उपन्यास साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
उपन्यास साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 9 जुलाई 2011

हिन्दी उपन्यास–उद्भव संबंधी मान्यता

हिन्दी उपन्यास

उद्भव संबंधी मान्यता

मेरा फोटोमनोज कुमार

उपन्यास के उद्भव के संबंध में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। डॉ. गुलाब रॉय, शिवनारायण श्रीवास्तव आदि विद्वानों की धारणा है कि भारतीय उपन्यासों के अंकुर भारत की प्राचीनतम साहित्य में ही उपलब्ध हैं। वे कहीं बाहर से नहीं आए।

किन्तु डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, नलिनी विलोचन शर्मा तथा हजारी प्रदाद द्विवेदी इससे सहमत नहीं हैं। उनकी मान्यता है कि उपन्यास का संबंध संस्कृत की प्राचीनतम औपन्यासिक परंपरा से जोड़ना विडंबंना मात्र है।

अनेक विद्वान हिन्दी उपन्यास का पश्चिमी साहित्य की देन मानते हैं। उनके अनुसार 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में, भारतेन्दु युग में, जब हमारे यहां हिन्दी उपन्यासों का श्रीगणेश हुआ था, यह विधा पश्चिमी साहित्य में पूर्ण रूप से विकसित थी। ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव के कारण सर्वप्रथम बांगला साहित्य, पश्चिमी साहित्य की इस पूर्ण विकसित विधा से प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप बंग्ला उपन्यासों की रचना हुई। बंगभाषा में बहुत अच्छे उपन्यास निकल चुके थे। बांग्ला साहित्य की इस साहित्यिक परिवर्धन से भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों ने हिन्दी उपन्यासों की आवश्यकता को अपरिहार्य समझा।

क्या यह मान्यता सही है?

क्या भारतीय उपन्यासों को पश्चिम के मापदंडों पर परखना उचित है?

क्या भारतीय उपन्यास का विकास यूरोप से पूर्ण रूप में हुआ है?

… और यदि ऐसा नहीं है है तो यह भिन्नता क्या है?

images (44)विचार डॉक्टर नामवर सिंह के

नामवर सिंह ने इन प्रश्नों को विचारा। उनका मानना है कि …

आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास उपन्यासों के बिना अधूरा है। हिन्दी में उपन्यास साहित्य के उद्भव की चर्चा करते हुए एक तरफ़ तो कुछ लोगों ने भारतीयता की लहर के चलते, भारतीय उपन्यास के बारे में कुछ ऐसी स्थापनाएं की, जिससे यह लगता है कि वे लेखन की एक खास तरह की परंपरा को भारतीय परंपरा के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।

दूसरी ओर भारतीय साहित्य में कुछ ऐसे लोग थे जिन्होंने धारणा बनाई कि यह विधा भारतीय परंपरा के अनुरूप नहीं है। इस वर्ग के लोगों के मतानुसार उपन्यास तो भारतीय है ही नहीं। उनके अनुसार यह यूरोपीय विधा है और इसका जन्म पश्चिम में हुआ। अंग्रेज़ों के भारत आगमन के साथ भारतीयों का भी परिचय इस विधा से हुआ। यूरोपीय विधा के रूप में भारत में इसका आयात किया गया। बाहर से लाई गई यह विधा भारतीय ज़मीन पर रोपी गई है। पर इसके साथ मुश्किल यह हुआ कि इसे ठीक से आरोपित नहीं किया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि यह ठीक से विकास नहीं कर सका। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि भारतीय उपन्यास जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। हमारे यहां न तो श्रेष्ठ उपन्यास लिखे गए और न ही महान उपन्यास।

ठीक से यदि विचार किया जाए तो हम पाते हैं कि दूसरी तरह की धारणा को स्वीकार करने में कुछ सैद्धान्तिक स्थापनाएं बाधक हैं। इसलिए ज़रूरी है कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले उन सैद्धान्तिक स्थापनाओं की जांच-पड़ताल कर ली जाए।

हेगेल ने कहा था कि उपन्यास आधुनिक मध्य वर्ग का महा काव्य है। कुछ इसी तरह के विचार लुकास ने भी दिए। इस सिद्धांत के मानने वालों के अनुसार चूंकि मध्य वर्ग या बुर्जुआ यूरोप में ही पैदा हुआ, भारत में यह देर से विकसित हुआ है, इसलिए वह एक तरह से परजीवी या परोपजीवी रहा। इसलिए वह अपना महाकाव्य वैसे तैयार नहीं कर सका जैसा यूरोप में किया। ये पूरी की पूरी बात कुछ लोगों द्वारा स्वीकार कर ली गई। किन्तु इस धारणा से भारतीय उपन्यास साहित्य के मुख्य चरित्र को समझने में कठिनाई है। इस समझ के चलते भारतीय उपन्यास लेखन में अपनी पहचान बनाने वाले लेखकों का अवमूल्यन भी हुआ। उदाहरण के लिए ऐसे लोगों के द्वारा प्रेमचंद के बारे में यह कहा गया कि उनके उपन्यास अंग्रेज़ी में लिखे उपन्यास की नकल की गई दूसरे-तीसरे दर्ज़े के यथार्थवादी उपन्यास हैं। इन उपन्यासों का महत्त्व इस रूप में स्वीकार किया गया कि ये तो भारत के गावों और भारत के किसानों के बारे में लिखे गए हैं।

इन बातों की परख करने के लिए हमें यह देखना होगा कि भारतीय हिन्दी उपन्यास के पीछे कौन सी जीवन दृष्टि है, कौन सी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, और फिर इस पृष्ठभूमि में वे कौन सा विशिष्ट चरित्र ग्रहण करते हैं। इसका उत्तर टटोलने के लिए हमें 19वीं सदी के उपन्यासों पर खास तौर से ध्यान देना होगा। उन उपन्यासों का ऐतिहासिक महत्त्व तो हम आज भी स्वीकार करते हैं पर उन्हें अविकसित और कलाहीन मानते हैं। मतलब कहने का यह कि हम यह तो मानते हैं कि इनसे उपन्यासों के उदय का आभास तो मिलता है लेकिन ये महत्वपूर्ण नहीं हैं। हिन्दी का पहला उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ माना जाता है। ‘परीक्षा गुरु’ एक अंग्रेज़ी ढंग का ‘नॉवेल’ है। लेखक ने इसी समझ के तहत इसे लिखा भी है। पर जगमोहन सिंह के ‘श्यामा स्वप्न’ को लोगों ने कहा कि यह तो उपन्यास है ही नहीं। उनके ऐसा मानने का कारण यह था कि इसमें कविता की बहुत सारी पंक्तियां उद्धृत हैं। किन्तु कई ऐसे उपन्यास हैं जिनमें कविता की पंक्तियां उद्धृत हैं। ‘अज्ञेय’ जी ने शेखर एक जीवनी में कविता की पंक्तियां उद्धृत की है। इसके कारण कोई क्षति उनकी नहीं हुई है, कोई आलोचना भी उनकी नहीं की गई है। लेकिन ‘श्यामा स्वप्न’ को उपन्यास नहीं माना गया। इससे यह समझ बनती है कि उपन्यासों का उन देशों में संबंध उस चरित्र से है जिसे हम उपनिवेशवादी चरित्र कहते हैं। उपनिवेशों में जहां साहित्य की एक बड़ी लंबी और समृद्ध परंपरा रही हो, भारत में जहां ‘कादम्बरी’ की रचना हुई हो, जहां ‘दस कुमार चरित’ लिखा गया हो, जहां ‘जातक कथा’ लिखे गए हों, जहां ‘कथा सरित सागर’ रचा गया हो, जहां ‘वसुदेव कथा कृतियां’ हो, उस देश में कैसे संभव है कि आगे चलकर के जब आधुनिक भारतीय भाषा में गद्य का विकास होता है तब वह उससे किस रूप में जुड़ता है, क्या ग्रहण करता है?

एक वे वर्ग थे जो अंग्रेज़ी के उपन्यास को सामने रखकर के रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का यथार्थ चित्र उपस्थित करते थे लेकिन कुछ दूसरे उपन्यास यथार्थवादी शैली में नहीं लिखे गए हैं बल्कि उन्हें आप रोमांस कह सकते हैं, रमनाख्यान कह सकते हैं, जो अद्भुत की और फैण्टेसी की सृष्टि करते हैं और इस क्रम में भारत ही नहीं भारत के बाहर भी आरंभिक उपन्यास आमतौर से फैंटेसी के रूप में लिखे गए हैं। उदाहरण के लिए पहला अमेरिकी प्रसिद्ध उपन्यास ...... एक एडवेंचर कथा है, एक जीवन और साहस की कहानी है। यह प्रतीकात्मक शैली में लिखी गई है। इस क्रम में हम पाते हैं कि जहां स्वाधीनता की भावना जिन उपनिवेशों में प्रबल थी वहां उपन्यास का उदय और ढ़ंग से हुआ है। वहां उपन्यास का उदय मध्य वर्ग के महा काव्य के रूप में नहीं हुआ है, बल्कि उपनिवेशों में उपन्यास का उदय राष्ट्रीय रूपक के रूप में हुआ है। इसका लेखक कभी-कभी इतिहास का सहारा लेता था, तो कभी-कभी इतिहास के अलावा कल्पित कथा का सहारा लेता था। 19वीं सदी में भारत के सबसे बड़े उपन्यासकार बंकिम चंद्र का उपन्यास ‘दुर्गेश नंदिनी’ यथार्थवादी या ऐतिहासिक तरह का उपन्यास नहीं है, बल्कि एक तरह का रोमांटिक उपन्यास है, रमनाख्यान है। ‘कपालकुण्डला’ एक फैंटेसी है। इस दृष्टि से हिन्दी में अगर कोई उपन्यास ‘श्यामास्वप्न’ है, वह फैंटेसी के रूप में है।

