सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

मधुशाला -- भाग -4 / हरिवंश राय बच्चन


जन्म -- 27 नवंबर 1907 
निधन -- 18 जनवरी 2003 


मधुशाला ..भाग - 4 


   
धर्म - ग्रंथ      सब    जला चुकी है 
जिसके   अंतर    की         ज्वाला 
मंदिर , मस्जिद , गिरजे - सबको 
तोड़   चुका        जो      मतवाला , 
                        पंडित , मोमिन , पादरियों के 
                       फंदों    को  जो   काट     चुका 
कर सकती है आज उसी का 
स्वागत मेरी      मधुशाला । 

लालायित  अधरों   से  जिसने 
हाय ,  नहीं   चूमी        हाला , 
हर्ष - विकंपित कर से  जिसने , 
हा , न   छुआ  मधु  का प्याला 
                   हाथ पकड़ लज्जित साकी का 
                    पास   नहीं    जिसने    खींचा 
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की 
उसने   मधुमय  मधुशाला । 

बने   पुजारी   प्रेमी   साकी , 
गंगाजल   पावन ,    हाला , 
रहे फेरता  अविरत  गति से 
मधु के   प्यालों   की माला , 
                  और लिए जा , और पिये जा - 
                   इसी   मंत्र      का   जाप करे , 
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूँ , 
मंदिर    हो  यह मधुशाला । 

बाजी न मंदिर में  घड़ियाली , 
चढ़ी न     प्रतिमा पर  माला 
बैठा अपने भवन  मुअज्जिन
देकर   मस्जिद   में     ताला 
                      लुटे  खजाने  नरपतियों के , 
                   गिरीं   गढ़ों    की     दीवारें ;
रहें    मुबारक पीने वाले 
खुली रहे यह मधुशाला । 

बड़े - बड़े परिवार मिटें यों ,
एक    न   हो    रोने वाला 
हो जाएँ सुनसान महल वे , 
जहां   थिरकती   सुरबाला 
                 राज्य उलट जाएँ , भूपों की 
                   भाग्य - सुलक्ष्मी सो जाये ;
जमे    रहेंगे   पीने वाले , 
जगा करेगी मधुशाला । 

सब मिट जाएँ  , बना रहेगा 
सुंदर   साकी  ,   यम काला , 
सूखें  सब रस  ,  बने   रहेंगे 
किन्तु , हलाहल , औ ' हाला ;
                  धूमधाम औ ' चहल - पहल  के 
                    स्थान    सभी   सुनसान   बने , 
जगा करेगा अविरत मरघट , 
जगा     करेगी     मधुशाला ।  
क्रमश: 




12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह दी...........
    नशा छा जाता है मधुशाला पढ़ कर...

    आभार
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. आभार दीदी |
    सुन्दर प्रस्तुति ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. सब मिट जाएँ , बना रहेगा
    सुंदर साकी , यम काला ,
    सूखें सब रस , बने रहेंगे
    किन्तु , हलाहल , औ ' हाला ;
    धूमधाम औ ' चहल - पहल के
    स्थान सभी सुनसान बने ,
    जगा करेगा अविरत मरघट ,
    जगा करेगी मधुशाला ।

    मुझे ये पंक्तियां और हमारे “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग का ख्याल आ रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बाजी न मंदिर में घड़ियाली ,
    चढ़ी न प्रतिमा पर माला
    बैठा अपने भवन मुअज्जिन
    देकर मस्जिद में ताला
    लुटे खजाने नरपतियों के ,
    गिरीं गढ़ों की दीवारें ;
    रहें मुबारक पीने वाले
    खुली रहे यह मधुशाला ।
    वाह.... वाह ..

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  5. पीड़ा में आनंद जिसे हो आये मेरी मधुशाला ,

    जहां कहीं मिल बैठे हम तुम वहीँ रही हो मधु शाला .

    उत्तर देंहटाएं
  6. पीड़ा में आनंद जिसे हो आये मेरी मधुशाला ,

    जहां कहीं मिल बैठे हम तुम वहीँ रही हो मधु शाला .

    शुक्रिया आजकल हम यूं ही यु ट्यूब पर मन्ना -डे साहब की आवाज़ में मधु शाला सुनते रहतें हैं .

    उत्तर देंहटाएं

  7. पीड़ा में आनंद जिसे हो आये मेरी मधुशाला ,

    जहां कहीं मिल बैठे हम तुम वहीँ रही हो मधु शाला .

    शुक्रिया आजकल हम यूं ही यु ट्यूब पर मन्ना -डे साहब की आवाज़ में मधु शाला सुनते रहतें हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  8. अंजनी कुमार ओझा1 नवंबर 2012 को 6:47 am

    अति सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  9. हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों की रचनाओं का अच्छा संग्रहण

    बधाई
    कभी मेरे ब्लॉग पर पधारे

    साकेत सहाय
    www.vishwakeanganmehindi.blogspot.com

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