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सोमवार, 13 सितंबर 2010

एक वचन लेना ही होगा!

एक वचन लेना ही होगा!


संगीता स्वरुप

आज हम स्वतंत्र भारत के नागरिक
जब स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं
ध्वज में चन्द पुष्प रख
राष्ट्रध्वज फहराते हैं .

यह देख अक्सर

एक ख्याल आता है मन में

क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?

 

 

किसी मुख्य अतिथि का आना
डोरी खींचना , पुष्पों का गिरना
हमारा ताली बजाना
और राष्ट्रीय गीत गाना .
मात्र एक औपचारिकता

राष्ट्रीय धर्म निभाने की

और इस तरह

ध्वज फहराने की .

पर क्या यही कर्तव्य है हमारा ?

आज हम स्वयं को
स्वतंत्र मानते हैं
पर कितने स्वतंत्र हैं
यह कभी जाना?

आज हम अँग्रेज़ों से आज़ाद
पर अँग्रेज़ी के गुलाम हैं
जो दो बोल अँग्रेज़ी बोलता है
समाज में उसी की शान है
हमारे भारत के स्वतंत्र नागरिक
प्रगतिशील हो गये हैं
राष्ट्रीय भाषा नही अपितु
अंतरराष्ट्रीय भाषा के ग्याता बन गये हैं .
अँग्रेज़ी में गि ट - पिट कर
स्वयं को उँचा मानते हैं
जो भारती के ग्याता हैं
वो हीनता के गर्त में
गोते खाते हैं .

आज हम अँग्रेज़ों से स्वाधीन
पर अँग्रेज़ियत में जकड़े हुए हैं
भाषा के क्षेत्र में अभी तक
पराधीनता को पकड़े हुए हैं.

इस स्वतंत्र भारत में
अपनी राष्ट्र भाषा का
कैसा गौरव बढ़ा रहे हैं ?
पूरे वर्ष में
हिन्दी की प्रगति के लिए
केवल एक सप्ताह मना रहे हैं.

जब तक एक सप्ताह को
बावन ( एक साल ) सप्ताह में नही बदल पाएँगे
तब तक हिन्दी दिवस का अर्थ
सही अर्थों में नही समझ पाएँगे
जब भाषा में ही स्वतंत्र ना हो पाए
तो इस स्वतंत्रता का क्या अर्थ है
जब इस ध्वज का सम्मान ना कर पाए
तो ध्वज फहराने का क्या अर्थ है?

नही--अब वक़्त नही-
अब तो कुछ करना होगा
आज इस क्षण हमें
एक वचन लेना होगा .
क्यों कर अँग्रेज़ी आगे है
क्यों भारती पिछड़ रही है
क्यों भाषा का अपमान हुआ
क्यों हिन्दी सिसक रही है ?
कुछ तो कहना होगा
कुछ तो करना होगा
भाषा की स्वतंत्रता के लिए
एक वचन लेना ही होगा!
--

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

हे कृष्ण …!

हे  कृष्ण …!


संगीता स्वरूप

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

हे  कृष्ण -

आओ  तुम एक बार

लेकर  कल्की  अवतार!

 

पापों का नाश कर  तुमने

पापियों को मुक्ति  दी

आज पापों के बोझ से

अवनि  है धंस रही

फ़ैल  रहा दसों दिशाओं में

अपरिमित  भ्रष्टाचार

हे कृष्ण -

तुम आओ  एक बार !

 

सतीत्व  की रक्षा को तुमने

था स्वयं को अर्पित किया

आज यहाँ हर चौराहे पर

स्त्रीत्व  खंडित  हो रहा

संवेदनाएं  प्रस्तर हुयीं

हुआ  असीमित व्याभिचार

हे कृष्ण -

आओ तुम एक बार !

 

धर्म रक्षा  हेतु तुमने

श्राप गांधारी का लिया

आज धरती पर है

अधर्म का दिया  जला

धर्मांध बने हुए सब

कर रहे एक दूजे पर प्रहार

हे कृष्ण -

आओ तुम एक बार !

ले कर कल्की अवतार!!

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

रविवार, 15 अगस्त 2010

ये कैसी स्वतंत्रता -- मनोज कुमार

ये कैसी स्वतंत्रता

मनोज कुमार

स्वतंत्रता की तिरसठवीं वर्षगांठ

मना चुके हम भारतवासी।

सन सैंतालिस मध्य निशा की

क्या हमको है याद ज़रा सी।

स्वतंत्रता की सालगिरह पर

हर कोई खुशी मनाता है

मगन हर्ष उल्लास से

आज़ादी की रस्म निभाता है

एक प्रश्‍न रह-रह कर

उठता है मेरे अंतरमन में

आज़ादी के दीवानों से क्या हमने

तोड लिया हर नाता है?