इस विवेचन से जो सिद्धान्त-सूत्र निकलता है वह यह है कि भारत में उपनिवेशवादी दौर में उपन्यास का विकास यूरोपिय उपन्यासों के रास्ते नहीं हुआ, बल्कि वह अपने प्राचीन परंपरा की रोमांस, फैंटेसी और स्वप्नलोक की अद्भुत कथा के रूप में हुआ और इसके द्वारा राष्ट्र की मुक्ति की आकांक्षा राष्ट्रीय चेतना के रूप में हुआ। सच्चे भारतीय उपन्यास का उदय राष्ट्रीय रूपक (National Allegory) के रूप में हुआ। इस राष्ट्रीय रूपक को आगे चलकर के यथार्थ जीवन की घटनाओं ने एक दूसरा रूप दिया जिसे एक तरह से यथार्थवादी कह सकते हैं। इस दृष्टि से देखें तो प्रेमचंद के सारे उपन्यास जिन्हें हम यथार्थवादी उपन्यास के रूप में देखते हैं, जिसे हम गांव के किसान का संघर्ष के कथा के रूप में देखते हैं, वह राष्ट्रीय रूपक है। चाहे वह ‘रंगभूमि’ का सूरदास हो, या ‘गोदान’ का होरी। होरी की सारी चिंता – गाय है। गाय उसे मिलती भी है, मिलकर भी हाथ से निकल जाती है। खेत निकल जाता है, वह किसान से मज़दूर हो जाता है। औपनिवेशिक व्यवस्था के तहत एक ज़मींदार एक ऐसी समाज व्यवस्था का अंग बनता है, जिसमें गोदान को राषट्रीय रूपक के रूप में देखा जा सकता है।

इसलिए जार्ज लुकास या हेगेल का कथन भारतीय उपन्यास के साथ न्याय नहीं करता। इस दृष्टि से विचार करने पर हमें यह कहना पड़ेगा कि भारतीय उपन्यास के विकास का इतिहास नए सिरे से लिखा जाना चाहिए, जिसके केन्द्र में मध्य वर्ग का जीवन नहीं बल्कि वह स्वाधीनता संग्राम के विकास की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं पर होकर गुज़रता हुआ विकसित हुआ है। और ज़ाहिर है कि इसके समांतर उपन्यास की एक दूसरी भी धारा है, लेकिन मुख्य धारा भारतीय उपन्यासों की वही है जिसकी नींव प्रेमचंद ने डाली थी। जिसका विकास रेणु में हुआ। आगे चलकर रागदरबारी में हुआ। और इन उपन्यासों के ढ़ांचों को लेकर, साथ ही इनकी शैलियों को लेकर और फिर देखें कि प्रच्छन्न रूप में कैसे ये उपन्यास यथार्थ ठेठ यूरोपीय यथार्थवादी उपन्यास नहीं हैं, जिस रूप में प्रेमचंद के उपन्यास को यथार्थवादी उपन्यास कहा जाता है। हमलोगों ने, खास तौर से मार्क्सवादी आलोचकों ने, जो यथार्थ और यथार्थवाद का पल्ला पकड़े हैं, वे भूल जाते हैं कि ये यथार्थ तक तो बात ठीक है क्योंकि इनका संबंध जीवन की वास्तविकता से है, लेकिन वास्तविकता कई रूपों में अपने आपको व्यक्त करती है, कभी-कभी वास्तविकता फैंटेसी के रूप में भी व्यक्त होने को बाध्य होती है। कुछेक उपन्यास उसे फैंटेसी की सृष्टि करती है। इसलिए हिन्दी उपन्यास और यथार्थवाद को इस तरह से देखने पर हम भारतीय उपन्यास के साथ न्याय नहीं कर सकते।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

उपन्यास की परिभाषा

उपन्यास साहित्य

उपन्यास की परिभाषा

vcm_s_kf_m160_160x120मनोज कुमार

उपन्यास ‘उप’ और ‘न्यास’ से मिलकर बना है। ‘उप’ का अर्थ समीप और ‘न्यास’ का अर्थ है रचना। अर्थात्‌ उपन्यास वह है जिसमें मानव जीवन के किसी तत्त्व को उक्तिउक्त के रूप में समन्वित कर समीप रखा जाए।

इसमें उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद एवं दुखद किन्तु मर्मस्पर्शी घटनाओं को निश्चित तारतम्य के साथ चित्रित करता है।

संस्कृत लक्षण ग्रंथों में भी उपन्यास का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है। किन्तु उस उपन्यास शब्द और आज के उपन्यास शब्द में भिन्नता है। संस्कृत साहित्य में एक स्थान पर कहा गया है, “उपन्यासः प्रसाधनम्‌” अर्थात्‌ प्रसन्नता प्रदान करने वाली कृति उपन्यास है। किन्तु संस्कृत नाट्य शास्त्र में उपन्यास को प्रतिमुख संधि का एक उपभेद माना गया है, जिसकी व्याख्या में कहा गया है ‘उपपति वृतहथ उपन्यासः प्रकृतितः’ अर्थात्‌ किसी अर्थ को उसके उक्तिउक्त अर्थ में उपस्थित करने को उपन्यास कहा जाता है। किन्तु आज उपन्यास शब्द के अन्तर्गत गद्य द्वारा अभिव्यक्त सम्पूर्ण कल्पना प्रसूत कथा साहित्य में ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त उपन्यास शब्द और आधुनिक उपन्यास शब्द में ज़मीन आसमान का अंतर है।

इसमें उपन्यासकार मानव जीवन से संबंधित सुखद एवं दुखद किन्तु मर्मस्पर्शी घटनाओं को निश्चित तारतम्य के साथ चित्रित करता है। उपन्यास एक ऐसी लोकप्रिय साहित्यिक विधा है जिसे मानव जीवन का यथार्थ प्रतिबिंब कहा जा सकता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है।

इस प्रसंग में आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी ने अपनी पुस्तक “आधुनिक साहित्य” में लिखा है कि उपन्यास में आजकल गद्यात्मक कृति का अर्थ लिया जाता है। पद्यबद्ध उपन्यास नहीं हुआ करते। उपन्यास के विकास से गद्य का विकास का भी संबंध है। प्रायः वही परिस्थिति गद्य के विकास में सहायक हुई हैं जो उपन्यास के विकास में योग दे रही थीं। यूरोप में गद्य उपन्यासों के पहले कुछ प्रेमाख्यान कविताएं प्रचलित थीं। उन्हें ही आधुनिक उपन्यास की जननि कहा जा सकता है।”

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार “उपन्यास आधुनिक युग की देन है। नए गद्य के प्रचार के साथ-साथ उपन्यास प्रचार हुआ है। आधुनिक उपन्यास केवल कथा मात्र नहीं है और पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं की भांति कथा-सूत्र का बहाना लेकर उपमाओं, रूपकों, दीपकों और श्लेषों की छटा और सरस पदों में गुम्फित पदावली की छटा दिखाने का कौशल भी नहीं है। यह आधुनिक वैक्तिकतावादी दृष्टिकोण का परिणाम है।”

डॉ. श्याम सुंदर दास उपन्यास को मानव के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा मानते हैं, किन्तु मुंशी प्रेमचंद जी कहते हैं, “मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।”

क्षेमेन्द्र सुमन के अनुसार उपन्यास मानव जीवन की आन्तरिक और बाह्य परिस्थितियों का उसके मन के संघर्ष-विघर्ष का, उसके चारो ओर के वातावरण और समाज का काल्पनिक चित्र है, किन्तु काल्पनिक होता हुआ भी वह यथार्थ है। उसमें जीवन के स्त्य की अभिव्यक्ति होती है।

डॉ, जे. बी. क्रिस्टले लिखते हैं, “उपन्यास जीवन का विशाल दर्पण है और इसका विस्तार साहित्य के किसी भी रूप से बड़ा है।” इसी प्रकार रौल फ्रांस के अनुसार “उपन्यास केवल काल्पनिक गद्य नहीं है वरन वह मानव जीवन का गद्य है। ऐसी प्रथम कला जिसने सम्पूर्ण मानव को लेने और उसे अभिव्यंजना देने का प्रयास किया है लेकिन इसके विपरीत विलियम हेनरी हेडसन के अनुसार, “मानव और मानवीय भावों से तथा क्रियाओं की विस्तृत चित्रावलि ने नर एवं नारियों की सार्वकालिक, सार्वदेशिक रुचि ही उपन्यास के अस्तित्व का कारण है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपन्यास की एक सर्वमान्य परिभाषा निर्धारित करना कठिन है। इस कठिनाई की ओर इंगित करते हुए डॉ. देवराज लिखते हैं, “उपन्यास की कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। प्रायः यह अंग्रेज़ी में Novel शब्द का पर्यायवाची शब्द समझा जाता है। पर Novel का प्रयोग अंग्रेज़ी में जहां एक ओर सुसंगठित कथाओं के लिए भी किया जाता है वहीं दूसरी ओर अतीत की स्मृतियों के लिए भी, जिन कथाओं का कोई विस्तृत रूप नहीं है।

देवकी नंदन खत्री जी का चंद्रकांता और उसकी संतति, प्रेमचंद जी का सेवासदन तथा अज्ञेय की शेखर एक जीवनी के लिए हम एक शब्द उपन्यास का प्रयोग करते हैं। जो भी हो, जिस व्यक्ति ने उपन्यास शब्द का प्रयोग Novel के पर्यायवाचे रूप में किया होगा वह अवश्य ही साहित्य तत्त्वज्ञ और उसके नूतन रूप विधान का मर्मज्ञ होगा। उप = निकट, निकट माने समीप और न्यास = रखने, अर्थात स्थापित करना। अर्थात उपन्यास शब्द से यह ध्वनि निकलती है कि लेखक इसके द्वारा निकट की कोई बात करना चाहता है। यद्यपि उपर्युक्त परिभाषाओं में एक रूपता नहीं है तथापि प्रायः सभी विद्वान उपन्यास को मानव जीवन का काल्पनिक या कलात्मक चित्र मानते हैं। अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि उपन्यास मानव जीवन की कथा है।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

उपन्यास साहित्य–समापन किस्त–समकालीन उपन्यास

clip_image001

झिंगूर दास 291मनोज कुमार

इस दशक के उपन्यास मुख्यतः अधुनिकतावादी विचारधारा से प्रभावित हैं। शहरीकरण की तेज़ प्रक्रिया, अस्तित्ववादी दर्शन और पश्चिमी प्रभाव के कारण पारंपरिक मूल्य बिखरते गए, सामाजिकता की जगह वैयक्तिकता ने ले लिया। मानव जीवन में हताशा, निराशा, कुंठा ने घर कर लिया।

