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गुरुवार, 20 मई 2010

हाइकू :: हरीश प्रकाश गुप्त

J0341653 भरा उदधि

हुआ मधु विस्‍फोट

फूटी कविता ।

उतर गई

अन्‍तस में, नैनन

पढ़ कविता ।

मेरी कविता

मेरे मन का गीत

सुर संगीत।

रात निठल्‍ली

सोई, दिन ने थक

बेबस ढोई ।

अचल बिंदु

के इर्द-गिर्द घूम

रहा बेसूध ।

गली-गली में

घूमा, ठहरा, सोचा

लेकिन कहॉं?

कुत्ता ले भागा

रोटी, नुक्‍कड़ वाले

भिखमंगे की ।

दरक गया

शीशे-सा जब देखा-

सच, सपना

शीशे में देखा

चेहरा, अपना या

कुछ उनका ।

गली में शाम

नुक्‍कड़ में रोशनी

मीना बाजार ।

रविवार, 16 मई 2010

लड़की

लड़की

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हरीश प्रकाश गुप्त, हिन्दी अनुवादक

आयुध उपस्कर निर्माणी, कानपुर

 

acd_wallpaper लड़की

खेलती है गली में

नुक्कड़ में,

बच्चों के साथ,

उसे छूट है

खेलने की ।

Picture 062 लड़की खेलती है

गुड्डे और गुड़िया से

सजाती और शृंगार करती है

फिर कराती है

शादी दोनों की ।

Picture 092 लड़की बनाती है

घरौदा-

मिट्टी का,

अपने मकान के एक कोने में-

एक घर,

रंगती है

पोतती है

सजाती है

बिठा देती है उसमें

गुड्डे और गुड़िया को ।

Picture 113 लड़की बड़ी होती है

अब नहीं खेलती

गुड्डे और गुड़िया से

घरौंदे से,

उसकी बड़ी समझ में

अब

इनकी कोई जरुरत नहीं,

उसका बनाया घरौंदा

अब भी खड़ा है-

भर दी जाती हैं

उसमें आलू, प्याज और सब्जियाँ