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मंगलवार, 28 सितंबर 2010

अगर क़लम का साथ नहीं मिला होता तो मैं बहुत पहले मर गई होती- डॉ. इंदिरा गोस्वामी

अगर क़लम का साथ नहीं मिला होता तो मैं बहुत पहले मर गई होती- डॉ. इंदिरा गोस्वामी


अरुण सी राय

untitled वर्ष २००८ में मैं पूर्वोत्तर की यात्रा पर गया था जिसमें असम, मणिपुर, अगरतल्ला आदि राज्यों के पर्यटक स्थलों की यात्रा की थी, वहां के जनजीवन को करीब से देखने की कोशिश की थी.  पूर्वोत्तर से लौटते हुए हमारा अंतिम पड़ाव था गुवाहाटी. गुवाहाटी जाओ और माँ कामख्या से दर्शन ना करो यह हो नहीं सकता. कहा जाता है कि आप एक बार माँ कामाख्या के दर्शन करो और माँ आपको दो बार और बुलाएंगी.  माँ कामख्या के मंदिर परिसर में मैं जब मैं गया मुझे डॉ. इंदिरा गोस्वामी जी का उपन्यास का हर चरित्र, हर प्रसंग, हर दृश्य  जीवंत हो उठा और रोंगटे खड़े हो गए. मन भय मिश्रित रोमांच से भर उठा. यदि मैं ने डॉ. इंदिरा गोस्वामी जी का उपन्यास 'छिन्नमस्ता'  नहीं पढ़ा होता तो शायद माँ कामाख्या के मंदिर परिसर और आस पास के वातावरण, असमिया संस्कृति व परंपरा को नहीं समझ पाता, नहीं देख पाता.

बहुभाषी भारत की लोक संस्कृति और सामाजिक विविधता को समझने के लिए आंचलिक साहित्य को मूल रूप में अथवा उसके अनुवाद को पढ़े बिना संभव नहीं है.  और जितना समृद्ध अपना हिंदी साहित्य है उस से कमतर अन्य भाषा के साहित्य नहीं हैं.  डॉ. इंदिरा गोस्वामी इसके सबसे सशक्त उदहारण हैं. असमिया की बहुचर्चित कथाकार और उपन्यासकार तथा  भारतीय ज्ञानपीठ से पुरस्कृत डॉ. इंदिरा गोस्वामी की रचनाओं में असम और सम्पूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र धड़कता हुआ महसूस होता है। उसमें असम का सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास नज़र आता है। इंदिरा जी की रचनाओं, विशोषकर कहानियों में चित्रित असमी जीवन के विविध परिदृश्यों से गुजरते हुए हमें लगता हैं कि जैसे हम खुद वहाँ की यात्रा पर निकल पड़े हो।

डॉ. इन्दिरा गोस्वामी ने असमिया में लगभग एक दर्जन उपन्यास और सैकड़ो कहानियाँ लिखी हैं,  जिनमें  प्रमुख उपन्यास हैं  : 'चेनाबार सोत ' (1972), 'नीलकंठी ब्रज' (1972), 'अहिरन' (1980), 'मामरे धरा तरोवाल' (१९८०), "छिन्नमस्ता" (१९९८), 'बलूद स्टेण्ड पेजिज' (2002) . डॉ. गोस्वामी जी के उपन्यास असमी जनता के दुःख-दर्द, आशा-आकांक्षा, राग-विराग, संघात-संघर्ष को उजागर करने के साथ हमाने मानस लोक में एक ऐसे समाज का प्रतिबिम्ब रच देते हैं, जिनके बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है। इंदिरा जी सिर्फ साहित्य नहीं लिखती, बल्कि वे समाज का अंतरंग विश्लेषण भी प्रस्तुत कर देती हैं।

indiragoswami इंदिरा जी का बहुचर्चित उपन्यास 'छिन्नमस्ता' के माध्यम असमिया साहित्य लोक के असाधारण सृष्टि पर रोशनी डालती हैं . यह उपन्यास शक्तिपीठ कामाख्या की पृष्ठभूमि में 1921 से 1932 की अवधि की घटनाओं पर आधारित हैं . छिन्नमस्ता दो विरोधी विचारधाराओं- अहिंसा और हिंसा- के टकराओं के बीच गरीबी, निरक्षरत, अज्ञान और अन्धविशावसों से घिरे कामरूप के जन-जीवन की सच्ची कहानी है । इसलिए उनकी रच्नूं को पढ़कर पाठक केवल मुग्ध ही नहीं होता बल्कि उद्वेलित भी होता है। वे पाठकों को किसी जादुई यथार्थ में नहीं ले जाती बल्कि सच्चाई के रूबरू खड़ा कर देती हैं। इंदिरा गोस्वामी जी की रचनाएं ना केवल कथ्य  की दृष्टि से बल्कि अभिव्यक्ति क्षमता में भी अप्रतिम हैं.  डॉ. इंदिरा जी की रचनाएं धीरे-धीरे मन्द आंच पर पकती  हुई निष्पत्ति पर पहुँचती हैं, जिनका स्वाद देर तक बना रहता हैं।

