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शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

केले का पेड़

अज्ञेयअज्ञेय की कविता

केले का पेड़

उधर से आए सेठ जी

इधर से संन्यासी,

एक ने कहा, एक ने मानी --

(दोनों ठहरे ज्ञानी)

दोनों ने पहचानी

सच्ची सीख, पुरानी :

दोनों के काम की,

दोनों की मनचीती --

जै सियाराम की!

सौटंच सत्यानासी।

 

 

कि

मानुस हो तो ऐसा …

जैसा केले का पेड़

जिस का सब कुछ काम आ जाये।

(मुख्यतया खाने के!)

फल खाओ, फूल खाओ,

घौद खाओ, मोचा खाओ,

डण्ठल खाओ, जड़ खाओ,

पत्ते – पत्ते का पत्तल परोसो

जिस पर पकवान सजाओ :

(यों पत्ते भी डाँगर तो खायेंगे --

गो माता की जै हो, जै हो!)

यों, मानो बात तै हो :

इधर गये सेठ, उधर गये संन्यासी।

रह गया बिचारा भारतवासी।

 

ओ केले के पेड़, क्यों नहीं भगवान्‌ ने तुझे रीढ़ दी

कि कभी तो तू अपने भी काम आता --

चाहे तुझे कोई न भी खाता --

न सेठ, न संन्यासी, न डाँगर-पशु --

चाहे तुझे बाँध कर तुझ पर न भी भँसाता

हर असमय मृत आशा-शिशु?

तू एक बार तन कर खड़ा तो होता

मेरे लुजलुज भारतवासी!

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

मन-मस्तिष्क सितार हो गए–कविता श्यामनारायण मिश्र

वसन्त का आगमन हो चुका है. १४फ़रवरी भी निकट ही है. ऐसे में वातावरण में एक संगीत सा रच बस गया है. ऐसे में  मुझे श्यामनारायण मिश्र जी की एक छोटी कविता याद आ रही है. उसे ही आज पेश करता हूं.
मन-मस्तिष्क सितार हो गए
तुमने नेह-नज़र से देखा
    सब अभाव अभिसार हो गए.
मनु के एकाकी जीवन में
    श्रद्धा के अवतार हो गए.

हर मौसम वसंत का मौसम
             रात चांदनी रात हो गई.
कांटों के जंगल में जैसे
            फूलों की बरसात हो गई.
जब से छेड़ दिया है तुमने
      मन-मस्तिष्क सितार हो गए.
तुमने नेह-नज़र से देखा
    सब अभाव अभिसार हो गए.
मनु के एकाकी जीवन में
    श्रद्धा के अवतार हो गए.

सोमवार, 6 सितंबर 2010

वेदना सृजन की





अंतस की गहराई से


जब आह निकलती है


विलपत हो शब्दों में


तब वो रचना बनती है .



शब्दों को यूँ बाँध - बाँध कर


मन को बांधा करते हैं


अश्कों के सागर पर भी


यूँ बाँध बनाया करते हैं.



बंध जाता है बाँध जब


सागर में गोता खाते हैं


डूब - डूब कर एहसासों के


मोती लाया करते हैं .



मुट्ठी भर - भर कर जब मोती


आ जाते सागर के बाहर


उनकी माला पिरो - पिरो कर


खुद को बहलाया करते हैं .



बहला कर खुद के मन को


फिर नयी चेतना जगती है


स्वयं से ऊपर उठ कर फिर


नयी कल्पना सजती है .



नयी कल्पना फिर से मुझको


ले जाती है गहराई में


और गहराई तक जा कर


फिर से आह निकलने लगती है.



इन आहों के आने - जाने से


मन में पीडा होती है


हर नए सृजन के लिए शायद


वेदना भी ज़रूरी होती है.




संगीता स्वरुप 





गुरुवार, 2 सितंबर 2010

हे कृष्ण …!

हे  कृष्ण …!


संगीता स्वरूप

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

हे  कृष्ण -

आओ  तुम एक बार

लेकर  कल्की  अवतार!

 

पापों का नाश कर  तुमने

पापियों को मुक्ति  दी

आज पापों के बोझ से

अवनि  है धंस रही

फ़ैल  रहा दसों दिशाओं में

अपरिमित  भ्रष्टाचार

हे कृष्ण -

तुम आओ  एक बार !

 

सतीत्व  की रक्षा को तुमने

था स्वयं को अर्पित किया

आज यहाँ हर चौराहे पर

स्त्रीत्व  खंडित  हो रहा

संवेदनाएं  प्रस्तर हुयीं

हुआ  असीमित व्याभिचार

हे कृष्ण -

आओ तुम एक बार !

 

धर्म रक्षा  हेतु तुमने

श्राप गांधारी का लिया

आज धरती पर है

अधर्म का दिया  जला

धर्मांध बने हुए सब

कर रहे एक दूजे पर प्रहार

हे कृष्ण -

आओ तुम एक बार !

ले कर कल्की अवतार!!

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

तासीर नीम की

 तासीर नीम की



मैंने एक दिन
नीम के पेड़ से पूछा
कि भाई -
तुम कड़वे क्यों हो ?
उसने मेरी तरफ़
आश्चर्य से देखा
मैं उसकी ओर ही
निहार रही थी
उसके उत्तर के लिए
मैं प्रतीक्षारत थी ।
मुझे लगा कि
उसके सारे अस्तित्व में
एक व्याकुलता भर गई है ।
उसकी पत्ती - पत्ती जैसे
व्यथित हो गई है ।
आकुल हो तब वह बोला -
हाँ ! मैं कड़वा हूँ।
लेकिन तब ही तो तुम
दूसरे तत्वों में
मीठे का अहसास
कर पाते हो ।
मैं कितने रोगों की दवा हूँ
तभी तो तुम जी पाते हो ।
ज़रा तुम मेरे फूल -फल और पत्ते खाओ
और फिर तुम कहीं का भी पानी लाओ
और उसे पी कर बताओ
कि वो पानी कैसा है ?
शर्त के साथ कहता हूँ कि
वो तुमको मीठा ही लगेगा ।
तो हे मेरे प्रश्नकर्ता !
मैं ख़ुद को कड़वा रखता हूँ
लेकिन दूसरे की तासीर
मीठी कर देता हूँ।
यह सुन मैं सोचती हूँ
कि शायद सच भी
इसीलिए कड़वा होता है.