बुधवार, 17 अक्टूबर 2012
बाबू श्यामसुन्दर दास
बुधवार, 10 अक्टूबर 2012
श्री मैथिलीशरण गुप्त
प्रबुद्ध पाठक गण आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालते हुए आइये आज चर्चा करते हैं श्री मैथिलीशरण गुप्त जी की .....
अनामिका
श्री मैथिलीशरण गुप्त
जन्म सन 1886, मृत्यु सन 1964
जीवनवृत -
आधुनिक हिंदी कवियों में श्री मैथिलिशरण गुप्त जी को सर्वाधिक लोक-प्रियता प्राप्त हुई है. इनका जन्म चिरगाँव जिला झाँसी में सन 1886 में हुआ था और इनके पिता सेठ रामचरण धनी मानी वैश्य थे. यह कनकलता उप नाम से कविता किया करते थे और राम के विष्णुत्व में अटल आस्था रखते थे. गुप्त जी को कवित्व प्रतिभा और राम भक्ति पैतृक देन में मिली तथा यह बाल्यकाल में ही काव्य रचना करने लगे. पिता ने इनके एक छंद को पढ़ कर आशीर्वाद दिया कि 'तू आगे चलकर हमसे हजार गुनी अच्छी कविता करेगा' और यह आशीर्वाद अक्षरशः सत्य हुआ. चिरगांव में प्रारंभिक शिक्षा समाप्त करने के उपरान्त गुप्त जी झाँसी के मेकडॉनल हाईस्कूल में अंग्रेजी पढने के लिए भेजे गए पर वहां इनका मन न लगा और दो वर्ष पश्चात ही घर पर इनकी शिक्षा का प्रबंध किया लेकिन पढने की अपेक्षा इन्हें चकई फिराना और पतंग उड़ाना अधिक पसंद था. इन्हें आल्हा पढने में भी बहुत आनंद आता था. इसी बीच यह मुंशी अजमेरी के संपर्क में आये और उनके प्रभाव से इनकी काव्य-प्रतिभा को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ. अतः अब ये दोहे, छपप्यों में काव्य रचना करने लगे जो कलकत्ते में प्रकाशित होने वाले 'वैश्योपकारक' पत्र में प्रकाशित हुई. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जब झाँसी के रेलवे ऑफिस से चीफ कलर्क थे तब गुप्तजी अपने बड़े भाई के साथ उनसे मिलने गए और कालांतर में उन्हीं की छत्रछाया में मैथिलीशरण जी की काव्य प्रतिभा पल्लवित व् पुष्पित हुई. गुप्त जी द्विवेदी जी को अपना काव्य गुरु मानते थे और उन्हीं के बताये मार्ग पर चलते रहे तथा जीवन के अंत तक साहित्य साधना में रत रहे. इन्होने राष्ट्रीय आंदलनों में भी भाग लिया और जेल यात्रा भी की तथा विश्व-वंध्य बापू का यह अत्यंत सम्मान करते थे. यह हिंदी के प्रसिद्द राष्ट्रीय कवि कहे जाते हैं और सन 1936 इन्हें काकी में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया गया तथा इनकी साहित्य सेवाओं के उपलक्ष में आगरा व इलाहबाद विश्व-विद्यालय ने इन्हें डी. लिट. की उपाधि से विभूषित भी किया. साथ ही 'साकेत' महाकाव्य पर इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी प्राप्त हुआ और यह भारतीय संसद के मनोनीत सदस्य भी रहे.
काव्य सौन्दर्य -
गुप्त जी अपनी भाव रश्मियों से हिंदी साहित्य को प्रकाशित करने वाले युग कवि हैं. चालीस वर्ष तक निरंतर इनकी रचनाओं में युग स्वर गूंजता रहा. इन्होने गौरवपूर्ण अतीत को प्रस्तुत करने के साथ साथ भविष्य का भी भव्य रूप प्रस्तुत किया :
"मैं अतीत नहीं भविष्यत् भी हूँ आज तुम्हारा "
गुप्त जी मानवतावाद के पोषक और समर्थक थे. इनकी भगवत भावना महान थी. इनके काव्य में निर्गुण नारायण ही पृथ्वी को स्वर्ग बनाने के लिए भूतल पर आते हैं.
'भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया.
सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल ही को स्वर्ग बनाने आया.
गुप्त जी का काव्य मानस की प्रेरणा और प्रवृति का स्त्रोत है. वर्तमान युग का यह समन्वित रूप है. मानवीय चरित्र की जितनी भी संभावनाए संभव हैं, उस सबकी सृष्टि राम का चरित्र है.
अपने साहित्यिक गुरु पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से गुप्त जी ने 'भारत-भारती' की रचना की. 'भारत-भारती' के प्रकाशन से ही गुप्त जी प्रकाश में आये. उसी समय से आपको राष्ट्र कवि के नाम से अभिनंदित किया गया. गुप्त जी की साहित्य साधना सन 1921 से सन 1964 तक निरंतर आगे बढती रही.
गुप्त जी युग-प्रतिनिधि राष्ट्रीय कवि थे. इस अर्ध-शताब्दी की समस्त सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक हलचलों का प्रतिनिधित्व इनकी रचनाओं में मिल जाता है. इनके काव्य में राष्ट्र की वाणी मुखर हो उठी है. देश के समक्ष सबसे प्रमुख समस्या दासता से मुक्ति थी. गुप्त जी ने भारत-भारती तथा अपनी अन्य रचनाओं के माध्यम से इस दिशा में प्रेरणा प्रदान की. इन्होने अतीत गौरव का भाव जगाकर वर्तमान को सुधारने की प्रेरणा दी. गुप्त जी अपनी अभिलाषा अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं -
"मानव-भवन में आर्यजन, जिसकी उतारें आरती.
भगवान् भारतवर्ष में, गूंजे हमारी भारती. "
इस युग की प्रमुख समस्या हिन्दू मुसलामानों की एकता थी , गुप्त जी ने अपनी अनेक रचनाओं में दोनों की एकता पर बल दिया. 'काबा और कर्बला' में इन्होने मुसलामानों की सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयास किया है. इस प्रकार गुप्त जी ने समस्त समस्याओं का राष्ट्रीय दृष्टि से समाधान प्रस्तुत किया है.
भाषा शैली -
शैलियों के निर्वाचन में गुप्त जी ने विविधता दिखाई किन्तु प्रधानता प्रबंधात्मक इतिवृतमय शैली की है. गुप्त जी के अधिकांश काव्य इसी शैली में हैं - रंग में भंग, जयद्रथ वध, नहुष, सिद्धराज, त्रिपथक, साकेत आदि प्रबंध शैली में हैं. यह शैली दो प्रकार की है - खंड काव्यात्मक तथा महाकाव्यात्मक. साकेत महाकाव्य है तथा शेष सभी काव्य खंड काव्य के अंतर्गत आते हैं.
गुप्तजी की एक शैली विवरण शैली भी है. 'भारत-भरती' और 'हिन्दू' इस शैली में आते हैं.
तीसरी शैली गीत शैली है - इसमें गुप्तजी ने नाटकीय प्रणाली का अनुगमन किया है. 'अनघ' इसका उदाहरण है.
आत्मोदगार प्रणाली गुप्त जी की एक और शैली है जिसमे 'द्वापर की रचना की.
नाटक, गीत, प्रबंध, पद्य और गद्य सभी के मिश्रण एक मिश्रित शैली है जिसमे 'यशोधरा' की रचना हुई है.
इन सभी शैलियों में गुप्त जी को समान रूप से सफलता नहीं मिली. गुप्तजी की शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमे इनका व्यक्तित्व झलकता है. पूर्ण प्रवाह है. भावों की अभिव्यक्ति में सहायक होकर उपस्थित हुई हैं.
भाषा -
गुप्तजी की काव्य भाषा खड़ी बोली है, इस पर इन्हें पूर्ण अधिकार है. भावों को अभिव्यक्त करने के लिए गुप्तजी के पास अत्यंत व्यापक शब्दावली है.
गुप्तजी की प्रारंभिक रचनाओं की भाषा तत्सम है. इसमें साहित्यिक सौन्दर्य कला नहीं है. 'भारत-भरती' की भाषा में खड़ी बोली की खडखडाहट है, किन्तु गुप्तजी की भाषा क्रमशः विकास करती हुई सरस होती गयी.
संस्कृत के शब्द भण्डार से ही गुप्तजी ने अपनी भाषा की भण्डार भरा है. लेकिन प्रिय प्रवास की भाषा में संस्कृत बहुला नहीं होने पायी इसमें प्राकृत रूप सर्वथा उभरा हुआ है. भाव व्यंजना को स्पष्ट और प्रभावपूर्ण बनाने के लिए संस्कृत का सहारा लिया है.
संकृत के साथ गुप्तजी की भाषा पर प्रांतीयता का भी प्रभाव है. गुप्त जी का काव्य भाव तथा कला पक्ष दोनों की दृष्टि से सफल है.
इनके काव्य की विशेषताएं इस प्रकार उल्लेखित की जा सकती हैं -
१.राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता.
२. गौरवमय अतीत के इतिहास और भारती संस्कृति की महत्ता
३. पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता
४. नारी मात्र को विशेष महत्त्व
५. प्रबंध और मुक्तक दोनों में लेखन
६. शब्द शक्तियों तथा अलंकारों के सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग.
कृतियाँ -
गुप्त जी का रचनाकाल सं. 1964 से प्रारंभ होता है और इनकी पहली काव्यकृति 'रंग में भंग' सं. 1937 में प्रकाशित हुई. तब से अब तक इनकी 52 से अधिक काव्य रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे से कुछ अनुदित भी हैं. इन्होने 'मधुप' उपनाम से विरहणी ब्रजांगन, पलासी का युद्ध और मेघनाद वध नामक बंगला काव्य कृतियों का अनुवाद किया है तथा कुछ संस्कृत नाटकों के अनुवाद भी किये. इसी प्रकार 'रुबाइयात उमरखय्याम; भी उमर खयाम की रुबाइयों का हिंदी रूपान्तर है. इनकी उल्लेखनीय मौलिक रचनाओं की तालिका में - रंग में भंग, जयद्रथ वध, पद्य प्रबंध, भारत भरती, शकुंतला, तिलोत्तमा, चंद्रहास, पत्रावली, वैतालिका, किसान, अनघ, पंचवटी, स्वदेश संगीत, हिन्दू, विपथगा, शक्ति विकटभट, गुरुकुल, झंकार, साकेत, यशोधरा, सिद्धराज, द्वापर, मंगलघट, नहुष, कुणालगीत , काबा और कर्बला, प्रदक्षिणा, जयभारत, विष्णुप्रिया आदि आते हैं.
सन 1964 में गुप्त जी के स्वर्गवास से हिंदी साहित्य को जो महान क्षति पहुंची उसकी पूर्ती संभव नहीं है.
