सोमवार, 7 नवंबर 2011

कुछ यूँ ही सा …



पलकों पे जो ये अश्क चले आते हैं,
ये कितने बेदर्द हो कर चले आते हैं,
जब छोड़ देता है साथ ज़माना मेरा
तो ये भी मेरा साथ छोड़ कर चले आते हैं।



जब तन्हाई होती है तो खुद ही ख़ुद से मिला करते हैं
किसी की ज़रूरत नहीं होती ख़ुद से ही बात किया करते हैं
ज़िन्दगी  हो जाए रेगिस्तान तो फिर पानी की चाह भी क्यों हो ?
छलकाते नहीं गम-ऐ - दर्द बस हम उन्हें पी लिया करते हैं।
 
 
बेचैनिया हद से गुज़र जाएँ तो  खलिश बन जाती हैं
बेबसी जब बाँध लगाती है तो   चुभन बन जाती है
वक्त को कब कौन रोक पाया है   ऐ मेरे दोस्त
जब वक्त साथ न दे तो  ,   बेवफाई बन जाती है .

हथेलियों ने
सहला दिया था
आँखों को
और समेट लिए थे
सारे मोती
वापस आ गयी है
आँखों में
फिर से वो चमक
जिसकी रोशनी में
तुम नहाया करते थे|

संगीता स्वरुप

23 टिप्‍पणियां:

  1. पलकों पे जो ये अश्क चले आते हैं,
    ये कितने बेदर्द हो कर चले आते हैं,
    जब छोड़ देता है साथ ज़माना मेरा
    तो ये भी मेरा साथ छोड़ कर चले आते हैं।

    संगीता स्र्वरूप जी, मन को तो हम समझा सकते है लेकिन आंसूओं को समझाना बड़ा ही मुश्किल कार्य होता है क्योंकि ये सही होते हैं । थोड़ी सी याद, थोड़ा सा गम एवं थोड़ी सी खुशी को भी संजोकर नही रख सकते । इन सबका इजहार सबके सामने कर देते हैं । इसी संदर्भ से मेरी ओर से भी चंद पक्तियां जोड़ रहा हूँ-

    सच कोई कह गया जमाने से,
    इश्क छुपता नही छुपाने से ,

    रूटकर जा रहे हैं जाने दे,
    लौट आएंगे वे मनाने से,

    इश्क पाएगा रोशनी सच है,
    हाँ मगर अपना दिल जलाने से

    दूर हो जाएंगे गिले शिकवे
    आपके सिर्फ मुस्कराने से

    आपकी कविता दिल से निकली है एवं दिल से निकली बात किसी को भी भाव-विह्वल कर जाती है । बहुत सुंदर । मेर नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  2. बेबसी बेकसी के बाद कुछ राहत भी शायद -सुन्दर रचना!

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  3. आंसू बहाए जो फिर लौट आये ...
    तन्हाई से ज्यादा अपना कौन जो हमें खुद से मिलाती है ...

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  4. जिन्‍दगी रोने का नाम नहीं अपितु रोते हुए को हँसाने का नाम है। जीवन में प्रसन्‍न रहने के अवसर की तलाश करनी चाहिए फिर वह कविता में ही क्‍यों ना हो।

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  5. मन के दर्द को पी लेना ही बेहतर है।

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  6. वापस आ गयी है
    आँखों में
    फिर से वो चमक
    जिसकी रोशनी में
    तुम नहाया करते थे|
    - बस यह चमक सलामत रहे-यही कामना है.

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  7. ईद मुबारक .बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति .ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं

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  8. हथेलियों ने
    सहला दिया था
    आँखों को
    और समेट लिए थे
    सारे मोती
    वापस आ गयी है
    आँखों में
    फिर से वो चमक
    जिसकी रोशनी में
    तुम नहाया करते थे|

    बहुत ही खूबसूरत अहसास ! खुद को उत्सर्जित कर किसीके जीवन में रोशनी बिखेर देने की भावना कितनी पावन और विरल होती है यह अनुभव कर पा रही हूँ आपकी रचना से ! बहुत ही सुन्दर !

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  9. बहुत ही सुन्दर अहसासो को संजोया है…………सभी एक से बढकर एक्।

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  10. बेचैनिया हद से गुज़र जाएँ तो खलिश बन जाती हैं
    बेबसी जब बाँध लगाती है तो चुभन बन जाती है
    वक्त को कब कौन रोक पाया है ऐ मेरे दोस्त
    जब वक्त साथ न दे तो , बेवफाई बन जाती है ....kuch yunhi itna jabardast ! wakai bechainiyaan jab had se guzar jati hain to khalish ban jati hain

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  11. पलकों पे जो ये अश्क चले आते हैं,
    ये कितने बेदर्द हो कर चले आते हैं,
    जब छोड़ देता है साथ ज़माना मेरा
    तो ये भी मेरा साथ छोड़ कर चले आते हैं
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ...

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  12. सच कोई कह गया जमाने से,
    इश्क छुपता नही छुपाने से
    यकीनन इश्क कब छुपता है भला

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  13. भावनापूर्ण भावाभिव्यक्ति !

    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है,कृपया अपने महत्त्वपूर्ण विचारों से अवगत कराएँ ।
    http://poetry-kavita.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html

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  14. हथेलियों ने
    सहला दिया था
    आँखों को
    और समेट लिए थे
    सारे मोती
    वापस आ गयी है
    आँखों में
    फिर से वो चमक
    जिसकी रोशनी में
    तुम नहाया करते थे|
    Behtareen panktiyan!

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  15. पता नहीं क्यों ...२ तरह की रचना लगी मुझे.पढ़ना शुरू किया तो लगा कि ये संगीता दी तो नहीं :).पर आखिरी पंक्तियाँ पढते ही आप दिखाई दे गईं.
    बहुत सुन्दर रचना.

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  16. बहुत सुन्दर कविता... सघन प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति ...

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  17. बहुत उम्दा!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! सूचनार्थ!

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  18. वापस आ गयी है
    आँखों में
    फिर से वो चमक
    जिसकी रोशनी में
    तुम नहाया करते थे|

    fir to sari shikayte hi khatam. sab kuchh in aansuo me beh gaya hoga.

    sare sher dil ko chhoote hue.

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  19. जीवन के अलग अलग अनुभव से अलग अलग मुक्तक जैसे स्वत: ही निकल आते हैं ... बहुत सुन्दर ...

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  20. वक्त को कब कौन रोक पाया है ऐ मेरे दोस्त
    जब वक्त साथ न दे तो , बेवफाई बन जाती है.
    बहुत सुंदर. धन्यवाद.

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  21. मन को छूते नमनाक मुक्तक.

    आँसू गम का इशारा नहीं है.
    इससे वफादार सहारा नहीं है.
    कभीं चख के देखो,पाओगे तुम
    स्वाद में ये हरदम,खारा नहीं है.

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  22. हथेलियों ने
    सहला दिया था
    आँखों को
    और समेट लिए थे
    सारे मोती
    वापस आ गयी है
    आँखों में
    फिर से वो चमक
    जिसकी रोशनी में
    तुम नहाया करते थे|
    वाह ! कितना खूबसूरत अहसास !!!!

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