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बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर'

बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' 
Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोप्रबुद्ध पाठक गण आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालते हुए आइये आज चर्चा  करते हैं बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' जी की.....

बाबू जगन्नाथप्रसाद 'रत्नाकर' 

                                      जन्म  सं. 1923 ( सन 1866 ई.),  मृत्यु सं. 1989 ( सन 1932 ई.)

जीवनवृत -

बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' का जन्म संवत 1923 भाद्रपद शुक्ल पंचमी को काशी में हुआ. इनके पिता पुरुषोत्तमदास दिल्ली वाले अग्रवाल वैश्य थे और पूर्वज पानीपत के रहने वाले थे तथा उनका मुग़ल दरबारों में बड़ा सम्मान था. लेकिन परिस्थितिवश उन्हें काशी आकर रहना पड़ा. पुरुषोत्तम दास फारसी के अच्छे विद्वान थे और हिंदी फ़ारसी कवियों का बड़ा सम्मान करते थे. भारतेंदु हरिश्चंद्र उनके मित्र थे और इनके यहाँ बहुधा आया करते थे. रत्नाकर ने बाल्यावस्था में भारतेंदु का सत्संग भी किया था और उन्होंने  कहा भी था कि किसी दिन यह बालक हिंदी की शोभा वृद्धि करेगा.

रत्नाकर ने सन 1891 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की, जिसमे अंग्रेजी के साथ दूसरी भाषा फारसी भी थी. यह फ़ारसी में एम्.ए. की परीक्षा देना चाहते थे पर कुछ कारणों से न दे सके. इधर इसी बीच 'जकी' उपनाम से इन्होने फ़ारसी में कवितायें लिखना प्रारंभ किया और इस सम्बन्ध में इनके उस्ताद मुहम्मद हसन फायज थे.

रत्नाकर प्रारंभ में  अवागढ़ में खजाने के निरीक्षक  पद पर नियुक्त हुए पर जलवायु अनुकूल न होने से दो ही वर्षों में इन्होने नौकरी छोड़ दी और काशी चले  आये. . इसी बीच इन्होने हिंदी काव्य का अभ्यास प्रारंभ किया और ब्रजभाषा में काव्य रचना की. सन 1902 में यह अयोध्या नरेश के प्राईवेट सेक्रेटरी नियुक्त हुए और सन 1906 में महाराजा का स्वर्गवास हो गया, पर इनकी सेवाओं से प्रसन्न हो महारानी ने इन्हें अपना प्राईवेट सेक्रेटरी नियुक्त किया तथा मृत्युपर्यंत  रत्नाकर जी इस पद पर रहे.


कवित्व -

'रत्नाकर' जी का भावों का वैभव है. इनके काव्य-विषय विशुद्ध पौराणिक हैं. आपने इन कथानकों में नवीनता भर कर उन्हें नवीन रूप प्रदान किया. 'रत्नाकर' जी ने प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार के काव्य लिखे. रत्नाकर जी विशेषतया श्रृंगार के कवि हैं; परन्तु इनके श्रृंगार में न तो रीतिकाल की अफीमची मादकता है और न नायिका भेद की बारीकी ही. इनका श्रृंगार भक्ति-परक होकर मर्यादित रूप में सामने आया. विशुद्ध श्रृंगार में भी ह्रदय की अनुभूति पूर्ण भावनाओं ही का तीव्र वेग है.  कृष्ण-राधा के हृदय में स्वाभाविक प्रेम के उदय पर रत्नाकर जी कलम का एक दृष्टव्य -


आवन लगी है दिन द्वैक ते हमारे धाम,

रहे बिनु काम काज आई अरुझाई है.

कहैं रत्नाकर खिलौननी सम्हारि राखि,

बार-बार जननी चितावत कन्हाई है .

देखी सुनु ग्वारिनी किती ब्रजवासिन  पै,

राधा सी न और अभिहारिन लखाई है .

हेरत ही हेरत हरयौ तौ है हमारो कछु,

काहि धौं हिरानी पै न परत जनाई है .


विरह विरहिरिनों के हृदय को विदीर्ण कर देता है. विरह-विपत्ति का झेलना अत्यंत कठिन है. इसीकी अनुभूति पूर्ण अवस्था का एक उदाहरण देखिये -


पीर सों धीर धरावत वीर, कटाक्ष हूँ कुंतल सेल नहीं है

ज्वाल न याकी मिटे रत्नाकर, नेह कछू तिल तेल नहीं है

जानत अंग जो झेलत हैं, यह रंग गुलाल की झेल नहीं है.

थामे थमें न बहें अंसुवा, यह रोयबो है, हंसी-खेल नहीं है.

