम से वर्तमान जीवन की दशाओं को व्यंजित करता है। शैली शिल्प के स्तर पर इस तरह के नाटक में प्रतीकात्मक प्रस्तुतिकरण की जाती है। इससे नाट्य-वस्तु अधिक व्यंजक और काव्यात्मक स्वरूप ग्रहण करती है। नया नाटककार अधुनिकता व्यंजक संवेदना को व्यक्त करने के लिए मिथकीय या पौराणिक प्रसंगों को नयी तार्किकता के साथ प्रस्तुत करता है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिम में लोगों की मानसिकता ऐसी हो गई थी जिसमें आध्यात्मिक चिंतन और सामाजिक व्यवस्था लोगों को निरर्थक लगने लगा था। मूल्यहीनता, अनास्था, बढ़ते जा रहे थे। जीवन विसंगतियों से भरा लगने लगा था। मानवीय विघटन थी। उलझाव और संत्रास से मानव त्रस्त था। आक्रोश व्यंजक ब्रेखट की रंगचेतना संत्रास के सामाजिक या बाहरी चेहरे को मामूली आदमी का संत्रास रूपायित करने लगीं। जबकि दूसरी तरफ़ अस्तित्ववादी और विसंगत नाटककार व्यक्तिविशेष के आंतरिक संत्रास और उलझाव को नाट्यबद्ध करने लगे।

ब्रेख्ट की धारणा पर व्यक्तित्वखोजी मानव की झलक सबसे पहले जगदीश चन्द्र माथुर के ‘कोणार्क’ (1946) में देखने को मिलती है। माथुर जी 1941 बैच के आई.ए.एस. थे। बिहार के हाजीपुर अनुमंडल में एस.डी.ओ. नियुक्त हुए। अपने कर्मशील जीवन के तीस वर्ष उन्होंने वैशाली, नालंदा, मिथिला और मगध के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण में लगाए। प्रतिवर्ष होने वाले भव्य वैशाली महोत्सव की परिकल्पना उन्हीं की थी। आकाशवाणी के महानिदेशक के तौर पर उन्होंने देश की सभी भाषाओं और कला-साहित्य की प्रतिभाओं को उससे जोड़ा। उन्होंने ‘दस तस्वीरें’ और ‘जिन्होंने जीना जाना’ रेखाचित्र की रचना की। ‘परम्पराशील नाट्य तथा प्राचीन भाषा नाट्य संग्रह’ शोध-प्रबंध लिखा। 12 वर्ष की आयु में ‘मूर्खेश्वर राजा’ नामक प्रहसन लिखा। 14-15 वर्ष की उम्र में ‘लवकुश’ और ‘शिवाजी’ नामक एकांकी की रचना की। 19 वर्ष की आयु में चर्चित ‘मेरी बांसुरी’ एकांकी की रचना की। इनके एकांकी संग्रह हैं, - ‘भोर का तारा’ और ‘ओ मेरे सपने’।

कुछ समय के लिए इनकी नियुक्ति उड़ीसा में हुई थी। वही इन्होंने ‘कोणार्क’ की रचना की। इस नाटक में मंचीय सार्थकता और नयी जटिल जीवनानुभूतियों की नाटकीय रचनात्मकता लक्षित होती है। इसमें नायिका नहीं है। नायक सर्वहारा वर्ग का एक श्रमिक है। उसके चरित्र में मामूली न्याय से वंचित सामाजिक अस्तित्व के प्रति गहरी चिंता मिलती है। विभिन्न प्रकार के पात्रों, घटनाओं आदि को इसमें इस प्रकार संयोजित किया गया है कि वे विशिष्ट नाटकीय स्थिति में संश्लिष्ट हो उठते हैं। कोणार्क का निर्माण एक गहरे अंतर्द्वन्द्व का परिणाम है, एक प्रकार का उदात्तीकरण है। शिल्पी विशु की रचना की रचना-प्रक्रिया अनेक तरह के अंतःसंघर्षों से प्रेरित है – एक विशेष बिन्दु पर पहुंच कर तो परिवेश का संघर्ष अंतःसंघर्ष से मिल कर इतना उद्वेलनपूर्ण हो उठा है कि रचयिता विशु अपनी रचना का विध्वंस स्वयं कर देता है। कलाकार का युग-युग से मौन पौरुष, जो सौंदर्य-सृजन क्के सम्मोहन में अपने को भूल जाता है, कोणार्क के खंडन में फूट निकलता है।

माथुर जी का दूसरा ऐतिहासिक नाटक है ‘शारदीया’ (1959)। उन्होंने नागपुर के म्यूज़ियम में पांच गज की एक साड़ी देखी जिसका वजन मात्र पांच तोला था। इसे मराठों और हैदरबाद के निज़ाम के बीच 1795 में हुए खुर्दा युद्ध में बन्दी बने एक अज्ञात व्यक्ति ने ग्वालियर क़िले के तहख़ाने में आजीवन कारावास का दंड भुगतते हुए बुना था। लेखक ने ग्वालियर क़िले का वह कक्ष देखा और बाहर-भीतर के अंधेरे, अकेलेपन, घुटन और बेड़ियों में जकड़े उस कलाकार तथा उसकी प्रेमिका की सजीव-साकार कल्पना कर डाली। इसका नायक नरसिंह राव अर्ध-ऐतिहासिक पात्र है। प्रेम और सर्जनात्मक प्रक्रिया का प्रश्न इसमें उठाया गया है। इसमें जहां एक ओर भाषा की सरलता है वहीं दूसरी ओर नाटकीय स्थितियों की तीव्रतापूर्वक प्रस्तुति है।

माथुर जी का तीसरा नाटक ‘पहला राजा’ (1969) है। यह नाटक ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि पर आधारित होने पर भी युगीन संदर्भों से जुड़ा है। माथुर जी ने आधुनिक समय की समस्याओं, विसंगतियों और जटिलताओं को अन्योक्ति-नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है। नाटक में घटनाओं और पात्रों की प्रतीकात्मकता काफ़ी प्रभावित करती है। पौराणिक संदर्भ को लेकर उनकी चौथी कृति ‘दशरथनंदन’ (1974) और पांचवीं कृति ‘रघुकुल रीति’ (मरणोपरान्त) है।

इन नाटकों माथुर जी ने अन्तश्चेतना की भूमिका में स्थित तथ्य के अनुसंधान के लिए मनोविज्ञान का संबल ग्रहण किया और तार्किकता का सहारा लिया। इनकी नाट्य-कला में विविध रंग-शैलियों के सार्थक तत्त्वों का रचनात्मक प्रयोग, काव्यात्मकता, भावेश, तरलता, प्रगतिशील दृष्टिकोण, सामाजिक सरोकार और रंग-शिल्प के दिलचस्प प्रयोग दिखाई पड़ते हैं। भारतीय रंग-परंपरा के साथ इन्होंने पश्चिमी त्रासद-तत्त्व का सुन्दर सामंजस्य स्थापित किया।