सातवें दशक के हिन्दी उपन्यासों में आधुनिकताबोध की ये सभी प्रवृत्तियां परिलक्षित हुई हैं। इस दृष्टि से मोहन राकेश (अंधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल), निर्मल वर्मा (वे दिन), राजकमल चौधरी (मरी हुई मछली, शहर था शहर नहीं था), महेन्द्र भल्ला (एक पति के नोट्स), उषा प्रियंवदा (रुकोगी नहीं राधिका), imageशिवप्रसाद सिंह (अलग-अलग वैतरणी), गिरिराज किशोर (यात्राएं), मणि मधुकर (सफेद मेमने), ममता कालिया (बेघर), मन्नू भंडारी (आपका बंटी) आदि के उपन्यास पठनीय हैं। इन उपन्यासों का व्यक्ति अकेला, ऊबा हुआ, संत्रस्त, व्यर्थताबोध से पीड़ित, अजनबियत से घिरा हुआ, थका-हारा ऐसा व्यक्ति है जिसको कोई भविष्य नहीं दिखाए देता, न कहीं आशा-उत्साह की कोई किरण दिखाई पड़ती है।

एक जहां निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘वे दिन’ में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की यूरोपीय युवा पीढ़ी के अर्थहीन यौन संबंधों, अकेलापन, ऊब, अनास्था, भय, कुंठा आदि का चित्रण हुआ है, वहीं दूसरी ओर मोहन राकेश के उपन्यासों में जीवन की त्रासदी चित्रित है। राजकमल चौधरी के उपन्यास ‘मरी हुई मछली’ में अर्थाभाव झेलती हुई स्त्री की देह-गाथा क चित्रण हुआ है तो मन्नू भंडारी imageके उपन्यास ‘आपका बंटी’ में उच्च मध्यवर्गीय जीवन की अधुनिकता, फैशन आदि का चित्रण है।

आठवें दशक के उपन्यासों में प्रगतिवादी विचारधारा से सम्पन्न वह परंपरा है जिसका संबंध प्रेमचंद की जनवादी परम्परा से है। इस दृष्टि से श्रीलाल शुक्ल (राग दरबारी), बदीउज़्ज़मा (एक चूहे की मौत), जगदीशचन्द्र (धन धरती न अपना), काशीनाथ सिंह (अपना मोर्चा), गिरिराज किशोर (जुगलबंदी), भीष्म साहनी (तमस), रमेशचन्द्र शाह (गोबर गणेश), जगदम्बा प्रसाद दीक्षित (मुर्दाघर), रामदरश मिश्र image(अपने लोग), राही मासूम रज़ा (कटराबी आरज़ू), कृष्ण सोबती (ज़िन्दगीनामा), मन्नू भंडारी (महाभोज), मनोहर श्याम जोशी (कुरु-कुरु स्वाहा), और मार्कण्डेय (अग्निबीज) के उपन्यास उल्लेखनीय हैं।

इन लेखकों ने मध्यमवर्गी जीवन को जन-जीवन के बीच उन्मुक्त सांस लेने के लिए अवकाश प्रदान किया। व्यंग्य, फैंटेसी, क्रांति, विद्रोह, आन्दोलन का भाव जगा कर अपनी दुर्दशा, असहाय अवस्था से मुक्ति पाने का मार्ग भी दिखाया। राग दरबारी की व्यंग्यात्मकता अय्र एक चूहे की मौत की फैंटेसी इस दौर की उपन्यास कला को एक नया आयाम देती है।

३. समकालीन हिन्दी उपन्यास

नवें दशक में कई उपन्यासकारों के उपन्यास प्रकाश में आए, जैसे, ‘रात का रिपोर्टर (निर्मल वर्मा), ‘मय्यादास की माड़ी (भीष्म साहनी), ‘बिना दरवाज़े के माकन’, दूसरा घर, (रामदरश मिश्र), ‘नीला चांद’ (शिवप्रसाद सिंह), ‘हुज़ूर दरबार’, ‘तुम्हारी रोशनी में’, ‘धीर समीरें’ (गोविन्द मिश्र), ‘बंधन’, ‘अधिकार’, ‘कर्म’, ‘अभिज्ञान’ (नरेन्द्र कोहली), ‘सोना माटी’ (विवेकी राय) आदि।

इस दशक में मनोहर श्याम जोशी (कुरु-कुरु स्वाहा, कसप, हरिया हरिकुलिस), अब्दुल बिस्मिल्लाह (झीनी-झीनी बीनी चदरिया, दंतकथा, ज़हरबाद), मंज़ूर एहतेशाम (सूखा बरगद), संजीव (सर्क, सावधान नीचे आग है) के नाम उल्लेखनीय है।

वीरेन्द्र जैन (डूब, पार, पंचनामा), कमलाकांत त्रिपाठी (पाहीघर), पंकज बिष्ट (उस चिड़िया का नाम), प्रियंवद (वे वहां क़ैद हैं), सुरेन्द्र वर्मा (मुझे चांद चाहिए) आदि ने हिन्दी उपन्यास में नयी रचना शीलता को सार्थक से प्रस्तुत किया है।

स्मकालीन उपन्यासों में किसी खास प्रवृत्ति या विचारधारा का प्रभाव या दबाव नहीं है। इन उपन्यासों में विषयगत विविधता, शिल्पगत नवीनता और प्रयोगशीलता है। वर्तमान उपन्यासकार वैचारिक कठमुल्लेपन और सीमित जीवनानुभव की बंदिशों से काफ़ी मुक्त हैं।

वर्तमान में महिला कथाकारों की एक सशक्त पीढ़ी भी तैयार हुई है। इन्होंने रचना संसार को एक विशिष्ट रूप प्रदान किया है। नई पहचान और नई दिशा दी है। शशिप्रभा शास्त्री, शिवानी, कृष्णा सोबती (‘मित्रो मरजानी’, ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘दिलोदानिश’), दीप्ति खण्डेलवाल, मन्नू भंडारी (‘एक इंच मुस्कान’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’), उषा प्रियंवदा (‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘पचपन खंभे लाल imageदीवारें’), निरुपमा सेवती, मेहरुन्निसा परवेज़, राजी सेठ (तत्सम), मृदला गर्ग (चितकोबरा, ममता कालिया (नरक दर नरक), चित्रा मुद्गल, मृणाल पाण्डेय (पटरंग पुराण), नासिरा शर्मा (शामली, ठीकरे की मंगनी, ज़िन्दा मुहावरे), सूर्यबाला, प्रभा खेतान (छिन्नमस्ता, तालाबन्दी, अपने-अपने चेहरे), मैत्रेयी पुष्पा (इदन्नमम) आदि ने अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज़ कराई है।

निष्कर्ष :

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिन्दी उपन्यास अपने उद्भव से लेकर आजतक बराबर विकसित होता रहा है। इसने तकनीक और विषयवस्तु की दृष्टि से जो प्रगति की है वास्तव में असाधारण और सराहनीय है। हिन्दी उपन्यास की इस प्रगति को ध्यान में रखते हुए तथा नवीन उपन्यासकारों द्वारा वर्णनात्मक, विश्लेषणात्मक, आत्मकथात्मक, विवरणात्मक, आदि शैलियों में लिखी रचनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि भविष्य में हिन्दी उपन्यास विश्व के साहित्यिक उपन्यासों में अपना महत्वपूर्ण स्थान स्थापित कर लेगा। वर्तमान जगत में उपन्यासों की बड़ी शक्ति है। समाज जो रूप धारण कर रहा है उसके भिन्न-भिन्न वर्गों में जो प्रवृत्तियां उत्पन्न हो रही हैं, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृत्ति भी उत्पन्न कर सकते हैं।

शुक्रवार, 24 जून 2011

ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार–विवेकी राय

clip_image001

ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार

विवेकी रायclip_image002

अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।
    ये लाईनें हैं श्री विवेकी राय जी के एक लेख की जो उन्होंने एक नदी मंगई के बारे में लिखी हैं।

(श्री सतीश पंचम जी के पोस्ट से साभार)

डॉ. विवेकी राय हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार हैं। वे ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। श्री राय उनका जन्म 19 नवम्बर सन् 1924 को भरौली (बलिया) नामक ग्राम में हुआ है। इनकी आरमिभिक शिक्षा इनके पैतृक गाँव सोनवानी (गाजीपुर) में हुई।  स्नातकोत्तर परीक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1970 ई. में स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य और ग्राम जीवन विषय पर काशी विद्यापीठ, वाराणसी से आपको पी. एच. डी. की उपाधि मिली।

डॉ. विवेकी राय जी के अध्यापकीय जीवन की जो शुरूआत ‘सोनवानी’ के लोअर प्राइमरी स्कूल शुरू हुई वह हाई स्कूल नरहीं (बलिया), श्री सर्वोदय इण्टर कॉलेज खरडीहां (गाज़ीपुर) होते हुए स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाज़ीपुर में सन् 1988 ई. तक चली। यह अपने आप में शैक्षिक मूल्यों की प्राप्ति और प्रदेय का अनूठा उदाहरण है।

जब 7वीं कक्षा में अध्यन कर रहे थे उसी समय से डॉ.विवेकी राय जी ने लिखना शुरू किया। सन् 1945 ई. में आपकी प्रथम कहानी ‘पाकिस्तानी’ दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद इनकी लेखनी हर विधा पर चलने लगी जो कभी थमनें का नाम ही नहीं ले सकी। इनका रचना कार्य कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी, समीक्षा, सम्पादन एवं पत्रकारिता आदि विविध विधाओं से जुड़ा रहा। अब तक इन सभी विधाओं से सम्बन्धित लगभग 60 कृतियाँ आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं और लगभग 10 प्रकाशनाधीन हैं।

प्रकाशित कृतियाँ निम्न हैं-

काव्य संग्रह : अर्गला,राजनीगंधा, गायत्री, दीक्षा, लौटकर देखना आदि।

कहानी संग्रह : जीवन परिधि, नई कोयल, गूंगा जहाज बेटे की बिक्री, कालातीत, चित्रकूट के घाट पर, विवेकी राय की श्रेष्ठ कहानियाँ , श्रेष्ठ आंचलिक कहानियाँ, अतिथि, विवेकी राय की तेरह कहानियाँ आदि।

उपन्यास : बबूल,पूरुष पुराण, लोक ऋण, बनगंगी मुक्त है, श्वेत पत्र, सोनामाटी, समर शेष है, मंगल भवन, नमामि ग्रामम्, अमंगल हारी, देहरी के पार आदि।