डॉ. इन्दिरा गोस्वामी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें प्रमुख हैं 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' (1983), 'असम साहित्य सभा पुरस्कार' (1988), 'कथा पुरस्कार' (1993), ज्ञानपीठ पुरस्कार' (2000).

जहाँ छिन्नमस्ता उपन्यास में कामाख्या मन्दिर का एक परिपूर्ण चित्र अंकित किया गया है। यहाँ की पूजा-अर्चना के विभिन्न रूप, आतार-नीति, लोक-विश्वास, लोकगाथा, देवीपीठ के साथ जुड़ी हुई किंवदन्तियाँ, देवीपीठ का इतिहास, यहां की धार्मिक परम्परा (मनसा-पूजा में यहाँ मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग भी बलि चढ़ाते थे), साथ ही इसके नकारात्मक पहलू आदि को कथानक का रूप दिया गया है... वहीँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित असमिया उपन्यास "मामरे धरा तरोवाल" यानी "जंग लगी तलवार" में मामोनी रायसम गोस्वामी (इन्दिरा गोस्वामी) ने श्रमिकों की मजबूरी और बदहाली की गाथा प्रस्तुत की है। 

edit1 श्रमिकों को हड़ताल के लिए कौन प्रेरित करता है और उससे किस तरह उनकी हालत दिन-ब-दिन बदत्तर होती जाती है,.इसी के चरम बिन्दु तक इस उपन्यास की कहानी जाती है। पुरानी होती जाती पड़ताल के साथ ही अनिश्चितता और हताशा से पीड़ित श्रमिक यन्त्र की तरह दिन काटते हैं। भूख की ज्वाला में खलासी लंगर में स्वीपर लाइन के बच्चे रोटी के लिए कुत्तों तरबूज जानवरों की तरह चबाकर खानेवाली बसुमती बुढिया और बीमार पति तथा बच्चे के लिए दवाई और दूध खरीदने में असमर्थ और अपने सम्मान को दाँव पर लगानेवाली नारायणी की मनोदशा एक जैसी ही है।

अंत में, श्रीमती गोस्वामी ने इन सभी रचनाओं में अपने स्थानीय पात्रों एवं परिवेश को ही नहीं जिया है-अपनी रचनात्मक प्रतिश्रुतियों का भी भरपूर निर्वाह किया है. इनके उपन्यासों और कहता संग्रहों का हिंदी अनुवाद भारीतय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है और सुलभता से उपलब्ध हैं, साथ ही पठनीय है.

उनके उपन्यास 'छिन्मस्त्ता' के कुछ अनुदित अंश, जिसे पुस्तक में पापोरी गोस्वामी ने अनुवाद किया हैं.

१.

"छिन्नमस्ता के संन्यासी के लिए प्रतीक्षारत भक्तों ने एक साथ कहा, ‘‘रक्त को त्याग दो ! फूलों से देवी की पूजा करो ! फूलों में ज़्यादा शक्ति है। रक्त को त्याग दो ! फूलों से जगज्जननी के पैर धुलाओ ! फूलों की पंखुड़ियों में मनुष्य-हृदय छुपा रहता है। मनुष्य की अदृश्य आत्मा को फूल ही सुगन्धित बनाये रखते हैं। रक्त को त्याग दो, फूलों से देवी माता की पूजा करो !’’