बुधवार, 3 अक्टूबर 2012
बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर'
बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर'
प्रबुद्ध पाठक गण आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालते हुए आइये आज चर्चा करते हैं बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' जी की.....
बाबू जगन्नाथप्रसाद 'रत्नाकर'
जन्म सं. 1923 ( सन 1866 ई.), मृत्यु सं. 1989 ( सन 1932 ई.)
जीवनवृत -
बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' का जन्म संवत 1923 भाद्रपद शुक्ल पंचमी को काशी में हुआ. इनके पिता पुरुषोत्तमदास दिल्ली वाले अग्रवाल वैश्य थे और पूर्वज पानीपत के रहने वाले थे तथा उनका मुग़ल दरबारों में बड़ा सम्मान था. लेकिन परिस्थितिवश उन्हें काशी आकर रहना पड़ा. पुरुषोत्तम दास फारसी के अच्छे विद्वान थे और हिंदी फ़ारसी कवियों का बड़ा सम्मान करते थे. भारतेंदु हरिश्चंद्र उनके मित्र थे और इनके यहाँ बहुधा आया करते थे. रत्नाकर ने बाल्यावस्था में भारतेंदु का सत्संग भी किया था और उन्होंने कहा भी था कि किसी दिन यह बालक हिंदी की शोभा वृद्धि करेगा.
रत्नाकर ने सन 1891 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की, जिसमे अंग्रेजी के साथ दूसरी भाषा फारसी भी थी. यह फ़ारसी में एम्.ए. की परीक्षा देना चाहते थे पर कुछ कारणों से न दे सके. इधर इसी बीच 'जकी' उपनाम से इन्होने फ़ारसी में कवितायें लिखना प्रारंभ किया और इस सम्बन्ध में इनके उस्ताद मुहम्मद हसन फायज थे.
रत्नाकर प्रारंभ में अवागढ़ में खजाने के निरीक्षक पद पर नियुक्त हुए पर जलवायु अनुकूल न होने से दो ही वर्षों में इन्होने नौकरी छोड़ दी और काशी चले आये. . इसी बीच इन्होने हिंदी काव्य का अभ्यास प्रारंभ किया और ब्रजभाषा में काव्य रचना की. सन 1902 में यह अयोध्या नरेश के प्राईवेट सेक्रेटरी नियुक्त हुए और सन 1906 में महाराजा का स्वर्गवास हो गया, पर इनकी सेवाओं से प्रसन्न हो महारानी ने इन्हें अपना प्राईवेट सेक्रेटरी नियुक्त किया तथा मृत्युपर्यंत रत्नाकर जी इस पद पर रहे.
कवित्व -
'रत्नाकर' जी का भावों का वैभव है. इनके काव्य-विषय विशुद्ध पौराणिक हैं. आपने इन कथानकों में नवीनता भर कर उन्हें नवीन रूप प्रदान किया. 'रत्नाकर' जी ने प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार के काव्य लिखे. रत्नाकर जी विशेषतया श्रृंगार के कवि हैं; परन्तु इनके श्रृंगार में न तो रीतिकाल की अफीमची मादकता है और न नायिका भेद की बारीकी ही. इनका श्रृंगार भक्ति-परक होकर मर्यादित रूप में सामने आया. विशुद्ध श्रृंगार में भी ह्रदय की अनुभूति पूर्ण भावनाओं ही का तीव्र वेग है. कृष्ण-राधा के हृदय में स्वाभाविक प्रेम के उदय पर रत्नाकर जी कलम का एक दृष्टव्य -
आवन लगी है दिन द्वैक ते हमारे धाम,
रहे बिनु काम काज आई अरुझाई है.
कहैं रत्नाकर खिलौननी सम्हारि राखि,
बार-बार जननी चितावत कन्हाई है .
देखी सुनु ग्वारिनी किती ब्रजवासिन पै,
राधा सी न और अभिहारिन लखाई है .
हेरत ही हेरत हरयौ तौ है हमारो कछु,
काहि धौं हिरानी पै न परत जनाई है .
विरह विरहिरिनों के हृदय को विदीर्ण कर देता है. विरह-विपत्ति का झेलना अत्यंत कठिन है. इसीकी अनुभूति पूर्ण अवस्था का एक उदाहरण देखिये -
पीर सों धीर धरावत वीर, कटाक्ष हूँ कुंतल सेल नहीं है
ज्वाल न याकी मिटे रत्नाकर, नेह कछू तिल तेल नहीं है
जानत अंग जो झेलत हैं, यह रंग गुलाल की झेल नहीं है.
थामे थमें न बहें अंसुवा, यह रोयबो है, हंसी-खेल नहीं है.
श्रृंगार के पश्चात 'रत्नाकर' जी के काव्य में वीर रस को प्रमुख स्थान मिला है. करुण रस की सुन्दर व्यंजना 'हरिश्चंद्र' में हुई है. इसके अतिरिक्त वीभत्स तथा वात्सल्य आदि रसों का यथास्थान सफलता से चित्रण हुआ है.
रत्नाकर जी को भावों के चित्रण में विशेष सफलता मिली है. क्रोध, हर्ष, उत्साह, शोक, प्रेम, घृणा आदि मानवीय व्यापारों की अभिव्यंजना रत्नाकर जी ने बड़ी सफलता से की है.
आधुनिक युग के होते हुए भी रत्नाकर जी ने भक्ति काल एवं रीति काल के आदर्शों को अपनाया. इनके काव्य में भक्ति कवियों के भाव की सी भावुकता, रसमग्नता तथा रीति कालीन कवियों जैसा शब्द-कौशल तथा चमत्कार प्रियता मिलती है. इनके काव्य पर आधुनिक युग के बुद्धिवाद का भी प्रभाव है. इनकी 'उद्धवशतक', गंगावतरण', हरिश्चंद्र' आदि रचनाये प्राचीन युग का उच्चादर्श उपस्थित करती हैं.
भाषा शैली -
रत्नाकर जी की काव्य भाषा नवीनता से परिपूर्ण है. इन्होने ब्रज भाषा को संयत और परिष्कृत रूप प्रदान किया है. ब्रज भाषा के अप्रचलित प्रयोगों को इन्होने सर्वथा छोड़ दिया. इस प्रकार ब्रजभाषा को खड़ी बोली के समान प्रतिष्ठित करने का इनका सराहनीय प्रयास रहा. इनकी शब्द योजना सर्वथा दोष मुक्त है. इनकी भाषा क्लिष्ट भावों की चेरी बन कर चलती है. इनकी भाषा में इतनी सरलता और स्वाभाविकता है कि भावों को समझने में कठिनाई नहीं पड़ती. इनकी भाषा में ओज और माधुर्य गुण मिलता है. भाषा में कहीं भी शिथिलता नहीं है. अनुप्रास योजना भाषा को स्वाभाविकता प्रदान करती है.
रत्नाकर जी की कविता में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग खुल कर हुआ है परन्तु इससे इनकी भाषा में कृत्रिमता और शिथिलता नहीं आने पायी. साहित्यिक स्वरूप में घनानंद की भाषा ही रत्नाकर जी की भाषा की समता कर सकती है. रत्नाकर जी को आधुनिक ब्रजभाषा का पद्माकर कहा जा सकता है.
रत्नाकर जी ने जिस शैली को अपनाया उसमे मावीय व्यापारों को सफलतापूर्वक चित्रित किया गया है. इनकी शैली में सर्वत्र ही कलात्मकता और स्वाभाविकता मिलती है.
कृतियाँ -
रत्नाकर जी ने हिंडोला, हरिश्चंद्र, कलकाशी, रत्नाश्टक, वीराश्टक, धनाक्षरी, नियम रत्नाकर, गंगा लहरी, विष्णु लहरी, श्रृंगार लहरी, उद्धवशतक और गंगावतरण नामक ग्रन्थ रचे. 'समालोच्नादर्ष' इनका अनुदित ग्रन्थ है तथा 'बिहारी सतसई ' की सबसे सुन्दर व् उत्कृष्ट टीका भी इन्होने 'बिहारी रत्नाकर' नामक लिखी. साथ ही बहुत अधिक परिश्रम और अपना बहुत सा धन व्यय कर यह 'सूरसागर' का सम्पादन भी कर रहे थे पर उसका केवल तीन चतुर्थांश ही पूर्ण कर सके. बहुत अधिक संख्या में इनकी स्फुट रचनाएं भी मिलती हैं और नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने इन स्फुट कविताओं व् उक्त सभी काव्यकृतियों का एक सुन्दर संग्रह 'रत्नाकर' नामक प्रकाशित किया है.
महत्त्व -
हिंदी साहित्य में 'रत्नाकर' जी एक निर्माता के रूप में स्मरण करने योग्य हैं. ये नवीन और प्राचीन को साथ लेकर चले हैं. इन्होने आधुनिक हिंदी साहित्य के तीनों काल देखे थे, पर किसी भी युग विशेष से प्रभावित नहीं हो सके. द्विवेदी युग में होने वाली खड़ी बोली के आन्दोलन ने इनको तनिक भी आकर्षित नहीं किया और ये ब्रज भाषा की उपासना - अराधना में लगे रहे. रत्नाकर जी हिंदी के स्वर्ण-युग (मध्य-युग) के पुजारी थे. सं. 1989 में हरिद्वार में इनका देहावसान हो गया.
बुधवार, 26 सितंबर 2012
आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर प्रणाम ! अगस्त माह से मैंने एक नयी शृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये आज चर्चा करते हैं आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी की ...
आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी
जन्म सं. 1921 ( सन 1864 ई.), मृत्यु सं. 1995 ( सन 1938 ई.)
परिचय
गद्य की विविध विधाओं में भारतेंदु युग के साहित्यकार सृजन करते रहे, किन्तु उनके स्वरुप गठन के लिए उनके पास अवकाश ही नहीं रहा. इस महत्वपूर्ण दायित्व की पूर्ती आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी ने की. श्री पदुमलाल बख्शी ने आचार्य द्विवेदी के लिए लिखा है -
यदि कोई मुझसे पूछे कि द्विवेदी जी ने क्या किया तो मैं उसे समग्र आधुनिक हिंदी साहित्य दिखलाकर कह सकता हूँ कि यह सब उन्हीं की सेवा का फल है. हिंदी साहित्य गगन में सूर्य, चंद्रमा और तारागणों का आभाव नहीं है. सूरदास, तुलसीदास, पद्माकर आदि कवि साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र हैं. परन्तु मेघ की तरह ज्ञान - राशि देकर साहित्य के उपवन को हरा-भरा करने वालों में द्विवेदी जी की ही गणना होगी.