कैसे - कैसे बलिदान किए,

धन्य - धन्य बलिदानी।

काल - कोठरी अन्धकूप के,

पी गए कालापानी।

उन वीरों के बलिदानों को

मिला दिया माटी में हमने,

अपने दुष्‍कर्मों से मिटा रहे,

उनके सत्कर्मों की निशानी।

भगत सिंह, आज़ाद, खुदी राम,

अशफाक उल्लाह, रानी झांसी।

कितने कितने आदर्श दिए,

स्वीकारी हंस हंसकर फांसी।

आज़ाद, भगत और बिस्मिल

हमसे पूछ रहें हैं - बोलो तो

स्वाभिमान क्यों बिका हमारा,

अपनी वृत्ति बनी क्यों दासी।

पृथ्वी, अग्नि मिसाइल बनाकर

भारत का मान बढ़ाया

रोबोट, राकेट, टैंक बनाकर

दुनियां में नाम कमाया

नए-नए अनुसंधान किए

अंतरिक्ष की दौड़ लगाई

पोखरण में कर अणु परीक्षण

पौरुषबल दुनियां को दिखाया

आज़ादी से अबतक, सच है,

हमने बहुत तरक्की की

विश्‍व बाज़ार नई अर्थ व्यवस्था में

हमने कितनी मंजिल तय की

स्वतंत्रता के चौंसठवें जन्म दिन तक

और भी किए कई प्रयत्न

यहां तक कि टेस्ट ट्यूब में

हुआ इंसानों का अस्तित्व उत्पन्न

फिर भी कुछ कमियों का हमको

होता है एहसास,

आज भी हम बने हुए हैं

कुप्रथा - कुरीतियों के दास

वैभव और संस्कृति की निशानी

ऋषि मुनियों की ओजपूर्ण वाणी

और जिनके उपदेशों ने

दुनियां को थी राह दिखाई

स्वतंत्रता के विकास की कहानी

अपने पन्ने उलट- उलट कर

वहीं खड़ी है जहां से उसने

आज़ादी की थी अलख जगाई।

पशुता के पंक में धंसकर

मलिन मानवता का सरोज

सभ्यता हमारे लिए आज

भौतिक सुख साधनों की खोज

क्या नहीं था हमारे पास

विवेकशीलता की कहानी थी।

एक जोश था, रवानी थी

राम का आदर्श था

गौतम बुद्ध की वाणी थी

बहुत कुछ था हमारे द्वार,

आपस का वह प्यार

दिल के आइने चेहरे

दिल पर खाकर घाव भी गहरे

एक दूजे के लिए मरना

मुंह पर हंसी खुशी का फूल धरना।

हम सब जिनको भूल चुके हैं,

कहां गया वह प्यार हमारा

गंगा-जमुना का सा रिश्ता

कहां गई वह पावन धारा।

जिस यशगाथा की गूंजें

भू-मंडल में थी गूंजा करती।

मरघट की सी नीरवता में

डूब गई है भरत की धरती

मानवता पर दानवता हावी

देश है पतनोन्मुख।

सबको सूझता है केवल

अपना ही सुख।

चारों ओर है ख़ून का पहरा,

ख़ूनी दिल है, ख़ून का चेहरा।

वातावरण में रक्त की महक

फैली है अत्याचारी छाया

होड़ लगी है हिंसा प्रतिहिंसा की

ना कोई मोह, ना कोई माया।

स्त्रियों की इज़्ज़त बचा न पाए

भंवरी अपनी लाज गंवा कर

धन के लिए औलाद को बेचा

लगता यह इलज़ाम पिता पर

बहुएं शूली चढ जाती हैं

दहेज के दानव का होकर शिकार

आज़ाद देश में रूपकंवर सी बेटी

जल जाए शौहर की चिता पर,

बापू के सुन्दर सपनों का,

हमने ख़ूब किया अभिनंदन।

नाम कलंकित किया देश का,

टीक भाल पर ख़ूनी चंदन।

करुणा विहीन यह हृदय हमारा

बहा रहा है शोणित धारा

भौतिकता के उन्माद तले

मानवता कर रही क्रंदन।

आतंकवाद का काला साया

हरी-भरी वादियां निगल रहा है।

साम्प्रदायिकता का उन्मादी पिशाच

आग के गोले उगल रहा है।

मनवता का हो रहा ह्रास

आपाधापी घट-घट में है,

घृणा-द्वेष का फैला पंजा

भाईचारा मसल रहा है ।

निर्बल की कराह-सिसकियां

सुनने वाला कोई नहीं।

बेचैन, थकी, उनींदी आंखें

वर्षो से हैं सोई नहीं

अपमानित होने की पीड़ा

जाने वही जिसने सहा।

परंपराओं के नाम पर

कौन सी जाति रोई नहीं।

. ..