फिर बैतलवा डाल पर, जुलूस रुका है, मन बोध मास्टर की डायरी, नया गाँवनाम, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ ,जगत तपोवन सो कियो, आम रास्ता नहीं है, जावन अज्ञात की गणित है, चली फगुनाहट, बौरे आम आदि अन्य रचनाओं का प्रणयन भी डॉ. विवेकी राय ने किया है। इसके अलावा डॉ. विवेकी राय ने 5 भोजपुरी ग्रन्थों का सम्पादन भी किया है। सर्वप्रथम इन्होंने अपना लेखन कार्य कविता से शुरू किया। इसीलिए उन्हें आज भी ‘कविजी’ उपनाम से जाना जाता है।

विवेकी राय स्वभावतः गम्भीर एवं खुश-मिज़ाज़ रचनाकार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, सीधे, सच्चे, उदार एवं कर्मठ व्यक्ति हैं। ललाट पर एक बड़ा सा तिल, सादगी, सौमनस्य, गंगा की तरह पवित्रता, ठहाका मारकर हँसना, निर्मल आचार-विचार आपकी विशेषताएँ हैं। सदा खादी के घवल वस्त्रों में दिखने वाले, अतिथियों का ठठाकर आतिथ्य सत्कार करने वाले साहित्य सृजन हेतु नवयुवकों को प्रेरित करने वाले आप भारतीय संस्कृति की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं।

डॉ. विवेकी राय का जीवन सादगी पूर्ण है। गम्भीरता उनका आभूषण है। दूसरों के प्रति अपार स्नेह एवं सम्मान का भाव सदा वे रखते हैं। सबसे खुलकर गम्भीर विषय की निष्पत्ति एवं चर्चा करना उनका स्वभाव है। अपने इन्हीं गुणों के कारण पहुतों के लिए वे परम पूज्य एवं आदरणीय बने हुए हैं। कुल मिलाकर वे संत प्रकृति के सज्जन हैं। विशुद्ध भोजपुरी अंचल के महान् साहित्यकार हैं।

सत्पथ पर दृढ़ निश्चय के साथ बढ़ते रहने का सतत् प्रेरणा देने वाले डॉ. विवेकी राय मूलतः गँवई सरोकार के रचनाकार हैं। बदलते समय के साथ गाँवों में होने वाले परिवर्तनों एवं  आँचलिक चेतना विवेकी राय के कथा साहित्य की एव विशेषता है। इन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में किसानों, मज़दूरों, स्त्रियों तथा उपेक्षितों की पीड़ा को अभिव्यक्ति प्रदान की है। अपनी रचनाधार्मिता के कारण इन्हें हम प्रेमचन्द और फणीश्वर नाथ रेणु के बीच का स्थान दे सकते हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन में परिलक्षित परिवर्तनों को इन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है। इनके कथा साहित्य में गाँव की खूबियाँ एवं अन्तर्विरोध हमें स्वष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

उनकी सृजन यात्रा अर्धशती से आगे निकली है। जीवन के साकारात्मक पहलुओं की ओर, लोक मंगल की ओर इन्होंने अब तक विशेष ध्यान दिया है।

डॉ. विवेकी राय को अनेकों पुरस्कारों एवं मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया है। हिन्दी संस्थान (उ.प्र.) द्वारा ‘सोनामाटी’ उपन्यास पर दिया गया प्रेमचन्द पुरस्कार , हिन्दी संस्थान लखनऊ (उ.प्र. ) द्वारा दिया गया साहित्य भूषण पुस्स्कार, बिहार सरकार द्वारा प्रदान किया गया आचार्य शिवपूजन सहाय सम्मान; ‘आचार्य शिवपूजन सहाय’ पुरस्कार मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदत्त ‘शरद चन्द जोशी ; सम्मान केन्द्रीय हिन्दी संस्थान एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में दिया गया ‘पंडित राहुल सांकृत्यायन’ सम्मान तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ओर से प्रदत्त ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि जैसे अनेकों सम्मान इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं। डॉ. विवेकी राय के उपन्यासों, कहानियों, ललित निबन्धों; उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व, उनकी सम्पूर्ण साहित्य साधना पर पंजाब वि.वि, गोरखपुर विश्वविद्यालय, रुहेल खण्ड विश्वाद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, मगध विश्वविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय, मुम्बई विश्वविद्यालय, उस्मानिया विश्वविद्यालय, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सबा मद्रास, श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, डॉ. भीमराव अमबेडकर विश्वविद्यालय, पंडित दीन दयाल विश्वविद्यालय, शिवाजी विश्वविद्यालय, माहाराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय, वीर बहादुर सिंह पर्वांचल विश्वविद्यालय,बेंगलोर विश्वविद्यालय, जेयोति बाई विश्वविद्यालय, जम्मू विश्वविद्यालय, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय आदि विश्वविद्यालयों में एम, फिल,/ पी. एच. डी. के 70 शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके हैं और कई विश्वविद्यालयों में छात्रों द्वारा इन पर शोध कार्य किया जा रहा है।

नोट : इस आलेख के लिए श्री आशीष राय ने जो योगदान दिया है, मैं उसके लिए उनका आभार प्रकट करता हूं।                                        – मनोज कुमार

बुधवार, 22 जून 2011

मैला आंचल - आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति

उपन्यास साहित्य

clip_image001

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का ‘मैला आंचल’ - आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति

IMG_1393मनोज कुमार

मैला आंचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे आंचलिक उपन्यासों की रचना का श्रेय फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ को जाता है। प्रेमचंद के बाद रेणु ने गांव को नये सौन्दर्यबोध और रागात्मकता के साथ चित्रित किया है।

‘रेणु’ जी का ‘मैला आंचल’ वस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर सबसे अलग है। इसमें एक नए शिल्प में ग्रामीण-जीवन को दिखलाया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इसका नायक कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) नहीं है, पूरा का पूरा अंचल ही इसका नायक है। दूसरी प्रमुख बात यह है कि मिथिलांचल की पृष्ठभूमि पर रचे इस उपन्यास में उस अंचल की भाषा विशेष का अधिक से अधिक प्रयोग किया गया है। खूबी यह है कि यह प्रयोग इतना सार्थक है कि वह वहां के लोगों की इच्छा-आकांक्षा, रीति-रिवाज़, पर्व-त्यौहार, सोच-विचार, को पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठक के सामने उपस्थित करता है।

रेणु जी ने ही सबसे पहले ‘आंचलिक’ शब्द का प्रयोग किया था। इसकी भूमिका, 9 अगस्त 1954, को लिखते हुए फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ कहते हैं,

“यह है मैला आंचल, एक आंचलिक उपन्यास।“

इस उपन्यास के केन्द्र में है बिहार का पूर्णिया ज़िला, जो काफ़ी पिछड़ा है। ‘रेणु’ कहते हैं,

“इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी – मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।“

यही इस उपन्यास का यथार्थ है। यही इसे अन्य आंचलिक उपन्यासों से अलग करता है जो गांव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखे गए हैं। गांव की अच्छाई-बुराई को दिखाता प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, शिवप्रसाद रुद्र, भैरव प्रसाद गुप्त और नागार्जुन के कई उपन्यास हैं जिनमें गांव की संवेदना रची बसी है, लेकिन ये उपन्यास अंचल विशेष की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते। बल्कि ये उपन्यासकार गांवों में हो रहे बदलाव को चित्रित करते नज़र आते हैं। परन्तु ‘रेणु’ का ‘मेरीगंज’ गांव एक जिवंत चित्र की तरह हमारे सामने है जिसमें वहां के लोगों का हंसी-मज़ाक़, प्रेम-घृणा, सौहार्द्र-वैमनस्य, ईर्ष्या-द्वेष, संवेदना-करुणा, संबंध-शोषण, अपने समस्त उतार-चढाव के साथ उकेरा गया है। इसमें जहां एक ओर नैतिकता के प्रति तिरस्कार का भाव है तो वहीं दूसरी ओर नैतिकता के लिए छटपटाहट भी है। परस्पर विरोधी मान्यताओं के बीच कहीं न कहीं जीवन के प्रति गहरी आस्था भी है – “मैला´आंचल में”!

पूरे उपन्यास में एक संगीत है, गांव का संगीत, लोक गीत-सा, जिसकी लय जीवन के प्रति आस्था का संचार करती है। एक तरफ़ यह उपन्यास आंचलिकता को जीवंत बनाता है तो दूसरी तरफ़ उस समय का बोध भी दृष्टिगोचर होता है। ‘मेरीगंज’ में मलेरिया केन्द्र के खुलने से वहां के जीवन में हलचल पैदा होती है। पर इसे खुलवाने में पैंतीस वर्षों की मशक्कत है इसके पीछे, और यह घटना वहां के लोगों का विज्ञान और आधुनिकता को अपनाने के की हक़ीक़त बयान करती है। भूत-प्रेत, टोना-टोटका, झाड़-फूक, में विश्‍वास करनेवाली अंधविश्वासी परंपरा गनेश की नानी की हत्या में दिखती है। साथ ही जाति-व्यवस्था का कट्टर रूप भी दिखाया गया है। सब डॉ.प्रशान्त की जाति जानने के इच्छुक हैं। हर जातियों का अपना अलग टोला है। दलितों के टोले में सवर्ण विरले ही प्रवेश करते हैं, शायद तभी जब अपना स्वार्थ हो। छूआछूत का महौल है, भंडारे में हर जाति के लोग अलग-अलग पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। और किसी को इसपर आपत्ति नहीं है।

‘रेणु’ ने स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई राजनीतिक अवसरवादिता, स्वार्थ और क्षुद्रता को भी बड़ी कुशलता से उजगर किया है। गांधीवाद की चादर ओढे हुए भ्रष्ट राजनेताओं का कुकर्म बड़ी सजगता से दिखाया गया है। राजनीति, समाज, धर्म, जाति, सभी तरह की विसंगतियों पर ‘रेणु’ ने अपने कलम से प्रहार किया है। इस उपन्यास की कथा-वस्तु काफ़ी रोचक है। चरित्रांकन जीवंत। भाषा इसका सशक्त पक्ष है। ‘रेणु’ जी सरस व सजीव भाषा में परंपरा से प्रचलित लोककथाएं, लोकगीत, लोकसंगीत आदि को शब्दों में बांधकर तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश को हमारे सामने सफलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं।