संदर्भ ग्रंथ

१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र, सह सं. डॉ. हरदयाल २. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली – खंड ९ ३. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारीप्रसाद द्विवेदी ४. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. श्याम चन्द्र कपूर ५. हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ६. मोहन राकेश, रंग-शिल्प और प्रदर्शन – डॉ. जयदेव तनेजा ७. हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास – डॉ. दशरथ ओझा ८. रंग दर्शन – नेमिचन्द्र जैन ९. कोणार्क – जगदीश चन्द्र माथुर १०. जयशंकर प्रसाद : रंगदृष्टि नाटक के लिए रंगमंच – महेश आनंद ११. अन्धेर नगरी में भारतेन्दु के व्यक्तित्व के स र्जनात्मक बिन्दु – गिरिश रस्तोगी, रीडर, हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्व विद्यालय १२. रंगमंच का सौन्दर्यशास्त्र – देवेन्द्र राज अंकुर १३. दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज - देवेन्द्र राज अंकुर १४. आधुनिक भारतीय नाट्य-विमर्श – जयदेव तनेजा

शनिवार, 10 सितंबर 2011

नया नाटक - संवेदना और शिल्प का नाटक

नाट्य साहित्य

नया नाटक - संवेदना और शिल्प का नाटक

स्वाधीनता के बाद हिंदी-गद्य की सर्वांगीण उन्नति हुई। भारत ने ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर आज़ादी की सुखद और स्फूर्तिदायक सांस ली। इसका परिणाम यह हुआ कि गद्य के क्षेत्र में नये आयामों का उद्घाटन हुआ। अपने मनोभावों को अभिव्यक्ति देने के लिए सर्वथा नवीन साहित्यरूपों का प्रश्रय लिया जाने लगा। नवनिर्माण पर बल दिया जाने लगा। कथ्य की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए सर्वथा नये प्रतीक, उपमान या बिंब ही प्रयुक्त नहीं हुए, बल्कि फ्लैशबैक, चेतना-प्रवाह आदि शैलियों का भी प्रयोग किया जाने लगा। कथानक को गौण मानने तथा पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण करने की प्रवृत्तियों के लेखक मानव-मन के सूक्ष्म से सूक्ष्म संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने में सफल हो सके। इस प्रकार जटिल से जटिलतर होते हुए जीवन-यथार्थ की प्रखर चेतनात्मक अभिव्यक्ति मिली। रचनाकार समस्याओं को यथार्थ की ज़मीन पर ही यथार्थ को देखने, झेलने और रचने को प्रेरित हुए। फलतः प्रचलित साहित्यरूपों की अभ्यस्तता को तिरस्कृत करते हुए नये सहित्यरूप, नयी अभिव्यक्तियां और नयी शैली जन्मी।

हिंदी नाटक भी रंगमंच और यथार्थ से जुड़कर नयी दिशा की ओर उन्मुख हुआ। जगदीशचन्द्र गुप्त और मोहन राकेश ने प्रसाद की नाट्य शैली का अनुकरण करते हुए रंग-शिल्प के नये प्रयोग किए। मंचीय सार्थकता और नयी जटिल जीवनानुभूतियों की नाटकीय रचनात्मकता के लिए इन्होंने संवेदना की नयी भूमियों का उद्घाटन किया। इन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक नाटकों मे लेखन में नये रंग भरे जिससे ‘नया नाटक’ लिखने की एक नई शुरुआत संभव हुई। इन्होंने नाटक लेखन को इस तरह से लिया कि नाटक लेखन और रंगमंच के बीच घनिष्ठ रिश्ता क़ायम हुआ। नाट्य कला में यह एक नया विकास था। संवेदना का स्वर भी आधुनिक बोध के नए स्वरूप को लिए था।

प्रसाद शैली से भिन्नता के कारण इनको हिंदी में नया नाटक या गंभीर नाटक लिखने की शुरुआत करने वाला नाटककार माना गया। धीरे-धीरे इस ढ़र्रे पर शिल्प और संवेदना से युक्त नाटक लिखने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। और फिर हिंदी में नया नाटक का दौर चल पड़ा। जगदीश चन्द्र माथुर कृत ‘कोणार्क’ (1951) और मोहन राकेश कृत ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1956), ‘लहरों के राजहंस’ (1963) में ऐतिहासिक कथानक का आधार तो था, लेकिन शिल्प और संवेदना का एक बदला हुआ आधुनिक रूप दिखा। इनमें समाज और व्यक्ति के जीवन की आंतरिकता के गहरे और जटिल यथार्थ का नाटकत्व प्रकट हुआ। इनमें मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ जीवन के यथार्थ का चित्रण किया हुआ है। एक और विशेषता यह है कि इनमें नाट्य-भाषा और अभिनय के बीच अभिन्न रिश्ता क़ायम किया गया। हिंदी में रंगमंच लेखन की यह एक नई शुरुआत थी।

साठोत्तर के वर्षों में प्रकृतिवादी यथार्थ पर बल दिया जाने लगा। इस तरह के नाटकों में मनोवैज्ञानिक यथार्थ के केन्द्र से मानवीय रिश्तों और उन रिश्तों की संवेदनात्मक स्थितियों को प्रकाशित किया गया। इसप्रकार स्पष्ट बाह्य यथार्थ से कुछ अलग हटकर व्यक्ति के आन्तरिक यथार्थ का चित्रण करना ‘नया नाटक’ की एक विशिष्ट प्रवृत्ति बनकर प्रकट हुई।

संवेदना और शिल्प का नाटक

नया नाटक आज़ादी के बाद सपनों के क्रमशः टूटने से उपजी विवशता और निराशा की संवेदना का नाटक है। बीसवीं सदी के छठे दशक के मध्य से हम पाते हैं कि शिक्षित जनमानस आंतरिक विघटन और घुटन का अनुभव करने लगा। मानव मन की पलने वाली आशाएं टूटीं। इससे एक मोहभंग की स्थिति पैदा हुई। नयी पीढ़ी में कुंठा, वर्जना, घुटन, संत्रास, निराशाएं और आशंका ने जन्म लिया। उसके पहले कुछ वर्षों तक ऐसी स्थिति नहीं था। हालाकि विभाजन का दंश और गांधी जी की हत्या कचोटती रही फिर भी आज़ादी मिलने का हर्ष था, पहली पंचवर्षीय योजना की आंशिक सफलता की ख़ुशी थी। इसलिए सामान्य शिक्षित व्यक्ति अपने को दिशाहीन नहीं समझता था। किंतु साठोत्तर काल तक आते-आते आंतरिक संकट बढ़ गए। रचनाकारों का ध्यान इस ओर गया। इसी आंतरिक संकट को मूर्त करने के लिए नया नाटक का विकास हुआ। आंतरिकता के जटिल संसार को रंगमंचीय प्रतिबद्धता के साथ रूपायित करने के कारण हिंदी का नया नाटक, गंभीर सर्जनात्मक नाट्य सर्जन का आभास देने लगा। (… ज़ारी ….)

