शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

आम आदमी की हिंदी प्रयोजनमूलक हिंदी के ज़रिए (भाग-6)

साहित्य से अलग के क्षेत्र

साहित्य से अलग के क्षेत्र जैसे विज्ञान, चिकित्सा, विधि, प्रशासन आदि में जिस भाषा का प्रयोग होता है वह भाषा जीवन व्यवहार और ज्ञानपरक विचार-विश्लेषणमूल्यांकन विवेचन और प्रस्तुतिकरण की भाषा होती है। उसकी एक अलग तकनीकी शब्दावली होती है, जिसके प्रयोग के बिना उसके कार्य को आगे बढ़ाया ही नहीं जा सकता। चूंकि हिंदी की बोलियों में विज्ञान, चिकित्सा, विधि, प्रशासन आदि क्षेत्रों संबंधी चिंतन अनुशासन का विकास हुआ ही नहीं था इसलिए उसकी शब्दावलि की कोई बोलीगत परंपरा विकसित नही थी। आधुनिक पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, विधि, प्रशासन आदि की शब्दावली के लिए हिंदी शब्दावलि में पर्याय निर्धारित करने के प्रश्न पर काफी विवाद उठा। एक वर्ग संस्कृत के धातुओं को लेने के पक्ष में था तो दूसरा वर्ग अरबी-फ़ारसी। यह टकराव का कारण बना। शब्दावलि तैयार तो की गई पर न तो यह पूर्ण है न ही निर्दोष। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों विज्ञान, चिकित्सा, विधि, प्रशासन आदि में हिंदी को कार्य का माध्यम बनाने के प्रयास को आज तक गंभीरतापूर्वक नहीं लिया गया है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या कार्य क्षेत्र, विभिन्न विषयों के लोग हिंदी माध्यम से अपने को दूर रखने की कोशिश ही करते रहे।

सरकारी क्षेत्र के सृजनात्‍मक लेखन की बात करें तो हम पाते हैं कि प्रशासनिक क्षेत्र में हिंदी के उपयोग के सरकारी प्रयास का समुचित माहौल ही नहीं बना। अनुवाद की प्रक्रिया हिंदी में सोचने, समझने और लिखने की सहज स्थिति से दूर हटती गई। रोज़मर्रा के व्यवहार के अभाव में प्रशासनिक हिंदी में असहजता ही नहीं आई बल्कि यह अटपटी हिंदी बनकर रह गई। कार्यालयों में यह बात आए दिन सुनी जा सकती है कि हिंदी को ख़तरा अंग्रेज़ी से नहीं, अपनों से है, ख़ास तौर से शुद्धतावादियों से। कार्यालय को कठिन और दफ़्तर को सरल, वेतन को कठिन और तनख़्वाह को सरल सिद्ध करते हुए ऐसे लोग हिंदी के संस्कृतकरण के ख़िलाफ लड़ाई लड़ते रहते हैं। ऐसे लोगों का तर्क है कि तत्सम शब्दों के इस्तेमाल से हिंदी संकीर्ण होती जा रही है। वे हिंदी को शुद्धतावादियों के ख़ेमे से बाहर निकाल कर सर्वग्राह्य बनाने के भरसक प्रयास में ये जुटे रहते हैं।

आज हिंदी के कई रूप देखने को मिलते हैं। छत्तीसगढ़ी हिंदी, झारखंडी हिंदी, मुंबइया हिंदी, बिहारी हिंदी, अंडमान की हिंदी, कर्नाटक की हिंदी, हैदराबादी हिंदी आदि। हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में हिंदी भाषी क्षेत्रों की श्रम शक्ति का भी काफी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदीतर भाषी प्रदेशों में हिंदी भाषी प्रदेशों के श्रमिक काम करने जाते हैं। वे प्राय: अनपढ़ या कम शिक्षा प्राप्त होते हैं। उनके साथ संवाद स्थापित करने के लिए स्थानीय लोगों को हिंदी का ही सहारा लेना पड़ता है। फलत: उन क्षेत्रों में हिन्दी का प्रसार प्रचार होता है और आंचलिकता की छाप लिए एक अलग हिंदी का रूप देखने को मिलता है।

----- अभी ज़ारी है ....


3 टिप्‍पणियां:

  1. आपके लेख के माध्‍यम से नई जानकारियां मिल रही है । धन्‍यवाद ।

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  2. Hindi kee manyata din-b-din badhtee jayegee ye baat to tay hai..gar dikshin Bharat ka koyi Uttar Bharat me kaam ke silsilse aaye to Hindi ke siva any paryaay nahi..

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  3. कोई भी शब्द व्यवहार में आ जाने से प्रचलित हो जाता है । संस्कृत का एक शब्द है:मुद्रिका । लेकिन दिल्ली में दिल्ली के चारों ओर परिक्रमा करने वाली बस सेवा को मुद्रिका बस सेवा नाम देने से यह शब्द वहां आम हो गया है । हमें जरूरत है हिंदी शब्दों को व्यवहार में प्रचलित करने की , न कि उसके सरलीकृत करते जाने से उसके अर्थ-सौष्ठव को कम करने से ।

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