स्वतंत्रता दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्वतंत्रता दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 15 अगस्त 2010

ये कैसी स्वतंत्रता -- मनोज कुमार

ये कैसी स्वतंत्रता

मनोज कुमार

स्वतंत्रता की तिरसठवीं वर्षगांठ

मना चुके हम भारतवासी।

सन सैंतालिस मध्य निशा की

क्या हमको है याद ज़रा सी।

स्वतंत्रता की सालगिरह पर

हर कोई खुशी मनाता है

मगन हर्ष उल्लास से

आज़ादी की रस्म निभाता है

एक प्रश्‍न रह-रह कर

उठता है मेरे अंतरमन में

आज़ादी के दीवानों से क्या हमने

तोड लिया हर नाता है?

कैसे - कैसे बलिदान किए,

धन्य - धन्य बलिदानी।

काल - कोठरी अन्धकूप के,

पी गए कालापानी।

उन वीरों के बलिदानों को

मिला दिया माटी में हमने,

अपने दुष्‍कर्मों से मिटा रहे,

उनके सत्कर्मों की निशानी।

भगत सिंह, आज़ाद, खुदी राम,

अशफाक उल्लाह, रानी झांसी।

कितने कितने आदर्श दिए,

स्वीकारी हंस हंसकर फांसी।

आज़ाद, भगत और बिस्मिल

हमसे पूछ रहें हैं - बोलो तो

स्वाभिमान क्यों बिका हमारा,

अपनी वृत्ति बनी क्यों दासी।

पृथ्वी, अग्नि मिसाइल बनाकर

भारत का मान बढ़ाया

रोबोट, राकेट, टैंक बनाकर

दुनियां में नाम कमाया

नए-नए अनुसंधान किए

अंतरिक्ष की दौड़ लगाई

पोखरण में कर अणु परीक्षण

पौरुषबल दुनियां को दिखाया

आज़ादी से अबतक, सच है,

हमने बहुत तरक्की की

विश्‍व बाज़ार नई अर्थ व्यवस्था में

हमने कितनी मंजिल तय की

स्वतंत्रता के चौंसठवें जन्म दिन तक

और भी किए कई प्रयत्न

यहां तक कि टेस्ट ट्यूब में

हुआ इंसानों का अस्तित्व उत्पन्न

फिर भी कुछ कमियों का हमको

होता है एहसास,

आज भी हम बने हुए हैं

कुप्रथा - कुरीतियों के दास

वैभव और संस्कृति की निशानी

ऋषि मुनियों की ओजपूर्ण वाणी

और जिनके उपदेशों ने

दुनियां को थी राह दिखाई

स्वतंत्रता के विकास की कहानी

अपने पन्ने उलट- उलट कर

वहीं खड़ी है जहां से उसने

आज़ादी की थी अलख जगाई।

पशुता के पंक में धंसकर

मलिन मानवता का सरोज

सभ्यता हमारे लिए आज

भौतिक सुख साधनों की खोज

क्या नहीं था हमारे पास

विवेकशीलता की कहानी थी।

एक जोश था, रवानी थी

राम का आदर्श था

गौतम बुद्ध की वाणी थी

बहुत कुछ था हमारे द्वार,

आपस का वह प्यार

दिल के आइने चेहरे

दिल पर खाकर घाव भी गहरे

एक दूजे के लिए मरना

मुंह पर हंसी खुशी का फूल धरना।

हम सब जिनको भूल चुके हैं,

कहां गया वह प्यार हमारा

गंगा-जमुना का सा रिश्ता

कहां गई वह पावन धारा।

जिस यशगाथा की गूंजें

भू-मंडल में थी गूंजा करती।

मरघट की सी नीरवता में

डूब गई है भरत की धरती

मानवता पर दानवता हावी

देश है पतनोन्मुख।

सबको सूझता है केवल

अपना ही सुख।

चारों ओर है ख़ून का पहरा,

ख़ूनी दिल है, ख़ून का चेहरा।

वातावरण में रक्त की महक

फैली है अत्याचारी छाया

होड़ लगी है हिंसा प्रतिहिंसा की

ना कोई मोह, ना कोई माया।

स्त्रियों की इज़्ज़त बचा न पाए

भंवरी अपनी लाज गंवा कर

धन के लिए औलाद को बेचा

लगता यह इलज़ाम पिता पर

बहुएं शूली चढ जाती हैं

दहेज के दानव का होकर शिकार

आज़ाद देश में रूपकंवर सी बेटी

जल जाए शौहर की चिता पर,

बापू के सुन्दर सपनों का,

हमने ख़ूब किया अभिनंदन।

नाम कलंकित किया देश का,

टीक भाल पर ख़ूनी चंदन।

करुणा विहीन यह हृदय हमारा

बहा रहा है शोणित धारा

भौतिकता के उन्माद तले

मानवता कर रही क्रंदन।

आतंकवाद का काला साया

हरी-भरी वादियां निगल रहा है।

साम्प्रदायिकता का उन्मादी पिशाच

आग के गोले उगल रहा है।

मनवता का हो रहा ह्रास

आपाधापी घट-घट में है,

घृणा-द्वेष का फैला पंजा

भाईचारा मसल रहा है ।

निर्बल की कराह-सिसकियां

सुनने वाला कोई नहीं।

बेचैन, थकी, उनींदी आंखें

वर्षो से हैं सोई नहीं

अपमानित होने की पीड़ा

जाने वही जिसने सहा।

परंपराओं के नाम पर

कौन सी जाति रोई नहीं।

. ..