२ लेखिका को विश्वास है कि भावनाएँ अधिक फलप्रद होती हैं। कुछ-एक उदाहरण इस प्रकार हैं-
‘‘रत्नधर हाथ के नाखून से ज़मीन कुरेदने लगा उसके मुँह से झाग निकलने लगा। वह गला फाड़कर चिल्लाने लगा, ‘‘पकड़ो, पकड़ो ! बलि देने के लिए लाया गया है ! ओफ्, ओफ् !! वह वधस्थल में जाना नहीं चाहता है, डर के मारे उसकी विष्ठा निकल गयी है। ओह्, ओह् ! उसकी आँखें देखो ! उस पर रहम खाओ ! रहम खाओ उस पर ! वह मरना नहीं चाहता है ! उसे मुक्ति नहीं चाहिए। उसे घसीटकर इस तरह मुक्ति देने की ज़रूरत नहीं है। पकड़ो, पकड़ो ! वह ज़िन्दा रहना चाहता है। देवी माँ की बनाई हुई इस हरी-भरी धरती पर वह ज़िन्दा रहना चाहता है। पकड़ो, पकड़ो !’’रत्नधर के सीने में जैसे भैंसा के खुर की खट् खट् आवाज गूँजने लगी। उसकी देह के रक्तप्रवाह के साथ यह शब्द मिलकर एक हो गया है ! ". उनकी रचनात्मक क्षमता और सजग लेखनी का पता चलता है।

2006110402290101 औरतों के बारे में डॉ. इंदिरा गोस्वामी ने एक बार बी बी सी के साथ एक साक्षातकार में कहाँ था कि  "अगर क़लम का साथ नहीं मिला होता तो मैं बहुत पहले मर गई होती. पहले के मुक़ाबले, आज की औरत की तस्वीर बदली है. लेकिन आज भी 85 प्रतिशत औरतें दहलीज़ के इस पार ठिठकी हुई हैं. ज़रूरत उन्हें हाशिए से उठाने की है. तब औरत की तस्वीर साफ़ नज़र आएगी. मुझे ख़ुशी है कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में कामयाब हो रही हैं. लेकिन आज़ादी की आड़ में फ़ूहड़ नग्नता को अपना अधिकार मान लेना ठीक नहीं है. "

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिंदी और अर्थव्यवस्था-2

हिंदी और अर्थव्यवस्था-2

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पिछले अंक में हिंदी के विकास में अर्थव्यवस्था के महत्व को रेखांकित किया गया था। आज अपने दूसरे और अंतिम अंक में सरकार द्वारा हिंदी के प्रचारप्रसार में किये जा रहे प्रयासों की चर्चा कर रहे हैं !

अरुण सी राय

आज १४ सितम्बर है । आज हिंदी दिवस है । वैसे तो यह दिवस केवल सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में मनाया जाता है लेकिन जरुरत है कि इसे पूरे जोर शोरसे पूरे देश में मनाया जाना चाहिए। यदि देश माँ दिवस, पिता दिवस, मित्रता दिवस मना सकता है तो हिंदी दिवस क्यों नहीं। केवल इसलिए नहीं कि यह सरकार द्वारा घोषित दिवस है, इसका विरोध उचित नहीं है।

ऐतिहासिक  पृष्ठभूमि में जाने की बजाय सरकार द्वारा किये गए प्रयासों के फलस्वरूप हिंदी की प्रगति में कैसे सुधार हो रहा है, पर ए़क विचार आवश्यक है। सरकार और सरकारी उपक्रमों का दायरा कम नहीं है और राजभाषा कार्यान्वयन के द्वारा काफी काम किया जा रहा है। आम आदमी को जोड़ने और आम जन तक पहुँचने  के लिए सरकार की मशीनरी से  सशक्त माध्यम कोई अन्य नहीं। ऐसे में यदि सरकार की ओर से प्रयास किया जा रहा है तो उसका अपेक्षित परिणाम अवश्य मिलेगा। इन सबके पीछे जो मुहिम सरकार द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन के जरिये हो रही है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में राजभाषा विभाग, ना केवल मंत्रालय के स्तर पर बल्कि  उद्योग जगत  में भी हिंदी के उपयोग को बढ़ाने के लिए  प्रेरित और प्रोत्साहित करता  है और नयी नीतियां बना कर उसे आम जनता की भाषा में पहुँचाने  के लिए बाध्य करता   है।