अपने अंचल को केन्द्र में रखकर कथानक को “मैला आंचल” द्वारा प्रस्तुत करने के कारण फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ हिन्दी में आंचलिक उपन्यास की परंपरा के प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। अपने प्रकाशन के 56 साल बाद भी यह उपन्यास हिन्दी में आंचलिक उपन्यास के अप्रतिम उदाहरण के रूप में विराजमान है। यह केवल एक उपन्यास भर नहीं है, यह हिन्दी का व भारतीय उपन्यास साहित्य का एक अत्यंत ही श्रेष्ठ उपन्यास है और इसका दर्ज़ा क्लासिक रचना का है। इसकी यह शक्ति केवल इसकी आंचलिकता के कारण ही नहीं है, वरन्‌ एक ऐतिहासिक दौर के संक्रमण को आंचलिकता के परिवेश में चित्रित करने के कारण भी है। बोली-बानी, गीतों, रीतिरिवाज़ों आदि के सूक्ष्म ब्योरों से है। जहां एक ओर अंचल विशेष की लोकसंस्कृति की सांस्कृतिक व्याख्या की है वहीं दूसरी ओर बदलते हुए यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में लोक-व्यवहार के विविध रूपों का वर्णन भी किया है। इन वर्णनों के माध्यम से ‘रेणु’ ने “मैला आंचल” में इस अंचल का इतना गहरा और व्यापक चित्र खींचा है कि सचमुच यह उपन्यास हिन्दी में आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति बन गया है।

संदर्भ

1. हिंदी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 2. हिंदी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र 3. हिन्दी साहित्य का इतिहास – श्यामचन्द्र कपूर 4. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारी प्रसाद द्विवेदी 5. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली खंड-7 6. साहित्यिक निबंध आधुनिक दृष्टिकोण – बच्चन सिंह 7. झूठा सच – यशपाल 8. त्यागपत्र – जैनेन्द्र कुमार 9. फणीश्वरनाथ रेणु – व्यक्तित्व, काल और कृतियां – गोपी कृष्ण प्रसाद 10. फणीश्वरनाथ रेणु व्यक्तित्व एवं कृतित्व – डॉ. हरिशंकर दुबे

बुधवार, 8 जून 2011

उपन्यास साहित्य–आधुनिक युग

clip_image001

३. मार्क्सवादी धारा :

clip_image002

इस धारा के प्रवर्तक यशपाल जी हैं। मर्क्स ने समाज को प्रमुख रूप से दो भागों में विभक्त किया है – शोषक और शोषित। मर्क्स के विचारों से प्रभावित होकर आधुनिक साहित्यकार शोषित वर्ग की समस्याओं, कठिनाइयों, परिस्थितियों और अभावों का यथार्थ चित्रण करने लगे हैं। ऐसे साहित्य को समाजवादी यथार्थ के नाम से पुकारा जाता है। इस धारा से प्रभावित कलाकार जाति, धर्म तथा वर्ग की प्राचीन रूढ़ियों के प्रति विद्रोही होता है तथा सामाजिक संघर्षों से अधिक विषमता को देखने का प्रयास करता है।

हिन्दी-उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में यशपाल जी का बहुत बड़ा योगदान है। अपनी विशिष्ट विचारधारा और सर्जनात्मक शक्ति के कारण यशपाल ने स्वतंत्र पहचान बना ली। वैसे तो प्रेमचंद के परवर्ती लेखन पर मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव दिखाई पड़ने लगा था किन्तु मध्यम वर्ग को आधार बना कर साम्यवादी विचारधारा को हिन्दी साहित्य में व्यापक प्रतिष्ठा दिलाने वाले यशपाल जी प्रथम कलाकार हैं। ‘गोदान’ में प्रेमचंद जी ने आदर्शवाद से बहुत-कुछ मुक्त होकर जिस यथार्थवादी दृष्टिकोण को अपनाया था, उसकी परंपरा को यशपाल ने आगे बढाया। ‘अमिता’ और ‘दिव्या’ जैसे ऐतिहासिक उपन्यासों को छोड़कर उनके सभी उपन्यास समाजवादी यथार्थ का चित्र प्रस्तुत करते हैं।

दादा कॉमरेड (1941), देशद्रोही (1943), पार्टी कॉमरेड (1946), मनुष्य के रूप (1949), झूठा सच (1958 पहला भाग और 1960 दूसरा भाग), मेरी तेरी उसकी बात (1973) आदि उपन्यासों में यशपाल की इसी विचारधारा के दर्शन होते हैं। ‘दादा कामरेड’ में पूंजीवाद, गांधीवाद और आतंकवाद का विरोध करते हुए समाजवाद का समर्थन किया गया है। ‘देशद्रोही’ 1941 की क्रांति से सम्बद्ध उपन्यास है। ‘मेरी तेरी उसकी बात’ में 1942 की क्रांति की बात है।

यशपाल जी का जन्म पंजाब के फिरोजपुर नगर में हुआ था। इनकी प्रारम्बिक शिक्षा गुरुकुल कांगड़ी में हुई। बाद में ये लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़े। यही वे क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव के सम्पर्क में आए। इसके बाद सशक्त क्रान्तिकारी आन्दोलन में उन्होंने देश-विदेश के साहित्य का खूब अध्ययन किया। देश स्वतंत्र होने के बाद स्वतंत्र रूप से साहित्य सृजन में लग गए।

यशपाल में कथा कहने की अद्भुत क्षमता थी। यशपाल का ‘झूठा सच’ स्वतंत्रता पूर्व और प्राप्ति के बाद के यथार्थ को चित्रित करने वाला उपन्यास है। इसका पहला खण्ड ‘वतन और देश’ और दूसरा खण्ड ‘देश का भविष्य’ आज़ादी के पूर्व और अज़ादी के बाद के भारत की संघर्ष कथा को बड़ी सजीवता से रूपायित करते हैं। इस उपन्यास ने सिद्ध कर दिया कि यशपाल बहुत विशाल फलक पर जीवन के विविध रूपों, आयामों, समस्याओं और जटिलताओं को अपने ढ़ंग से प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। इसलिए इस उपन्यास को औपन्यासिक महाकाव्य की संज्ञा दी जा सकती है।

कहानी संग्रह :: ज्ञानदान, अभिशाप, तर्क का तूफ़ान, वो दुनिया, भस्मावृत, चिनगारी, फूलों का कुर्ता, धर्मयुग, उत्तराधिकारी, उत्तमी की मां।

यशपाल के अतिरिक्त इस धारा के प्रमुख उपन्यासकारों में रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ का नाम उल्लेखनीय है। ‘चढ़ती धूप’ (1945), `नयी इमारत’ (1946), ‘उल्का’ (1947) और ‘मरुप्रदीप’ (1951) उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। यथार्थ के प्रति रुझान होने पर भी उन्होंने कथा-विन्यास में कल्पना की अतिशयता रखी है। इसलिए इनमें जीवन की द्वन्द्वात्मक चेतना अपनी पूरी शक्ति से नहीं उभर पायी है।

अमृतराय, भगवत शरण, उपेन्द्रनाथ अश्क, रागेय राघव (घरौंदे, विषाद मठ,), मन्मथनाथ गुप्त (शोले, माशाल) आदि का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है।

४. राजनीतिक धारा :

गुरुदत्त और यज्ञदत्त शर्मा को इस धारा का प्रवर्तक माना जा सकता हिअ। यद्यपि उनके उपन्यासों में अन्तर है तथापि इन दोनों उपन्यासकारों की पृष्ठभूमि राजनीतिक ही है। गुरुदत्त ने प्राचीन कड़ियों का आश्रय लेकर राजनीतिक उपन्यासों का प्रणयन किया है। बहती रेखा, गुंठन, मानव, विश्वासघात, वाममार्ग, प्रकृति, छाया, आदि उपन्यास उनकी इस धारा के सूचक हैं।

इस धारा से अनुप्राणित होकर यज्ञदत्त शर्मा के इंसान, महाराव का काम, इंसाफ़, दो पहलु, आदि उपन्यास हैं।

गुरुवार, 2 जून 2011

उपन्यास साहित्य :: मनोवैज्ञानिक धारा

IMG_0568clip_image001                          

  मनोज कुमार

२. मनोवैज्ञानिक धारा :

आधुनिक युग के उपन्यासों की चर्चा के क्रम में आज हम मनोवैज्ञानिक धारा की चर्चा करते हैं। मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों ने यह माना कि बाह्य सत्य की अपेक्षा अन्तःसत्य ही प्रमाणिक एवं विश्वनीय है। अतः उसे ही मानना महत्वपूर्ण है।

clip_image002

जैनेन्द्र कुमार जी का जन्म अलीगढ़ के कौड़ियागंज में 2 जनवरी 1905 में हुआ था। पिता प्यारेलाल का देहावसान तभी हो गया था जब वे चार मास के थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा (1911-1918) जैन गुरुकुल ऋषि ब्रह्मचर्याश्रम हस्तिनापुर में हुई। यहीं पर उन्हें आनंदीलाल से ‘जैनेन्द्र’ नाम दिया गया। कुछ वर्षों तक अध्ययन करने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद आगे के अध्ययन के लिए काशी गए। दो वर्षों (1919-20) तक काशी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गये। वे स्वाधीनता संग्राम में पूरे मनोयोग से जुड़े रहे। इसके बाद अध्ययन का क्रम टूट गया। वे कई बार जेल गये। जेल में ही इन्हें लिखने की प्रेरणा मिली। 1929 में इनका विवाह भगवती देवी से हुआ। उनका पहला लेख ‘अहिंसा’ है जो 1929 में विशाल भारत में छपा थी। इसके कुछ दिनों के बाद इनका उपन्यास ‘परख’ निकला। गांधी जी का उन पर विशेष प्रभाव पड़ा। बाद में वे दिल्ली में रहकर साहित्य रचना करते रहे। प्रेमचंद के साथ मिलकर लाहौर में हिंदुस्तानी सभा की स्थापना । डॉ के.एम.मुंशी तथा प्रेमचंद के साथ मिलकर महात्मा गांधी की अध्यक्षता में भारतीय साहित्य परिषद की स्थापना की। प्रेमचंद की मृत्यु के पश्चात हंस का संपादन शुरु किया। इनकी मृत्यु 24-12-1988 को हुई।