उल्लेखनीय नाटक :

विशेष नाट्यप्रवृत्ति के आधार पर डॉ. गिरीश रस्तोगी ने इस प्रकार वर्गीकरण किया है -

भारतीय रंगतत्व अन्वेषक

लक्ष्मी नारायण लाल कृत : सूर्यमुख, एक सत्य हरिश्चन्द्र, मिस्टर अभिमन्यु, दर्पण, अब्दुल्ला दीवाना, सूखा-सरोवर, मादा कैक्टस, अंधा कुंआ, आदि।

गत्यवरोधक विध्वंसक

मोहन राकेश कृत : आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे

सूक्ष्म सौन्दर्यबोधक
सुरेन्द्र वर्मा कृत : द्रौपदी, सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, आठवां सर्ग

समकालीन चेतना संकेतक

गिरिराज किशोर कृत : प्रजा ही रहने दो

शैली अन्वेषक

मुद्राराक्षस कृत : मरजीवा, तिलचिट्टा, योर्स फेथफुली

विडम्बना उद्धारक

डॉ. शंकर शेष कृत : एक और द्रोणाचार्य

प्रयोग धर्मी

ज्ञानदेव अग्निहोत्री कृत : शुतुर्मुर्ग

रमेश बख्शी कृत : देवयानी का कहना है, तीसरा हाथी

हमीदुल्ला कृत विसंगत नाटक : उलझी आकृतियां, दरिन्दे, उत्तर उर्वशी।

बृजमोहन शाह कृत : त्रिशंकु

लोकशैली अन्वेषक

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कृत : बकरी

मणि मधुकर

कुछ अन्य महत्वपूर्ण नाटक :

ललित सहगल कृत : हत्या एक आकार की

अज्ञेय कृत : उत्तर प्रियदर्शी

दया प्रकाश सिन्हा कृत : कथा एक कंस की

रेवती शरन शर्मा कृत : राजा बलि की नयी कथा

नरेन्द्र कोहली कृत : शम्बूक की हत्या

सुशील कुमार सिंह कृत : सिंहासन ख़ाली है

काशी नाथ सिंह कृत : धोआस

बुधवार, 7 सितंबर 2011

प्रसादोत्तर काल का नाट्य साहित्य

प्रसादोत्तर काल का नाट्य साहित्य

बीसवीं सदी के तीसरे दशक के अन्त तक यथार्थवादी नाट्य शैली और रंग-शिल्प को अपनाकर कई यथार्थवादी नाटक या समस्या नाटक देखने को मिलते हैं। कृपानाथ मिश्र कृत “मणि गोस्वामी” (1929), लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत “संन्यासी” (1929), से हम यथार्थवादी नाटक या समस्या नाटक की शुरुआत मान सकते हैं। 1930 के आस पास यथार्थपरक नाटकों का कार्य निर्बाध रूप से गतिशील होता रहा और इस तरह के नाटकों एक धारा सी ही चल पड़ी। सेठ गोविन्द दास (सेवापथ, धीरे-धीरे), उपेन्द्र नाथ अश्क (जय-पराजय, स्वर्ग की झलक, छठा बेटा, भंवर, क़ैद और उड़ान, पैतरे, अलग-अलग रास्ते), उदय शंकर भट्ट (नया समाज), गोविन्द वल्लभ पंत (अंगूर की बेटी), पृथ्वीनाथ वर्मा (द्विविधा), वृन्दावन लाल वर्मा (बांस की फांस, पीले हाथ, लो भाई पंचो लो, खिलौने की खोज), भगवती चरण वर्मा, रमेश मेहता, विमला रैना, विनोद रस्तोगी, विष्णु प्रभाकर (डॉक्टर), इन्द्र सेन सिंह, मोहनलाल महतो वियोगी, रेवती शरण शर्मा, अरिगपूडि (कोई न पराया), मैरूलाल व्यास, मन्नू भंडारी आदि ने अपने लिखे नाटकों में सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है। हालाकि इन नाटकों में यथार्थ का चित्रण तो था, लेकिन यथार्थवादी रंगमंचीय प्रदर्शन का हिंदी में प्रचलन नहीं होने के कारण, उनका नाट्य लेखन रंग-शिल्प की दृष्टि से अधिक प्रभावकारी नहीं बना।

इस काल में भी लोग प्रसाद नाट्य आदर्शों का अनुगमन करते दिखे। प्रसाद की परंपरा में ऐतिहासिक नाटकों, पौराणिक नाटकों, गीति नाटकों, प्रतीक नाटकों के सृजन का कार्य अनरवत भाव से चलता रहा।

उदयशंकर भट्ट कृत : ‘विक्रमादित्य’ (1933), ‘दाहर’ या ‘सिंध पतन’ (1934), ‘मुक्ति पथ’ (1944), ‘शक विजय’ (1949),।

हरिकृष्ण प्रेमी कृत : ‘स्वर्णविहान’ (1930), ‘रक्षाबंधन’ (1934), ‘पाताल-विजय’ (1936), ‘शिव साधना’ (1937), ‘प्रतिशोध’ (1937), ‘स्वप्नभंग’ (1940), ‘आहुति’ (1940), ‘उद्धार’ (1949), ‘प्रकाश स्तम्भ’ (1954), ‘कीर्ति स्तम्भ’ (1955), ‘साँपों की सृष्टि’ (1959), ‘रक्तदान” (1962)।

प्रेमी जी ने भारतीय इतिहास के मुस्लिम काल को आपने नाटकों का आधार बनाया और हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतिपादन पर उनका विशेष बल रहा। उनके नाटक राष्ट्रीयता और देशप्रेम के भावों से ओत-प्रोत हैं और इस रूप में अपने युग के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

चंद्रगुप्त विद्यालंकार कृत : ‘अशोक’ (1935)।

सेठ गोविन्ददास कृत : ‘हर्ष (1935), ‘शशिगुप्त’ (1942)।

लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत : ‘अशोक’ (1926), “संन्यासी” (1929), ‘मुक्ति का रहस्य (1932), ‘राक्षस का मंदिर’ (1932), ‘राजयोग (1934), ‘आधी रात (1934), ‘गरुड़ध्वज’ (1945), ‘वत्सराज (1950), ‘दशाश्वमेध’ (1957), ‘वितस्ता की लहरें’ (1953)।

प्रसाद जी से अलग मार्ग पर चलकर उन्होंने हिन्दी नाट्य-साहित्य को नया मोड़ दिया। उनके ‘संन्यासी’ नाटक के साथ ही हिंदी नाटक के विषय और शिल्प दोनों में बदलाव आया। इस नाटक में राष्ट्र और अपनी संस्कृति के गौरवबोध की प्रेरणा मुख्य रही है। ‘संन्यासी’ से ‘आधी रात’ तक अपने सभी नाटकों में उन्होंने सामाजिक समस्याओं का, विशेषकर नारी समस्याओं को आधार बनाया है। नाट्यशास्त्र की दिशा में उन्होंने मौलिक एवं क्रांतिकारी प्रयोग किए हैं।

वृन्दावनलाल वर्मा कृत : “झांसी की रानी’ (1948), ‘पूर्व की ओर’ (1950), ‘काश्मीर का काँटा’ (1948)।

जगदीश चन्द्र माथुर कृत : ‘कोणार्क’ (1946), ‘शारदीया’, ‘पहला राजा’ (1969)।

देवराज दिनेश कृत : ‘मानव प्रताप’ (1952)।

रामवृक्ष बेनीपुरी कृत : ‘अम्बपाली’।

दशरथ ओझा कृत : ‘प्रियदर्शी सम्राट अशोक’, ‘चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य’।

मोहन राकेश कृत : ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1956), ‘लहरों के राजहंस’ (1963)।