सरकार द्वारा वेबसाइट हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ स्थानीय  भाषा में उपलब्ध कराये जाने सम्बन्धी दिशा निर्देशों  के कारण ''डिजिटल डिवाइड "में भी कमी आयी हैं। जिस तरह हिंदी का उपयोग सरकारी उपक्रमों में अनिवार्य है, अपनी भाषा में सूचना उपलब्ध करना अनिवार्य है, उसका निजी क्षेत्र तक विस्तार  होना तय है क्योंकि आम जनता के लिए उसकी अपनी भाषा में जानकारी प्राप्त करना उसका मौलिक अधिकार है। इससे ना केवल  आर्थिक प्रगति को और मजबूती मिलेगी बल्कि सभी क्षेत्रों   में काम करना सुगम होगा, लोगों  तक पहुंचना  संभव हो सकेगा और यही भाषा का अंतिम लक्ष्य भी होता है।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जो कि भूतल एवं परिवहन मंत्रालय के अधीन ए़क स्वायत्त प्राधिकरण है, द्वारा देश भर के राजमार्गो पर जानकारी हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में दी जा रही है, जो कि  निश्चित रूप से ए़क दूरगामी कदम है और हिंदी के विकास में मील का पत्थर साबित होगी। ऐसे कई प्रयास हैं जो सरकार के स्तर पर चलाये जा रहे हैं और इनके परिणाम हमारे सामने हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक ऐसा नहीं था।

इसी तरह, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय द्वारा देश के सभी पर्यटन स्थलों पर आम आदमी के लिए उपयोगी सामग्री हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा मेंउपलब्ध है, जबकि कुछ वर्ष पूर्व तक यह सामग्री, जानकारी केवल अंग्रेजी में उपलब्ध हुआ करती थी। यह दो कारणों से हो रहा है। ए़क तो आर्थिक विकास केकारण आम आदमी की पर्यटन में रूचि और दूसरे सरकारी स्तर पर राजभाषा कार्यान्वन के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता ।

राजभाषा कार्यान्वयन के लिए संसदीय राजभाषा  समिति गठित  है। इसकी कई उपसमितियां हैं जो सरकारी क्षेत्र एवं सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदी के उपयोग में प्रगामी प्रगति का मूल्यांकन करती हैं। ए़क उपसमिति के राजभाषा संबधी निरीक्षण  में मैं भी उपस्थित था। निरीक्षण  हिन्दुस्तान पेट्रोलियमका था जिनका  वार्षिक विज्ञापन बजट करीब १००० करोड़ रूपये का है। संसदीय समिति ने पाया कि वे अंग्रेजी में विज्ञापन पर लगभग ८५% बजट का उपयोग करते थे। समिति ने उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में बराबर बराबर खर्च करने का निर्देश दिया और कंपनी द्वारा इसका अनुपालन भी किया गया है। संसदीय राजभाषा  समिति वर्ष भर में लगभग १०० कार्यालयों का निरिक्षण करती है जिससे स्वतः स्पष्ट है कि सरकार हिंदी की प्रगति के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रश्न पूछने और उत्तर हिंदी में भी मांगे जाने की सुविधा के कारण आम आदमी को काफी सहूलियत हो रही है और आम आदमी हिंदी के और करीब महसूस कर रहा है।  भारतीय रेल द्वारा भी हिंदी देश के कोने कोने तक पहुँच  रही है और देश को ए़क सूत्र में बाँध रही है। रेलगाड़ियों के नाम इसके सबसे बड़े उदहारण हैं। यही है भाषा की शक्ति, यही है भाषा का उद्देश्य।

संक्षेप में कहें तो हिंदी अब निरीह नहीं। जैसे जैसे शासन आम आदमी तक पहुँच रहा है, हिंदी भी सशक्त हो रही है। हिंदी दिवस के मौके पर देशवासियों से  ना केवल हिंदी अपनाने का निवेदन करता हूँ बल्कि यह निवेदन करता हूँ कि कम से कम ए़क भारतीय भाषा जरुर सीखें और अपने बच्चों को भी प्रेरित करें. इस से सही मायने में देश की सांस्कृतिक विविधता से परिचय होगा और अंतर्देशीय अविश्वास के माहौल में भी सुधार होगा.

सोमवार, 13 सितंबर 2010

एक वचन लेना ही होगा!

एक वचन लेना ही होगा!


संगीता स्वरुप

आज हम स्वतंत्र भारत के नागरिक
जब स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं
ध्वज में चन्द पुष्प रख
राष्ट्रध्वज फहराते हैं .

यह देख अक्सर

एक ख्याल आता है मन में

क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?

 

 

किसी मुख्य अतिथि का आना
डोरी खींचना , पुष्पों का गिरना
हमारा ताली बजाना
और राष्ट्रीय गीत गाना .
मात्र एक औपचारिकता

राष्ट्रीय धर्म निभाने की

और इस तरह

ध्वज फहराने की .

पर क्या यही कर्तव्य है हमारा ?

आज हम स्वयं को
स्वतंत्र मानते हैं
पर कितने स्वतंत्र हैं
यह कभी जाना?