श्रृंगार के पश्चात 'रत्नाकर' जी के काव्य में वीर रस को प्रमुख स्थान मिला है. करुण रस की सुन्दर व्यंजना 'हरिश्चंद्र' में हुई है. इसके अतिरिक्त वीभत्स तथा वात्सल्य आदि रसों का यथास्थान सफलता से चित्रण हुआ है.

रत्नाकर जी को भावों के चित्रण में विशेष सफलता मिली है. क्रोध, हर्ष, उत्साह, शोक, प्रेम, घृणा आदि मानवीय व्यापारों की अभिव्यंजना रत्नाकर जी ने बड़ी सफलता से की है.

आधुनिक युग के होते हुए भी रत्नाकर जी ने भक्ति काल एवं रीति काल के आदर्शों को अपनाया. इनके काव्य में भक्ति कवियों के भाव की सी भावुकता, रसमग्नता तथा रीति कालीन कवियों जैसा शब्द-कौशल तथा चमत्कार प्रियता मिलती है. इनके काव्य पर आधुनिक युग के बुद्धिवाद का भी प्रभाव है. इनकी 'उद्धवशतक', गंगावतरण', हरिश्चंद्र' आदि रचनाये प्राचीन युग का उच्चादर्श उपस्थित करती हैं.


भाषा शैली -

रत्नाकर जी की काव्य भाषा नवीनता से परिपूर्ण है. इन्होने ब्रज भाषा को संयत और परिष्कृत रूप प्रदान किया है. ब्रज भाषा के अप्रचलित प्रयोगों को इन्होने सर्वथा छोड़ दिया. इस प्रकार ब्रजभाषा को खड़ी बोली के समान प्रतिष्ठित करने का इनका सराहनीय प्रयास रहा. इनकी शब्द योजना सर्वथा दोष मुक्त है. इनकी भाषा क्लिष्ट भावों की चेरी बन कर चलती है. इनकी भाषा में इतनी सरलता और स्वाभाविकता है कि भावों को समझने में कठिनाई नहीं पड़ती. इनकी भाषा में ओज और माधुर्य  गुण मिलता है. भाषा में कहीं भी शिथिलता नहीं है. अनुप्रास योजना भाषा को स्वाभाविकता प्रदान करती है.

रत्नाकर जी की कविता में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग खुल कर हुआ है परन्तु इससे इनकी भाषा में कृत्रिमता और शिथिलता नहीं आने पायी. साहित्यिक स्वरूप में घनानंद की भाषा ही रत्नाकर जी की भाषा की समता कर सकती है. रत्नाकर जी को आधुनिक ब्रजभाषा का पद्माकर कहा जा सकता है.

रत्नाकर जी ने जिस शैली को अपनाया उसमे मावीय व्यापारों को सफलतापूर्वक चित्रित किया गया है. इनकी शैली में सर्वत्र ही कलात्मकता और स्वाभाविकता मिलती है.


कृतियाँ  -

रत्नाकर जी ने हिंडोला, हरिश्चंद्र, कलकाशी, रत्नाश्क, वीराश्टक, धनाक्षरी, नियम रत्नाकर, गंगा लहरी, विष्णु लहरी, श्रृंगार लहरी, उद्धवशतक और गंगावतरण नामक ग्रन्थ रचे. 'समालोच्नादर्ष' इनका अनुदित ग्रन्थ है तथा 'बिहारी सतसई  ' की सबसे सुन्दर व् उत्कृष्ट टीका भी इन्होने 'बिहारी रत्नाकर' नामक लिखी. साथ ही बहुत अधिक परिश्रम और अपना बहुत सा धन व्यय कर यह 'सूरसागर' का सम्पादन भी कर रहे थे पर उसका केवल तीन चतुर्थांश ही पूर्ण कर सके. बहुत अधिक संख्या में इनकी स्फुट रचनाएं भी मिलती हैं और नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने इन स्फुट कविताओं व् उक्त सभी काव्यकृतियों का एक सुन्दर संग्रह 'रत्नाकर' नामक प्रकाशित किया है.

महत्त्व -

हिंदी साहित्य में 'रत्नाकर' जी एक निर्माता के रूप में स्मरण करने योग्य हैं. ये नवीन और प्राचीन को साथ लेकर चले हैं. इन्होने आधुनिक हिंदी साहित्य के तीनों काल देखे थे, पर किसी भी युग विशेष से प्रभावित नहीं हो सके. द्विवेदी युग में होने वाली खड़ी बोली के आन्दोलन ने इनको तनिक भी आकर्षित नहीं किया और ये ब्रज भाषा की उपासना - अराधना में लगे रहे. रत्नाकर जी हिंदी के स्वर्ण-युग (मध्य-युग) के पुजारी थे.  सं. 1989 में हरिद्वार में इनका देहावसान हो गया.