यथार्थवादी नाटकों की रचना संस्कृत नाटकों के विपरीत केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं, अपितु मानवीय विकास में बाधक अवरोधों के संकेत और उनके निवारण के निर्देशों के द्वारा जीवन को विकासोन्मुख बनाने के लिए हुई। यथार्थवादी नाटकों का लक्ष्य समस्याओं को उभारकर जनता के हृदय में असन्तोष उत्पन्न करना रहा है। वे लोग राष्ट्रीय जीवन के विकास के लिए इसे आवश्यक समझते रहे। लेकिन महान कृतियों के लिए जिस महान औदार्य और महती आस्था की अपेक्षा होती है, वह इस युग के नाटकों में उपस्थित नहीं थी। इसीलिए डॉ. दशरथ ओझा कहते हैं, “इस युग के किसी भी समस्या-नाटककार की अनुभूति इतनी गहराई तक नहीं पहुंच पाई कि उसकी कृति स्थाई बन सके।”

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

यथार्थवादी और समस्या नाटक का विकास

नाटक साहित्य-13

यथार्थवादी और समस्या नाटक का विकास

बीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक समाप्त होते-होते सामाजिक जीवन के यथार्थ को लक्ष्यकर सामाजिक नाटक लिखे जाने लगे। इसमें इब्सन के ढर्रे के सामाजिक नाटक या समस्या नाटक की शैली का अनुकरण किया गया। ऐसे नाटक को यथार्थमूलक या समस्यामूलक नाट्क भी कह सकते हैं। इनके कथानक सामाजिक और तात्कालिक समस्याओं पर आधारित होते थे।

सामाजिक मसले ऐसे होते हैं, हम आए दिन उन पर तर्क-वितर्क करते रहते हैं। समस्या नाटकों में भी इन्हीं तर्क-वितर्क पर पात्रों के माध्यम से बल दिया जाता है। जहां एक ओर परम्परागत रूढ़िवादी मूल्य-व्यवस्था का समर्थन करते हैं वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी उन मूल्यों का विरोध। यह टकराहट इन नाटकों का केन्द्र बिन्दु होता है। इस टकराहट से पारिवारिक और सामाजिक जीवन में तनाव उत्पन्न होता है। उन तनावपूर्ण अवस्थाओं का यथातथ्य रूप समस्या नाटकों में प्रकट होता है। ऐसे नाटकों का मूल स्वर सामाजिक कुरीतियों की प्रस्तुति है। इस तरह की प्रस्तुति में परम्परा का तिरस्कार मिलता है।

बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक में कई ऐसे प्रहसन और व्यंग्य पर आधारित सामाजिक नाटक लिखे गए जिनमें यथार्थ परक जीवन-चित्रण का आभास मिलता है। लेकिन इनमें इन रूढ़ियों के तोड़ने का वैसा प्रबल आग्रह नहीं है जैसा कि बाद के दिनों में प्रस्तुत समस्या-मूलक नाटकों में प्रकट हुआ।

लक्ष्मी नारायण मिश्र

लक्ष्मी नारायण मिश्र ने एक समस्या नाटक लिखा था, “मुक्ति का रहस्य”। इसकी भूमिका में उन्होंने सामाजिक या समस्या नाटकों के शिल्प और संवेदना के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की है। ऐसे नाटकों में समसामयिक प्रश्नों की जहां तक संभव हो तथ्य पर आधारित अभिव्यक्ति की जाती है। इस तरह की अभिव्यक्ति में नाटककार की बौद्धिक सोच की ईमानदारी बहुत महत्व रखती है। इन्होंने ‘अशोक’ (1927), ‘संन्यासी (1929), ‘मुक्ति का रहस्य’ (1932), ‘राक्षस का मंदिर’ (1932), ‘राजयोग’ (1934), ‘सिंदूर की होली’ (1934), ‘आधी रात’ (1934), आदि नाटकों की रचना की।

प्रसाद जी से भिन्न मार्ग पर चलकर उन्होंने हिंदी नाटक साहित्य को नया मोड़ दिया। ‘संन्यासी’ की भूमिका में उन्होंने लिखा है, “इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने का काम इस युग के साहित्य में वांछनीय नहीं है।” ‘संन्यासी’ नाटक के साथ हिंदी-नाटक के विषय और शिल्प दोनों में बदलाव आया। उनके सभी नाटक तीन अंकों के हैं। अंकों का विभाजन दृश्यों में नहीं किया गया है। उनके नाटकों के शिल्पविधान पर अंगरेज़ी के यथार्थवादी नाटकों का प्रभाव पड़ा प्रतीत होता है।

‘संन्यासी’ से ‘आधी रात’ तक अपने सभी नाटकों में उन्होंने सामाजिक समस्याओं को आधार बनाया है। उन्होंने विशेष रूप से नारी की स्थिति और उसकी समस्याओं को अपने दृष्टिकोण से चित्रित किया। शिक्षा के प्रसार, स्वातंत्र्य आन्दोलन और नवीन जीवन दर्शन के कारण आधुनिक नारी का ऐसा रूप सामने आया, जिससे हमारा समाज अब तक अपरिचित था। प्रेम और विवाह, प्रणय और दाम्पत्य, काम और नैतिकता विषयक अनेक समस्याएं सहसा उपस्थित हो गईं। मिश्र जी ने इन समस्याओं को उठाते समय सामाजिक वैषम्य की पृष्ठभूमि में नारी और पुरुष के संबंधों का चित्रण किया। समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने बुद्धिवादी दृष्टिकोण का आग्रह रखा। हालाकि उनके नाटकों की नारियां अपने काम-संबंधों में पर्याप्त स्वतंत्रता बरतती हैं और इस कारण उनका चरित्र पहली दृष्टि में भारतीय मान्यताओं के प्रतिकूल दीख पड़ता है, पर गहराई में जाकर देखने से विदित होता है कि उनकी जीवन-दृष्टि मूलतः भारतीय है। ‘मुक्ति का रहस्य’ में पश्चिम के उन्मुक्त प्रेम पर भारतीय दांपत्य-विधान की विजय और ‘सिंदूर की होली’ में विधवा विवाह और नारी-उद्धार के प्रति मनोरमा के दृष्टिकोण से इस कथन की पुष्टि होती है।

अंबिकादत्त त्रिपाठी (सीय-स्वयंवर), रामचरित उपाध्याय (देवी द्रौपदी), रामनरेश त्रिपाठी (सुभद्रा), गंगाप्रसाद अरोड़ा (सावित्री-सत्यवान), गौरीशंकर प्रसाद (अजामिलचरित), वियोगी हरि (छद्मयोगिनी), बेचन शर्मा ‘उग्र’ (महात्मा ईसा) आदि इस काल के कुछ ऐसे नाटककारों के नाम हैं जिन्होंने अपने प्रहसनों और व्यंग्य प्रधान सामाजिक नाटकों में उस समय के समाज की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक-धार्मिक बुराइयों को सामने लाने का प्रयास किया। हालाकि वे सुधार की भावना से प्रेरित थे, लेकिन उनमें रूढ़ियों के प्रति विद्रोह का स्वर प्रमुख नहीं था।

