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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

ग़रीबी के हज़ार चेहरे हैं , लेकिन पहचाने कौन !

ग़रीबी के हज़ार चेहरे हैं , लेकिन पहचाने कौन !

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

दरभंगा. बिहार का एक महत्वपूर्ण शहर. रेलवे के लिहाज़ से देश के बड़े शहरो के बराबर क्योंकि बहुत राजस्व देता है. एतिहासिक शहर भी है. लेकिन इतिहास को जबतक इतिहासकार, सरकार और समाचार पत्र नहीं मिलता इतिहास मिटटी में दबा रहता है. गुमनाम रहता है. देश में बहुत कम ही ऐसे शहर होंगे जहाँ एक साथ इतने सारे शैक्षणिक संस्थान हो. दरभंगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, मेडिकल कालेज, महिला इंजीनियरिंग कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, पोलेटेक्निक, दो दो एमबीए संस्थान के अतिरित्क्त कई और निजी संस्थान हैं. अब तो देश भर से लोग पढ़ने आते हैं. यहाँ का विश्वविद्यालय परिसर देश के किसी भी विश्वविद्यालय परिसर के समकक्ष है.

दरभंगा महाराज ने अपना किला विश्वविद्यालय को दे दिया था. यूरोपियन स्थापत्य कला का नमूना है यह परिसर. कभी घूमने की नज़र से कोई आये तो यह परिसर निराश नहीं करेगा आपको. पूरे परिसर में आम के बगीचे हैं, नारियल के बड़े बड़े वृक्ष हैं. पूरे परिसर में धूप कम ही लगेगी. पूरे परिसर में नहर  का जाल सा है, जो बिना रखरखाव के भी पानी से भरा रहता है. इन दिनों मखाने से पटे हैं ये नहर.

जय श्यामा माईदो मंदिर भी हैं इस परिसर में . एक मनोकामना मंदिर. कहते हैं इस मंदिर में मनोकामना रखने पर हनुमान जी मन की बात पूरी कर देते हैं. छोटा सा खूबसूरत मंदिर है. ना जाने कितने आई ए एस अफसर, आई पी एस, बैंक मैनेज़र आदि आदि बने हैं अपनी मेहनत और आस्था के समन्वय से. मंगलवार को अच्छी भीड़ होती हैं यहाँ. लड़कियां भी चुपके चुपके लाल धागा बाँध जाती हैं मंदिर में उगे पीपल से. दूसरा मंदिर श्यामा माई का मंदिर है. भगवती दुर्गा का मंदिर है यह. शारदीय दुर्गा पूजा एवं चैत्री दुर्गापूजा में मेला सा लगता है. छोटा सा स्टेडियम भी है इस परिसर में जहाँ दरभगा महाराज कभी पोलो खेला करते थे. यूरोपियन गेस्ट हाउस में महाराज के विदेशी मित्र रहते थे. आज इसमें विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन है.

विश्वविद्यालय का मुख्य आकर्षण नरगौना पैलेस है जो कभी महारानी का निवास था. तीस बीघे में फैला यह पैलेस चारो ओर से एक सा दिखता है. चारो ओर एक जैसे प्रवेश द्वार, तालाब और आम के बगीचे थे. ठाणे में जब रेलगाड़ी कि शुरुआत हुई थी, उसके कुछ ही साल के बाद दरभंगा महाराज के इस किले को भी रेल से जोड़ा गया था और पूर्व में कलकत्ता के बाद सबसे पहले रेल दरभंगा ही पहुची थी. लेकिन रेलवे के पहुचने से गरीबी दूर हो जाये यह गारंटी नहीं है. दरभंगा और इसके आसपास का इलाका इस बात का गवाह वर्षों से है.

बिहार को पूरब से जोड़ने के रास्ते में समस्तीपुर भी एक महत्वपूर्ण जक्शन है. पहले समस्तीपुर और दरभंगा के बीच केवल पैसेंज़र गाड़िया चलती थी. लेकिन अब तीन तरह कि रेलगाड़ियाँ चलती हैं. एक पैसेंज़र. समस्तीपुर और दरभंगा के बीच इसका किराया केवल ६ रुपया है. एक है फास्ट पैसेंज़र जिसका किराया ३६ रुपया है. और एक है सुपरफास्ट. आम तौर पर दरभंगा से दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, पूरी आदि को जाने वाली गाड़ियाँ सुपर फास्ट श्रेणी की गाड़ियाँ है. इसका किराया १२८ रूपये है.