जीवन वृत्त
आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी का जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली के दौलत पुर नामक ग्राम में बैशाख शुक्ल 4, सं. 1921 वि. में हुआ. इनके पिता का नाम पं. रामसहाय था. पं. महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी की शिक्षा उन्नाव में हुई और हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने पर यह तार का काम सीख कर जी.आर. पी. रेलवे में नौकरी करने लगे. द्विवेदी जी बड़े अध्यवसायी थे और यही कारण है कि बंगला काव्य की शास्त्रीय बातों का ज्ञान इन्हें बचपन में ही हो गया था. इन्हें पुस्तकें पढने की भी बहुत रूचि थी और यही कारण है कि तार का काम करते समय भी इन्होंने अपना पुस्तक-प्रेम नहीं त्यागा. नौकरी के दिनों में इन्होंने अपने कुछ आदर्श निश्चित कर लिए कि यह समय की पाबंदी करेंगे, रिश्वत नहीं लेंगे, अपना कार्य इमानदारी से करेंगे और ज्ञान वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहेंगे.
अपने इन्हीं आदर्शों के कारण यह रेलवे में पदोन्नति करते गए और जहाँ कि यह पचास रूपए प्रतिमाह के लिए नियुक्त हुए थे वहां दस -बारह वर्षों में इनका वेतन दुगना हो गया. इतने पर भी जब इन्हें रेलवे में अपने आत्म-सम्मान को धक्का लगता जान पड़ा तब इन्होने त्याग-पत्र दे दिया. कहा जाता है कि जब इनके ऑफिसर ने इन्हें कर्मचारियों सहित 8 बजे सुबह आने को कहा तो इन्होने स्पष्ट कह दिया कि " मैं आऊंगा पर औरों के आने को लाचार ना करूँगा.” इसी बात पर बात बढ़ जाने से इन्होने सरकारी नौकरी छोड़ दी और केवल तेईस रुपये प्रति माह पर सरस्वती पत्रिका के सम्पादन का भार संभाला. इस प्रकार सरस्वती की सेवा से जो भी मासिक आमदनी इन्हें होती उसी में यह संतुष्ट रहने लगे.
सरस्वती पत्रिका की सहायता से द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य की जो सेवा की है , वह अतुलनीय है . साहित्य क्षेत्र में प्रविष्ट होते ही इन्होने हिंदी भाषा को एक नवीन मोड़ प्रदान किया जिसके फलस्वरूप हिंदी साहित्य के इतिहास में द्विवेदी युग को प्रसिद्धि मिली. इन्होने भारतेंदु युग की भाषा को नवीन संस्कार प्रदान किये और लेखकों को उनकी त्रुटियों से अवगत कराया. फलस्वरूप भाषा में एक नया निखार आ गया और उसकी शुद्धता पर बल दिया जाने लगा. इस प्रकार हिंदी भाषा को परिष्कृत, परिमार्जित कर इन्होने एक नवीन युग की प्रति-स्थापना की तथा अनेक नवीन लेखकों व् कवियों को प्रोत्साहित कर साहित्य-सृजन के लिए प्रवृत किया.
भाषा शैली -
द्विवेदी जी को हिंदी गद्य का निर्माता कहा जाता है , क्योंकि इन्होने हिंदी गद्य में उस समय लिखना प्रारंभ किया जब हिंदी-भाषा व्याकरण की अराजकता से आक्रान्त थी. व्याकरण - विरोधी शब्दों और अव्यवस्थित वाक्यविन्यास का प्रयोग बेधड़क हो रहा था तथा भाषा की शुद्धता, प्रांजलता व् व्याकरण की मर्यादा का हिंदी लेखकों के सामने कोई आदर्श न था. द्विवेदी जी भाषा की शुद्धता और व्याकरण के नियमों को मर्यादा का आदर्श लेकर साहित्य जगत में अवतीर्ण हुए तथा इन्होने विरामादी चिन्हों के प्रयोग, शब्द विधान, वाक्य गठन में व्याकरण के नियमो का पूर्णतः ध्यान रखा. स्वयं अपने गद्य को प्रांजल, परिष्कृत और साहित्यिक रूप प्रदान कर हिंदी गद्य को भी उसी सांचे में ढाला.
साथ ही भाषा के सम्बन्ध में भी इनका दृष्टिकोण उदार और प्रगतिशील था. यह न तो संस्कृत बहुल भाषा के पक्षपाती थे और न उर्दू फ़ारसी व अप्रचलित शब्दों से बोझिल भाषा के. इन्होने भाव और विषय के अनुकूल ही भाषा लिखी है तथा उनका शब्द विधान प्रसंग की उपयुक्तता के अनुकूल होता था. इनके निबंधों में न तो गूढ़ अर्थों से युक्त वाक्यों की अधिकता है और न एक-एक वाक्य में अनेक विचारों को ही भर दिया गया है. इन्होने तो हमेशा छोटे छोटे वाक्यों द्वारा ही कोई बात कहनी चाही है और ऐसा जान पड़ता है मानो कोई अध्यापक बालकों को समझा-समझा कर पढ़ा रहा हो. अर्थात इनकी भाषा में व्यावहारिकता व सूक्ष्मता आदि गुण भी हैं.
सामान्यतः इनकी भाषा शैली में निम्न रूप दृष्टिगोचर होते हैं -
1. वर्णात्मक शैली
2. विचारात्मक शैली
3. व्यंग्यात्मक शैली
4. भावात्मक शैली
5. वक्तृतात्मक शैली
गद्य साधना
वस्तुतः द्विवेदी जी अपने युग की समस्त साहित्यिक प्रवृतियों के केंद्र थे, अतः हिंदी के बहुमुखी विकास के लिए इनकी साधना ने साहित्य के सभी उपकारों का उपयोग किया है. यह एक साथ कवि, आलोचक, निबंधकार , पत्रकार, साहित्य-परिष्कार-कर्ता और साहित्य शिक्षक के साथ-साथ कवि लेखक निर्माता भी थे. यों तो समीक्षकों ने द्विवेदी जी की साहित्य साधना का वास्तविक आधार इनकी पत्रकारिता को माना है और इसमें कोई संदेह नहीं कि पत्रकार के रूप में इन्होने हिंदी भाषा के प्रसार और उन्नयन में अभूतपूर्व कार्य किया है. सरस्वती के प्रथम अंक के साथ हिंदी में सच्ची पत्रकारिता का जन्म हुआ और द्विवेदी जी ने उस समय जबकि हिंदी पत्रों की कोई बूझ नहीं थी सरस्वती को जन-समाज के गले का हार बना दिया. इन्होने अनेक नवीन लेखकों को भी प्रकाश में लाया और रामचंद्र शुक्ल, कामताप्रसाद गुरु, विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक', पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मैथिलीशरण गुप्त तथा गोपालशरण सिंह आदि साहित्यकार सरस्वती के माध्यम से ही प्रसिद्द हुए.
कृतियाँ
आचार्य द्विवेदी जी सम्पादक होने के साथ साथ सुलेखक और कवि भी थे. संस्कृत, हिंदी, फ़ारसी, अंग्रेजी, बंगला, मराठी आदि भाषाओं के ज्ञाता होने के कारण इन्होने इन भाषाओँ के उपयोगी कृतियों का अनुवाद भी किया है. भामिनी विलास, अमृत लहरी, बेकन विचार रत्नावली शिक्षा, स्वाधीनता, जल चिकित्सा, हिंदी महाभारत, रघुवंश, वेणी-संहार, कुमार संभव, मेघदूत, किरातार्जुनीय प्राचीन पंडित और कवि तथा आख्यायिका सप्तक इनकी अनूदित कृतियाँ हैं. इसके अतिरिक्त इन्होने पचास से भी ऊपर मौलिक रचनाएं हिंदी साहित्य को भेंट में दी हैं, जिनमे से उल्लेखनीय यह हैं - नैषध चरित चर्चा, हिंदी कालिदास की समालोचना, वैज्ञानिक कोष, नाट्य-शास्त्र, विक्र्मांक देव्चारित चर्चा, हिंदी भाषा की उत्पत्ति संपत्ति शास्त्र, कौटिल्य कुठार, कालिदास की निरंकुशता, वनिता-विलास, रसज्ञ -रंजन, कालिदास और उनकी कविता, सुकवि-संकीर्तन, अतीत समृति, साहित्य सन्दर्भ, अलोप, महिला मोड़, साहित्यालाप, कोविद कीर्तन, दृश्य दर्शन, आलोचना जालित चरित-चित्रण, समालोचना समुच्चय, पुरातत्व प्रसंग, साहित्य सीकर, विचार-विमर्श, विज्ञानं वार्ता आदि.
महत्त्व -
द्विवेदी जी को युग निर्माता और युग प्रवर्तक होने का गौरव प्राप्त है. इनका युग हिंदी गद्य के परिष्कार का युग है. इसके लिए जिस निष्ठा, धैर्य एवं रूचि की आवश्यकता थी, हिंदी साहित्य की अराजकतापूर्ण अवस्था में इन्होने सरस्वती के माध्यम से व्यवस्था और संयम की सृष्टि की.
डा. रामचंद्र तिवारी के शब्दों में -
"चाहे यह गंभीर आलोचना न कर सकें हों, चाहे इनके निबंध 'बातों के संग्रह मात्र हों .' चाहे इनकी नीतिकता के रसात्मकता की सहायता को सिकता में बदल दिया हो, किन्तु यह स्वीकार करना होगा कि इन्होने हिंदी गद्य को मर्यादा दी, हिंदी भाषा को परिमार्जित किया और नवीन प्रयोगों को हिंदी साहित्य में संभव बनाया. इस दृष्टि से ये युग प्रवर्तक हैं.
द्विवेदी जी का देहांत सं. 1995 सन 1938 ई. में हो गया.
बुधवार, 19 सितंबर 2012
बाबू बालमुकुन्द गुप्त
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर प्रणाम ! अगस्त माह से मैंने एक नयी शृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये आज चर्चा करते हैं श्री बालमुकुन्द गुप्त जी की ...
श्री बालमुकुन्द गुप्त
जन्म सं. 1922 ( सन 1805 ई.), मृत्यु सं. 1964 ( सन 1894 ई.)
परिचय
बाबू बालमुकुन्द गुप्त भारतेंदु युग और द्विवेदी युग को जोड़ने वाली कड़ी हैं. इनके निबंधों में यदि एक ओर भारतेंदु युग का राष्ट्र-प्रेम, जन जागरण और सामाजिक नव निर्माण की लालसा मुखरित हुई है तो दूसरी ओर द्विवेदी युगीन भाषा सौष्ठव भी विद्यमान है. इस प्रकार भारतेंदु युगीन आत्मा और द्विवेदी युगीन कलेवर को धारण कर इनके निबंध पार्दुभूर्त हुए हैं. इनकी प्रतिभा बहुमुखी थी. ये हिंदी के प्रमुख निबंधकार, पत्रकार, आलोचक तथा कवि थे. हिंदी गद्य के उन्नायकों में इनका गौरवशाली स्थान है.