... ....

..... ......

यदि सही स्वतंत्रता हम चाहते हैं तो,

हमको आगे बढना होगा।

शांति और सौहार्द्र के वातावरण में,

नया भारत गढ़ना होगा।

होठों पर मुसकान सजा कर

दिल में प्यार की जोत जगा कर

हिंसा, घृणा, दुश्मनी हटाकर

प्यार के पाठ को पढ़ना होगा।

घिसी पिटी बेमानी रस्में

भारत से उठ जाएं बिलकुल

जाति-धर्म का भेद मिटा कर

रहें देश में हम सब मिलजुल

सोच हमारी फिर विस्तृत हो

सुख शांति खुशहाली से

एकता का जो पाठ पढाए

फिर से निर्मित हो वह गुरकुल

मलिनता बुहर जाए जग की

मन हम सब इस तरह बुहारें

आज़ादी के वीरों की वाणी

अपने अपने दिल में उतारें।

तब हम समझें कि हमने

पाई है आज़ादी सच्ची

अपने-अपने घरों में जब हम

सुख चैन से रात गुज़ारें।

आज़ादी

हमारा

अधिकार है

कर्त्तव्य है

और है

अस्तित्व की

मुनादी।

*** *** ***

शनिवार, 14 अगस्त 2010

तिरंगे का ग़लत इस्तेमाल न करें…!

तिरंगे का ग़लत इस्तेमाल न करें…

12012010005मनोज कुमार

यह हमेशा ध्यान रखें कि भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज भारत के नागरिकों की आशाएं और आकांक्षाएं दर्शाता है। यह हमारे राष्‍ट्रीय गर्व का प्रतीक है। पिछले छह दशकों से अधिक समय से सशस्‍त्र सेना बलों के सदस्‍यों सहित अनेक नागरिकों ने तिरंगे की पूरी शान को बनाए रखने के लिए निरंतर अपने जीवन न्‍यौछावर किए हैं।

एक लिंक दे रहा हूं। आपका खून न खौल जाए तो कहिएगा। यहां देखें। मैं चाहता तो फोटो कॉपी कर पेस्ट कर सकता था। पर इससे मेरा ब्लॉग अपवित्र हो जाता। ये तथाकथित धार्मिक गुरु हैं। तिरंगे का इतना ज़्यादा अपमान शायद ही कोई भारतीय बर्दाश्त कर सकता है।

अब मैं आता हूं अपनी बात पर …

भारत का राष्ट्रीय ध्वज भारतवासियों के लिए आशा और अभिलाषा का परिचायक है। यह हमारे राष्ट्र के लिए गर्व का प्रतीक है। पिछले छह दशकों में अनेकों लागों ने इसके सम्मान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का न्योछावर किया है।

भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्‍चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘’तिरंगे’’ का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है।

भारतीय राष्‍ट्रीय ध्वज का इतिहास

आइए राष्ट्रीय ध्वज के रोचक इतिहास पर एक नज़र डालें। यह किन-किन परिवर्तनों से गुजरा, इसका एक लंबा इतिहास है। इसे हमारे स्‍वतंत्रता के राष्‍ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्‍यता दी गई।

ये हमारे सबसे पहले राष्‍ट्रीय ध्‍वज का चित्र है। 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कोलकाता में फहराया गया था। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।

यह है दूसरा ध्‍वज! इसे पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

यह है तीसरा ध्‍वज! यह 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया।

इस चौथे ध्वज को आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। इसका प्रयोग अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में विजयवाड़ा में किया गया। भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा गांधी जी के सुझाव पर इसमें डाला गया था।

काग़ज़ या प्लास्टिक का तिरंगा झंडा बेचा जाता है, जो सही नहीं है। राष्ट्रीय गर्व की भावना के साथ लोग काफी उत्साह से इन झंडों को ख़रीदते हैं, लेकिन दूसरे ही दिन हम इन झंडों को सड़को पर पांव तले रौंदे जाते देखते हैं या किसी कूड़ेदान में या अन्यत्र फेंका हुआ पाते हैं।

यह पांचवां ध्‍वज वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ। वर्ष 1931 में तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया। 

22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे स्वतंत्र भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया।