आज हम अँग्रेज़ों से आज़ाद
पर अँग्रेज़ी के गुलाम हैं
जो दो बोल अँग्रेज़ी बोलता है
समाज में उसी की शान है
हमारे भारत के स्वतंत्र नागरिक
प्रगतिशील हो गये हैं
राष्ट्रीय भाषा नही अपितु
अंतरराष्ट्रीय भाषा के ग्याता बन गये हैं .
अँग्रेज़ी में गि ट - पिट कर
स्वयं को उँचा मानते हैं
जो भारती के ग्याता हैं
वो हीनता के गर्त में
गोते खाते हैं .

आज हम अँग्रेज़ों से स्वाधीन
पर अँग्रेज़ियत में जकड़े हुए हैं
भाषा के क्षेत्र में अभी तक
पराधीनता को पकड़े हुए हैं.

इस स्वतंत्र भारत में
अपनी राष्ट्र भाषा का
कैसा गौरव बढ़ा रहे हैं ?
पूरे वर्ष में
हिन्दी की प्रगति के लिए
केवल एक सप्ताह मना रहे हैं.

जब तक एक सप्ताह को
बावन ( एक साल ) सप्ताह में नही बदल पाएँगे
तब तक हिन्दी दिवस का अर्थ
सही अर्थों में नही समझ पाएँगे
जब भाषा में ही स्वतंत्र ना हो पाए
तो इस स्वतंत्रता का क्या अर्थ है
जब इस ध्वज का सम्मान ना कर पाए
तो ध्वज फहराने का क्या अर्थ है?

नही--अब वक़्त नही-
अब तो कुछ करना होगा
आज इस क्षण हमें
एक वचन लेना होगा .
क्यों कर अँग्रेज़ी आगे है
क्यों भारती पिछड़ रही है
क्यों भाषा का अपमान हुआ
क्यों हिन्दी सिसक रही है ?
कुछ तो कहना होगा
कुछ तो करना होगा
भाषा की स्वतंत्रता के लिए
एक वचन लेना ही होगा!
--

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

हिंदी और अर्थव्यवस्था

हिंदी और अर्थव्यवस्था

अपने बारे में :

download मैं, अरुण चन्द्र रॉय , पहली बार राजभाषा ब्लॉग पर आपके बीच आ रहा हूं और आप सबका स्नेह और आशीष मिलता रहा तो प्रत्येक मंगलवार को अपनी बात लेकर उपस्थित रहूँगा। अपने मन की बातों को जो अपनी भाषा, अपने लोग, अपने समाज के बारे में जिन्हें रोज के जीवन में हम सब देखते हैं, अनुभव करते हैं, से जुडी हैं, उन्ही में से कुछ टुकड़े, कुछ झलकियाँ आपके साथ साझा करूँगा !

१४ सितम्बर को हर वर्ष हम हिंदी दिवस मनाते हैं। लोग इसके औचित्य पर सवाल भी उठाते हैं। यह दिवस ठीक वैसे ही मनाया जाता है जैसे कि हम स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मानते हैं।सरकारी क्षेत्र में हिंदी दिवस मनाने की दायित्वपूर्ण परंपरा है जिसका निर्वाह किया जा रहा है। मैं इसके औचित्य पर बात नहीं कर रहा लेकिन बात हिंदी भाषा पर ही करना चाहता हूँ। साथ ही देश की अन्य भाषाओं पर भी करूँगा कि कैसे भाषा का विकास सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था के विकास के साथ जुड़ा है ।

आज शोर है कि हिंदी मर रही है। विडंबना है कि २४ घंटे हिंदी समाचार चैनल वाले भी इसे प्रचारित करते रहते हैं। लेकिन जिस तरह से हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार पिछले ए़क दशक में हुआ है, इतिहास में कभी नहीं हुआ! हिंदी अपना विस्तार ही कर रही है और करेगी भी। कारण भी साफ़ है। भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और हिंदी भाषी क्षेत्रों में बाजार की मौजूदगी। यही नहीं, जहाँ-जहाँ बाजार है वहां की भाषा बची रहेगी। भले ही बदले हुए स्वरुप में।