जीवन वृत्त
श्री बालमुकुन्द गुप्त जी का जन्म सं. 1922 वि. में पंजाब के रोहतक जिले के गुरयानी नामक गाँव में हुआ. गुप्त जी के पिता का नाम लाला पूरनमल था और माता अत्यंत धर्मशील महिला थी तथा सत्संग आदि में विशेष रूचि रखती थीं, अतः गुप्त जी में भी अपने धर्म के प्रति बड़ी आस्था थी. इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण पाठशाला में ही हुई पर पांचवीं कक्षा में उत्तीर्ण होते ही इनकी पढाई रुक गयी, क्योंकि इसी वर्ष इनके पिता और पितामह की मृत्यु हो गयी. इन्होने घर पर ही उर्दू और फ़ारसी का अध्ययन किया तथा कुछ समय उपरान्त दिल्ली के एक हाई स्कूल से मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की.
इन्होने प्रारंभ में उर्दू में लिखना आरम्भ किया और 22 वर्ष की आयु में मिर्जापुर से निकलने वाले उर्दू अखबार 'अखबारे-चुनर' का सम्पादन-भार संभाला तथा कुछ समय बाद लाहौर से निकलने वाले 'कोहेनूर' नामक पत्र के सम्पादक बनाये गए. पं. मदनमोहन मालवीय और पं. प्रतापनारायण मिश्र की प्रेरणा से यह हिंदी की ओर अग्रसर हुए और हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया. यह अपने समय के सर्वाधिक अनुभवी संपादक थे और इन्होने हिन्दुस्तान, बंगवासी, भारत मित्र आदि पत्रों में कार्य किया. भारत मित्र के तो यह संपादक ही नहीं सर्वेसर्वा थे और इस पत्र द्वारा इन्होने आठ वर्षों से अधिक हिंदी की सेवा की.
गद्य साधना
गुप्तजी एक सफल संपादक और पत्रकार के साथ साथ उत्कृष्ट निबंध लेखक भी थे और बालमुकुन्द निबंधावली तथा शिवशम्भू का चिटठा इनके निबंध संग्रह ही हैं. गुप्तजी ने राजनैतिक या सामाजिक समस्याओं पर निबंध लिखा हैं पर विचारात्मक और वर्णात्मक निबंधों की अपेक्षा भावात्मक और कथात्मक निबंधों की संख्या ही अधिक है. 'शिवशम्भू का चिटठा' के निबंध कथात्मक ही हैं और उन पर गुप्त जी की भावात्मकता की भी अनूठी छाप है. इनके विचारों में गंभीरता, दुरूहता और उलझन की अपेक्षा भावावेग की अधिक मात्र है तथा हास-परिहास व् व्यंग्य विनोद का भी प्रसंगानुकूल समावेश है. इसी प्रकार इन्होने तत्कालीन भाषा शैली और साहित्यिक कृतियों के सम्बन्ध में साहित्यिक निबंध भी लिखे हैं तथा अंग्रेजी शासन की व्यंग्यात्मक आलोचना भी की है. इन्होने आत्माराम नाम से भी आलोचनाएँ प्रस्तुत की हैं और इनके विचारों का जनता में अच्छा स्वागत हुआ है.
भाषा शैली
गुप्तजी एक नूतन भाषा शैली के प्रवर्तक थे और इनकी भाषा सर्वथा व्याकरणनुमोदित रही है. भारतेंदु युग में जो भाषा की अव्यवस्था, अनेकरूपता, अव्यावहारिकता व शिथिलता दीख पड़ती है और विराम चिन्हों का अशुद्ध प्रयोग मिलता है उन सबसे गुप्तजी की भाषा बिलकुल अछूती है. चूंकि वह उर्दू से हिंदी में दीख पड़ती है और इनकी भाषा में जाफरानी, मौल, ख्याली, तरक्की, करम, अमल, लिबास दिल्लगी, कलम, फरियाद, तबियत, तुल-अरज, आवाज आदि उर्दू, फ़ारसी शब्दों के साथ साथ अभ्रस्पर्शी, अनंत, नवजात आदि संस्कृत के तत्सम शब्द भी दृष्टिगोचर होते हैं. इन्होने मुहावरों का भी सफल प्रयोग किया है और भाषा में प्रवाह इनका प्रधान लक्ष्य था.
गुप्तजी की शैली में सामान्यतः तीन रूप दीख पड़ते हैं -
- आलोचनात्मक शैली
- व्यंग्यात्मक शैली
- परिचयात्मक शैली
कृतियाँ
गुप्त जी के मौलिक ग्रंथों में स्फुट कविता, शिव शम्भू का चिटठा, हिंदी भाषा, चिट्ठे और ख़त, खिलौना, खेल तथा तमाशा तथा सर्पाघात चिकित्सा का उल्लेखनीय स्थान है. इनके निबंधों का एक संग्रह 'बालमुकुन्द गुप्त निबंधावली' नाम से प्रकाशित भी हो चुका है. इसके अतिरिक्त माडेल-भागिनी, हरिदास, रत्नावली नाटिका आदि इनकी अनूदित कृतियाँ हैं.
बाबू बालमुकुन्द गुप्त जी का हिंदी गद्य के उन्नायकों में एक विशिष्ट स्थान है. हिंदी साहित्य करण में भारतेंदु जी के अस्त होने और महावीर प्रसाद द्विवेदी के उदय होने के मध्य की संक्रमण बेला में ये शुक्र तारे की भाँती चमके और सर्वत्र अपना आलोक विकीर्ण किया. हिंदी के साहित्यिक इतिहास में गुप्त जी सदा स्मरणीय रहेंगे. हिंदी को प्रवाहमयी और सर्वरूप बनाने की दिशा में इनके योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. गुप्त जी की मृत्यु सं. 1964 ( सन 1894 ई.) में हुई.
बुधवार, 12 सितंबर 2012
पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर प्रणाम ! अगस्त माह से मैंने एक नयी शृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये आज चर्चा करते हैं पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' जी की ...
पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
जन्म सं. 1922 ( सन 1865 ई.), मृत्यु सं. 2004 ( सन 1947 ई.)
जीवन वृत्त
पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का जन्म बैशाख कृष्ण तृतीया संवत 1922 में हुआ. इनके पिता का नाम पं. भोलासिंह उपाध्याय और माता का नाम रुक्मणि देवी था. यद्यपि इनके पूर्वज बदायूं के रहने वाले थे परन्तु लगभग अढाई तीन सौ वर्षों में आजमगढ़ के समीप तमसा नदी के किनारे निजामाबाद कसबे में आ बसे थे. उपाध्याय जी पर पिता से अधिक चाचा ब्रह्म सिंह का जो कि ज्योतिष के बड़े विद्वान थे प्रभाव पड़ा और उन्ही की देख-रेख में इनकी शिक्षा भी आरम्भ हुई. पांच वर्ष की अवस्था में उन्होंने इनका विद्यारम्भ प्रारम्भ किया और घर पर छोटी छोटी पुस्तकें पढ़ते रहे. सात वर्ष की अवस्था में वह निजामाबाद के मिडिल स्कूल में भरती किये गए जहाँ से सं. 1936 में इन्होने मिडिल वर्नाक्युलर की परीक्षा उत्तीर्ण की. इसके उपरान्त यह बनारस के क्वींस कालेज में प्रविष्ट हुए परन्तु स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण यह आगे न पढ़ सके और घर पर ही संस्कृत, फ़ारसी, उर्दू, गुरुमुखी व पिंगल का अध्ययन करते रहे. सं. 1939 में इनका विवाह अनंतकुमारी देवी के साथ हुआ और सं. 1941 में यह निजामाबाद के तहसील स्कूल में अध्यापक नियुक्त हुए. निजामाबाद में यह बाबा सुमेरसिंह से विशेष प्रभावित हुए और 'हरिऔध' उपनाम इसी बीच रखा गया. सं. 1946 में इन्होने कानूनगो की परीक्षा उत्तीर्ण की और कानूनगो का स्थायी पद प्राप्त किया, जिसमे यह निरंतर उन्नति करते रहे. 1 नवम्बर सन 1923 में पेंशन लेकर हिंदी काशी विश्व विद्यालय में अवैतनिक अध्यापक का काम करते रहे और निरंतर हिंदी साहित्य की सेवा में रत रहे. हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी बनाये गए और 'प्रियप्रवास' पर इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया तथा सम्मेलन की 'साहित्य वाचस्पति' उपाधि से भी विभूषित किये गए.
भाषा शैली -
हरिऔध जी का भाषा पर व्यापक अधिकार है. इन्होने ब्रज और खड़ी बोली दोनों भाषाओँ में समानाधिकार से रचनाएं की हैं. ये जैसी सफलता से संस्कृतमयी भाषा में अभिव्यक्ति करते हैं; उतनी ही सफलता से बोल-चल की मुहावरेदार हिंदी में भी रचनाएं करते हैं.
हरिऔध जी की ब्रज भाषा में सरलता, प्रांजलता, सरसता आदि गुण मिलते हैं. इनकी रचनाओं में ना तो क्लिष्टता है और न ही शब्दों की तोड़-मरोड़ ही है.
खड़ी बोली हिंदी में हरिऔध जी के 'प्रियप्रवास', 'वैदेही-बनवास' और 'चोखे चौपदे' प्रमुख ग्रन्थ हैं. 'प्रियप्रवास' और 'वैदेही-बनवास' की भाषा संस्कृत निष्ठ है. कहीं पर तो यदि हिंदी क्रियाओं को निकाल दिया जाय तो भाषा हिंदी के स्थान पर विशुद्ध संस्कृत ही बन जाती है.
काव्य की विशेषताएं -
काव्यधारा - हरिऔध जी की काव्यधारा युग की परम्पराओं और मान्यताओं की सच्चाई को साथ लेकर प्रवाहित हुई है. इसमें बुद्धिवादी युग का नपा जीवन-दर्शन मानवीय दृष्टिकोण और प्रगतिशील विचारधारा का समन्वय हुआ है. 'रस कलश', 'प्रियप्रवास' और वैदेही बनवास' में पुरानी कथा वस्तु इन्होने आधुनिक बुद्धिवादी जीवन दर्शन की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत की है.
विविधता - इनके काव्य में विषयवस्तु, भाषा और शैली की दृष्टि से विविधता मिलती है. शैली की दृष्टि से इन्होने मुक्तक और प्रबंध दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे हैं. शुद्ध साहित्यिक और संस्कृत तत्समता प्रधान भाषा में रचनाएँ की हैं.
ब्रज भाषा - हरिऔध जी की काव्य साधना का प्रारंभ ब्रज भाषा से होता है तो इन्होने प्रारंभ में श्री कृष्ण की भक्ति सम्बन्धी रचनाएं लिखीं. 'रस-कलश' ब्रजभाषा में इनकी प्रौढ़तम रचना है. यह रीति ग्रन्थ है. इसमें अलंकार और नायिका भेद आदि का निरूपण है. नायिका वर्णन के साथ इनका ऋतू वर्णन भी बहुत सुन्दर है. प्रेमाकर्षण का आधार शारीरिक सौन्दर्य मात्र न होकर मानसिक सौन्दर्य और उदात्त विचार है.
