रविवार, 31 जनवरी 2010

बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका (भाग-१)

बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका (भाग-१)

अनुवाद का मूलमंत्र


जहां एक ओर पिछले कुछ दशकों में सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव आया है वहीं दूसरी ओर हिंदी के ज़रिए एक वैश्‍विक क्रांति का आगाज़ हुआ है। इसमें सिनेमा और टेलीविजन का बहुत बड़ा हाथ है। आज विज्ञापन की दुनियां में हिंदी का बोलबाला है। हिंदी धरावाहिकों को भी इसका बहुत बड़ा श्रेय जाता है। न सिर्फ हिंदीतर भाषी बल्कि विदेशी भी यह समझ चुके है कि अगर आम भारतीयों को कोई संदेश देना है तो हिंदी को माध्यम बनाना ही होगा।

1949 में हमने यह तय किया था कि हम सरकारी काम काज में हिंदी का उपयोग करेंगे। यानी हिंदी हमारी राजभाषा होगी। प्रशासन में राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रयोग और प्रगामी प्रयोग पर जोर दिया गया। इसके फलस्वरूप शिक्षा और प्रशासन में भारतीय भाषा को नई भूमिका मिली। अनुवाद एक व्यापक विषय बन गया। अनुवाद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य हो गया। अनुवाद और राजभाषा दोनों ही क्षेत्र का काफी विकास हुआ है। अब अनुवाद और राजभाषा को एक ही अध्ययन विषय माना जा रहा है। आज पूरे विश्‍व में तेज़ी से बदलाव आ रहा है। अत: बदलते परिवेश में अनुवाद के संदर्भ में अनेक बिंदुओं का विकास अब ज़रूरी हो गया है। इसमें अनुवउदकों की भूमिका काफी बढ़ जाती है।

आज बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से कौन नहीं परिचित है। यह एक व्यवसायिक हिंदी का रूप इख़्तियार कर चुकी है। इसक चौतरफा विस्तार हो रहा है। इसके फलस्वरूप हिंदी ने इस घोर व्‍यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्‍पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज कराई । जिसका रोजमर्रा की जिंदगी में कोई खास उपयोग नहीं है वह प्रायः आम लोगों के लिए कोई विशेष महत्‍व नहीं रखती। मशीनी युग के भाग-दौड़ में वही चीज स्‍वागतेय है जिसका सीधा और तीव्र प्रभाव पड़ता हो। परिवर्तन ही एक मात्र शाश्‍वत है। हिंदी को भी रूढिवादिता एवं परंपरावादिता से बाहर निकल कर दैनिक जीवन की छोटी-बड़ी सभी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए बाजार के मान-दंड पर खड़ा होना पड़ा है। इस हिंदी का सौन्दर्य अलंकारों से नहीं साधारनीकरण से है। आज अनेक विदेशी उत्‍पादों के विज्ञापन भारत में हिंदी में किए जाते हैं ऐसी हिंदी में जो आम आदमी से लेकर खास आदमी तक पर प्रभाव डाल सके। फलत: हिंदी के ज़रिए रोजगार के नए-नए अवसरों का समावेश हुआ है।

हालांकि साहित्‍य के अलावे ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में भी हिंदी का इतिहास कमजोर नहीं रहा है, अपितु ज्ञान-विज्ञान का हस्‍तांतरण मजबूत भाषा की विशेषता रही है। आज की तारीख में चिकित्‍सा, अभियंत्रण, पारिस्थितिकी, अर्थशास्‍त्र से लेकर विभिन्‍न भाषाओं से साहित्‍य का हिंदी में अनुवाद करने वालों की भारी मांग है। यह पूर्णतः अनुवादक पर निर्भर करता है कि वह जिस भाषा से और जिस भाषा में अनुवाद कर रहा है उन भाषाओं पर उसका कितना अधिकार है और इन भाषाओं की अनुभूतियों में वह कितनी तारतम्‍यता कायम रख सकता है। एक सफल अनुवादक वही होता है जो अनुदित कृति में भी मूल कृति की नैसर्गिक अनुभूतियों को अपरिवर्तित रखे। अनुवाद करते समय स्रोत भाषा की रचना के परिवेश और प्रसंग को समझकर ही अनुवादक को लक्ष्य भाषा में अनुवाद करना चाहिए। अपने किसी आत्मीय को बहुत दिनों के बाद देखकर अगर कोई पश्‍चिम के देशों का विदेशी कहे “You cane as sunlight” तो इसका अनुवाद हिंदी में तुम सूर्यप्रकाश की तरह आए के स्थान पर तुम्हारे आने से बड़ी खुशी हुई सही होगा।

