मंगलवार, 1 जून 2010

काव्यशास्त्र – 16 :: आचार्य मम्मट

काव्यशास्त्र – 16

::

आचार्य मम्मट

- आचार्य परशुराम राय

भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य मम्मट का योगदान अद्वितीय है। इन्हें विद्वत्समाज 'वाग्देवतावतार' मानता है। इनका काल महाराजा भोजदेव के बाद आता है। इनके जीवन के विषय में प्रामाणिक तथ्य बहुत कम मिलते हैं। इसमें संशय नहीं कि ये कश्मीर निवासी थे। इनके एकमात्र ग्रंथ'काव्यप्रकाश' पर'सुधासागर' नामक टीका के टीकाकार भीमसेन के अनुसार आचार्य मम्मट के पिता जैयट थे। 'अष्टाध्यायी' नामक व्याकरण ग्रंथ पर महर्षि पंतञ्जलि द्वारा प्रणीत 'महाभाष्य' के टीकाकार कैयट और यजुर्वेद के भाष्यकार उव्वट (कहीं-कहीं पर औव्वट) दोनों आचार्य मम्मट के अनुज थे। ये पुन: लिखिते हैं कि आचार्य मम्मट ने शिवपुर (वाराणसी) जाकर अध्ययन किया।

उव्वट ने अपने वाजसनेयसंहिता के भाष्य में अपना परिचय देते हुए लिखा है:-

आनन्दपुरवास्तव्यवज्रटाख्यस्य सूनुना।

मंत्रभाष्यमिदं क्लृप्तं भोजे पृथ्वीं प्रषासति॥

इस विवरण के अनुसार उव्वट के पिता वज्रट हैं और यह भाष्य (वेदभाष्य) महाराज भोज के शासन-काल में उनके द्वारा लिखा गया। इस प्रकार उव्वट महाराज भोज के समकालीन और आचार्य मम्मट के पूर्ववर्ती है। अतएव सुधासागर टीकाकार द्वारा दिया गया उपर्युक्त तथ्य सत्य नहीं प्रतीत होता।

इसके अतिरिक्त आचार्य भीमसेन का यह वक्तव्य कि आचार्य मम्मट ने वाराणसी जाकर अध्ययन किया, सत्य नहीं माना जा सकता। क्योंकि कश्मीर अपने आप में काव्य एवं काव्यशास्त्र अध्ययन का बहुत बड़ा केन्द्र था। उसके लिए इन्हें काशी जाकर अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं थी। वैसे भी कुछ काव्यशास्त्रियों को छोड़कर सभी कश्मीरी थे। इन्हीं स्रोतों से आचार्य मम्मट के व्यक्तिगत जीवन के कुछ अंश देखने को मिलते हैं।

अब देखते हैं काव्यशास्त्र जगत को आचार्य मम्मट की देन को। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि इनके द्वारा रचित एक मात्र ग्रंथ काव्यप्रकाश हैं। वैसे काव्यप्रकाश के लेखक को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि इस ग्रंथ का का आरम्भ आचार्य मम्मट ने किया। किन्तु कुछ कारणों से वे उसे पूरा नहीं कर पाये और शेष अन्य विद्वान द्वारा यह पूरा किया गया। दूसरे रचनाकार के नाम पर भी मतैक्य नहीं है। काव्य प्रकाश पर 'काव्यप्रकाशनिदर्शना' नामक टीका के लेखक राजानक आनन्द ने 1685 में लिखा है कि परिकर अलंकार तक की रचना आचार्य मम्मट की है और शेष भाग अल्लट सूरि नामक विद्वान द्वारा लिखा गया हैः-

कृत: श्रीमम्मटाचार्यवर्यै: परिकरावधि:।

ग्रंथः सम्पूरित: शेषं विधायाल्लटसूरिणा॥

कुछ विद्वान उक्त मत से अलग विचार रखते हैं। इनके अनुसार आचार्य मम्मट और आचार्य अल्लटसूरि दोनों ने मिलकर सम्मिलित रूप से पूरे ग्रंथ की रचना की। इस मत का भी राजनक आनन्द ने उल्लेख किया हैः-