खड़ी बोली - आगे चलकर हरिऔध जी का मोह ब्रजभाषा में नहीं रहा और खड़ी बोली की ओर आ गए. पहले इन्होने बोलचाल की खड़ी बोली में उर्दू छंदों को अपनाया. इसके पश्चात पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से संस्कृत वर्ण वृतों और संस्कृत की समस्त पदावली में महाकाव्य 'प्रिय-प्रवास' की रचना की. 'प्रिय-प्रवास' में इन्होने प्रकृति चित्रण बड़े विस्तार से किया है. 'वैदेही-बनवास' में प्रकृति का संश्लिष्ठ चित्रण अधिक मिलता है.
रस योजना - हरिऔध जी के काव्य में मुख्य रूप से श्रृंगार और वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है. 'रस-कलश' में श्रृंगार रस का विस्तार से विवेचन हुआ है. इसमें संयोग श्रृंगार के बड़े ही सुन्दर चित्र मिलते हैं. इनमे वासना की गंध नहीं है. एक गोपी कहती है -
"मन्द मन्द समंद की सी चालन सों,
ग्वालन लै लालन हमारी गली आइये ! "
इनकी रचनाओं में करुण विप्रलंब बहुत ही गहरा है. ब्रज बालाओं के वियोग में विप्रलंब करुण है, वहाँ माता यशोदा का वात्सल्य अकुलाहट और टीस में करुणा की सीमा में पहुँच गया है.
छंद योजना -
हरिऔध जी के काव्य में अनेकों छंदों का प्रयोग मिलता है. इनके काव्य में ग्रामीण छंद जैसे चुभते चौपदे और चौखे चौपदे हैं. रीतिकाल छंदों में कवित्त-सवैया छंद, मात्रिक छंद अर्थात वैदेही बनवास में प्राचीन और नवीन छंदों पर समान अधिकार मिलता है. और प्रिय प्रवास में संस्कृत के वर्णवृत छंद मिलते हैं.
अलंकार योजना - इन्होने शब्दालंकारों और अर्थालंकारों का सफल प्रयोग किया है. यमक, शलेश, अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, प्रतीप, व्यतिरेक, विभावना आदि हरिऔध जी के प्रिय अलंकार हैं. इनकी नजर में अलंकारो का आश्रय कल्पना की उड़ान नहीं थी बल्कि सर्वत्र इसका सीधा साधा प्रयोग करना था. एक रूपक का उदाहरण देखिये -
"ऊधो मेरा हृदय तल था एक उद्यान न्यारा !
शोभा देती अमित उसमे कल्पना क्यारियाँ थीं !
प्यारे प्यारे कुसुम कितने भाव के थे अनेकों !
उसके विपुल विटपी मुग्धकारी महा थे".
कृतियाँ
हरिऔध जी प्रतिभा बहुमुखी थे और इन्होने कविता, उपन्यास, नाटक, निबंध व् समालोचना सभी क्षेत्रों में अत्यधिक कार्य किया.
काव्य - प्रियप्रवास, वैदेही बनवास, रस-कलश, पद्य-प्रसून, चोखे-चौपदे, चुभते चौपदे, बोलचाल, प्रेमाम्बु-प्रश्रवन, प्रेमाम्बु वारिधि, प्रेमाम्बु प्रवाह, प्रेम-पुष्पोहार, प्रेम-प्रपंच, कल्पलता, पारिजात औत सतसई आदि.
उपन्यास - अनुवाद - वेनिस का बांका, रिपवान विकल,
मौलिक - ठेठ हिंदी का ठाठ, अधखिला फूल
नाटक - रुक्मिणी परिणय और प्रद्युम्न विजय व्यायोग !
समालोचनात्मक - हिंदी भाषा और साहित्य का विकास, कबीर वचनावली की भूमिका, साहित्य सन्दर्भ !
सं. 2004 (सन 1947 ई.) में यह चमकता सितारा हमारे साहित्य की सेवा करते करते विलुप्त हो गया.
बुधवार, 5 सितंबर 2012
प्रताप नारायण मिश्र
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर नमस्कार ! अगस्त माह से मैंने एक नयी श्रृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये भारतेन्दु हरिशचंद्र जी, श्री बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी, श्री नाथूराम शर्मा 'शंकर' , श्रीधर पाठक जी की और पं. बालकृष्ण भट्ट जी की चर्चा के बाद आज चर्चा करते हैं पं. प्रताप नारायण मिश्र जी की ...
प्रताप नारायण मिश्र
जन्म सं. 1913 ( सन 1856 ई.), मृत्यु सं. 1951 ( सन 1894 ई.)
परिचय
हिंदी - साहित्य के उन्नायकों की पंक्ति में पं. प्रतापनारायण मिश्र जी का विशिष्ट स्थान है, ये भारतेंदु युग के देदीप्यमान विभूति थे. मिश्र जी ने कवि, निबंधकार और नाटककार आदि अनेक रूपों में हिंदी साहित्य की सेवा की है. ब्राह्मण पत्र का इन्होने अनेक वर्षों तक सफल सम्पादन किया है. इनके निबंधों के निष्कपट विचार हृदय से निःस्तृत होने के कारण पाठकों के हृदय में सीधे प्रविष्ट हो जाते हैं. यही इनके निबंधकार रूप की सबसे बड़ी सफलता है.
जीवन वृत्त
पं. प्रतापनारायण मिश्र जी का जन्म उन्नाव जिले के बैजे गाँव में संवत 1913 वि. (सन 1856 ई. ) को हुआ था. इनके पिता पं. संकटा प्रसाद मिश्र ज्योतिष के प्रसिद्द विद्वान थे और 14 वर्ष की अवस्था में कानपुर आकर बस गए थे. उनकी अभिलाषा अपने पुत्र को ज्योतिर्विंद बनाने की थी पर मिश्र जी की रूचि उस ओर न थी अतः इन्हें अंग्रेजी पाठशाला में पढने भेज दिया. मिश्र जी का मन पाठशाला में नहीं लगता था और पिता की मृत्यु हो जाने से इनका पढना एकदम रुक गया. इन्होने घर पर ही हिंदी, उर्दू, संस्कृत और फ़ारसी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया.
मिश्र जी बचपन से ही भावुक थे और कविता से इन्हें प्रेम था. इनके बाल कवि हृदय पर भारतेंदु जी की 'कवि-वचन-सुधा' नामक पत्रिका की काव्य रचनाओं का अत्यधिक प्रभाव पड़ा. इसी प्रकार इन्हें लावनियों में भी बड़ा रस मिलता था और कानपुर के तत्कालीन प्रसिद्द कवि पं. लालिता प्रसाद शुक्ल 'ललित' से छंदशास्त्र के नियम सीख कर इन्होने काव्य रचना भी प्रारंभ की. यह समाचार पत्र प्रेमी भी थे और अपने मित्रों की सहायता से इन्होने ब्राह्मण नामक मासिक पत्र भी प्रकाशित किया. इस पत्र के बंद होने पर यह कालाकांकर से प्रकाशित होने वाले 'हिंदी हिन्दोस्तान' के सहकारी संपादक भी नियुक्त हुए लेकिन इस पद पर यह अधिक दिनों तक कार्य ना कर सके.
यह अपने समय के उत्साही हिंदी साहित्य-सेवी थे और हिंदी, हिंदी-हिन्दोस्तान के प्रबल समर्थक थे. भारतेंदु जी पर इनकी विशेष श्रद्धा थी और देशभक्ति का इनके हृदय में अत्यंत ऊंचा स्थान था. गोरक्षा के यह बड़े पक्षपाती थे और फक्कडपन, अक्खडपन व् मनमौजीपन इनके स्वभाव की मूल विशेषताएं थीं. आत्मश्लाधा और आत्मसम्मान की मात्रा अधिक होते हुए भी इनमे आत्मीयता भी थी.
गद्य साधना
मिश्र जी की प्रतिभा का विकास कई दिशाओं में हुआ है और इन्होने उपन्यास, निबंध, नाटक, कविता आदि विविध क्षेत्रों में इसे अपनाया है. इन्होने अनेक प्रकार के निबंध लिखे जिनके शीर्षक देखने मात्र से ही यह प्रतीत हो जाता है कि मिश्र जी सभी प्रकार के सामान्य व् गंभीर विषयों पर लिख सकते थे. भौं, दांत, नाक, पेट, आप, बात, दान, वृद्ध, अपव्यय, जुवा, छत, स्वार्थ, विश्वास, भलमंसी, नास्तिक , शिवमूर्ति, सोने का डंडा, मनोयोग मन, चिंता, टेढ़ जानी संका सब काहू, होली है अथवा होरी है आदि शीर्षक हमारे कथन के प्रमाण हैं. किसी भी विषय पर लिखते समय मिश्र जी मूल विषय के साथ पाठक में धर्म, इतिहास, समाज, साहित्य, राजनीति और सामयिक परिस्थितियों के प्रति सजगता भी उत्पन्न कर देते थे.
भाषा शैली
मिश्र जी जनसुलभ भाषा के पक्षपाती थे, अतः इनकी भाषा में अनेकरूपता, अस्थिरता, ग्रामीणता और स्खलन आदि त्रुटियाँ भी दीख पड़ती हैं, परन्तु आत्मीयता, सशक्तता, रोचकता, चुलबुलापन आदि गुण भी हैं. कहावतों और मुहावरों के तो यह धनि थे. अपनी भाषा शैली में मिश्र जी ने सामान्यतः दो शैलियों को अपनाया.
व्यंग्यात्मक शैली
विचारात्मक शैली
कृतियाँ
मिश्र जी ने कई पुस्तकें लिखी तथा कई का हिंदी में अनुवाद भी किया है. इनकी उल्लेखनीय कृतियों की तालिका इस प्रकार हैं.
मौलिक - कलिप्रभाव, हठी हमीर, गोसंकट, कलिकौतुक, भारत दुर्दशा और जुआरी खुआरी रूपक व प्रहसन. निबंध नवनीत और काव्य कानन में आलोचनाएँ हैं. प्रताप-लहरी कविता संग्रह है तथा वर्णमाला, शिशुज्ञान और स्वास्थ्य रक्षा मौलिक ग्रन्थ हैं.
अनुदित - राजसिंह, इंदिरा, राधारानी, युगालान्गुरीय, चरिताश्टक, पंचामृत, नीति रत्नावली, कथा-माला, संगीत शाकुंतल, वर्ण परिचय सेन वंश और सूबे बंगाल का भूगोल.