कार्यालयों में अनुवाद का प्रयोग एक विशेष प्रयोजन के लिए होता है। राजभाषा हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों के बीच सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए। राजभाषा के प्रयोग का अधिकाधिक अवसर तभी मिलेगा जब उसमें सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों का सहज समावेश हो। अनुवाद और अनुवादक की सार्थकता तभी है जब प्रवाहमय भाषा का प्रयोग होगा। भाषा में सदैव नए प्रयोग चलते रहते हैं। हिंदी भाषा में भी बाज़ारवाद, वैश्‍वीकरण, भौगोलीकरण एवं भूमंडलीकरण के कारण कई नए प्रयोग हो रहें हैं। अनुवादकों को इस बात का ख़ास ख़्याल रखना चाहिए। उन्हें इन परिवर्तनों को अपनी सहज प्रवृत्ति के रूप में ढ़ालना चाहिए। सहज प्रवृत्ति से सहज भाषा निर्मित होती है। सहज भाषा ही सर्वग्राह्य होगी। अनुवादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी भाषा को इतना बोझिल और कृतिम न बना दिया जाए कि इसकी सहजता नष्ट होने लगे। प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही सर्वग्राह्य हो सकती है। सरकारी कार्यालयों में साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। यहां की शब्दावली में न तो भावनाओं का प्रवाह होता है न विचारों की प्रबलता। यहां मात्र माध्यम बनने की नियति होती है। अनासक्त तटस्थता यहां के अनुवाद का मूलमंत्र है।

ज़ारी है ----

7 टिप्‍पणियां:

  1. यह भाग भी सार्गर्भित .उत्तम विचार .

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  2. जानकारी और सुझाव देता एक अच्छा लेख है।

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  3. कोई अनुवाद पूर्ण नहीं होता । क्योंकि वह मूल भाव को उसकी आत्मा से पूर्णत: अभिव्यक्त नहीं कर पाता । अनुवाद कई तरह का होता है । आज तो पूर्णत: यांत्रिक अनुवाद भी उपलब्ध है । google पर अनेक टूल उपलब्ध हैं, जो एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद कर देते हैं, लेकिन संदर्भ और अनुभूति मशीन नहीं दे सकती । ये पूर्णत: मानवीय परिघटनाएँ हैं । जितनी सूक्ष्म अनुभूति होगी, उतना ही व्यक्त करना कठिन होगा । लेकिन एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद कार्य होता रहना चाहिए । चाहे अनुवाद अच्छा हो या बुरा यह होता रहना चाहिए । समय के साथ उसमें बहुत कुछ परिमार्जित ,परिनिष्ठित होता जाता है ।

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  4. "आज की तारीख में चिकित्‍सा, अभियंत्रण, पारिस्थितिकी, अर्थशास्‍त्र से लेकर विभिन्‍न भाषाओं से साहित्‍य का हिंदी में अनुवाद करने वालों की भारी मांग है।"

    क्या वाकई? सच? यदि ऐसा है तो हमारे लिए क्या संभावनाएं हो सकती हैं?
    http://ankurthoughts.blogspot.com/2009/08/blog-post_2028.html

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  5. हिंदी के प्रति जागरूकता का अच्छा कार्य है...

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  6. अनुवाद आवश्‍यकता है इसमें कोई दो राय नहीं हैं परंतु अनुवादकों द्वारा अनुवाद की गुणवत्‍ता का कितना ध्‍यान रखा जा रहा है।यह विचारणीय प्रश्‍न है क्‍योंकि बहुत कम अनुवादक हैं जो अनुवाद करते समय स्रोत भाषा में रचित सामग्री पर पर्याप्‍त ध्‍यान देते हैं। शाब्दिक अनुवाद की प्रववृत्ति बढ़ रही हैं। जब अनुवाद में मूल पाठ की अात्‍मा आनी चाहिए तभी वह वास्‍तविक संदेश की अभिव्‍यक्ति में सक्षम अनुवाद होगा।

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