शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

हिन्दी उपन्यास साहित्य : आरंभिक हिन्दी उपन्यास

हिन्दी उपन्यास साहित्य : आरंभिक हिन्दी उपन्यास

IMG_0870मनोज कुमार

पिछले पोस्ट में हमने अनुदित हिन्दी उपन्यास की चर्चा की थी और देखा था कि लाला श्रीनिवास दास के ‘परीक्षा गुरु’ को हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है।

‘परीक्षा गुरु’ के पश्चात मौलिक उपन्यासों की एक परंपरा सी चल पड़ी। मौलिक उपन्यासों की परंपरा को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है :

1. भारतेन्दु युग (1882 से 1916 तक) 2. प्रेमचंद युग (1916 से 1940 तक) 3. आधुनिक युग (1940 से आजतक)

1. भारतेन्दु युग

भारतेन्दु युग में ही हिन्दी उपन्यासों का श्रीगणेश हुआ। तब से बराबर उन्नति करती हुई उपन्यास विधा समकालीन हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण गद्य विधा के रूप में प्रतिष्ठित है।

आरंभिक हिन्दी उपन्यास :

सन्‌ 1877 में श्रद्धाराम फुल्लौरी ने ‘भाग्यवती’ नामक सामाजिक उपन्यास लिखा था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस उपन्यास की काफी प्रशंसा की है। यह भले ही अंग्रेज़ी ढंग का मौलिक उपन्यास न हो किन्तु विषयवस्तु की नवीनता के आधार पर इसे हिन्दी का प्रथम आधुनिक उपन्यास कहा जाता है। इसमें उस समय के हिन्दू समाज की अनेक कुरीतियों का आलोचनात्मक एवं यथार्थवादी रीति से चित्रण हुआ है और स्त्रियों के लिए अनेक सदुपदेश दिए गए हैं।

भारतेन्दु युगीन उपन्यासकारों में लाला श्रीनिवास दास कृत ‘परीक्षा गुरु’ का प्रकाशन 1882 में हुआ था। ‘भाग्यवती’ उपन्यास का प्रकाशन उसके रचना-काल के दस वर्ष बाद सन्‌ 1887 में हुआ।

इस युग के उपन्यासों को हम पांच श्रेणियों में बांट सकते हैं।

1. सामाजिक उपन्यास, 2. ऐयारी-तिलिस्मी उपन्यास, 3. जासूसी उपन्यास, 4. ऐतिहासिक उपन्यास और 5. भावप्रधान उपन्यास

  1. सामाजिक उपन्यास : यह काल राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना की दृष्टि से जागृति एवं सुधार का काल था। सामाजिक समस्यायों और परिस्थितियों को केन्द्र में रखकर साहित्य साहित्य रचना करने वाले दो प्रकार के साहित्यकार थे –
    1. एक वर्ग तो नवीन शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, सुधार-आन्दोलन के प्रकाश में धार्मिक बाह्याडम्बरों एवं सामाजिक विकृतियों को समाप्त करके अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता था। इस वर्ग में श्रद्धाराम फुलौरी (भाग्यवती), लाला श्रीनिवास दास (परीक्षा गुरु), बालकिशुन भट्ट (नूतन ब्रह्मचारी, सौ आजान एक सुजान), लोचन प्रसाद पाण्डेय (दो मित्र), लज्जाराम मेहता (धूर्त रसिकलाल, हिन्दू गृहस्थ, आदर्श दम्पत्ति, बिगड़े का सुधार और आदर्श हिन्दू) का नाम उल्लेखनीय है।
    2. दूसरे वर्ग का लेखक सनातनी परम्परा से जुड़ा हुआ था। वह आर्य समाज आदि के द्वारा किये जाने वाले सुधारों का विरोधी था। इस वर्ग में गोपालराम गहमरी (चतुर चंचला, भानमती, नए बाबू, बड़ा भाई, देवरानी जेठानी, दो बहिन, तीन पतोहू, डबल बीबी, सास-पतोहू) और किशोरी लाल गोस्वामी (अंगूठी का नगीना) के नाम उल्लेखनीय हैं।

अन्य उपन्यास लेखकों में हनुमंत सिंह, देवी प्रसाद शर्मा, राधाचंद गोस्वामी, कार्तिक प्रसाद खत्री, देवकी नंदन खत्री, गोकुल नाथ शर्मा तथा अयोध्या सिंह उपाध्याय (बेनिस का बांका, ठेठ हिंदी का ठाट, अधखिला फूल) आदि प्रमुख हैं।

इन सामाजिक उपन्यासों के बीच प्रेम-रोमांस वाले ऐसे उपन्यासों की भी रचना हुई है जिनमें रीतिकालीन नायिका भेद वाले विलासात्मक प्रेम को प्रधानता दी गई है। कुछ उपन्यासों में ऊर्दू उपन्यासों की शोखी, शरारत और चुहल दिखाई पड़ती है। ‘अंगूठी का नगीना’ (किशोरी लाल गोस्वामी), ‘प्रणयी माधव’ (मोटेश्वर पोतदार), ‘शीला’ (हरिप्रसाद जिंजल), ‘श्यामा स्वप्न’ (ठाकुर जगमोहन सिंह) आदि प्रेम-प्रधान उपन्यास हैं।

उपन्यासों का ढेर लगा देने वाले इस युग के सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार हैं किशोरीलाल गोस्वामी। उन्होंने सामाजिक ऐतिहासिक उपन्यासों का श्रीगणेश किया। संख्या में इस तरह के उपन्यास 75 हैं। इनके विचार सनातन हिन्दू धर्म के अनुकूल हैं। इनके उपन्यासों में समाज के कुछ सजीव चित्र, वासनाओं के रूप रंग, चित्ताकर्षक वर्णन और थोड़ा बहुत चरित्रचित्रण भी पाया जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मानना है,

