केले का पेड़
उधर से आए सेठ जी
इधर से संन्यासी,
एक ने कहा, एक ने मानी --
(दोनों ठहरे ज्ञानी)
दोनों ने पहचानी
सच्ची सीख, पुरानी :
दोनों के काम की,
दोनों की मनचीती --
जै सियाराम की!
सौटंच सत्यानासी।

कि
मानुस हो तो ऐसा …
जैसा केले का पेड़
जिस का सब कुछ काम आ जाये।
(मुख्यतया खाने के!)
फल खाओ, फूल खाओ,
घौद खाओ, मोचा खाओ,
डण्ठल खाओ, जड़ खाओ,
पत्ते – पत्ते का पत्तल परोसो
जिस पर पकवान सजाओ :
(यों पत्ते भी डाँगर तो खायेंगे --
गो माता की जै हो, जै हो!)
यों, मानो बात तै हो :
इधर गये सेठ, उधर गये संन्यासी।
रह गया बिचारा भारतवासी।
ओ केले के पेड़, क्यों नहीं भगवान् ने तुझे रीढ़ दी
कि कभी तो तू अपने भी काम आता --
चाहे तुझे कोई न भी खाता --
न सेठ, न संन्यासी, न डाँगर-पशु --
चाहे तुझे बाँध कर तुझ पर न भी भँसाता
हर असमय मृत आशा-शिशु?
तू एक बार तन कर खड़ा तो होता
मेरे लुजलुज भारतवासी!


हे कृष्ण …!
संगीता स्वरूप