- सलिल वर्मा
(एक घोषणा: मुझमें भाषा की कोई समझ नहीं है और ना ही मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. यह आलेख एक सामान्य जानकारी और साधारण जिज्ञासा का परिणाम है, जो किसी भी व्यक्ति के मन में जागृत हो सकती है. इसलिए इस आलेख को उसी आलोक में ग्रहण किया जाए.)
भाषा और राजभाषा की चर्चा से पूर्व एक पहेली. भारतवर्ष की एक ऐसी भाषा का नाम बताएं जो पाँच अक्षरों के मेल से बनी है और जिसे उलटा सीधा दोनों तरफ से एक समान पढ़ा जा सकता है. अगर आपका उत्तर है “मलयालम”, तो मैं कहूँगा, गलत जवाब! और मेरी बात यहीं से आरम्भ होती है. “मलयालम” शब्द वस्तुतः “मलयाळम” है, अतः इसे उलटा पढने पर, इस शब्द में “ळ” और “ल” का स्थान परिवर्तित हो जाएगा, साथ ही उच्चारण भी. अब आप समझ गए होंगे कि आपका उत्तर क्यों और कैसे गलत है.
हिन्दी से राजभाषा के रूप में परिचय अपनी नौकरी के सिलसिले में हुआ. भारत सरकार के उपक्रम में कार्य करने के कारण हिन्दी दिवस, हिन्दी कार्यशाला आदि के माध्यम से राजभाषा के रूप में हिन्दी की उपयोगिता जानने को मिली. बताया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली यह भाषा अत्यंत सरल है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शब्दों को जिस प्रकार उच्चारित किया जाता है, ठीक वैसे ही इन्हें लिपिबद्ध भी किया जाता है. अर्थात, जैसा उच्चारण, वैसा ही लेखन या हिज्जे. एक और विशेषता यह भी बताई गयी कि इस भाषा ने कई स्थानीय, प्रादेशिक, देशज व विदेशज शब्दों को सहज ही सामाहित कर लिया है, जिसके कारण वे शब्द हिन्दी का ही एक अभिन्न अंग प्रतीत होते हैं.
मेरे विचार से इसी उदारता के कारण हमारी वर्णमाला की सीमा का भी पता चला. कालान्तर में कई ऐसे स्वर, व्यंजन अथवा मात्राएं प्रयोग में लाई गईं, जो हिन्दी-वर्णमाला में नहीं थीं. कारण स्पष्ट है कि देवनागरी की वर्णमाला हिन्दी शब्दों के लिए थी, न कि हिन्दी इतर भाषाओं के लिए. न वे शब्द थे हिन्दी में, न उनको लिखने के लिए हमारे पास वर्णमाला में अक्षर थे; न वे ध्वनियाँ थीं, न उनको लिपिबद्ध करने के लिए हमारे पास मात्राएं थीं.
विज्ञापन की दुनिया ने इस आवश्यकता का सर्वाधिक बोध कराया, जब कई शब्द अंग्रेज़ी से हू-ब-हू लिप्यांतरित कर दिए गए. एक विज्ञापन की टैग लाइन है “Go get it!”. यदि इसे देवनागरी में लिखा जाए तो एक शब्द व्यवधान पैदा करता है. वह शब्द है “Get”. हिन्दी में Get और Gate दोनों को “गेट” ही लिखा जाता है. किन्तु पहले शब्द की ध्वनि, दूसरे स्वर की ध्वनि से भिन्न है अर्थात उच्चारण भिन्न. यही बात College शब्द के भी साथ दिखाए देती है. बिहार में जहां इसे “कौलेज” कहा जाता है, वहीं यू.पी. में “कालेज”. जबकि इस शब्द का उच्चारण दोनों के मध्य कहीं पर है.
दक्षिण भारतीय भाषाओं में यह समस्या नहीं है. वहाँ की वर्णमाला में स्वर ‘ऍ’, ‘ए’ और ‘ऐ’ तथा ‘ऑ’, ‘ओ’ और ‘औ’ सम्मिलित हैं. जिस कारण वे इस प्रकार लिखते हैं:
Get: गॅट Gate: गेट College: कॉलेज
मराठी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में एक अक्षर है ‘ळ’ जिसका उच्चारण, हिन्दी के ‘ल’ से भिन्न है. किन्तु इसे भी हम ‘ल’ के स्थानापन्न के रूप में प्रयोग करते हैं. जबकि किसी मराठी माणूस को पूछ कर देखें तो ‘दलवी और काले’ बिलकुल अलग हैं ‘दळवी और काळे’ से.
पिछले दिनों कनिमोड़ी के समाचारों में बने रहने के कारण, उनके नाम की कई हिज्जे देखने को मिली. दक्षिण भारतीय भाषाओं में एक अक्षर है ‘ഴ’. इसका उच्चारण बड़ा कठिन है, क्योंकि इसमें जीभ को घुमाकर कंठ की ओर ले जाकर एक ध्वनि उत्पन्न की जाती है, जो हिन्दी के ‘र’ और ‘ड़’ के बीच की ध्वनि है. रोमन लिपि में इसे “Zha” लिखने का प्रचलन है और अंग्रेज़ी का अंधानुकरण करने के कारण हम कभी कनिमोझी, कभी कनिमोज़ी लिखते और बोलते हैं. पहले इस अक्षर को ‘ष’ में नुक्ता लगाकर लिखा जाता था.
उर्दू और हिन्दी के संबंधों पर तो कई चर्चाएं और बहस हुईं है. ग़ालिब और मीर भी देवनागरी में लिप्यांतरित होकर उपलब्ध हैं. उर्दू के कई शब्दों को हमने देवनागरी के अक्षरों के नीचे बिंदी लगाकर अपना लिया है जैसे ग़ालिब, ज़ेवर, फ़रमाइश आदि.
आज जब लिप्यान्तरण, अनुवाद तथा साझेदारी, भाषा को समृद्ध कर रही है (अंग्रेज़ी शब्दकोष में हिन्दी भाषा से लिए गए शब्द Loot, Dacoity, Bandh, Gherao आदि) तो आवश्यकता है कि उनको ससम्मान स्वीकार किया जाए; इसके लिए चाहे क्यों न हिन्दी वर्णमाला, मात्राओं आदि में स्वल्प परिवर्तन करना पड़े. प्रांतीय भाषाओं को अंतर नहीं पड़ता, किन्तु राजभाषा और राष्ट्रभाषा होने के लिए यह अनिवार्य है कि हिन्दी के सुमन से अन्य भाषाओं की सुगंध साहित्य को सुवासित करे.