... ....

..... ......

यदि सही स्वतंत्रता हम चाहते हैं तो,

हमको आगे बढना होगा।

शांति और सौहार्द्र के वातावरण में,

नया भारत गढ़ना होगा।

होठों पर मुसकान सजा कर

दिल में प्यार की जोत जगा कर

हिंसा, घृणा, दुश्मनी हटाकर

प्यार के पाठ को पढ़ना होगा।

घिसी पिटी बेमानी रस्में

भारत से उठ जाएं बिलकुल

जाति-धर्म का भेद मिटा कर

रहें देश में हम सब मिलजुल

सोच हमारी फिर विस्तृत हो

सुख शांति खुशहाली से

एकता का जो पाठ पढाए

फिर से निर्मित हो वह गुरकुल

मलिनता बुहर जाए जग की

मन हम सब इस तरह बुहारें

आज़ादी के वीरों की वाणी

अपने अपने दिल में उतारें।

तब हम समझें कि हमने

पाई है आज़ादी सच्ची

अपने-अपने घरों में जब हम

सुख चैन से रात गुज़ारें।

आज़ादी

हमारा

अधिकार है

कर्त्तव्य है

और है

अस्तित्व की

मुनादी।

*** *** ***

बुधवार, 30 जून 2010

बाबा नागार्जुन के जन्‍म दिन पर........

-- मनोज कुमार

बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी गांव में 30 जून 1911 को बाबा नागार्जुन का जन्‍म हुआ था। एक मैथिल ब्राहृण परिवार में जन्‍मे बाबा का नाम वैद्यनाथ मिश्र था। तीन वर्ष की छोटी उम्र में ही मातृ -विहीन हो चुके इस महापुरूष का बचपन बहुत ही कष्‍ट में बीता। बुद्धि से कुशाग्र इस बालक के स्‍वप्रयास से अध्‍ययन चलता रहा। उन्हें न सिर्फ संस्‍कृत भाषा का अच्‍छा ज्ञान था बल्कि ‘पाली’ और ‘प्राकृत’ पर उनकी अच्‍छी पकड़ थी। इसके माध्‍यम से उन्‍होंने बौद्ध- साहित्‍य और दर्शन का गंभीर अध्‍ययन किया। वे राहुल सांकृत्‍यायन से बेहद प्रभावित थे।

“यात्री” उपनाम से उन्‍होंने मैथिली में लिखना शुरू किया। बाद में उन्‍होंने हिंदी में भी लिखना आंरभ कर दिया। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के कारण इन्‍होंने ‘बैद्यनाथ’ और ‘यात्री’ उपनाम छोड़कर अपना उपनाम नागार्जुन रखा।

नागार्जुन सीधे साधे व्‍यक्तित्‍व के स्‍वामी थे और खरी-खरी बात करते थे। तेवर उनका तल्‍ख था। इस व्‍यक्ति को हम एक संस्‍था कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने जिन्‍दगी की सच्‍चाईयों को अपनी कविताओं में बड़े तल्‍ख तेवर के साथ प्रस्‍तुत किया है। सामाजिक चेतना और जनता के शोषण-उत्‍पीड़न के कारण इनका झुकाव मार्क्‍सवादी चिंतन की ओर हुआ। तद्ययुगीन कृषक नेता स्‍वामी सहजानंद के साथ इन्‍होंने बिहार के अनेक किसान आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के पहले एवं इसके बाद भी इन्‍हें कई बार जेल जाना पड़ा। बाबा नागार्जुन ने कविताओं में ही नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी अपने विद्रोह एवं क्रांतिकारिता का परिचय दिया है । इन्‍होंने किसी के सामने सिर नहीं झुकाया, तथा जीवन पर्यन्‍त मसिजीवी ही बने रहना पसंद किया।

इन्‍होनें अपनी काव्‍य चेतना के माध्‍यम से संपूर्ण भारत को समग्रता के साथ समाहित किया है। मिथिला जनपद से जुड़े होने के कारण इस अंचल विशेष के ग्रामीण परिवेश एवं तदयुगीन जमींदारों की सामंती प्रवृति पर भी कवि ने अपनी कलम चलाई है। अपने गद्य, खासकर उपन्‍यासों में उन्‍होंने ग्रामीण अंचल का वास्‍तविक चित्र प्रस्‍तुत किया। उनके उपन्‍यास ‘बलचनमा’ और ‘रतिनाथ की चाची’ इसके गवाह है।

स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद जन कवि के रूप में इनका सर्वाधिक महत्‍व इनकी राजनीतिक कविताओं के माध्‍यम से उजागर हुआ है।