मैं दिल्ली से अपने गाव जा रहा था. गाड़ी सुबह नौ बजे समस्तीपुर पहुच चुकी थी. यहाँ से गाड़ी को अंतिम स्थान दरभंगा पहुचना था. गाड़ी खुलने को थी कि एक पति पत्नी मेरी सीट पर आकर बैठ गए. वे ठीक से बैठे ही थे कि टी टी ई साहब पहुच गए. शायद उन्होंने इन्हें गाड़ी में चढ़ते देखा था. टिकट मांगने पर पत्नी ने टिकट निकाल कर दे दिया. टी टी ई साहब की बांछे खिल गई. उन्होंने जोड़ लिया कि १२८ रुपया किराया में से ६ रुपया किराया घटाकर बनता है १२२ रुपया इसमें २५० रुपया जुर्माना जोड़ने से बनता है ३७२ रुपया और दो लोगों का सात सौ चौवालिस रुपया. बेचारी पत्नी तो सुनकर रोने ही लगी.

वे समस्तीपुर के पास मुसरीघरारी के रहने वाले थे. पति को कोई मानसिक बीमारी हो गई थी. पत्नी ने बताया कि चिंता से. इतिहास से एम ए होने के वावजूद उन्हें कोई उचित रोज़गार नहीं मिल सका . अपना देश गाँव छोड़ कर बाहर जा नहीं पाया. आज पत्नी अपने गाँव में ही घर के बाहर परचून की दुकान चला कर दो बेटियों को पाल रही है. टी टी ई से जुर्माने का नाम सुनकर वो दवाई के सारी कागज़ दिखाने लगी, अपना खाली स्टील का डब्बा भी दिखाने लगी जिसमे तीन चार सुखी रोटियां और घर के बने आचार थे. पति कुछ कह नहीं पा रहा था क्योंकि दवाई के असर से वो हमेशा नींद में ही रहता था. रोते रोते पत्नी कह रही थी कि उसे पता नहीं था कि जिस गाड़ी में वो चढ़ी है वह सुपरफास्ट है. किसी टी टी ई ने ही बता दिया कि यह गाड़ी दरभंगा जाएगी. उस महिला के पास पूरे अस्सी रूपये थे. पचास रुपया डाक्टर के लिए और बाकी वापसी किराया के लिए. किन्तु टी टी ई महोदय का ह्रदय बिल्कुल भी पसीज नहीं रहा था. शायद वो अपना काम कर रहे थे. हम दो यात्रियों के अनुरोध पर टी टी ई एक व्यक्ति का जुर्माना लेकर छोड़ने को तैयार हो गए और उस महिला के 3७२ रूपये हमने दिए.

टी टी ई के जाने के बाद जब महिला से बात हुई तो पता चला कि वो उच्च जाति की है इस लिए उसे गरीबी रेखा के नीचे वाला कोई लाभ नहीं पहुचता. खेती बाड़ी कुछ है नहीं. जो है उसमे भी करने के लिए उनमे सामर्थ्य नहीं है. बटाई नहीं दे सकती क्योंकि कमजोर समझ कर निचली जाति के लोग उसका खेत छीन लेंगे. किसी तरह परचून की दुकान से अपने बीमार पति और दो बेटियों का पालन पोषण कर रही है. हाँ ! बेटियों को पढ़ा रही है वह. उच्च जाति, स्टील के डिब्बे में सूखी रोटी, बीमार पति और फटती हुई महँगी साडी, गरीबी का एक चेहरा है, जिसकी गिनती शायद सरकार के आकड़ो में नहीं होती.

दरभंगा और पूरे इलाके में गरीबी का यह चेहरा बहुत आम है, सरकार है कि पहचानती ही नहीं है.

मंगलवार, 31 मई 2011

सुन रहे हैं अन्ना भाई

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अरुण चन्द्र रॉय

कुछ दिन पहले तक विश्वास नहीं था कि ग्रह दशा ख़राब होती है, इन सबका कोई असर पड़ता है जीवन पर. विश्वास अभी भी नहीं है. लेकिन पिछले तीन शनिवार और रविवार कुछ अच्छे नहीं गुज़र रहे हैं .. कुछ न कुछ उल्टा पलता हो रहा है. संयोग मात्र है यह. पत्नी पीछे पड़ी है कि किसी पंडित ज्योतिष से दिखवाइये. खैर मुद्दा यह नहीं है.

