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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

नवगीत – श्यामनारायण मिश्र :: समय के देवता

नवगीत – श्यामनारायण मिश्र :: समय के देवता

Sn Mishraकुछ लोगों में कविता के छांदसिक और छंदमुक्त रूप को लेकर मतभेद बना रहता है। कुछ लोगों को नवगीत, परम्परागत गीत, दोहा के अलावा कविता का छंदमुक्त रूप स्वीकार नहीं होता। श्यामनारायण मिश्र जी इसी श्रेणी में आते थे। वे गीत को पिता, नवगीत को पुत्र मानते थे बस। हां, नई कविता को नवगीत की सहोदरा मानते थे। चाहे जो भी मत रखते हों, वो एक समर्थ नवगीतकार थे। नवगीत के प्रति उनकी आस्था और समर्पण संदेह से परे था। तभी तो अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे सेन्ट्रल किडनी अस्पताल जबलपुर में उपचार के दौरान जब भी राहत मिलती “केन्द्र में नवगीत” संग्रह की भूमिका लिखने में जुट जाते। सन्‌ २००८ नये साल का पहला दिन जीकर, वह बड़े जीवट का नवगीतकार २ जनवरी की रात अपनी अवधारणा “केन्द्र में नवगीत” को छोड़, मृत्यु के पार के संसार में चला गया। आज उसी संग्रह से एक नवगीत प्रस्तुत है।

समय के देवता!

                             --- श्यामनारायण मिश्र

समय के देवता!

थोड़ा रुको,

मैं तुम्हारे साथ होना चाहता हूं।

तुम्हारे पुण्य-चरणों की

महकती धूल में

आस्था के बीज बोना चाहता हूं।

 

उम्र भर दौड़ा थका-हारा,

विजन में श्लथ पड़ा हूं।

विचारों के चके उखड़े,

धुरे टूटे,

औंधा रथ पड़ा हूं।

 

आंसुओं से अंजुरी भर-भर,

तुम्हारे चरण धोना चाहता हूं।

 

धन-ऋण हुए लघुत्तम

गुणनफल शून्य ही रहा।

धधक कर आग अंतस

हो रहे ठंडे, आंख से

बस धुंआ बहा।

 

तुम्हारे छोर पर क्षितिज पर,

अस्तित्व खोना चाहता हूं।