पुरस्कार व सम्मान :: हिन्दुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद (परख, 1929, भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय (प्रेम में भगवान, 1952, पाप और प्रकाश, 1953), साहित्य अकादमी (मुक्तिबोध, 1965), हस्तीमल डालमिया पुरस्कार, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार (समय और हम, 1970). पद्मभूषण (1971), मानद डि. लिट्‌ (दिल्ली विश्व विद्यालय, 1973, आगरा विश्व विद्यालय, 1974), हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, (साहित्य वाचस्पति, 1973), विद्या वाचस्पति, गुरुकुल कांगड़ी, साहित्य अकादमी की फेलोशिप, 1974|

जैनेन्द्र कुमार जी को उपन्यास-साहित्य के विकास में भाषा और शैली की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उन्होंने साहित्य में कलात्मकता के साथ-साथ भारतीय सामाजिक तथा राजनैतिक परिवेश की गहरी पकड़ बनाई। अंतर्वृत्ति अथवा शीलवैचित्र्य और उसका विकासक्रम अंकित करने वाले उपन्यास ‘गबन’ की रचना करने वाले प्रेमचंद जी ने इस धारा के उपन्यासकार श्री जैनेन्द्र कुमार जी के मनोविज्ञान चित्रण पर मुग्ध होकर ‘हंस’ में लिखा था,

‘‘इनमें अन्तःप्रेरणा और दार्शनिक संकोच का संघर्ष है।”

जैनेन्द्र कुमार (1905-1988) ने हिन्दी उपन्यास को प्रेमचंद-युग में ही नयी दिशा देने का सफल प्रयास किया। उन्होंने हिन्दी उपन्यास साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उपन्यास को सामाजिक यथार्थ ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक यथार्थ के क्षेत्र में भी प्रवेश करने की राह सुझाई। उन्होंने व्यक्ति की गुम होती पहचान को उभार कर सामने रखा। उनके उपन्यासों में अनमेल विवाह या दहेजप्रथा जैसी समस्याएं नहीं हैं, बल्कि विवाह स्वयं में एक समस्या है। उनके उपन्यासों में मनुष्य-जीवन के अनेक नवीन पहलुओं का उद्घाटन हुआ। गांधी जी के जीवन दर्शन से वे प्रभावित थे, परन्तु कहीं भी उन्होंने ऐसा कुछ न लिखा जो उनका स्वयं चिंतित न हो।

हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं,

“उनकी रचनाओं में नवीन कारीगरी और नवीन उपस्थापन-कौशल को देखकर सहृदयों को आशा हुई कि ये आगे चलकर बड़े साहित्यकार होंगे। यह आशा सत्य सिद्ध हुई।”

जैनेन्द्र कुमार की रचनाओं में नवीन कारीगरी और नवीन उपस्थापन-कौशल देखने को मिलता है।

उपन्यास :: ‘परख’(1929), ‘तपोभूमि’, ‘सुनीता’ (1935), ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’, ‘त्यागपत्र’ (1937), ‘विवर्त’, ‘व्यतीत’, ‘जयवर्धन’ ‘अनाम स्वामी’, ‘मुक्तिबोध’, ‘अनन्तर’, ‘यामा’, ‘दशार्क’।

जैनेन्द्र जी के मनोवैज्ञानिक उपन्यास में मनुष्य-जीवन के अनेक नवीन पहलुओं का उद्घाटन हुआ है। उन्होंने व्यापक सामाजिक जीवन को अपने उपन्यासों का विषय न बना कर मानव की शंकाओं, कुंठाओं, विकारों, उलझनों और प्रेम की वैक्तिकता के चित्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराया है। उन्होंने मुक्ति की समस्या पर बल तो दिया है, पर रूढ़ संस्कार उसके आड़े आ जाते हैं। इस तरह से उनके सभी उपन्यास अंतर्विरोधों का उपन्यास बन गए हैं। वे अपने पात्रों को पहेली बना कर छोड़ देते हैं और पाठक उस मनोवैज्ञानिक पहेली को सुलझाने के प्रयत्न में उलझा रह जाता है।

कहानी संग्रह :: फांसी, स्पर्धा, वातायन, एक रात, नीलम देश की राज कन्या, नई कहानियां, कथा कुसुमांजलि, जय सन्धि, ध्रुव यात्रा, एक दिन, दो चिड़िया, जैनेन्द्र की कहानियां (दस भागों में), जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियां, प्रेम में भगवान।

नाटक :: पाप और प्रकाश, मग्दालिनी।

संस्मरण - निबंध संग्रह :: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, गांधी नीति, लघु निबन्ध, व्यक्तिवाद, पूर्वोदय, सर्वोदय, विचार वल्लरी, मंथन, सोच-विचार, ये और वे, मेरे भटकाव, कश्मीर की वह यात्रा, परिप्रेक्ष्य, इतस्ततः, विहंगावलोकन।

साहित्य, आलोचना और संदर्भ-ग्रंथ :: साहित्य और संस्कृति, प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व, साहित्य का श्रेय और प्रेम, कहानी : अनुभव और शिल्प, समय समस्या और सिद्धांत, समय और हम, प्रेम और विवाह, नारी, काम प्रेम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी, प्रश्न और प्रश्न, राष्ट्र और राज्य, वृत्त विहार (तीन भागों में), शिक्षा और संस्कृति, क्या अभी भविष्य है? जैनेन्द्र के विचार।

सरस, सचित्र बाल व किशोर साहित्य :: अपना-पराया, जंगल की आवाज़, खेल, किसका रुपया, लाल सरोवर, नारद का निवेदन, पढ़ाई, रामू की शादी, सुन्दरियां, तमाशा, वह बेचारा, प्रेम में भगवान, दो साथी, मूरखराज, बाहुबली, धर्मपुत्र, देर है अंधेर नहीं, जीवन मूल, चिड़िया की बच्ची, तीन जोगी, गांधी कुछ स्मृतियां, हमसे सयाने बालक, खोखला ढ़ोल।

कहा जा सकता है कि उनके उपन्यास, विषय और शिल्प दोनों दृष्टियों से व्यस्क और संवेदनशील पाठकों के लिए लिखे गए उपन्यास हैं। एक प्रकार से देखा जाए तो नारी उन उपन्यासों की प्रधान समस्या है। इनका पुरुष पात्र इतना आकर्षक होता है कि सब नारियां उसके आसपास मंडरा कर उससे प्रेम करना चाहती हैं। उनके नारी-पात्रों में अद्भुत महिमा है। उन्होंने अपने उपन्यासों में सामाजिक मर्यादाओं के बीच अपनी पहचान बनाने वाले नारी पात्रों की सृष्टि की है जो सामाजिक दबावों और व्यक्तिगत आग्रहों के चलते द्वन्द्वग्रस्त होकर आत्मयातना के शिकार हो गये हैं। वे समाज को न तोड़कर, स्वयं टूटते हैं। इनके उपन्यासों में आदमी टूटता है समाज बचता है। मेरा मानना है कि अभी के समय में मनुष्य को थोड़ा और सामाजिक होना है, समाज को थोड़ा और मानवीय होना है। तभी देश की दशा और दिशा संतुलित रह सकती है।

जैनेन्द्र का विश्वास है कि पीड़ा और व्यथा ही अहं को विगलित करने में समर्थ है। व्यथा का तीव्रतम रूप कामगत यातना में प्राप्त होता है। इसीलिए जैनेन्द्र ने अपने उपन्यासों में कामपीड़ा और समर्पण का चित्रण करके अहं का विसर्जन किया। इनकी रचनाओं में ‘सुनीता’ को पर्याप्त ख्याति मिली है।

जैनेन्द्र जी के अतिरिक्त इस धारा के उपन्यासकारों में भगवती प्रसाद वाजपेयी का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है।

भिन्न-भिन्न जातियों और मतानुयायियों के बीच मनुष्यता के व्यापक संबंध पर ज़ोर देनेवाले उपन्यास ‘राम रहीम’ (1937) की रचना राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह ने की। उन्होंने इस उपन्यास में सामाजिक पहलुओं का उद्घाटन किया। उनके उपन्यास में मुहावरेदार भाषा और चटकीले चित्रों की योजना हिंदी में अपने ढ़ंग की अकेली ही है।

संदर्भ

1. हिंदी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 2. हिंदी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र 3. हिन्दी साहित्य का इतिहास – श्यामचन्द्र कपूर 4. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारी प्रसाद द्विवेदी 5. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली खंड-7 6. साहित्यिक निबंध आधुनिक दृष्टिकोण – बच्चन सिंह 7. झूठा सच – यशपाल 8. त्यागपत्र – जैनेन्द्र कुमार

बुधवार, 25 मई 2011

उपन्यास साहित्य - आधुनिकयुग

IMG_0545मनोज कुमार

उपन्यास साहित्य की चर्चा के क्रम में अब हम आधुनिक युग के उपन्यासों की चर्चा करेण्गे।

clip_image001

आधुनिक युग के उपन्यासकार यूरोप के उपन्यासकारों से अत्यधिक प्रभावित प्रतीत होते हैं। पश्चिमी साहित्य के प्रभाव के कारण ही उपन्यासकारों ने आज जात-पात, वर्ण-धर्म तथा देश और संस्कृति के बंधन को तोड़ डाला है। आज वे नवीन मानवता की सृष्टि में संलग्न हैं। यही कारण है कि आज के उपन्यासकार किसी एक धारा को नहीं स्वीकार करते हैं वरन्‌ वे पश्चिमी साहित्य के आधुनिकतम या नवीन वादों से प्रभावित होकर नवीन विचारधाराओं को विकसित करने का प्रयास करते हैं।

प्रेमचंद के बाद उपन्यास कई मोड़ों से गुज़रता हुआ दिखाई देता है। इन्हें मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जा सकता है –

१. 1950 तक के उपन्यास,

२. 1950 से 1960 तक के उपन्यास और

३. साठोत्तरी उपन्यास।

clip_image002

1950 तक के उपन्यास में मुख्यतः चार प्रकार की विचारधाराएं विकसित हो रही हैं –

१. फ़्रायडियन धारा,

२. मनोवैज्ञानिक धारा,

३. मार्क्सवादी धारा, और

४. राजनीतिक धारा

clip_image003

फ़्रायड ने सेक्स को महत्ता प्रदान की है। यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो काम-वासनाओं की अतृप्ति से उत्पन्न होने वाली कुंठाओं को लेकर ही फ़्रायड के सेक्स मनोविज्ञान ने प्रगति की है। फ़्रायड के कुंठावाद के आधार पर लेखकों ने मनुष्य की दमित वासनाओं, कुंठाओं, काम-प्रवृत्तियों, अहं, दंभ और हीन-भावना आदि ग्रंथियों का चित्रण करके हिन्दी उपन्यास में व्यक्ति का ऐसा रूप प्रस्तुत किया जिसमें वह अपनी आन्तरिक छवि देख सकता है। इन कुंठाओं का हल उपस्थित करने के लिए जिस प्रणाली को अपनाया गया उसे ही मनोविश्लेष्णात्मक प्रणाली कहा जाता है।