मिश्र बंधुओं द्वारा लिखा हुआ नाटक “नेत्रोन्मीलन” (1915), प्रेमचन्द का “संग्राम” (1922), राजा लक्ष्मण सिंह का “ग़ुलामी का नशा” (1922) आदि प्रहसनों में यथार्थवादी दृष्टि का अधिक विकसित रूप मिलता है, फिर भी उनकी वस्तु निरूपण शैली प्रहसनात्मक ही है। हास्य रस इन रचनाओं के केन्द्रीत लक्ष्य हैं। वैचारिकता को केन्द्र विषय बनाकर ये नाटक नहीं रचे गए।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

प्रसाद जी के नाटकों की मौलिक विशेषताएं


नाटक साहित्य-12
नाटक साहित्य प्रसाद युग-5

प्रसाद जी के नाटकों की मौलिक विशेषताएं

रोमांटिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नाटकों का सृजन कर प्रसाद ने हिंदी नाटक को नई दिशा दी। इनके माध्यम से उन्होंने हिन्दी-नाट्यसाहित्य को विशिष्ट स्तर और गरिमा प्रदान की। उनके लिए नाटक एक साहित्य विधा है। उनका मानना था कि नाटक की रचना रंगमंच को ध्यान में रखकर नहीं की जानी चाहिए। बल्कि नाटक के अनुसार रंगमंच को रूपांतरित किया जाना चाहिए। इससे उनके नाटकों का वैशिष्ट्य निर्मित हुआ।

प्रसाद जी मुख्यतः ऐतिहासिक नाटककार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने अपने अधिकांश नाटकों की कथा-वस्तु इतिहास से ली है। ऐतिहासिक नाटक लिखने का एक प्रमुख कारण यह था कि वे नाटकों के माध्यम से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे जनमानस को प्रेरित करना चाहते थे। वे भारतीय संस्कृति को उजागर करना चाहते थे। परतंत्र देश का लेखक वर्तमान की क्षतिपूर्ति अपने गौरवमय अतीत में करता है। जनता में यह विश्वास व्याप्त था कि जो कुछ अच्छा है, या हो सकता है, वह सब प्राचीन भारत में था। इस विश्वास से चालित होकर साहित्य का सृजन किया जाने लगा। प्रसाद जी के ऐतिहासिक नाटकों का फलक अति विराट होता है। इसमें पूरे राष्ट्र की समस्याएं अभिव्यक्त होती हैं। वे उन्हें सरल रूप में नहीं वरन्‌ जटिल रूप में रखते हैं। हिंदी नाटकों को इतने विराट परिप्रेक्ष्य में रचने का ऐसा उपक्रम बहुत कम हुआ है।

प्रसाद जी ने अपने नाटकों में पात्रों का चरित्र चित्रण बड़ी सावधानी से गढ़ा है। उन्होंने इतिहास के प्रसिद्ध पात्रों में नया जीवन भर दिया। पात्रों के मन का विश्लेषण बड़ी बुद्धिमत्ता से किया। नारी पात्रों में उनकी कल्पना और भावुकता का अधिक पुट है और उनका व्यक्तित्व अधिक औपन्यासिक और रोमांटिक है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वे नाट्य-वस्तु को ऐसे-ऐसे घुमाव देते थे जिससे मानवीय संबंधों की अनेकानेक संवेदनाएं प्रकट होती थीं। जिन जीवन प्रसंगों के प्रति इतिहास मौन था उसे वह अपनी कल्पना से रूप और आकार देते थे। इस कोशिश में उनके नाटकों के कथानक जटिल हो गए। उनके नाटकों में आचार्य शुक्ल के अनुसार, “प्राचीन काल की परिस्थितियों के स्वरूप की मधुर भावना के अतिरिक्त भाषा को रंगनेवाली चित्रमयी कल्पना और भावुकता की अधिकता भी विशेष परिमाण में पाई जाती है। इससे कथोपकथन कई स्थलों पर नाटकीय न होकर वर्तमान गद्यकाव्य के खंड हो गए हैं। बीच बीच में जो गान रखे गए हैं वे न तो प्रकरण के अनुकूल हैं, न प्राचीन काल की भावपद्धति के। वे तो वर्तमान काव्य की एक शाखा के प्रगीत मुक्तक (लिरिक्स) मात्र हैं”

प्रसाद जी के नाटकों में संवादों की भाषा की भी काफ़ी आलोचना की जाती रही है। संस्कृतनिष्ठ, तत्सम शब्दावली और काव्यात्मक विशेषताओं से युक्त भाषा को नाटकों के लिए बहुत उपयुक्त नहीं माना जाता। प्रसाद के नाटकों का भाषिक मूल्यांकन का यह तरीक़ा सही प्रतीत नहीं होता। प्रसाद पारसी नाटकों की उर्दू-मिश्रित हिंदी से नाटकों की भाषा को छुटकारा दिलाना चाहते थे। वह नाटकों की भाषा को साहित्यिक और रचनात्मक बनाना चाहते थे। छायावाद के प्रमुख स्तंभ होने के कारण उसका प्रभाव उनके नाटकों की भाषा पर भी था।

उनके नाटकों की कथावस्तु में पर्याप्त नाटकीय तत्व मिलते हैं। प्रसाद के नाटकों में एक दोष यह भी माना जाता है कि उनमें पात्रों की बहुलता होती है। नाटक में ज़्यादा पात्र होने पर उनके निजस्व को चित्रित करना नाटककार के लिए मुश्किल हो जाता है। हालाकि प्रसाद जी के नाटकों में पात्रों की संख्या अधिक ज़रूर है, लेकिन कथा के केन्द्र में एक-दो पात्र ही होते हैं। फिर भी उनकी सफलता इस बात में है कि चरित्र छोटा हो या बड़ा उसकी विशिष्टता और महत्व को पूरी तरह से चित्रित करने में वे सफल होते हैं।


प्रसाद अपने नाटकों का इतिहास और कल्पना का बेजोड़ समन्वय उनके नाटकों को बहुआयामी चित्र प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने इतने विविध प्रकार के पात्रों की सृष्टि की है कि उनके माध्यम से पूरा युग ही सजीव होकर सामने उपस्थित हो गया है। उन्होंने इतिहास की प्राचीन घटनाओं के माध्यम से व्यंग्य रूप में वर्तमान की सम्स्याओं का चित्रण और समाधान प्रस्तुत किया। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं, “उनके ऐतिहासिक नाटक पीछे लौटने की सलाह लेकर नहीं आए, आगे बढ़ने की प्रेरणा लेकर आए थे।” प्रसाद के नाटकों का सही मूल्यांकन इस बात से नहीं होगा कि उनका मंचन कितनी सफलता के साथ किया जा सकता है बल्कि एक रचनात्मक कृति के तौर पर वह कितना प्रभावशाली है। यह प्रसाद के नाटकों की शक्ति भी है और सीमा भी।

