शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

उपन्यास साहित्य–समापन किस्त–समकालीन उपन्यास

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झिंगूर दास 291मनोज कुमार

इस दशक के उपन्यास मुख्यतः अधुनिकतावादी विचारधारा से प्रभावित हैं। शहरीकरण की तेज़ प्रक्रिया, अस्तित्ववादी दर्शन और पश्चिमी प्रभाव के कारण पारंपरिक मूल्य बिखरते गए, सामाजिकता की जगह वैयक्तिकता ने ले लिया। मानव जीवन में हताशा, निराशा, कुंठा ने घर कर लिया।

सातवें दशक के हिन्दी उपन्यासों में आधुनिकताबोध की ये सभी प्रवृत्तियां परिलक्षित हुई हैं। इस दृष्टि से मोहन राकेश (अंधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल), निर्मल वर्मा (वे दिन), राजकमल चौधरी (मरी हुई मछली, शहर था शहर नहीं था), महेन्द्र भल्ला (एक पति के नोट्स), उषा प्रियंवदा (रुकोगी नहीं राधिका), imageशिवप्रसाद सिंह (अलग-अलग वैतरणी), गिरिराज किशोर (यात्राएं), मणि मधुकर (सफेद मेमने), ममता कालिया (बेघर), मन्नू भंडारी (आपका बंटी) आदि के उपन्यास पठनीय हैं। इन उपन्यासों का व्यक्ति अकेला, ऊबा हुआ, संत्रस्त, व्यर्थताबोध से पीड़ित, अजनबियत से घिरा हुआ, थका-हारा ऐसा व्यक्ति है जिसको कोई भविष्य नहीं दिखाए देता, न कहीं आशा-उत्साह की कोई किरण दिखाई पड़ती है।

एक जहां निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘वे दिन’ में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की यूरोपीय युवा पीढ़ी के अर्थहीन यौन संबंधों, अकेलापन, ऊब, अनास्था, भय, कुंठा आदि का चित्रण हुआ है, वहीं दूसरी ओर मोहन राकेश के उपन्यासों में जीवन की त्रासदी चित्रित है। राजकमल चौधरी के उपन्यास ‘मरी हुई मछली’ में अर्थाभाव झेलती हुई स्त्री की देह-गाथा क चित्रण हुआ है तो मन्नू भंडारी imageके उपन्यास ‘आपका बंटी’ में उच्च मध्यवर्गीय जीवन की अधुनिकता, फैशन आदि का चित्रण है।

आठवें दशक के उपन्यासों में प्रगतिवादी विचारधारा से सम्पन्न वह परंपरा है जिसका संबंध प्रेमचंद की जनवादी परम्परा से है। इस दृष्टि से श्रीलाल शुक्ल (राग दरबारी), बदीउज़्ज़मा (एक चूहे की मौत), जगदीशचन्द्र (धन धरती न अपना), काशीनाथ सिंह (अपना मोर्चा), गिरिराज किशोर (जुगलबंदी), भीष्म साहनी (तमस), रमेशचन्द्र शाह (गोबर गणेश), जगदम्बा प्रसाद दीक्षित (मुर्दाघर), रामदरश मिश्र image(अपने लोग), राही मासूम रज़ा (कटराबी आरज़ू), कृष्ण सोबती (ज़िन्दगीनामा), मन्नू भंडारी (महाभोज), मनोहर श्याम जोशी (कुरु-कुरु स्वाहा), और मार्कण्डेय (अग्निबीज) के उपन्यास उल्लेखनीय हैं।

इन लेखकों ने मध्यमवर्गी जीवन को जन-जीवन के बीच उन्मुक्त सांस लेने के लिए अवकाश प्रदान किया। व्यंग्य, फैंटेसी, क्रांति, विद्रोह, आन्दोलन का भाव जगा कर अपनी दुर्दशा, असहाय अवस्था से मुक्ति पाने का मार्ग भी दिखाया। राग दरबारी की व्यंग्यात्मकता अय्र एक चूहे की मौत की फैंटेसी इस दौर की उपन्यास कला को एक नया आयाम देती है।

३. समकालीन हिन्दी उपन्यास

नवें दशक में कई उपन्यासकारों के उपन्यास प्रकाश में आए, जैसे, ‘रात का रिपोर्टर (निर्मल वर्मा), ‘मय्यादास की माड़ी (भीष्म साहनी), ‘बिना दरवाज़े के माकन’, दूसरा घर, (रामदरश मिश्र), ‘नीला चांद’ (शिवप्रसाद सिंह), ‘हुज़ूर दरबार’, ‘तुम्हारी रोशनी में’, ‘धीर समीरें’ (गोविन्द मिश्र), ‘बंधन’, ‘अधिकार’, ‘कर्म’, ‘अभिज्ञान’ (नरेन्द्र कोहली), ‘सोना माटी’ (विवेकी राय) आदि।

इस दशक में मनोहर श्याम जोशी (कुरु-कुरु स्वाहा, कसप, हरिया हरिकुलिस), अब्दुल बिस्मिल्लाह (झीनी-झीनी बीनी चदरिया, दंतकथा, ज़हरबाद), मंज़ूर एहतेशाम (सूखा बरगद), संजीव (सर्क, सावधान नीचे आग है) के नाम उल्लेखनीय है।

