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सोमवार, 7 नवंबर 2011

कुछ यूँ ही सा …



पलकों पे जो ये अश्क चले आते हैं,
ये कितने बेदर्द हो कर चले आते हैं,
जब छोड़ देता है साथ ज़माना मेरा
तो ये भी मेरा साथ छोड़ कर चले आते हैं।



जब तन्हाई होती है तो खुद ही ख़ुद से मिला करते हैं
किसी की ज़रूरत नहीं होती ख़ुद से ही बात किया करते हैं
ज़िन्दगी  हो जाए रेगिस्तान तो फिर पानी की चाह भी क्यों हो ?
छलकाते नहीं गम-ऐ - दर्द बस हम उन्हें पी लिया करते हैं।
 
 
बेचैनिया हद से गुज़र जाएँ तो  खलिश बन जाती हैं
बेबसी जब बाँध लगाती है तो   चुभन बन जाती है
वक्त को कब कौन रोक पाया है   ऐ मेरे दोस्त
जब वक्त साथ न दे तो  ,   बेवफाई बन जाती है .

हथेलियों ने
सहला दिया था
आँखों को
और समेट लिए थे
सारे मोती
वापस आ गयी है
आँखों में
फिर से वो चमक
जिसकी रोशनी में
तुम नहाया करते थे|

संगीता स्वरुप