मिश्र जी का निधन सं. 1951 (सन १1894 ई. ) वि. में हुआ. इनके असामयिक निधन से क्षुब्ध होकर बाबु बाल मुकुंद गुप्त जी ने लिखा था -
"हिंदी साहित्य के आकाश में हरिश्चंद्र के उदय होने के थोड़े ही दिन पश्चात ऐसा चमकता हुआ तारा उदय हुआ था जिसकी चमक दमक को देखकर लोग इसे दूसरा चन्द्र कहने लगे थे. उस चन्द्र के अस्त हो जाने के बाद प्रान तारे के ज्योति और भी बढ़ी. बड़े हर्ष के साथ कितनों ही के मुख से यह ध्वनि निकलने लगी, यही उस चन्द्र की जगह लेगा". पर दुख की बात है की वैसा होने से पहले ही कुछ दिनों बाद यह उज्जवल नक्षत्र भी अस्त हो गया जिसका नाम प्रतापनारायण मिश्र था.
बुधवार, 29 अगस्त 2012
पं. बालकृष्ण भट्ट
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर नमस्कार ! अगस्त माह से मैंने एक नयी श्रृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये भारतेन्दु हरिशचंद्र जी, श्री बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी और श्री नाथूराम शर्मा 'शंकर' , श्रीधर पाठक जी की चर्चा के बाद आज चर्चा करते हैं पं. बालकृष्ण भट्ट जी की ...
पं. बालकृष्ण भट्ट
जन्म सं. 1901 (1885 ई.), मृत्यु 1916 ई.
परिचय
भारतेंदु युगीन निबंधकारों में पं. बालकृष्ण भट्ट का एक विशिष्ट स्थान है. निबंधकार, पत्रकार, कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार, शैलीकार एवं आलोचक आदि वीविध रूपों में आपने हिंदी साहित्य की विविध रूपों में सेवा की. लगभग बत्तीस वर्षों तक 'हिंदी प्रदीप' का संपादन कर आप अपने विचारों का व्यक्तिकरण करते रहे. भट्ट जी भारतेंदु युग की देदीप्यमान मौन विभूति होने के साथ साथ द्विवेदी युग के लेखकों के मार्ग-दर्शक और प्रेरणा स्त्रोत भी रहे.
जीवन वृत्त
भट्टजी का जन्म प्रयाग में सं. 1901 (सन 1885 ई. ) में हुआ था. इनके पिता का नाम पं. वेनिप्रसाद था और शिक्षा की ओर इन्हें विशेष रूचि थी तथा इनकी पत्नी भी विदुषी थीं. अतः भट्टजी की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया. प्रारंभ में इन्हें घर पर संस्कृत की शिक्षा दी गयी और 15-16 वर्ष की अवस्था तक इनका यही क्रम रहा. इसके उपरान्त इन्होने माता के आदेशानुसार स्थानीय मिशन के स्कूल में अंग्रेजी पढना प्रारंभ किया और दसवीं कक्षा तक अध्ययन किया. विद्यार्थी जीवन में इन्हें बाईबिल परीक्षा में कई बार पुरस्कार भी प्राप्त हुए. मिशन स्कूल छोड़ने के उपरान्त यह पुनः संस्कृत, व्याकरण और साहित्य का अध्ययन करने लगे.
कुछ समय के लिए यह जमुना मिशन स्कूल में संस्कृत के अध्यापक भी रहे, पर अपने धार्मिक विचारों के कारण इन्हें पद त्याग करना पड़ा. विवाह हो जाने पर जब इन्हें अपनी बेकारी खलने लगी तव यह व्यापार करने की इच्छा से कलकत्ते भी गए, परन्तु वहां से शीघ्र ही लौट आये और संस्कृत साहित्य के अध्ययन तथा हिंदी साहित्य की सेवा में जुट गए. यह स्वतंत्र रूप से लेख लिखकर हिंदी साप्ताहिक और मासिक पत्रों में भेजने लगे तथा कई वर्ष तक प्रयाग में संस्कृत के अध्यापक रहे.
यह प्रयाग से 'हिंदी प्रदीप' मासिक पत्र का निरंतर घाटा सहकर 32 वर्ष तक उसका सम्पादन करते रहे. हिंदी प्रदीप बंद होने के बाद हिंदी शब्दसागर का संपादन का काम भी इन्होने कुछ समय तक देखा पर अस्वस्थता के कारण इन्हें यह कार्य छोड़ना पड़ा. सं. 1971 में प्रयाग में इनका स्वर्गवास हो गया. प्रयाग का भारती भवन पुस्तकालय इन्होने ही स्थापित किया है और वह इनकी पुण्य स्मृति का स्तम्भ है.
महत्वपूर्ण स्थान
हिंदी के निबंधकारों में पं. बालकृष्ण भट्ट का महत्वपूर्ण स्थान है. निबंधों के प्रारंभिक युग को हम निःसंकोच भाव से भट्ट युग के नाम से अभिहित कर सकते हैं. व्यंग्य विनोद संपन्न शीर्षकों और लेखों द्वारा एक ओर तो ये प्रताप नारायण मिश्र के पास बैठे हैं और गंभीर विवेचन एवं विचारात्मक निबंधों के लिए आचार्य शुक्ल के पास. यह अपने युग के न केवल सर्वश्रेष्ठ निबंधकार थे अपितु इन्हें सम्पूर्ण हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी का निबंध लेखक माना जाता है. इन्होने साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक, नैतिक और सामयिक आदि सभी विषयों पर विचार व्यक्त किये हैं. इन्होने तीन सौ से अधिक निबंध लिखे हैं. इनके निबंधों का कलेवर अत्यंत संक्षिप्त है तथा तीन प्रष्टों में ही समाप्त हो जाते हैं. इन्होने मूलतः विचारात्मक निबंध ही लिखे हैं और इन विचारात्मक निबंधों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है -
व्यवहारिक जीवन से सम्बंधित
साहित्यिक विषयों से समबन्धित
सामयिक विषयों से सम्बंधित
हृदय की वृतियों पर आधारित
भाषा शैली
भट्टजी का झुकाव संस्कृतनिष्ठ भाषा की ओर अधिक था पर परिस्थिति व् आवश्यकतानुसार अरबी, फ़ारसी के औलाद, मुहब्बत, नालिश, दुरुस्त, ऐयाशी, आमदनी, कसरत, पैदाइश और बेकदर तथा अंग्रेजी के फिलासफी, कैरेक्टर, सोसाइटी, स्पीच, नेशनेलिटी, स्टेंडर्ड, पुलपिट, नेचुरल, गिफ्ट, मोरेल आदि शब्द इनकी भाषा में मिलते हैं. कहीं कहीं तो निबंधों के शीर्षक अंग्रेजी में दिए गए हैं जैसे - Are the nation and individual two different things. इसी प्रकार ब्रिज भाषा के शब्दों की भी कमी नहीं है और विभक्तियों व् क्रियाओं को बहुलता से प्रयोग किया गया है.
कृतियाँ
भट्ट जी भारतेंदु युग के देन थे और भारतेंदु मंडली के प्रधान सदस्य थे. संवत 1934 में प्रयाग में इन्होने हिंदी प्रवर्द्धिनी नामक सभा की स्थापना कर हिंदी प्रदीप प्रकाशित करते रहे. इसी पत्र में इनके अनेक निबंध दृष्टिगोचर होते हैं और हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयोग में इनके कुछ निबंधों का संग्रह निबंधावली नाम से प्रकाशित भी करवाया. नूतन ब्रहमचारी और सौ अजान एक सुजान इनके उपन्यास हैं तथा साहित्य सुमन निबंध संग्रह हैं - शिक्षा, दान, प्रभावती, शर्मिष्ठा, दमयंती, स्वयंवर, कलिराज की सभा, रेल का विकट खेल, बाल विवाह आदि इनकी नाट्य-कृतियाँ हैं. हिंदी प्रदीप में इनके अनेक उत्कृष्ट सशक्त व्यंग्य , गहन अर्थ और अभिव्यंजना शक्ति के साथ मुहावरों व् कहावतों का भी प्रचुर प्रयोग है. भट्टजी अपने समय के उत्कृष्ट शैलीकार भी थे और व्यास व् समास दोनों प्रकार की शैलियों को इन्होने कुशलतापूर्वक अपनाया है. इनकी शैली को चार रूपों में बांटा जा सकता है.
1. विचारात्मक शैली
2. वर्णात्मक शैली
3. भावात्मक शैली
4. व्यंग्यात्मक शैली
सन 1916 ई. में इनकी मृत्यु हो गयी.
गुरुवार, 23 अगस्त 2012
श्रीधर पाठक
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर नमस्कार ! अगस्त माह से मैंने एक नयी श्रृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये भारतेन्दु हरिशचंद्र जी, श्री बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी और श्री नाथूराम शर्मा 'शंकर' जी की चर्चा के बाद आज चर्चा करते हैं श्रीधर पाठक जी की
श्रीधर पाठक
जन्म 1859 ई., मृत्यु 1928 ई.
जीवन वृत्त
इनका जन्म आगरा जिले के जोंधरी गाँव में हुआ था. हिंदी के अतिरिक्त इन्होने अंग्रेजी, फ़ारसी और संस्कृत का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त किया. आजीविका के लिए पाठक जी ने कलकत्ता में सरकारी नौकरी की . नौकरी के प्रसंग में ही इन्हें काश्मीर और नैनीताल भी जाना पड़ा, जहाँ इन्हें प्रकृति के निरीक्षण का अच्छा अवसर मिला. नौकरी के पश्चात ये प्रयाग में आकर रहने लगे. इन्होने बृजभाषा और खड़ी बोली दोनों में अच्छी कविता की हैं. इनकी बृजभाषा सहज और निराडम्बर है - परंपरागत रूढ़ शब्दावली का प्रयोग इन्होने प्रायः नहीं किया है.खड़ी बोली में काव्य रचना कर इन्होने गद्य और पद्य की भाषाओं में एकता स्थापित करने का एतिहासिक कार्य किया. खड़ी बोली के ये प्रथम समर्थ कवि भी कहे जा सकते हैं. यद्यपि इनकी खड़ी बोली में कहीं कहीं बृजभाषा के क्रियापद भी प्रयुक्त हैं, किन्तु यह क्रम महत्वपूर्ण नहीं है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा 'सरस्वती' का सम्पादन संभालने से पूर्व ही इन्होने खड़ी बोली में कविता लिखकर अपनी स्वच्छन्द वृति का परिचय दिया. देश-प्रेम, समाज सुधार तथा प्रकृति - चित्रण इनकी कविता के मुख्य विषय हैं. इन्होने बड़े मनोयोग से देश का गौरव गान किया है, किन्तु देश भक्ति के साथ इनमे भारतेंदु कालीन कवियों के समान राजभक्ति भी मिलती है. एक ओर इन्होने ' भारतोत्थान' ; 'भारत प्रशंसा' आदि देशभक्ति पूर्ण कवितायें लिखी हैं तो दूसरी ओर 'जार्ज वन्दना' जैसी कविताओं में राजभक्ति का भी प्रदर्शन किया है. समाज सुधार की ओर भी इनकी दृष्टि बराबर रही है. 'बाल विधवा' में इन्होने विधवाओं की व्यथा का कारुणिक वर्णन किया है. परन्तु इनको सर्वाधिक सफलता प्रकृति चित्रण में प्राप्त हुई है. तत्कालीन कवियों में इन्होने सबसे अधिक मात्रा में प्रकृति चित्रण किया है. परिणाम की दृष्टि से ही नहीं, गुण की दृष्टि से भी वह सर्वश्रेष्ठ हैं. इन्होने रूढी का परित्याग कर प्रकृति का स्वतंत्र रूप में मनोहारी चित्रण किया है. इन्होने अंग्रेजी तथा संस्कृत की पुस्तकों के पद्यानुवाद भी किये. मातृभाषा की उन्नति की भी ये कामना करते हैं. इनके शब्दों में -
निज भाषा बोलहु लिखहु पढ़हू गुनहु सब लोग !