“साहित्य की दृष्टि से उन्हें हिन्दी का पहला उपन्यासकार कहना चाहिए।”

इनके सामाजिक उपन्यासों में ‘लवंगलता’, ‘हृदयहारिणी’, ‘हीराबाई’, ‘तरुणतपस्विनी’, ‘त्रिवेणी व सौभाग्य श्रेणी’, ‘लीलावती व आदर्श सती’, ‘राजकुमारी’, ‘चपला व नव्य समाज’, आदि उल्लेखनीय हैं। गोस्वामी जी के प्रायः सभी उपन्यास स्त्रीपात्र-प्रधान हैं और उनमें प्रेम के विविध रूपों का चित्रण हुआ है। उन्होंने एक ओर यदि सती-साध्वी देवियों के आदर्श प्रेम का चित्रण किया है तो दूसरी ओर साली-बहनोई के अवैध-प्रेम, विधवाओं के व्यभिचार, वेश्याओं के कुत्सित जीवन आदि का भी सजीव वर्णन किया है। बनते हुए नये समाज को इन्होंने संदेह की नज़र से देखा है। वे एक कामुक लेखक की दृष्टि से देखे जाते हैं। उनके सम्पूर्ण उपन्यास पर स्त्री और पुरुष के मिलन प्रसंग पर आधारित हैं। आचर्य शुक्ल का मत है,

“उनमें उच्च वासनाएं व्यक्त करनेवाले दृश्यों की अपेक्षा निम्नकोटि की वासनाएं प्रकाशित करनेवाले दृश्य अधिक भी हैं और चटकीले भी।

यही नहीं ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के लिए सहृदयता, निष्पक्षता, उदारता, पुरातत्व और ऐतिहासिक तथ्यों की पूरी तरह से हत्या करके गोस्वामी जी ने अपने पात्रों का नैतिक पतन कर दिया। भाषा के साथ किए गए मज़ाक़ के कारण उनके बहुत से उपन्यासों का साहित्यिक गौरव घट गया है।

(ज़ारी ….!)

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी मिल रही है…………आभार्।

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  2. याद नहीं कि उपन्यास के इतिहास के बारे में यह सब पढ़ा था या नहीं...यहाँ पर उपन्यास के बारे में अच्छी जानकारी मिल रही है ...आभार

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  3. बहुत ही उपयोगी श्रृंखला है ये.कृपया जारी रखिये.

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  4. इतने विस्तार से तो हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं पढ़ा था. बहुत दिन बाद समय मिला तो बढ़िया चीज पढ़ने को मिली. ये जानकारी अब किताबों से नहीं पढ़ी जा सकती है हाँ ब्लॉग पर जरूर पढ़ सकते हैं. ज्ञानवर्धक जानकारी.
    --

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  5. बहुत उपयोगी जानकारी है
    आभार्।

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  6. यह संकलन (हिन्दी) साहित्य के छात्रों के लिये अनुपम वरदान सिद्ध हो सकता है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसा सुगम आलेख पाठ्यक्रम में निर्दिष्ट सहायक ग्रंथों में मिलना मुश्किल है। जिस तरह से आप उपन्यास साहित्य के ऐतिहासिक सोपानों को सिलसिलेवार संजो रहे हैं वह स्तुत्य है। भविष्य में यह एक संदर्भ ग्रंथ होगा। धन्यवाद !!

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  7. मनोज जी!
    आशा करता हूं कि आज के कुछ अच्छे पठनीय उपन्यासों के नाम भी सुझाएंगे। अच्छा प्रयास है। शुभकामना।

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  8. हिन्दी उपन्यास के बारे में कुछ और तथ्यों से परिचय हुआ । धन्यवाद मनोज जी । किशोरीलाल गोस्वामी को हिन्दी की पहली कहानी के लेखक के रूप में ही जाना जाता है हालाँकि वह भी पूरा सच नही है । पर यहाँ पढ कर कहना होगा कि उन्हें कहानीकार से अधिक उपन्यासकार के रूप में जाना जाना चाहिये ।

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  9. Aaj pehli baar is Blog par aaya hun. Kaafi prasannata hui padhkar ki hindi ke uthhaan ke liye kuchh log karyarat hain.
    Meri Shubhkaamnaayein!!

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  10. दिन मैं सूरज गायब हो सकता है

    रोशनी नही

    दिल टू सटकता है

    दोस्ती नही

    आप टिप्पणी करना भूल सकते हो

    हम नही

    हम से टॉस कोई भी जीत सकता है

    पर मैच नही

    चक दे इंडिया हम ही जीत गए

    भारत के विश्व चैम्पियन बनने पर आप सबको ढेरों बधाइयाँ और आपको एवं आपके परिवार को हिंदी नया साल(नवसंवत्सर२०६८ )की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!

    आपका स्वागत है
    "गौ ह्त्या के चंद कारण और हमारे जीवन में भूमिका!"
    और
    121 करोड़ हिंदुस्तानियों का सपना पूरा हो गया

    आपके सुझाव और संदेश जरुर दे!

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  11. उपन्यास पर इतनी विस्तृत चर्चा बहुत जानकारीपरक एवं लाभदायक है.

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  12. आपका यह प्रयास प्रशंसनीय है। इस तरह के पोस्ट से अन्य लोगों को एक सीख लेनी चाहिए। यह सिलसिला जारी रखिए।धन्यवाद।

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  13. ..बहुत ही बढिया और उपयुक्त जानकारी आपने उपलब्ध कराई है, धन्यवाद!

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