मुद्दा है कि कुछ बातें अन्ना भाई से बांटना चाहता हूँ . भ्रष्टाचार अब भ्रष्टाचार नहीं रह गया है. यह एक सुविधा शुल्क बन गया है और अन्ना भाई के साथ जो जनता खड़ी थी, कैमरे के फ्लैश के साथ नारे लगा रही थी,  वह इस सुविधा शुल्क को स्वीकार करती है. पिछले कुछ महीनो से मैं अपने स्तर पर इस विषय पर शोध कर रहा हूँ और बहुत आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये हैं.

    • नगर निगमों में बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र के लिए जो ५०० रूपये से १००० रूपये का रिश्वत देना पड़ता है, ९०% से अधिक लोग उसे भ्रष्ट्राचार नहीं मानते क्योंकि इस से उनके कुछ घंटे, नगर निगम आने जाने का खर्चा आदि बच जाता है. मैंने लगभग चालीस पचास लोगों से इस बारे में पूछा है.
    • घर के लिए ऋण लेने में तमाम कागजात पूरे होने के बाद भी २ से ५ फिसदी का खर्चा आता है. लोग घर लेने के उत्साह में, घर की डील छूट ना जाये, कौन बैंको के चक्कर मारे, यह रकम देने को तैयार रहते हैं. कोई ३० मामलों में से २६-२७ मामलों में मैंने ऐसा पाया है. 
    • बिजली का कनेक्शन, सीवर का कनेक्शन पानी का कनेक्शन बिना सुविधा शुल्क के नहीं हो सकता. ग्रामीण इलाकों में नरेगा से मिलने वाली मजदूरी, गरीबी रेखा के नीचे वालों के लिए इंदिरा आवास के लिए रकम आदि में कमीशन तय है. लोग इसे भ्रष्टाचार नहीं मानते. इस दिशा में लगभग सौ लोगों से मेरी बात हुई है.

और जिस बात से मैंने यह लेख शुरू किया था वहीँ पहुचते हुए कहूँगा कि पिछले शनिवार को अपनी कालोनी के साप्ताहिक बाज़ार में मेरा मोबाइल चोरी हो गया. किसी जेबकतरे ने उड़ा लिया. महंगा हैंडसेट था सो बहुत खुश हुआ होगा. डाटा का बैक अप  मैंने रखा नहीं था सो मेरा नुक्सान भी हुआ. कुछ बेहद जरुरी नंबर नहीं है अभी मेरे पास. महीनो लगेंगे अपनी इष्ट मित्रों का नंबर फिर से जुटाने में.

अपने पुराने नंबर का नया सिम लेने के लिए कुछ औपचारिकतायें होती हैं. जैसे सिम के गुम होने की पुलिस रिपोर्ट करनी होती है. मैं भी चला गया. सरकारी महकमे में होने का परिचय नहीं दिया. एक आम आदमी की तरह गया. पहले तो सब इंस्पेक्टर साहब ने डेढ़ घंटे तक चौकी के बाहर इन्तजार कराया जैसे कि मैंने अपना मोबाइल खुद चुराया हो. फिर उस आवेदन पत्र को स्वीकार नहीं किया जिसमे मैंने लिखा था कि मोबाइल चोरी हो गया है. मुझसे लिखवाया गया कि मोबाइल गुम हो गया है कहीं.

फिर मुझसे चाय मंगवाई गई. मुझे चाय मिली नहीं क्योंकि वहां आसपास कहीं कोई चाय की दुकान थी ही नहीं. पुलिस वालों को पता था वह. सो मुझे उनके लिए २ लीटर वाली कोल्ड ड्रिंक और नमकीन लानी पडी. साथ में सौ रूपये अलग से देने पड़े. मैंने दिए भी क्योंकि मैं देखना चाहता था कि एक आम आदमी को एक छोटी सी रिपोर्ट लिखवाने के लिए क्या कुछ करना पड़ता है.

जाते जाते अन्ना भाई साहब, आम आदमी जंतर मंतर पर धरना भी नहीं दे सकता. यह अधिकार भी उस से छिन चुका है. विश्वास ना हो तो इन दिनों कभी भट्टा परसौल आकर देखिये . दिल्ली से बहुत दूर है.