करहु सकल वषयन विषैं निज भाषा उपजोग !!
पाठक जी कुशल अनुवादक थे - कालिदास कृत 'ऋतुसंहार' और गोल्डस्मिथ-कृत 'हरमिट', 'टेजटेंड विलेज' तथा 'प ट्रैवलर' का ये बहुत पहले ही 'एकांतवासी योग', ऊजड ग्राम और श्रांत पथिक शीर्षक से काव्यानुवाद कर चुके थे.
इनकी मौलिक कृतियों में 'वनाश्टक' 'काश्मीर सुषमा' (1904), 'देहरादून'(1915), 'भारत गीत'(1928), 'गोपिका गीत' , 'मनोविनोद' , 'जगत सच्चाई- सार' विशेषतः उल्लेखनीय हैं.
पाठक जी की काव्यशैली के उदाहरण स्वरुप एक अवतरण देखिये -
चारु हिमाचल आँचल में एक साल बिसालन कौ बन है !
मृदु मर्मर शीत झरैं जल-स्त्रोत है पर्वत -ओट है निर्जन है !!
लिपटे हैं लता द्रुम, गान में लीन प्रवीन विहंगन कौ बन है !
भटक्यों तहां रावरौं भूल्यौं फिरै, मद बावरौ सौ अलि को मन है !!
लीजिये उनकी प्रमुख कृतियों में से एक कृति
भारत गीत
जय जय प्यारा, जग से न्यारा
शोभित सारा, देश हमारा.
जगत मुकुट, जगदीश दुलारा
जन सौभाग्य सुदेश,
जय जय प्यारा, देश हमारा.
प्यारा देश, जय देशेश
अजय अशेष, सदय विशेष
जहाँ न संभव अघ का लेश
केवल पुन्य प्रवेश
जय जय प्यारा, देश हमारा.
स्वर्गिक शीश फूल पृथ्वी का
प्रेम मूल, प्रिय लोकत्रयी का.
सुललित प्रकृति -नटी का टीका
ज्यों निशि का राकेश !
जय जय प्यारा, देश हमारा.
जय जय शुभ्र हिमाचल शृंगा
कलरव निरत कलोलिनी गंगा
भानुप्रताप चमत्कृत अंगा
तेज पुंज तपदेश
जय जय प्यारा, भारत देश .
जग में कोटि कोटि जुग जीवे
जीवन सुलभ अमी रस पीवे,
सुखद वितान सुकृत का सीवे,
रहे स्वतंत्र हमेश !
जय जय प्यारा, भारत देश !!
********
गुरुवार, 16 अगस्त 2012
श्री नाथूराम शर्मा शंकर
आदरणीय गुणी जनों को अनामिका का सादर नमस्कार ! अगस्त माह से मैंने एक नयी श्रृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्द कवियों और लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक और मील का पत्थर का स्थान ग्रहण करेगी.
लीजिये भारतेन्दु हरिशचंद्र जी और श्री बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी की चर्चा के बाद आज चर्चा करते हैं श्री नाथू राम शर्मा शंकर जी की
श्री नाथूराम शर्मा शंकर
जन्म सन 1859 ., मृत्यु 1932 ई.
जीवन वृत्त
पंडित नाथूराम शर्मा शंकर ( 1859-1932) का जन्म संवत् 1916 में हरदुआगंज, जिला अलीगढ में हुआ था. ये अपना उपनाम 'शंकर' रखते थे. आरम्भ से ही शंकर जी बड़े साहित्यानुरागी थे .ये हिंदी, उर्दू, फ़ारसी तथा संस्कृत भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे और पद्यरचना में अत्यंत सिद्ध हस्त थे. तेरह वर्ष की छोटी आयु में ही इन्होने अपने एक साथी पर एक दोहा रचा था. कानपूर में ये भारतेंदु -मंडल के प्रसिद्द कवि प्रतापनारायण मिश्र के संपर्क में आये तथा 'ब्राह्मण' में इनकी कवितायें छपने लगीं और उस समय के कवि समाजों में बराबर कविता पढने लगे थे। . समस्यापूर्ति ये बड़ी ही सटीक और सुंदर करते थे जिनसे इनका चारों ओर पदक, पगड़ी, दुशाले आदि से सत्कार होता था। बाद में इन्होने आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित 'सरस्वती' के मुख्य कवियों में स्थान पाया.
भाषा शैली
प्रारंभ में ये बृजभाषा के कवि थे, किन्तु शीघ्र ही ये खड़ी बोली की ओर झुक गए थे. ये उर्दू में भी अच्छी कविता लिखते थे. ये प्रायः अतिशयोक्तिपूर्ण कविता लिखते थे. इनकी अतिशयोक्तियाँ आकाश-पाताल को एक कर देनेवाली हैं .
अतिश्योक्ति पूर्ण कविता का एक नमूना -
शंकर नदी नाद नदीसन के नीरन की ,
भाप बन अम्बर तें ऊँची चढ़ जाएगी.
दोनों ध्रुव छोरन लौं पल में पिघल कर,
घूम घूम धरनी धुरी सी बढ़ जाएगी !!
काव्य-सौन्दर्य
शंकर जी पर आर्यसमाज तथा तत्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलनों का गहरा प्रभाव पड़ा. देश-प्रेम, स्वदेशी-प्रयोग, समाज सुधार, हिंदी अनुराग तथा विधवाओं और अछूतों का दारुड दुख इनके कविता के प्रमुख विषय हैं. सामाजिक कुरीतियों, आडम्बरों, अंधविश्वासों, बाल-विवाह आदि पर इन्होने बड़े तीखे व्यंग्य किये हैं. रीतिकालीन पद्धति पर इन्होने कुछ श्रृंगार मयी रचनाएं भी की. राजा रवि वर्मा के चित्रों के आधार पर भी शंकर जी ने सुन्दर कवितायें लिखीं. ये समस्यापूर्ति में बड़े कुशल थे. तत्कालीन कवि-समाजों और सम्मेलनों में इनकी धूम थी तथा ये 'कविता-कामिनी-कान्त' , 'भारतेंदु-प्रज्ञेन्दु', 'साहित्य-सुधाकर' आदि उपाधियों से विभूषित किये गए. छंद शास्त्र के ये बड़े मर्मज्ञ विद्वान थे. इनके काव्य में सभी प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है. छंदों के सुंदर नपे तुले विधान के साथ ही उनकी उद्भावनाएँ भी बड़ी अनूठी होती थीं। वियोग का यह वर्णन पढ़िए ,
झारेंगे अंगारे ये तरनि तारे तारापति
जारैंगे खमंडल में आग मढ़ जाएगी।
काहू बिधि विधि की बनावट बचैगी नाहिं
जो पै वा वियोगिनी की आह कढ़ जाएगी
खड़ी बोली का प्रचार होने पर वे उसमें बहुत अच्छी रचना करने लगे। इनकी पदावली कुछ उद्दंडता लिए होती थी। इसका कारण यह है कि उनका संबंध आर्यसमाज से रहा जिसमें अंधाविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के उग्र विरोध की प्रवृत्ति बहुत दिनों तक जागृत रही। उसकी अंतर्वत्ति का आभास इनकी रचनाओं में दिखाई पड़ता है। 'गर्भरंडा रहस्य' नामक एक बड़ा प्रबंधकाव्य उन्होंने विधवाओं की बुरी परिस्थिति और देवमंदिरों के अनाचार आदि दिखाने के उद्देश्य से लिखा था। उसका एक पद्य देखिए ,
फैल गया हुड़दंग होलिका की हलचल में।
फूल फूल कर फाग फला महिला मंडलमें
जननी भी तज लाज बनी ब्रजमक्खी सबकी।
पर मैं पिंड छुड़ाय जवनिका में जा दबकी
फबतियाँ और फटकार इनकी कविताओं की एक विशेषता है। फैशन वालों पर कही हुई 'ईश गिरिजा को छोड़ि ईशु गिरिजा में जाय' वाली प्रसिद्ध फबती इन्हीं की है। पर जहाँ इनकी चित्तवृत्ति दूसरे प्रकार की रही है, वहाँ की उक्तियाँ बड़ी मनोहर भाषा में है। यह कवित्त ही लीजिए ,
तेज न रहेगा तेजधारियों का नाम को भी,
मंगल मयंक मंद मंद पड़ जायँगे।
मीन बिन मारे मर जायँगे सरोवर में,
डूब डूब 'शंकर' सरोज सड़ जायँगे
चौंक चौंक चारों ओर चौकड़ी भरेंगे मृग,
खंजन खिलाड़ियों के पंख झड़ जायँगे।
बोलो इन अंखियों की होड़ करने को अब,
विस्व से अड़ीले उपमान अड़ जायँगे
कृतियाँ
'अनुरागरत्न', 'शंकर-सरोज', 'गर्भरंडा रहस्य' तथा 'शंकर सर्वस्व' (१९५१) इनके प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं. 'कवि व चित्रकार', 'काव्यसुधाकर', 'रसिक मित्र' आदि पत्रों में उनकी अनूठी पूर्तियाँ हैं.
संवत् 1989 में इनकी मृत्यु हो गयी.
गुरुवार, 9 अगस्त 2012
आचार्य बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
आदरणीय पाठक वृन्द को अनामिका का सादर प्रणाम ! पिछले वृहष्पतिवार से हमने आधुनिक काल से नयी श्रृंखला का आरम्भ करते हुए भारतेन्दु हरिशचंद्र जी की चर्चा की थी. भारतेंदु जी के बाद दूसरा नाम आता है श्री बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी का. आइये आज इनके साहित्यिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं.
आचार्य बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
जन्म सन 1855 ई., मृत्यु 1923 ई.
"प्रेमधन" जी पं. गुरुचरणलाल उपाध्याय के ज्येष्ठ पुत्र थे । इनका जन्म भाद्र कृष्ण षष्ठी, संवत् 1912 को उत्तर प्रदेश के जिला मिर्जापुर के दात्तापुर नामक ग्राम के एक संपन्न ब्राह्मण कुल में हुआ था. इनकी माता ने इन्हें हिंदी अक्षरों का ज्ञान कराया। फारसी की शिक्षा का आरंभ भी घर पर करा दिया गया। अंग्रेजी शिक्षा के लिए इन्हें गोंडा (अवध)भेजा गया.