रविवार, 21 अगस्त 2011

प्रसाद जी की नाट्य संबंधी सोच


नाटक साहित्य-11

नाटक साहित्य – प्रसाद युग-4

प्रसाद जी की नाट्य संबंधी सोच

प्रसाद जी ने ‘हिंदी नाटक का स्थान’, ‘नाटकों में रस का प्रयोग’, ‘नाटकों का आरंभ’ और ‘रंगमंच’ नामक अपने लेखों में नाटक और रंगमंच पर विचार किया है। जब उन्होंने नाटक लिखना शुरु किया था तब हिंदी में नाटकों की समृद्ध परंपरा नहीं थी। भारतेन्दु युग के नाटक उनके सामने थे। इसके साथ ही संस्कृत और पश्चिम के नाटकों की समृद्ध परंपरा भी मौज़ूद थी। उन्होंने संस्कृत के नाटकों और नाट्य संबंधी अवधारणाओं का गहरा अध्ययन किया। पश्चिम के नाट्य चिंतन और परंपराओं से भी वे वाकिफ़ थे। उस समय के रंगमंच पर खेले जाने वाले नाटकों पर पश्चिम के नाटकों का गहरा प्रभाव था। उस समय एक तो शिक्षित समाज के लिए अभिजात्य नाटक खेले जाते थे वहीं दूसरी तरफ़ जनसाधारण के पारसी रंगमंच के नाटक थे। प्रसाद हिंदी पर पारसी रंगमंच के प्रभाव को अच्छा नहीं मानते थे। वे अपनी नाट्य परंपरा के अनुरूप हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास के समर्थक थे।

प्रसाद जी नाटक को ‘कला का विकसित रूप’ मानते थे। वे नाटक को ‘सब ललित सुकुमार कलाओं का समन्वय’ कहते थे। नाटक में दृश्य और श्रव्य दोनों कलाओं की अनुभूति होती है। इसलिए वे यह नहीं चाहते थे कि लोग नाटक को देखते वक़्त खुद को भूल जाएं और तल्लीन हो जाएं। प्रसाद जी नाटकीयता और सोद्देश्यता दोनों को नाटक के लिए ज़रूरी मानते थे। वे कहते थे, “जो नाटक मनोभाव का विश्लेषण करके चमत्कार के बल से मोहता हुआ, अंतःकरण में आदर्श सत्य को स्वयंमेव विकसित कर देता है, उसे ... सभी सभ्य जातियों के साहित्य में सम्मान मिलता है।”

प्रसाद जी के अनुसार पश्चिम में कला को अनुकरण माना जाता है जबकि हमारे यहां कला में दार्शनिक सत्य की प्रतिष्ठा की जाती है। आत्मा का अभिनय भाव है। भाव ही आत्म-चैतन्य में विश्रान्ति पा जाने पर रस होते हैं। जैसे विश्व के भीतर से विश्वात्मा की अभिव्यक्ति होती है, उसी तरह नाटकों से रस की। भरत के अनुसार नाटक देखते हुए जो हृदय स्थित भाव है, वही परिपक्व होकर रस रूप में परिणत हो जाता है। जब अभिनेता अपने आत्म चैतन्य में तल्लीन हो जाता है तो उसका भाव रस रूप में परिणत हो जाता है। इस प्रकार पश्चिम में नाटक के केन्द्र में अनुकरण होता है जबकि भारत में रस। इसलिए प्रायः भारत में नाटकों का अंत सुख या आनंद में होता है जबकि पश्चिम में दुखांत।

पश्चिम के नाटकों में त्रासदी का ज़ोर रहा तो इसीलिए कि उनकी परिस्थिति ने उन्हें लगातार दुख और संघर्ष की ओर अग्रसर किया। उपनिवेशों की खोज में दुर्गम भूभागों में उन्हें भटकना पड़ा। विपरीत परिस्थितियों से निरंतर संघर्ष करते हुए जीवन जीना पड़ा। इसीलिए उन्होंने जीवन को दुखमय (ट्रेजेडी) समझ लिया। चूंकि उन्होंने भावना की बजाए बुद्धि पर अधिक भरोसा किया इसलिए उन्होंने इस दुख को ही जीवन का सत्य समझ लिया।

बुद्धिवाद और दुख को (ट्रेजेडी) प्रधानता देने के कारण ही पश्चिमी सिद्धांत मनुष्य के चरित्र-निर्माण का पक्षपाती है। नाटक देखकर या कविता पढ़कर यदि मनुष्य अपने को बुराई की तरफ़ जाने से रोकता है और अपने चरित्र में संशोधन करता है तो साहित्य का लक्ष्य पूरा हो जाता है। मौज़ूदा साहित्य की दो प्रमुख विशेषताओं – व्यक्ति-वैचित्र्य और यथार्थवाद को इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। प्रसाद पाश्चात्य के व्यक्ति-वैचित्र्य को साधन मानते हैं, साध्य नहीं। किन्तु उन्होंने आदर्शवाद को भी अंतिम नहीं माना है। उनके शब्दों में, “चरित्र-चित्रण आदर्श के लिए हो, यह अति उत्तम सिद्धांत नहीं है, क्योंकि चरित्र-चित्रण का लक्ष्य आदर्श तो अवश्य है, किन्तु प्रत्येक चरित्र आदर्श हो तो वही उपर्युक्त दोषापत्ति हो जाती है।” प्रसाद ने पात्र के ‘नैतिक विकास’ अर्थात्‌ व्यक्तित्व के सहज विकास को मुख्यता दी है।

पश्चिम के विपरीत भारतीय परंपरा रस पर आधारित है। इसका कारण यह है कि पश्चिम की तरह आर्यों को घरबार छोड़कर इधर-उधर भटकना न पड़ा। भारतीय आर्य निराशावादी नहीं थे। उन्होंने प्रत्येक भावना में अभेद निर्विकार, अनंद लेने में अधिक सुख माना। रस में लोकमंगल की भावना प्रच्छन्न रूप में विद्यमान रहती है। भारतीय परंपरा में लोकमंगल स्थूल सामाजिक रूप में नहीं बल्कि दार्शनिक सूक्ष्मता के आधार पर मौज़ूद रहता है। जबकि पश्चिम में वासना का आधार रहता है। वासना से ही क्रिया संपन्न होती है। क्रिया के संकलन से व्यक्ति का चरित्र बनता है। चरित्र में महत्ता का आरोप हो जाने पर, व्यक्तिवाद का वैचित्र्य उस महती लीलाओं से विद्रोह करता है। इस प्रकार पश्चिम का साहित्य व्यक्ति और समाज की वासनात्मक क्रियाओं से ही संचालित और प्रेरित होता है। यही कारण है कि उसमें किसी दार्शनिक श्रेष्ठता के दर्शन नहीं होते।