बुधवार, 23 जून 2010

अपना अपना आनंद

--- --- मनोज कुमार

कोलकाता की उमस भरी तपती-जलती दोपहरी को बड़े साहब का संदेश मिला कि इस बार का राजभाषा सम्‍मेलन हम देहरादून में करेंगे। कोलकाता के 40 डिग्री सेल्सियस का तापमान और लगभग 100 प्रतिशत की आर्द्रता वाले माहौल में भी लगा कि कोई शीतल बयार आकर छूकर चली गई हो।

 

तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हम पिछले सप्‍ताहांत (11-12 जून) देहरादून में सम्‍मेलन कर आए। गर्मियों में देहरादून जाना एक सुखद अनुभव रहा। देहरादून उत्तराखण्ड की राजधानी है। हम मैदानी इलाकों में रहने वालों के लिए पहाड़ी स्‍थल तक की यात्रा एवं स्‍थान परिवर्तन से बहुत राहत मिलती है। कईयों के मुंह से देहरादून की जलवायु की प्रशंसा सुन रखी थी। गर्मियों में भी वहां हल्‍की सी ठंड रहती है। लू तो कभी चलती ही नहीं। हरे भरे जंगल चारों ओर फैले हैं। फिर, मसूरी की सैर का आनंद ही अलग है।

कुछ ही दूरी पर सहस्रधारा है। सहस्रधारा में पहाड़ की चट्टानों से निरन्तर पानी की झड़ी लगी रहती है। प्रकृति की इस सुंदरता का वर्णन मुझे सदैव आह्लादित किए रहता था कि यह सब एक बार अपनी आंखों से देखकर तृप्त हो जाऊँ।

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सहस्रधारा जाने के लिए पक्‍की सड़क है। तीन पहाडि़यों को पार कर सहस्रधारा तक पहुँचा जा सकता है। पहाड़ों की घुमावदार एवं ऊँची-नीची सड़कें और हरे-भरे पेड़–पौधे शहर छोड़ते ही साथ हो लेते हैं। एक पहाड़ी नाले के ऊपर सहस्रधारा की चट्टानें हैं। उसके नीचे गुफा है, जिसमें पानी झरता रहता है- बहुत ही ठंडा, बूंद-बूंद, फुहारों की तरह और इसीसे छोटी-छोटी असंख्य धाराएं बन जाती हैं। गरमी अधिक थी, अतः धाराएं कम थीं। शायद बरसाती दिनों में सहस्र धाराएं अवश्य बन जाती होंगी।

यहां आकर चारो ओर एकांत, शांत और स्‍वच्छ वातावरण की मेरी उम्‍मीदों पर मानों पानी फिर गया। मोटर की आवाजों का शोर, चाय, पान, सिगरेट, पूरी मिठाइयों की दुकानें और इनसे उपजी गंदगियां- जूठे पत्तल, दोने, कुल्‍हड़, प्‍लास्टिक की बोतलें, गिलास, सिगरेट बीड़ी के टुकड़े, खाली डिब्‍बे, पान की पीक आदि नाले के सड़े पानी की दुर्गंध के साथ चारो ओर बिखरे पड़े थे। ये सब हमारी ही तो देन हैं। हम अपनी प्रकृति का आनन्द लेने के बहाने उसको नष्‍ट करने का मजा लेते हैं। उसे अशोभन, अनाकर्षक और कुरूप बना देते हैं। सहस्रधारा से अविरल झरता पानी प्रकृति के साथ हुए अत्‍याचार पर आंसू बहाता प्रतीत हुआ।

IMG_0161 हमारा अगला पड़ाव मसूरी था। मसूरी देहरादून से ऊपर 32-35 कि.मी. चढ़ने पर आता है। रास्‍ते में प्रकाशेश्‍वर मंदिर पड़ता है। और उससे पहले ही, चढ़ाई शुरू होने के पहले, सांई बाबा का मंदिर है। यह यात्रा भी हमने मोटर से की। हालाकि, पहाड़ पर पैदल चलने, चढ़ने का आनंद ही कुछ और होता है। यद्यपि चढ़ाई कष्‍टकर होती ही है, खासकर उनके लिए जिन्‍हें चढ़ने का तरीका नहीं आता। पांवो में दर्द हो जाता है, सांस फूलने लगती है। लेकिन जो चढ़ने का आनंद लेते हैं उन्‍हें तो इसमें भी आनंद ही आता है। जीवन में कुछ पीड़ा न हो, कुछ कष्‍ट न हो, कुछ कठिनाई न हो तो आदमी किस चुनौती पर जिए। चुनौतियों से प्ररेणा लेकर जो चढ़ाई करता है, विजयश्री उसे ही मिलती है।