प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में समाज के साथ व्यक्ति के एडजस्ट होने के प्रश्न को अधिक महत्व दिया। प्रेमचंद के बाद हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणवादी उपन्यासकारों की एक ऐसी पंक्ति तैयार हुई जिसने हिन्दी को अनेक श्रेष्ठ उपन्यासों से समृद्ध किया है। फ़्रायड, एडलर और युंग की मनोविश्लेषण-संबंधी मान्यताओं का इस धारा के लेखको पर गहरा प्रभाव है।

clip_image004

हिन्दी उपन्यासकारों में इलाचंद्र जोशी इस प्रणाली (फ़्रायड के मनोविश्लेषण) से अत्यधिक प्रभावित प्रतीत होते हैं। उन्होंने फ़्रायड के सिद्धान्तों के आधार पर मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास लिखे। उनका पहला उपन्यास ‘घृणामयी’ (1929) है। परन्तु उन्हें ख्याति ‘संन्यासी’ (1941) से मिली। उनके लिखे उपन्यास हैं - ‘संन्यासी’, ‘पर्दे की रानी’ (1941), ‘प्रेत और छाया’ (1946), ‘निर्वासित’ (1946), ‘मुक्तिपथ’ (1950), ‘जिप्सी’ (1955), ‘जहाज का पंछी’ (1955), ‘ऋतुचक्र’ (1973), ‘भूत का भविष्य’ (1973) सुबह के भूले, और कवि की प्रेयसी।

इलाचंद्र जोशी का जन्म 13 दिसंबर 1902 को अल्मोड़ा में हुआ था। उनका निधन 14 दिसंबर 1982 को हुआ। हिंदी में मनोविश्लेषवादी उपन्यास और कहानी लेखन की दृष्टि से उनका स्थान शीर्ष पर है।

जोशी जी के उपन्यास चेतन और अचेतन मन में छुपी हुई वासनाओं और कुंठाओं का ही अध्ययन उपस्थित करते हैं। इनकी भावभूमियां एकांगी, संकुचित और छोटी हैं। इनके पात्र किसी न किसी मनोवैज्ञानिक ग्रंथि का शिकार हैं। इन ग्रंथियों के कारण वे असामाजिक कार्य में संलग्न होते हैं। उनके उपन्यासों में मनोविश्लेषण का इतना प्रभाव है कि उनके उपन्यास फ़्रायड की मान्यताओं के साहित्यिक संस्करण प्रतीत होते हैं। उनके उपन्यासों के पात्र अनेक मनोग्रंथियों से पीड़ित रुग्ण और दुर्बल हैं। फ़्रायड के मनोविश्लेषण का मूल आधार काम-भावना है। उसी को केन्द्र में रख कर ये उपन्यास लिखे गए हैं।

‘संन्यासी’ उनका सफल उपन्यास है जो कला के विचार से उच्चकोटि का है। इसमें आत्महीनता की ग्रंथि है। ‘प्रेत और छाया’ में इडिपस ग्रंथि है, जबकि ‘पर्दे की रानी’ के सभी पात्र मानसिक कुंठाओं से ग्रस्त हैं। ‘मुक्तिपथ’, ‘जिप्सी’ और ‘जहाज का पंछी’ में जोशी जी ने सामाजिकता का भी सन्निवेश किया है।

जोशी जी के उपन्यासों को पढककर लगता है, मानो उनका प्रतिपाद्य यह है कि जीवन के चरम सत्य की उपलब्धि सेक्स में ही होती है।

clip_image005

जोशी जी के अतिरिक्त इस पद्धति के उपन्यासकारों में सचिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन अज्ञेय का भी प्रमुख स्थान है। अज्ञेय ने उपन्यास कला को एक नया शिल्प दिया। इनसे पहले अंग्रेज़ी उपन्यासों के जिस गद्य को लोग आदर्श मानते थे, उसे ‘अज्ञेय’ जी ने आत्मसात्‌ कर अपनी रचनाओं में मूर्तरूप दिया। इनकी कहानियों में जीवन की सच्चाई, व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक और विचारों की ताज़गी थी। फ़्रायड के मनोविश्लेषण शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान अज्ञेय जी ने मनोविश्लेषण शास्त्र के प्रतीकों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है।

‘शेखर एक जीवनी’ (1941-1944) (अज्ञेय जी के बारे में यहां और यहां पढ़ें) के प्रकाशन के साथ हिन्दी उपन्यास की दिशा में एक नया मोड़ आया। यह उपन्यास हिन्दी के उपन्यास जगत में एक बिल्कुल नए अध्याय का श्रीगणेश करता है। यह उपन्यास मानव के मनोविकास का वैज्ञानिक चित्र उपस्थित करता है। इसमें मूलतः व्यक्ति-स्वातंत्र्य की समस्या उठाई गई है। कथ्य, शिल्प और भाषा की दृष्टि से यह परंपरा हट कर एक नया प्रयोग था। आधुनिकता का सर्वप्रथम समावेश इसी उपन्यास में दिखाई देता है। इसका मूल मंतव्य है – स्वतंत्रता की खोज। यह खोज सबसे काट कर नहीं की गई है, बल्कि मनवीय परिस्थितियों के बीच की गयी है। स्वतंत्रता की तलाश में शेखर अनेक प्रकार के आंतरिक संघर्षों से जूझता है, किंतु अपने निषेधात्मक रोमांटिक विद्रोह को लेकर वह बहिर्मुखी नहीं हो पाता। फलतः सारा संघर्ष मौखिक रह जाता है, क्रिया में नहीं बदलता। फिर भी शेखर के विद्रोह के पीछे आज की पीढ़ी का विद्रोही स्वर है। दूसरे भाग में उसका बिखरा व्यक्तित्व संघटित होकर रचनात्मक बनता है। शेखर एक विद्रोही है। समाज के निर्मित प्रतिमान उसे सह्य नहीं है। अपनी अनुभूतियों को वह अभिव्यक्ति देता है। यह एक प्रयोगधर्मी उपन्यास है। एक रात में देखे गए विजन को शब्दबद्ध किया गया है। इसमें अनुभूति के टुकड़ों को जहां-तहां से उठा लिया गया है। चेतना प्रवाह, प्रतीकात्मकता और भाषा की अंतरिकता के कारण यह उपन्यास अप्रतिम है।

अज्ञेय का दूसरा उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ (1951) में व्यक्तिवादी जीवन दर्शन व्यक्त हुआ है। उन्होंने मध्यम वर्गीय कुंठित जीवन के प्रतीक के रूप में नदी के द्वीप की कल्पना की है। नदी का द्वीप धारा से कटा हुआ है। मध्यवर्गीय जीवन भी शेष-जन-प्रवाह से विछिन्न है। अज्ञेय का अपनी-विद्रोह भावना, वरण की स्वतंत्रता और व्यक्तित्व की अद्द्वितीयता के कारण विशिष्ट स्थान है। उन्हें भाषा एवं मनोविश्लेषण की दृष्टि से ‘नदी के द्वीप’ में अपूर्व सफलता मिली।

‘अपने-अपने अजनबी’ (1961) अज्ञेय का तीसरा उपन्यास है। इसमें एक प्रकार की धार्मिक दृष्टिसंपन्नता दिखाई पड़ती है। इसमें मुख्य समस्या स्वंत्रता के वरण की है। संत्रास, अकेलेपन, बेग़ानगी, मृत्युबोध, अजनबीपन आदि से स्वंत्रता संयुक्त हो गई है। स्वतंत्रता को अहंकार से जोड़कर अज्ञेय जी ने इसमें अस्तित्ववादी स्वतंत्रता मे मूल अर्थ को ही बदल दिया है।

clip_image006

‘नर – नारी’ और ‘हमारा मन’ नाम की दो अनूठी पत्रिकाओं का सम्पादन - प्रकाशन करने वाले द्वारिका प्रसाद के उपन्यास ‘मम्मी बिगड़ेगी’ और ‘घेरे के बाहर’  भी इसी कोटि के अन्तर्गत आते हैं। ये एक विवादास्पद उपन्यास थे।  हिन्दी में सेक्स और मनोविज्ञान के ऊपर लेखन में यह  पहला गंभीर प्रयास था जिसे पाठकों ने पढ़ा और सराहा।  इन उपन्यासों में कथा के विकास पर ज्यादा जोर न देकर इस सम्बन्ध को जायज ठहराने की कोशिश अधिक की गयी है। इन उपन्यासों के चर्चित होने का मुख्य कारण इसका विषय था। उपन्यास कला की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास नहीं कहा जा सकता, किन्तु हिन्दी में यह एक अनूठा और साहसपूर्ण उपन्यास है।

डॉ. देवराज के ‘पथ की खोज’, ‘अजय की डायरी’ और ‘मैं, वे और आप’ भी इसी श्रेणी के उपन्यास हैं।

मनोहर श्याम जोशी का ‘हमजाद’ भी इसी श्रेणी के तहत आता है।

संदर्भ -

1. हिंदी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 2. हिंदी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र 3. हिन्दी साहित्य का इतिहास – श्यामचन्द्र कपूर 4. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारी प्रसाद द्विवेदी 5. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली खंड-7 6. साहित्यिक निबंध आधुनिक दृष्टिकोण – बच्चन सिंह 7. झूठा सच – यशपाल 8. त्यागपत्र – जैनेन्द्र कुमार

मंगलवार, 17 मई 2011

ऐतिहासिक उपन्यास

clip_image001

clip_image001[9]