आत्माभिव्यक्ति की गीतात्मकता को प्रसाद ने रसानुभूति माना है। रसवाद को अपनाने के कारण मनुष्य की वासनात्मक मनोवृत्तियां साधारणीकरण के द्वारा आनंदमय बना दी जाती हैं। इससे मनुष्य की वासना का संशोधन हो जाता है। इससे मनुष्य की विशिष्टता और विभिन्नता समाप्त हो जाती है। मनुष्य की भावनाओं को मानवीय आधार मिल जाता है। इस आधार हम पाते हैं कि प्रसाद जी नाट्य रचना के लिए पश्चिम के अनुकरण सिद्धांत, बुद्धिवाद और दुख व निराशा को स्वीकार नहीं करते। वे नाटक में लोकमंगल को स्वीकार करते हुए भी रस को ही उसका लक्ष्य मानते हैं। प्रसाद द्वारा विवेचित ‘रसानुभूति’ ही ‘रंगानुभूति’ और ‘जीवनानुभूति’ है, क्योंकि उन्होंने रस का विवेचन ‘नाट्य’ और जीवन-संदर्भों के साथ जोड़ते हुए किया है। एक तरह से वे रस पर विचार करते हुए यथार्थवाद की अपनी परंपरा को तलाशते हैं।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि प्रसाद ने अनेक भारतीय रंग-परंपराओं की युक्तियों, रूढ़ियों और व्यवहारों का रचनात्मक उपयोग किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने आंशिक रूप से इन्हें नए संदर्भों में स्वीकारा, और कहीं-कहीं नकारा भी है। उनकी यह स्वीकृति न तो विवशता थी और न ही अस्वीकृति महज़ फैशन। वे अपनी विषय-वस्तु के अनुकूल रंग-तत्वों की तलाश करते रहे, जो विशुद्ध मनोरंजन से हटकर नए जीवन-बोध को अनेक आयामों के साथ व्यंजित कर सकें। इस पुनर्रचना के तहत उन्होंने न तो संस्कृत नाटकों के शास्त्रीय नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया है, न पारसी नाटकों की अतिनाटकीयता को पूर्णतया स्वीकार किया है, न इब्सन की तरह नाटकों को तर्कमूलक बनाया है और न ही शेक्सपियर के त्रासदी नाटकों से आतंकित हुए हैं।

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संदर्भ ग्रंथ

१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र, सह सं. डॉ. हरदयाल २. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली – खंड ९ ३. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारीप्रसाद द्विवेदी ४. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. श्यम चन्द्र कपूर ५. हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ६. मोहन राकेश, रंग-शिल्प और प्रदर्शन – डॉ. जयदेव तनेजा  ७. हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास – डॉ. दशरथ ओझा ८. रंग दर्शन – नेमिचन्द्र जैन  ९. कोणार्क – जगदीश चन्द्र माथुर १०. जयशंकर प्रसाद : रंगदृष्टि नाटक के लिए रंगमंच – महेश आनंद ११. अन्धेर नगरी में भारतेन्दु के व्यक्तित्व के स र्जनात्मक बिन्दु – गिरिश रस्तोगी, रीडर, हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्व विद्यालय १२. रंगमंच का सौन्दर्यशास्त्र – देवेन्द्र राज अंकुर १३. दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज - देवेन्द्र राज अंकुर

रविवार, 14 अगस्त 2011

प्रसाद जी की नाट्य-रचनाएं


नाटक साहित्य-10

नाटक साहित्य प्रसाद युग-3

प्रसाद जी की नाट्य-रचनाएं

हैं –
१.      सज्जन (1910) : महाभारत के कथानक को लेकर रचा गया नाटक। गंधर्व चित्रसेन दुर्योधन को उसके मित्रों सहित बन्दी बनाता है। युधिष्ठिर के कहने पर अर्जुन चित्रसेन से युद्ध करने जाता है। चित्रसेन मित्र अर्जुन को पहचान लेता है और दुर्योधन को छोड़ देता है। इसमें भारतेन्दु काल की नाट्य-शैली अपनाई गई है। इसमें पद्यात्मक संवाद योजना है। गद्य में खड़ी बोली है, किंतु पद्य में ब्रजभाषा का व्यवहार किया गया है।

२.      कल्याणी परिणय (1912) : इस एकांकी नाटक का कथानक संक्षिप्त और सरल है। चंद्रगुप्त, कार्नेलिया, सिल्यूकस आदि इसके प्रमुख पात्र हैं। सिल्यूकस चन्द्रगुप्त से सन्धि कर अपनी पुत्री का पाणिग्रहण उससे कर देता है।  ‘चंद्रगुप्त’ इसी का विकसित रूप है। पद्यात्मक संवाद योजना है।

३.      प्रायश्चित (1014) : यह एक एकांकी रूपक है। इसमे जयचंद की मृत्यु घटना को प्रचलित इतिहास से भिन्न रूप में प्रदर्शित किया गया है। अपने कुकर्मों पर पश्चाताप करता हुआ जयचन्द शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय गंगाजी में डूबकर आत्महत्या कर लेता है। संवाद योजना पद्यात्मक नहीं है।

४.      करुणालय (1921) : यह एक गीति नाट्य है। यह ‘इन्दु’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें प्रसाद जी ने ‘अमित्राक्षर अरिल्ल’ छन्द का उपयोग किया है। पितृभक्त शुनःशेप अपने माता-पिता की आज्ञा मानकर नरमेध-यज्ञ के लिए जीवन उत्सर्ग करने को प्रस्तुत होता है, किन्तु राजकुमार रोहित पिता की आज्ञा अनुचित समझकर स्वतन्त्र मत की स्थापना करता है। सम्पूर्ण नाटक पांच दृश्यों में विभक्त है। इसका नाटकीय तत्व कहानी तत्व के सामने फीका पड़ गया है।

५.      राज्यश्री (1915) : इसके दो संस्करणों में भिन्नता पाई जाती है। प्रथम संस्करण की त्रुटियों को दूसरे संस्करण में सुधारा गया है। कल्याणी परिणय और प्रायश्चित रूपकों में इतिहास की मर्यादा का उतना पालन नहीं हुआ है जितना राज्यश्री में। इस नाटक में मालवा, स्थाणेश्वर, कन्नौज और मगध की राजपरिस्थितियों का दिग्दर्शन होता है। इसे प्रसाद जी का प्रथम ऐतिहासिक नाटक कहना उचित होगा। स्थानेश्वर में अपना राज्य स्थापित कर प्रभाकरवर्धन सीमा का विस्तार करता है। अपनी पुत्री राज्यश्री की विवाह कन्नौजराज ग्रहवर्मन से कर देता है। स्थानेश्वर और कन्नौज का उत्कर्ष देखकर मालवा और गौड़ ईर्ष्यालु बन गए। इन्हीं ईर्ष्यालु राजाओं के कुचक्रों की लीला इस नाटक में देखने को मिलता है।

६.      विशाख (1921) : उस समय सत्याग्रह आन्दोलन देशव्यापी बन रहा था। शासक वर्ग भक्षक हो चला था। जनता में उत्तेजना फैल रही थी। इसी प्रकार की घटना को लेकर ‘विशाख’ की रचना की गई थी। नाग जाति की लक्ष्मी चन्द्रलेखा के उपभोग के लिए कामुक किन्नर नरदेव आतुर है और जैसे-तैसे उसका अपहरण भी कर लेता है। फिर तो समस्त नाग जाति विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देती है और अभीष्ट को प्राप्त कर लेती है। इस नाटक में तत्कालीन थियेट्रिकल कम्पनियों के नाटकों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

७.      अजातशत्रु (1922) : इस नाटक में चार राज्यों, मगध, काशी, कोशल और कौशाम्बी को कथानक का केन्द्र बनाया गया है। बिम्बसार, प्रसेनजित, उदयन, पद्मावती, वासवी आदि पात्र एक दूसरे से संबंधित हैं और इन चार राज्यों से एक या दूसरे का स्म्बंध है। चारों राज्य एक-दूसरे से इतने सम्बद्ध हैं कि एक राज्य में घटित होनेवाली घटना का प्रभाव अनिवार्य रीति से शेष पर पड़ता ही है। सभी जगह क्रान्ति का घोष सुनाई देता रहता है। इस अमर कृति में एक ऐसी विचारधारा प्रवाहित होती है जो संतप्त मानव-जीवन को शान्ति प्रदान करती है। डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार, इस नाटक के “कथानक के संगठन में जो नाट्यकला झलकने लगती है, वह चरित्र-चित्रण और अंतर्द्वन्द्व की ज्योति पाकर चमक उठती है।” प्रसाद जी ने विविध घटनाओं को श्रृंखलाबद्ध करने का जो पहला प्रयास किया, उस नये प्रयोग में वे सफल रहे।