अन्येनाप्युक्तम्-

काव्यप्रकाशदशकेऽपि निबन्धकृद्भ्यां

द्वाभ्यां कृतेऽपि कृतिनां रसवत्वलाभ:।

'अमरूकशतक' की टीका लिखते समय अर्जुन वर्मनदेव ने भी इस मत की पुष्टि की है:-

'यथोदाहृत दोषनिर्णये मम्मटाल्लटाभ्याम्'

कुछ विद्वान इसे दो की नहीं, बल्कि तीन की सम्मिलित रचना मानते हैं और आधार के रूप में आचार्य रूचक (रूय्यक) द्वारा काव्य प्रकाश पर लिखी अपनी 'संकेत' टीका में उल्लास की समाप्ति पर दी गई पुष्पिकाओं को लेते हैं। इसके अनुसार आचार्य मम्मट, अलट (अलक) और रूचक तीनों ने मिलकर काव्यप्रकाश की रचना की थी -

'इति श्रीमद्राजानकमल्लमम्मट रूचक विरचिते

निजग्रंथ काव्य प्रकाश संकेते प्रथम उल्लास:।’

यहाँ आचार्य रूचक ने अपने 'संकेत' टीका को सम्मिलित करके पुष्पिकाएँ दी हैं, न कि केवल 'काव्यप्रकाष' के लिए। अतएव रूचक को काव्यप्रकाश के रचनाकारों की सूची में जोड़ना उचित नहीं है।

एक और मत प्रचलित है कि 'काव्यप्रकाष' की कारिकाएँ आचार्य भरत की हैं तथा वृत्ति भाग के लेखक आचार्य मम्मट हैं। इस मत को पुष्ट करने वाले 'काव्य प्रकाश' पर 'आदर्श'नामक टीका के लेखक आचार्य महेश्वर हैं। इसी प्रकार'साहित्यकौमुदी' नामक ग्रंथ के प्रणेता आचार्य विद्याभूषण भी इसी मत की पुष्टि करते हैं।

वैसे उक्त सभी मतों के विरूध्द इतने तथ्य हैं जो सिध्द करते हैं कि पूरे 'काव्यप्रकाष' के लेखक केवल आचार्य मम्मट हीं हैं। लेकिन उदाहरण भाग और अपने मत की पुष्टि में उध्दृत किए गए अंशों को छोड़कर।

'काव्यप्रकाष' दस उल्लासों में विभक्त है। प्रथम उल्लास में काव्य के प्रयोजन, कारण आदि का उल्लेख है। दूसरे में शब्दार्थों के स्वरूप का विवेचन है। तीसरे में अभिव्यंजकता का विश्लेषण है। चौथे में ध्वनि का निरूपण किया गया है। पाँचवे उल्लास में गुणीभूतव्यंग्य के भेदोपभेद का विवरण है। छठे में शब्दचित्र और अर्थ चित्र का निरूपण है। सातवें में काव्य-दोषों का विवेचन मिलता है। आठवें उल्लास में काव्य के गुणों का विश्लेषण है। नौवें में शब्दालंकारों और दसवें उल्लास में अर्थालंकारों का विवेचन किया गया है।

'काव्यप्रकाष' पर अब तक संस्कृत में लगभग 75 टीकाएँ मिलती हैं और हिन्दी में तीन टीकाएँ। किसी ग्रंथ की इतनी टीकाएँ दो बातों की ओर संकेत करती है। एक तो ग्रंथ की लोकप्रियता और दूसरी उसकी दुरूहता। आचार्य मम्मट ने काव्यशास्त्र से सम्बन्धित सारे तत्वों का'काव्यप्रकाष' में समावेश किया है। यही कारण है कि यह ग्रंथ सबसे अधिक आदर का पात्र बना।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आईये, मन की शांति का उपाय धारण करें!
    आचार्य जी

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  2. मम्मट ने "दोषरहित और गुणसहित और कभी-कभार अनलंकृत, शब्द और अर्थमयी रचना को कव्य" कहा है,
    तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावन्लंकृती पुनः क्वापि।
    इसमें दोषों के अभाव और गुणों के भाव को प्रधानता प्रदान की गई है और अलंकारों को नितांत आवश्यक नहीं माना है।
    मम्मट का यह काव्य लक्षण आपनी सरलता के कारण अति लोकप्रिय हुआ।

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