हिन्दी उपन्यासों के विकास के दौर में इतिहास संबंधी एक नए दृष्टिकोण का उदय हुआ। इस कोटि के उपन्यासों में भारतीय इतिहास के उन अध्यायों और घटनाओं को चित्रित किया गया है, जिनसे वर्तमान को नयी दिशा और प्रेरणा मिलती है।

clip_image003

वृन्दावन लाल वर्मा (1889-1969) ने हालाकि सामाजिक उपन्यास भी लिखे हैं, लेकिन उनका नाम ऐतिहासिक उपन्यासों लेखन में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके ‘संगम’ (1928), ‘लगन’ (1929), ‘प्रत्यागत’ (1929), और ‘कुंडलीचक्र’ (1932) सामाजिक उपन्यास और ‘गढ़ कुंडार’ ((1929), ‘विराटा की पद्मिनी’ (1936), ‘झांसी की रानी’ (1937), जैसे उपन्यास स्वतंत्रता के पहले और ‘कचनार’, ‘मृगनयनी’, ‘अहिल्याबाई’, ‘भुवन विक्रम’, ‘माधव जी सिंधिया’. ‘रामगढ़ की रानी’, ‘महारानी दुर्गावती’ आदि उपन्यास स्वतंत्रता के बाद लिखे गए है।

वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यासों में इतिहास के तथ्यों की रक्षा की है और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना का प्रसार किया है। उनमें इतिहास और कल्पना का समन्वय दिखायी पड़ता है। इन उपन्यासों में लेखक का अभीष्ट विभिन्न सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में जीवन का आदर्शात्मक यथार्थ निरूपण भी है।

‘झांसी की रानी’ तथ्याश्रयी और विवरणात्मक उपन्यास है जबकि ‘मृगनयनी’ मे तत्कालीन परिवेश को उसकी समग्रता के साथ आकलन किया गया है। उपन्यासकार ने ग्वालियर के महाराज मानसिंह और गांव की मृगनयनी के प्रेम के ताने बाने में उस समय के समय के सांस्कृतिक वातावरण को उसके विभिन्न आयामों में चित्रित करके उस कालखंड को जीवंत बना दिया है। तत्कालीन धर्म, राजनीति, चित्रकला, संगीतकला और वास्तुकला को उनके ब्यौरे ने सजीवता प्रदान किया है।

clip_image004

हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ एक अभिनव प्रयोग है। ऐतिहासिक जीवनवृत्त से जुड़ी कुछ घटनाओं के उपयोग के बावज़ूद यह न तो आत्मकथा है, न जीवनी। प्रयोगशीलता इसकी प्रमुख विशेषता है। भरत के सांस्कृतिक यथार्थ को चित्रित करने वाला यह अनूठा ऐतिहासिक उपन्यास है। इसके अलावा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘चारुचन्द्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’ सातवें और आठवें दशक में प्रकाशित हुए।

द्विवेदी जी के उपन्यास इतिहास के तथ्यों पर आधारित नहीं है, उनमें कल्पना के आधार पर ऐतिहासिक वातावरण की सृष्टि की गई है। वे किसी कालखंड को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ उसे आज की ज्वलंत समस्याओं के साथ भी जोड़ते चलते हैं।

‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में मध्यकालीन जड़ता पर प्रहार किया गया है। अलंकृत शैली में लिखे जाने के बावज़ूद भी यह गद्यात्मक है, काव्यत्मकता ही इसकी भाषा और वस्तु दोनों है।

‘चारुचन्द्रलेख’ अनाकर्षक है और इसका विन्यास बिखरा-बिखरा लगता है। इसमें द्विवेदी जी ने कुतूहल, विस्मय, रोमांस और रहस्य की सृष्टि की है।

clip_image005

यशपाल जी का ‘दिव्या’ एक काल्पनिक ऐतिहासिक उपन्यास है। उन्होंने ने इसे मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखा है। इस उपन्यास की नायिका दिव्या अनेक प्रकार के संघर्ष झेलती है। यह एक रोमांस विरोधी उपन्यास है। यशपाल जी की दिव्या भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा से इस मामले में अलग है कि जहां चित्रलेखा को परिस्थितियों के कारण जीवन में कोई राह नहीं सूझती, वही दिव्या में राह की खोज है। ‘अमिता’ यशपाल जी का दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। किन्तु इसमें वह ऊंचाई नहीं है जो ‘दिव्या’ में है।

clip_image006

राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) ने शैतान की आंख, 1923, विस्मृति के गर्भ में, 1923, सोने की ढ़ाल, 1923, बाइसवीं सदी, सिंह सेनापति, जीने के लिए, जय यौधेय, भागो नहीं, दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, राजस्थान निवास, विस्मृत यात्री, दिवोदस, आदि उपन्यास लिखे जिनमें ‘सिंह सेनापति’ और ‘जय यौधेय’ मार्क्सवादी दृष्टि से लिखे गए ऐतिहासिक उपन्यास हैं, जिनमें लिच्छवी गण और यौधेय गण के संघर्ष चित्रित हैं।

महापंडित की उपाधि से विख्यात, अविश्रांत यात्री, तत्वान्वेषी, इतिहासविद्‌ और युगपरिवर्तनकामी साहित्यकार के रूप में राहुल सांस्कृत्यायन जी को जाना जाता है। हिंदी की सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले राहुल जी ने ‘चरैवेति, चरैवेति’ का सत्य अपने जीवन में साकार किया।

जीवन पर्यंत ज्ञान पिपासु रहे राहुल सांस्कृत्यायन खुले दिमाग के मार्क्सवादी थे। उन्होंने समाजवाद को पुस्तकों से ही नहीं जीवन से भी सीखा। राहुल जी मार्क्सवादी चेतना से अनुप्राणित होकर द्वान्द्वात्मक भौतिकवाद के आधार पर इतिहास का विश्लेषण करने वाले उपन्यासकार हैं।

clip_image007

रांगेय राघव ने भी ‘मुर्दों का टिला’ मार्क्सवादी दृष्टि से लिखा है और इसमें मोहनजोदाड़ो के गणतंत्र का चित्रण किया गया है।

चतुरसेन शास्त्री

चतुरसेन शास्त्री ने अपने उपन्यासों ‘वैशाली की नगरवधु’, ‘सोमनाथ’ और ‘वयं रक्षामः’ में भारतीय संस्कृति का संश्लिष्ट चित्र प्रस्तुत किया है। ‘वैशाली की नगरवधू’  में लिच्छवी गणतंत्र की चर्चा मिलती है। इस उपन्यास में आधुनिक नगर जीवन के सहारे तत्कालीन इतिहास की प्रमाणिकता को संदिग्ध बना दिया गया है।

clip_image008

यह काल हिन्दी उपन्यास का स्थापना काल था। एक ओर इस काल में जहां प्रेमचंद द्वारा हिन्दी उपन्यास को साहित्य का दर्ज़ा दिलाया गया, वहीं दूसरी ओर जैनेन्द्र ने उसे आधुनिक बनाया। प्रसाद, कौशिक, उग्र, भगवतीचरण वर्मा, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, निराला आदि ने अपने-अपने ढ़ंग से उसे समृद्धि प्रदान कर बाद के दिनों में आने वाले उपन्यासकारों का मार्गदर्शन किया।

शुक्रवार, 13 मई 2011

व्यक्तिवादी उपन्य़ास

clip_image001

(घ) व्यक्तिवादी उपन्य़ास :
इस विचारधारा को मानने वाले व्यक्ति की सत्ता और अस्तित्व को समाज से पहले स्वीकारते हैं। उनकी दृष्टि में समाज-व्यवस्था सिर्फ़ एक माध्यम होती है, लक्ष्य व्यक्ति होता है। अपने अच्छे-बुरे का निर्णायक व्यक्ति होता है। वह अपने प्रति स्वयं उत्तरदायी होता है। इसमें व्यक्ति का अहं प्रबल होता है।
clip_image002

प्रमुख कृतियां : ‘टेढे-मेढे रास्ते’, ‘आख़िरी दांव’, ‘अपने खिलौने’, ‘भूले-बिसरे चित्र (1959), ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘रेखा’, ‘सबहिं नचावत राम गुसाईं’, ‘चित्रलेखा’ (1934), ‘तीन वर्ष’ (1936)।
भगवती चरण वर्मा ने ‘चित्रलेखा’ (1934) की रचना कर काफ़ी लोकप्रियता हासिल की। ‘तीन वर्ष’ (1936) भी अपनी भावुकता के कारण काफ़ी लोकप्रिय हुआ। ‘टेढे-मेढे रास्ते’ में दो पीढियों के बीच अंतराल का प्रश्न उठाया गया है। पिता और उसके तीन पुत्रों के बीच दूरियां हैं और उनके रास्ते टेढे-मेढे।
वर्मा जी के उपन्यासों में इस बात पर अधिक ज़ोर दिया गया है कि ‘मनुष्य परिस्थितियों का दास है’। उनके अनुसार परिस्थितियां इकहरी होती हैं, और मनुष्य उनसे पराभूत हो जाता है। प्रेमचंद की भांति वर्मा जी तात्कालिकता को तीख़ेपन के साथ चित्रित नहीं कर पाते। उन्हें ‘गोदान’ की परंपरा का उपन्यासकार न मान कर ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’ और ‘ग़बन’ की परंपरा का उपन्यासकार माना जाना चाहिए।
clip_image003
उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ समग्र अर्थ में तो नहीं पर इन्हें भी प्रेमचंद परंपरा का उपन्यासकार कहा जा सकता है। इन्होंने भी मध्यम वर्गीय व्यक्तियों की परिस्थितियों, समस्याओं और परिवेश को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।
अश्क जी ने ‘एक रात का नरक’, ‘सितारों के खेल’, ‘गिरती दीवारें’ (1949), ‘शहर में घूमता आईना’, ‘एक नन्ही कंदील’, ‘गर्म राख’ (1952), ‘बड़ी-बड़ी आंखे’ (1954), ‘पत्थर-अल-पत्थर’ (1957), लिखे हैं। ‘गिरती दीवारें’ और ‘गर्म राख’ व्यक्तिवादी और यथार्थवादी परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
भगवती प्रसाद वाजपेयी (पतिता की साधना, चलते-चलते, टूटते बंधन) और उषा देवी मित्रा (वचन का मोल, जीवन की मुस्कान, पथचारी) ने व्यक्तिवादी उपन्यास की रचना की। इन उपन्यासकारों ने सामाजिक शक्तियों के स्थान पर व्यक्ति की चेतना और उसके व्यक्तित्व को अधिक महत्वपूर्ण माना है। भगवती प्रसाद वाजपेयी के उपन्यासों में प्रेम, वासना, कर्तव्य और मानसिक द्वन्द्व का वैज्ञानिक ढंग से चित्रण हुआ है।