आज देश में १.४ बिलियन (यानी १४ करोड़ ) से अधिक मोबाइल उपभोक्ता हैं जो कि दुनिया के कुल ए़क चौथाई से अधिक है और भारतीय मोबाइल बाज़ार देश की बढ़ती आर्थिक ताकत का द्योतक है। इतना बड़ा बाज़ार बिना हिंदी और स्थानीय भाषा के कैसे चल सकता है। आज मोबाइल बाज़ार में हिंदी का उपयोग और प्रभुत्व बढ़ा है, ना केवल कंटेंट के स्तर पर बल्कि ग्राहक सेवा के स्तर भी है। इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जितनी भी दूर संचार कंपनिया हैं उनके कस्टमर केयर हिंदी के साथ-साथ सभी प्रमुख भाषाओं में काम कर रही हैं। इस दिशा में काफी उल्लेखनीय रूप से काम हो रहा है। मोबाइल सेवा प्रदाताओं की ओर से मोबाइल में शैक्षिक, मनोरंजक सामग्री हिंदी के साथ-साथ स्थानीय भाषा में भी उपलब्ध है। इसे बाज़ार के साथ साथ भाषा की जीत के रूप में देखी जानी चाहिए।

अभी कुछ दिन पहले हमने देश की ए़क प्रतिष्ठित ड़ी टी एच कंपनी के लिए सम्पूर्ण कस्टमर केयर मेनू हिंदी के साथ- साथ तेरह अन्य भाषाओं में उपलब्ध कराया है। पहले ऐसा नहीं था। ग्राहक सेवाकेन्द्रों पर सभी भाषाओं में जानकारी उपलब्ध हो रही है और इस दिशा में बाजार की सभी कंपनिया आगे आ रही हैं। कारण स्पष्ट है!  बढ़ता बाज़ार साथ ही बाज़ार की भाषा !

बैंकिंग और बीमा के क्षेत्र में भी हिंदी के प्रयोग में क्रांतिकारी रूप से बदलाव आया है और हिंदी बहुत ही सहजता से प्रयुक्त हो रही है। यह स्थिति सरकारी क्षेत्र में ही नहीं बल्कि निजी क्षेत्र के बैंक भी अपने ग्राहकों तक पहुँचने के लिए उनकी भाषा का रास्ता अपना रहे हैं। वह भाषा जो आसानी से समझी जाए, जो दिल के करीब हो वही भाषा बाज़ार बना सकती है, बाज़ार बढ़ा सकती है। तभी तो आईसी आई सी आई बैंक का कॉर्पोरेट पञ्च लाइन है : रखे ख्याल आपका !

अब समाचार पत्रों को ही देखते हैं। यदि बंगाली भाषी बाज़ार तक पहुचना है तो आनंद बाजार पत्रिका का कोई विकल्प नहीं। इसी तरह मलयाली भाषी बाज़ार तक पहुँचने के लिए मलयालम मनोरमा है। यदि दैनिक जागरण देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार है और इसकी विज्ञापन दर काफी अधिक है तो कारण है इसकी बाज़ार तक पहुँच। ए़क दशक पूर्व तक स्थिति भिन्न थी। उदारीकरण अपने साथ कई बुराइयां लेकर आयी और बाज़ार का बेहिसाब विस्तार हुआ। लेकिन इस बेहिसाब विस्तार में हिंदी के साथ- साथ देश की अन्य भाषाओं को ए़क नयी जान मिली, भाषा सेजुड़े लोगों के लिए रोजगार के अवसर मिले ।

ऐसा हिंदी के साथ हो रहा है ये नयी बात नहीं है। दुनिया को पता है कि अंग्रेजी भाषा उपनिवेशवाद के जरिये विश्व भाषा बनी, विज्ञान की भाषा बनी। लेकिन वो दिन दूर नहीं जब अपने अर्थ जगत में बढ़ते भारतीय प्रभुत्व के कारण हिंदी को नयी पहचान मिलेगी।

अपना देश बहु- भाषी है । ऐसे में सभी भाषाओं और भाषियों की अपनी- चिंताएं और अपने- अपने सरोकार भी हैं, क्योंकि भाषा ए़क सामाजिक विषय होने के साथ- साथ सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विषय भी है। लेकिन जिस तरह से देश के भीतर ही आर्थिक आदान-प्रदान हो रहे हैं, यह दूरी ख़त्म होने को, बशर्ते कि राजनितिक आलेप ना चढ़ाया जाय। इसलिए, ज्यों- ज्यों भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती जायेगी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की पहचान देश और विश्व पटल पर और भी अधिक पुष्ट होगी। इसमें सरकार की भूमिका को अस्वीकार नहीं किया जा सकता ।

अगले सप्ताह १४ सितम्बर को देश हिंदी दिवस मना रहा है। सरकार के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रयासों से हिंदी कैसे प्रगति कर रही है, इस पर अगले सप्ताह चर्चा करेंगे।