८.      जनमेजय का नागयज्ञ (1926) : इसका कथानक महाभारत से लिया गया है। ब्रह्म-हत्या के प्रायश्चित-स्वरूप राजा जनमेजय ने जो अश्वमेघ यज्ञ किया, उसको केन्द्र में रखक्रकर यह नाटक लिखा गया है। इस नाटक में पहले के नाटकों से अलग योजना है। इसके कारण पर विचार करते हुए डॉ. दशरथ ओझा कहते हैं, “आश्चर्य नहीं कि तत्कालीन हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष को देखकर प्रसाद जी को इस समस्या के सुलझाने का विचार मन में आया हो। ... नाटक का कथानक 1926 में होने वाले भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगे की ओर संकेत करता है। उस काल में महात्मा गांधी दोनों जातियों में पुनः सौमनस्य स्थापित करने का आन्दोलन चला रहे थे। प्रसाद जी महात्मा गांधी जी द्वारा संचालित आंदोलन में यद्यपि सक्रिय भाग नहीं लेते थे, किन्तु उनके सिद्धान्तों से सहमत होने के कारण अपने सुसंस्कृत नाटकों में उनके विचारों को सन्निविष्ट करते जाते थे।” इस नाटक में प्रसाद जी ने जो दृश्य योजना की है, कला की दृश्टि से अस्वाभाविक है।

९.      कामना (1927) : प्रसाद जी ने दार्शनिक विचारों को मूर्तरूप देने के लिए मनोवृत्तियों को पात्र बनाकर इस नाटक की रचना की। इसके पुरुष पात्र हैं – संतोष, विनोद, विलास, विवेक, दम्भ, दुर्वृत्त आदि और स्त्री पात्र हैं शान्ति, कामना, लीला, लालसा, करुणा, महात्त्वाकांक्षा आदि। इस नाटक में प्रतीकात्मक पात्रों के चरित्र चित्रण द्वारा उन्होंने मानव-जाति की सभ्यता और संस्कृति के विकास और ह्रास का इतिहास अंकित किया है। द्विजेन्द्रलाल राय का मत है, “कामना में जिस प्रतीकात्मक शैली का सूत्रपात हुआ है वह आगे चलकर ‘आंसू’ (काव्य), ‘प्रतिध्वनि’ (कहानी० और ‘एक घूंट’ (नाटक) में विकसित हुई है और वही ‘कामायनी’  में पूर्ण प्रस्फुटित हो उठी है।” ‘कामना’ में विभिन्न मनोविकारों को प्रतीक के रूप में रंगमंच पर उपस्थित किया गया है। उनके कार्यकलापों के द्वारा मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास की कथा प्रस्तुत की गई है। हालाकि नाट्यशिल्प की दृष्टि से इसे विशेष महत्व नहीं दिया जा सकता, पर इससे प्रसाद जी की प्रयोगधर्मिता का तो पता चलता ही है।

१०.  स्कन्दगुप्त (1928) : प्रसाद जी के नाटकों में ‘स्कंदगुप्त’ का महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है। इसकी कथावस्तु गुप्त वंश के प्रसिद्ध सम्राट स्कंदगुप्त के जीवन पर आधारित है। उसका समय 5वीं सदी माना जाता है। यह वह समय था जब देश शकों और हूणों के हमले से आक्रांत था। स्कंदगुप्त ने हूणों के हमले से अपने राज्य की रक्षा की। जब प्रसाद जी ने इस नाटक की रचना की तब देश पर अंग्रेज़ों का शासन था। आज़ादी की लड़ाई ज़ारी थी। ज़ाहिर है कि देशभाक्ति की भावना के प्रसार द्वारा लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा इस संघर्ष में शामिल किया जा सकता था। यह तभी संभव था जब लोग जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के मतभेदों से ऊपर उठ कर और एकजुट होकर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते। ‘स्कंदगुप्त’ में समृद्धि और ऐश्वर्य के शिखर पर आसीन गुप्त-साम्राज्य की उस स्थिति का चित्रण हुआ है, जहां आंतरिक कलह, पारिवारिक संघर्ष और विदेशी आक्रमणों के फलस्वरूप उसके भावी क्षय के लक्षण दिखने लगे हैं। विषय और रचना शिल्प की दृष्टि से यह प्रसाद जी का सर्व-श्रेष्ठ नाटक माना जाता है। भारतीय और पाश्चात्य नाटक पद्धतियों का इतना सुंदर समन्वय उनके अन्य नाटक में नहीं मिलता। स्कंदगुप्त और देवसेना के चरित्र पाठकों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

११.  चन्द्रगुप्त (1931) : ‘चंद्रगुप्त’ में विदेशियों से भारत का संघर्ष और उस संघर्ष में भारत की विजय की थीम उठायी गयी है। प्रसाद जी के मन में भारत की गुलामी को लेकर गहरी व्यथा थी। इस ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अपने इसी विश्वास को वाणी दी है। शिल्प की दृष्टि से इसमें अपेक्षाकृत गति शिथिल है।  इसकी कथा में वह संगठन, संतुलन और एकतानता नहीं है, जो ‘स्कंदगुप्त’ में है। अंक और दृश्यों का विभाजन भी असंगत है। चरित्रों का विकास भी ठीक तरह से नहीं हो पाया है। फिर भी ‘चंद्रगुप्त’ हिंदी की एक श्रेष्ठ नाट्यकृति है, प्रसाद जी की प्रतिभा ने इसकी त्रुटियों को ढंक दिया है।

१२.  ध्रुवस्वामिनी (1933) : ‘ध्रुवस्वामिनी’ का प्रसाद जी के नाटकों में एक विशिष्ट स्थान है। इसका विशेष महत्व समस्यानाटक के रूप में है। इसमें तलाक और पुनर्विवाह की समस्या को बड़े कौशल से उठाया गया है।

१३.  एक घूंट (1930) : ‘एक घूंट’ का विशेष महत्व इसके एकांकी होने में है। हालाकि आधुनिक एकांकी की एकलक्ष्यता, तीव्रता और यथार्थबोध का इसमें नितांत अभाव है, फिर भी नाट्यशिल्प की दिशा में प्रसाद जी का यह प्रयोग उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।

डॉ. दशरथ ओझा के शब्दों में कहें तो प्रसाद जी के नाटक किसी भी उत्कृष्ट कृति की तरह उन लोगों की समझ से बाहर रहे हैं जिनको अपनी संस्कृति, दर्शन और इतिहास और भाषा की गरिमा का न तो ज्ञान है और न उनमें आस्था। प्रसाद जी के नाटक चाहे रंगमंचीय हों, चाहे न हों, वे हिन्दी साहित्य की बहुमूल्य निधि माने गए हैं और माने जाएंगे।