वीरेन्द्र जैन (डूब, पार, पंचनामा), कमलाकांत त्रिपाठी (पाहीघर), पंकज बिष्ट (उस चिड़िया का नाम), प्रियंवद (वे वहां क़ैद हैं), सुरेन्द्र वर्मा (मुझे चांद चाहिए) आदि ने हिन्दी उपन्यास में नयी रचना शीलता को सार्थक से प्रस्तुत किया है।

स्मकालीन उपन्यासों में किसी खास प्रवृत्ति या विचारधारा का प्रभाव या दबाव नहीं है। इन उपन्यासों में विषयगत विविधता, शिल्पगत नवीनता और प्रयोगशीलता है। वर्तमान उपन्यासकार वैचारिक कठमुल्लेपन और सीमित जीवनानुभव की बंदिशों से काफ़ी मुक्त हैं।

वर्तमान में महिला कथाकारों की एक सशक्त पीढ़ी भी तैयार हुई है। इन्होंने रचना संसार को एक विशिष्ट रूप प्रदान किया है। नई पहचान और नई दिशा दी है। शशिप्रभा शास्त्री, शिवानी, कृष्णा सोबती (‘मित्रो मरजानी’, ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘दिलोदानिश’), दीप्ति खण्डेलवाल, मन्नू भंडारी (‘एक इंच मुस्कान’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’), उषा प्रियंवदा (‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘पचपन खंभे लाल imageदीवारें’), निरुपमा सेवती, मेहरुन्निसा परवेज़, राजी सेठ (तत्सम), मृदला गर्ग (चितकोबरा, ममता कालिया (नरक दर नरक), चित्रा मुद्गल, मृणाल पाण्डेय (पटरंग पुराण), नासिरा शर्मा (शामली, ठीकरे की मंगनी, ज़िन्दा मुहावरे), सूर्यबाला, प्रभा खेतान (छिन्नमस्ता, तालाबन्दी, अपने-अपने चेहरे), मैत्रेयी पुष्पा (इदन्नमम) आदि ने अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज़ कराई है।

निष्कर्ष :

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिन्दी उपन्यास अपने उद्भव से लेकर आजतक बराबर विकसित होता रहा है। इसने तकनीक और विषयवस्तु की दृष्टि से जो प्रगति की है वास्तव में असाधारण और सराहनीय है। हिन्दी उपन्यास की इस प्रगति को ध्यान में रखते हुए तथा नवीन उपन्यासकारों द्वारा वर्णनात्मक, विश्लेषणात्मक, आत्मकथात्मक, विवरणात्मक, आदि शैलियों में लिखी रचनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि भविष्य में हिन्दी उपन्यास विश्व के साहित्यिक उपन्यासों में अपना महत्वपूर्ण स्थान स्थापित कर लेगा। वर्तमान जगत में उपन्यासों की बड़ी शक्ति है। समाज जो रूप धारण कर रहा है उसके भिन्न-भिन्न वर्गों में जो प्रवृत्तियां उत्पन्न हो रही हैं, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृत्ति भी उत्पन्न कर सकते हैं।

16 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी साहित्य लगतार विकास की सीढियाँ चढ़ रहा है ...
    सार्थक आकलन !

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  2. बहुत अच्छी रही यह पुरु श्रृंखला .. उपन्यासों का सफर यूँ ही निरंतर चलता रहे ..

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  3. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (02.07.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  4. सार्थक एवं सफल साहित्य श्रंखला के लिए साधुवाद !

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  5. इतना गहन और शोधपरक लेख पढने के बाद लगता है कि हिन्दी उपन्यासों की यात्रा में अद्भुत आनंद प्राप्त हुआ!!

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  6. जानकारी परक और सारगर्भित श्रृंखला ...आपका आभार

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  7. ज्ञानवर्द्धक आलेख विशेषतः से विद्यार्कियों के लिए अति उपयोगी...धन्यवाद और बधाई स्वीकार करें सर!

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  8. bahut hi gyaanverdhak lekh.bahut hi achchi jaankaari di aapne.badhaai sweekaren.

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  9. मैं पहली बार आपके ब्लाग पर आया हूं। वाकई मेरे लिए नई और जरूरी जानकारी वाला लेख रहा है। आपको बहुत बहुत बधाई..

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  10. सार्थक विश्लेषण.....
    हिंदी साहित्य के लिए अति उपयोगी लेख

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  11. उपन्यास साहित्य का समापन किश्त अच्छा लगा। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि सन 1978 में मेरी पोस्टींग Air Forcs Station, Chandigarh में थी। कोलकाता से छुट्टी बिताकर वापस चंडीगढ जा रहा था। डीलक्स एक्सप्रेस में मेरी सामने वाली सीट पर एक सज्जन बैठे थे। संक्षिप्त परिचय के बाद उन्होंन अपना नाम 'मणि मधुकर' बताया और 'कबीर की आँख' नामक अपनी एक पुस्तक मुझे भेंट में दी। इनके द्वारा रचित उपन्यास 'सफेद मेमने' पढा हूँ, काफी रोचक है। उपन्यास साहित्य के विभिन्न रूपों को आद्योपांत प्रस्तुत करने के लिए आपका विशेष आभार।आशा ही नही अपितु मेरा पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी आप राजभाषा ब्लाग को सितारों-जड़ित करने के लिए अहर्निश कटिबद्ध रहेंगे। अशेष शुभकामनाओं के साथ।धन्वाद सर ।

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  12. अब और देरी की,तो अनपढ़ी कृतियों की संख्या और बड़ी होती जाएगी।

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