इनके पिता पं. गुरुचरणलाल उपाध्याय जी विद्याव्यसनी थे। उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और फारसी के साथ ही साथ संस्कृत की शिक्षा की व्यवस्था की तथा पं. रामानंद पाठक को अभिभावक शिक्षक नियुक्त किया। पाठक जी काव्यमर्मी एवं रसज्ञ थे। इनके साहचर्य से कविता में रुचि हुई। इन्हीं के उत्साह और प्रेरणा से प्रेमघन जी पद्यरचना करने लगे। संपन्नता और यौवन के संधिकाल में प्रेमघन जी का झुकाव संगीत की ओर हुआ और ताल, लय, राग, रागिनी का परिज्ञान हो गया विशेषत: इसलिए कि ये रसिक व्यक्ति थे और रागरंग में अपने को लिप्त कर सके थे। संवत् 1928 में कलकत्ते से अस्वस्थ होकर आए और लंबी बीमारी में फँस गए। इसी बीमारी के दौरान में प्रेमघन जी की पं. इंद्र नारायण सांगलू से मैत्री हुई। सांगलू जी शायरी करते थे और अपने मित्रों को शायरी करने के लिए प्रेरित भी करते। इस संगत से नज़्मों और गजलों की ओर रुचि हुई। उर्दू फारसी का इन्हें गहरा ज्ञान था ही। अस्तु, इन रचनाओं के लिए "अब्र" (तखल्लुस) उपनाम रखकर गजल, नज्म, और शेरों की रचना करने लगे। सांगलू के माध्यम से प्रेमघन जी का भारतेंदु बाबू, हरिश्चंद्रजी से मैत्री का सूत्रपात हुआ। धीरे धीरे यह मैत्री इतनी प्रगाढ़ हुई कि भारतेंदु जी के रंग में प्रेमघन जी पूर्णतया पग गए, यहाँ तक कि रचनाशक्ति, जीवनपद्धति और वेशभूषा से भी भारतेंदु जीवन अपना लिया। भारतेंदु-मंडल के कवियों में प्रेमघन जी का प्रमुख स्थान है .
वि. सं. 1930 में प्रेमधन जी ने "सद्धर्म सभा" तथा 1931 वि. सं. "रसिक समाज" की मीरजापुर में स्थापना की। संवत् 1933 वि. में "कवि-वचन-सुधा" प्रकाशित हुई जिसमें इनकी कृतियों का प्रकाशन होता। उसका स्मरण चौधरी जी की मीरजापुर की कोठी का धूलिधूसरित नृत्यकक्ष आज भी कराता है। अपने प्रकाशनों की सुविधा के लिए इसी कोठी में आनंदकादंबिनी मुद्रणालय खोला गया। संवत् 1938 में "आनंदकादंबिनी" नामक मासिक पत्रिका की प्रथम माला प्रकाशित हुई। संवत् 1949 में नागरी नीरद नामक साप्ताहिक का संपादन और प्रकाशन आरंभ किया। प्रेमधन जी के साथ आचार्य रामचंद्र शुक्ल का पारिवारिक-सा संबंध था। शुक्ल जी शहर के रमईपट्टी मुहल्ले में रहते थे और लंडन मिशन स्कूल में ड्राइंग मास्टर थे। आनंद कादंबिनी प्रेस में छपाई भी देख लेते थे।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी इनके बारे में बताते हुए लिखते हैं - 16 वर्ष की अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते तो समवयस्क हिन्दी-प्रेमियों की एक खासी मंडली मुझे मिल गई।चौधरी साहब से तो अब अच्छी तरह परिचय हो गया था। हम लोग इन्हें एक पुरानी चीज समझा करते थे। इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का एक अद्भुत मिश्रण रहता था। यहां पर यह कह देना आवश्यक है कि चौधरी साहब एक खासे हिन्दुस्तानी रईस थे। बसन्त पंचमी, होली इत्यादि अवसरों पर इनके यहां खूब नाच रंग और उत्सव हुआ करते थे। इनकी हर एक अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी। कन्धों तक बाल लटक रहे है। आप इधर से उधर टहल रहे है। एक छोटा-सा लड़का पान की तश्तरी लिये पीछे-पीछे लगा हुआ है। बात की काट-छांट का क्या कहना है! जो बातें इनके मुंह से निकलती थीं, उनमें एक विलक्षण वक्रता रहती थी। इनकी बात-चीत का ढंग इनके लेखों के ढंग से एकदम निराला होता था। नौकरों तक के साथ इनका 'संवाद' सुनने-लायक होता था। अगर किसी नौकर के हाथ से कभी कोई गिलास वगैरह गिरा, तो इनके मुंह से यही निकलता कि 'कारे बचा त नाहीं।' इनके प्रश्नों के पहले 'क्यों साहब' अक्सर लगा रहता था।
प्रेमघन जी लोगों को प्राय: बनाया करते थे, इससे इनसे मिलने वाले लोग भी इन्हें बनाने की फिक्र में रहा करते थे। मिर्जापुर में पुरानी परिपाटी के एक बहुत ही प्रतिभाशाली कवि रहते थे, जिनका नाम था- वामनाचार्य गिरि। एक दिन वे सड़क पर चौधरी साहब के ऊपर एक कवित्त जोड़ते चले जा रहे थे। अंतिम चरण रह गया था कि चौधरी साहब अपने बमारमदे में कंधों पर बाल छिटकाये खंभे के सहारे खड़े दिखाई पड़े। चट कवित्त पूरा हो गया और वामनजी ने नीचे से वह कवित्त ललकारा, जिसका अंतिम अंश था- 'खम्भा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाते की।'-
प्रेमधन जी आधुनिक हिंदी के आविर्भाव काल में उत्पन्न हुए थे। इनके अनेक समसामयिक थे जिन्होंने हिंदी को हिंदी का रूप देने में संपूर्ण योगदान किया। इनमें प्रमुख प्रतापनारायण मिश्र, पंडित अम्बिकादत्त व्यास, पं. सुधाकर द्विवेदी, पं. गोविन्द नारायण मिश्र, पं. बालकृष्ण भट्ट, ठाकुर जगमोहन सिंह, बाबू राधा कृष्णदास, पं. किशोरीलाल गोस्वामी तथा रामकृष्ण वर्मा थे.
प्रेमघनजी की रचनाओं का क्रमश: तीन खंडों में विभाजन किया जाता है : -
1. प्रबंध काव्य
2. संगीत काव्य
3. स्फुट निबंध।
ये कवि ही नहीं उच्च कोटि के गद्यलेखक और नाटककार भी थे। गद्य में निबंध, आलोचना, नाटक, प्रहसन, लिखकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा का बड़ी पटुता से निर्वाह किया है। आपकी गद्य रचनाओं में हास परिहास का पुटपाक होता था। कथोपकथन शैली का आपके "दिल्ली दरबर में मित्रमंडली के यार में देहलवी उर्दू का फारसी शब्दों से संयुक्त चुस्त मुहावरेदार भाषा का अच्छा नमूना है। गद्य में खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग (संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्द) आलंकारिक योजना के साथ प्रयुक्त हुआ। प्रेमघन जी की गद्यशैली की समीक्षा से यह स्पष्ट हो जाता है कि खड़ी बोली गद्य के वे प्रथम आचार्य थे। समालोच्य पुस्तक के विषयों का अच्छी तरह विवेचन करके उसके विस्तृत निरूपण की चाल इन्होने चलाई (रामचंद्र शुक्ल)।
लालित्य लहरी के वन्दना सम्बन्धी दोहों और बृजचंद पंचक में इनकी भक्ति भावना व्यक्त हुई है, तो इनकी श्रृंगारिक कवितायें भी रसिकता संपन्न हैं. इनका मुख्य क्षेत्र जातीयता, समाज दशा और देश प्रेम की अभिव्यक्ति है. देश की दुरावस्था के कारणों और देशोन्नति के उपायों का जितना वर्णन इन्होने किया है, उतना भारतेंदु जी की कविताओं में भी नहीं मिलता. इस सन्दर्भ में नयी से नयी घटना को ये कविता का विषय बना लेते थे. उदाहरण स्वरुप पार्लियामेंट के सदस्य दादाभाई नौरोजी को जब विलायत में 'काला' कहा गया, तब इन्होने इस पर यह क्षोभ पूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त की -
अचरज होत तुमहूँ सम गोरे बाजत कारे;
तासों कारे 'कारे' शब्दहू पर हैं वारे !
कारे कृष्ण, राम, जलधर जल-बरसावन वारे
कारे लागत ताहीं सों कारण कौ प्यारे
याते नीको है तुम 'कारे' जाहू पुकारे,
यहै असीस देत तुमको मिलि हम सब कारे -
सफल होहिं मन के सब ही सकल्प तुम्हारे.
इन्होने कई नाटक लिखे हैं जिनमें "भारत सौभाग्य" 1888 में कांग्रेस महाधिवेशन के अवसर पर खेले जाने के लिए लिखा गया था।
प्रेमघनजी का काव्यक्षेत्र विस्तृत था। ये ब्रजभाषा को कविता की भाषा मानते थ। प्रेमघन ने जिस प्रकार खड़ी बोली का परिमार्जन किया इनके काव्य से स्पष्ट है। "बेसुरी तान" शीर्षक लेख में आपने भारतेंदु की आलोचना करने में भी चूक न की। प्रेमघन कृतियों का संकलन इनके पौत्र दिनेशनारायण उपाध्याय ने किया है जिसका "प्रेमघन सर्वस्व" नाम से हिंदी साहित्य सम्मेलन ने दो भागों में प्रकाशन किया है। प्रेमघन हिंदी साहित्य सम्मेलन के तृतीय कलकत्ता अधिवेशन के सभापति (सं. 1912) मनोनीत हुए थे।
कृतियाँ
'जीर्ण जनपद', 'आनंद अरुणोदय', 'हार्दिक हर्षादर्श', 'मयंक-महिमा', 'अलौकिक लीला', 'वर्षा-बिंदु' , भारत सौभाग्य, प्रयाग रामागमन, संगीत सुधासरोवर, भारत भाग्योदय काव्य।आदि इनकी प्रसिद्द काव्य कृतियाँ हैं.
गद्य पद्य के अलावा आपने लोकगीतात्मक कजली, होली, चैता आदि की रचना भी की है जो ठेठ भावप्रवण मीरजापुरी भाषा के अच्छे नमूने हैं और संभवत: आज तक बेजोड़ भी। कजली कादंबिनी में कजलियों का संग्रह है। प्रेमघन जी का स्मरण हिंदी साहित्य के प्रथम उत्थान का स्मरण है।
68 वर्ष की अवस्था में फाल्गुन शुक्ल 14, संवत् 1978 को आपकी इहलीला समाप्त हो गई।