उन्होंने शासन द्वारा अपनाई गई हर जन विरोधी नीतियों का विरोध किया। उनकी कविताएं व्‍यवस्‍था पर चोट करती थी। उन्‍होंने ने न तो प्रथम प्रधानमंत्री स्‍व. जवाहरलाल नेहरू को छोड़ा न ही पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा जी को। जब नेहरू जी के निमंत्रण पर ब्रिटिश की महारानी भारत आई तो बाबा ने लिखा था-

“आओ रानी हम ढोएंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहर लाल की ”।



1975 में जब देश में आपात स्थिति लागू की गई तो उन्‍होंने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा जी को भी अपनी कविता द्वारा संदेश पहुंचाया।

जय प्रकाश नारायण को जब उस दौरान लाठियों का प्रहार सहना पड़ा तो बाबा की कलम बोली-
“जय प्रकाश पर लाठियाँ लोकतंत्र की”!

उन्‍होंने जहां एक तरफ़ जनता की आवाज शासक वर्ग तक पहुंचाई वहीं दूसरी ओर अपने काव्य सृजन में प्रकृति का वर्णन भी किया है–

“अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है”।

भारतीय शोषित एवं उत्‍पीडि़त जनता का इतना बड़ा पक्षधर कवि हिंदी में दूसरा नहीं हुआ। साहित्‍य की सेवा में सतत समर्पित रहने वाले जन कवि बाबा नागार्जुन हम सबको छोड़कर 1988 में पंचतत्‍व में विलीन हो गए।

इनकी निम्‍नलिखित रचनाएं हिंदी साहित्य की अनुपम धरोहर के रूप में अपना बर्चस्‍व अक्षुण्‍ण बनाए रखने में आज भी जीवंत दस्‍तावेज की प्रतिमुर्ति है –


संग्रह- ‘युगधारा’, ‘सतरंगी पंखो वाली’ ‘प्‍यासी पथराई आंखे’, ‘तलाब की मछलियां’, ‘चंदना’, ‘खिचड़ी विपल्‍व देखा हमने ’, ‘तुमने कहा था’ ‘पुरानी जूतियों का कोरस’, ‘हजार हजार बांहो वाली’, ‘चित्रा’, ‘पत्रहीन नग्‍न गांछ(मैथिली काव्‍य संग्रह)’ तथा धर्म लोक शतकम (संस्‍कृत वाक्‍य)

उपन्‍यासः ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बलचनमा’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘दुखलोचन’, ‘करूण के बेटे’, ‘पारो तथा नई पौध’ आदि ।

उनके जन्‍मदिन पर हम उन्‍हें विनम्र श्रद्धा सुमन अर्पित करते है।

रविवार, 9 मई 2010

काम करती मां

माँ के दूध से बढ़ कर कोई मिठाई और माँ के आँचल से बढ़ कर कोई रजाई नहीं होती। "मातृ देवो भवः !"  माँ.... धात्री ! अपने जीवन के कीमत पर हमें जीवन देती है। अपने रक्तसे सींच हमारा पोषण करती है। संस्कारों से सुवाषित कर 'जड़ता' नाश करती है। साक्षात ब्रहमा, विष्णु, महेश.... ! 9मई को विश्व मातृ-दिवस मनाया जाता है। मुझे आश्चर्य है कि जिसके बिना हमारा वजूद नहीं है, उसको समर्पित सालमें मात्र एक दिन.... ! फिर भी काम करती मां शीर्षक कविता के साथ उस परब्रह्म रूप को सिर नवाते हैं। विश्व मातृ-दिवस पर माँ तुझे सलाम !!

काम करती मां

                                                              --- --- मनोज कुमार   

जब मां आटा पीसती थी

तो सिर्फ अपने लिए ही नहीं पीसती थी,

सबके लिए पीसती थी,

झींगुर दास के लिए भी !

मां जब झाड़ू देती थी

तो सिर्फ घर आंगन ही नहीं बुहारती थी

ओसारा, दालान और

झींगुर दास का प्रवास क्षेत्र भी बुहार देती थी।

मां जब बर्तन धोती थी

तो सिर्फ अपना जूठन ही नहीं धोती थी

घर के सभी लोगों के जूठे बर्तन धोती थी

झींगुर दास के चाय पिए कप को भी !

 J0145168 काम करती मां का चेहरा

खिले फूल की तरह होता था

जिसकी सुगंध पर सबका हक़ था

झींगुर दास का भी !

उस फूल की सुगंध सबके लिए होती थी

झींगुर दास के लिए भी !

अब समय बदल गया है

घर के काम के लिए  बाई है

वह झाड़ू, पोछा, चौका-बर्तन कर देती है

पर मां

अपना घर आज भी बुहार रही है।