ध्‍वज के रंग

भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

राष्ट्रीय ध्वज का रंग तथा अशोक चक्र के महत्व को डॉ. एस. राधाकृष्णन ने संविधान सभा में प्रतिपादित किया था जिसे सर्वसम्मति से राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकार किया गया।

“सबसे ऊपर केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। यह रंग निस्वार्थ त्याग को दर्शाता है।

“मध्य में सफेद रंग सत्य की राह पर चलने के लिए हमारे उचित आचरण का मार्गदर्शन करता है। यह शांति और सत्‍य का प्रतीक है।

“हरा रंग पादप जीवन के साथ हमारे संबंध को दर्शाता है, जिसपर अन्य सभी जीवन निर्भर है। हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।

“सफेद रंग के बीच में अशोक चक्र न्याय और धर्म के चक्र का द्योतक है। इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। सत्य, धर्म या गुण उनका सिद्धांत होना चाहिए जो इस झंडे के नीचे काम करते हैं। अशोक चक्र गति को भी प्रदर्शित करता है। चलना ही जीवन है और रुक जाना मौत के समान। भारत में और अधिक बदलाव नहीं बल्कि आगे बढ़ने की आवश्यकता है। यह चक्र एक शांतिपूर्ण परिवर्तन के गतिवाद का प्रतिनिधित्व करता है।”

ध्‍वज संहिता

राष्ट्रीय ध्वज के प्रति व्यापक अनुराग, सम्मान तथा ईमानदारी होनी चाहिए। सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए अ-सांविधिक अनुदेशों के अलावा राष्ट्रीय ध्वज का प्रदर्शन इम्ब्लेम एंड नेम्स (प्रिवेंशन ऑफ इम्प्रॉपर यूज) एक्ट, 1950 (1950 का क्रम सं.12) तथा प्रिवेंशन ऑफ इनसल्ट्स टु नैशनल ऑनर एक्ट, 1971 (1971 का क्रम सं.69) के प्रावधानों के अंतर्गत शासित है। 26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया।

राष्ट्र ध्वज तिरंगा हमारे देश की प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रतीक है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौक़े पर राष्ट्रीय ध्वज का उदारता पूर्वक प्रयोग (liberal use) देखने को मिलता है। आजकल एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है कि उक्त अवसर पर काग़ज़ या प्लास्टिक का तिरंगा झंडा बेचा जाता है, जो सही नहीं है। राष्ट्रीय गर्व की भावना के साथ लोग काफी उत्साह से इन झंडों को ख़रीदते हैं, लेकिन दूसरे ही दिन हम इन झंडों को सड़को पर पांव तले रौंदे जाते देखते हैं या किसी कूड़ेदान में या अन्यत्र फेंका हुआ पाते हैं। इस संदर्भ में यह ध्यान देने वाली बात है कि लोग यह भूल जाते हैं कि ऐसा कर वे राष्ट्रध्वज का अपमान कर रहे होते हैं। अकसरहां ये झंडे कूड़े-कचड़े के साथ जला दिए जाते हैं। यह हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि तिरंगे का सही और वैभवशाली तरीक़े से इस्तेमाल किया जाए।

यदि आप स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की योजना बना रहें हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि इस पवित्र राष्ट्रीय ध्वज के प्रति किसी प्रकार का असम्मान आपको मुश्किल में डाल सकता है। प्रत्येक नागरिक इसकी गरिमा को बरकरार रखने के लिए संविधान से बंधा हुआ है।

१. हमें राष्ट्रीय ध्वज को एक ऊंचाई पर उचित तरीक़े से फहराना चाहिए।

२.  छोटे बच्चों को तिरंगे को खिलौने की तरह इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए।

३. प्लास्टिक के झंडे न तो ख़रीदें और न ही इस्तेमाल करें।

४. काग़ज़ के झंडे को शर्ट के पॉकेट आदि पर पिन से लगा कर इस्तेमाल न करें।

५. इसका हमेशा ध्यान रखें कि झंडे पर कोई शिकन न आए।

६. तिरंगे को बैनर/पताका या सजावट के रूप में इस्तेमाल न करें।

७. इस बात का ख्याल रखें की राष्ट्र ध्वज कुचल या फट न जाए।

८. तिरंगे को कभी जमीन पर गिरने न दें।

९. कपड़ों के टुकड़ों को जोड़ कर तिरंगे का रूप देने की कोशिश मत करें।

१०. इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है।

११. जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।

१२. इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए।

१३. इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।

१४. किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है।

१५.  तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

यह हमेशा ध्यान रखें कि भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज भारत के नागरिकों की आशाएं और आकांक्षाएं दर्शाता है। यह हमारे राष्‍ट्रीय गर्व का प्रतीक है। पिछले छह दशकों से अधिक समय से सशस्‍त्र सेना बलों के सदस्‍यों सहित अनेक नागरिकों ने तिरंगे की पूरी शान को बनाए रखने के लिए निरंतर अपने जीवन न्‍यौछावर किए हैं।