 

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शाम ढलने से पहले हम केम्प्टी फॉल पहुँच गए। जोरों से बहती हुई हवा थी। सर्द! ठंढी!! कँपकँपी दिलाने वाली!!! मौसम का मिजाज कितना बदल गया था। प्रकृति के सौंदर्य में दुबका मन किसी अनजाने एकाकीपन के वशीभूत, मसूरी के केम्‍प्टी फॉल के इर्द-गिर्द के वातावरण का आनंद ले रहा था। सीधी सड़क। ऊँचाई को जाती सड़क। पहाड़ी ढलान। ढलता सूरज। और आसमान में फैली लालिमा। मालरोड की भीड़ को छोड़ हम केम्‍प्‍टी फॉल का सौन्‍दर्य निहार रहे थे। ऊँचाई से झरने की गिरती धारा के मोहक नाद के बीच हवा के चलने पर वृक्षों का मर्मर स्‍वर और चिडि़यों का मन को मोहने वाला कलरव। ऊपर से देखें तो नीचे देहरादून की रोशनियाँ टिमटिमाते तारों का भ्रम दिलाती हैं। मानों आसमान जमीन पर उतर आया हो। एक भ्रम और भ्रम के इस आभास का आनंद। सहज होने पर मन को झटका लगा। मैं कल्पना लोक की उड़ान पर था। लगा यह कैसा अज्ञान था जिसने मुझे घेर रखा था।

डिजराइली ने कहा था-

‘अपने अज्ञान का आभास होना ही ज्ञान की तरफ़ बढ़ा एक कदम है।’

मैं अब वर्तमान में था।

शोरगुल, धमाके, ठहाकों के बीच पहाड़ की चोटी से गिरता झरना और केम्‍प्‍टी फॉल का यह नजारा कुदरत से प्यार करने वालों को आनंदित करता है। शहर की भीड़-भाड़, उमस-तमस, कोलाहल-हलचल चहल-पहल से दूर पहाड़ो की वादियों में, झरने की कलकल करती धारा और सूर्य की ढलती हुई किरणों को निहारते हम! पक्षियों के चहचहाते हुए सुरों का आनंद लेते मन में ये पंक्तियां गूंज रहीं थीं –

IMG_0136 जीवन क्‍या है निर्झर है

मस्ती ही इसका पानी है

सुख दुख के दोनों तीरों से

चल रहा राह मनमानी है।

निर्झर में गति ही जीवन है,

यह गति रूक जाएगी जिस दिन

मर जाएगा मानव समाज,

जग के दुर्दिन की घडि़यां गिन-गिन।

 

खाने पीने के शौकीन लोगों के लिए एक से एक ढाबा, रेस्‍तराँ और होटल मिले। जहां जायकेदार खाना और उसका आनंद लूटते लोग उमड़े पड़े थे। लेकिन, झरने के नीचे एक गुफा (खोह) नुमा संरचना मुझे महात्‍माओं और संतो के आसपास होने का भ्रम दे गई और इसी सोच से मुझे आनंद की अनुभूति होने लगी। मेरी उत्सुकता मुझे उस गुफा में खींच ले गई जहां लगा कि कोई मुनि जल की आसनी पर भगवान के प्रति सम्‍पूर्ण आस्‍था से ध्‍यानस्‍थ हैं और प्रभु की समीपता का आनंद लूट रहे हैं।

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ऊपर के लोग भी आनंद में थे। अपना-अपना आनंद है। कोई उस जल-प्रपात के तरण ताल में हिलोरें ले-लेकर आनंद लूट रहा था तो कोई सोमरस की खुमारी का। किसी जोड़े के चहरे पर नव विवाहित होने की मस्‍ती थी, तो कोई अपनी ढलती उम्र का आनंद ले रहा था। आनंद की प्राप्ति के लिए हम क्‍या कुछ नहीं करते? हां आनंद की परिभाषा और मायने हमारे लिए अलग-अलग हैं।

वहां पहुंच कर कैमरे में तस्‍वीरें कैद करते वक्‍त अपने ब्लॉग के लिए एक पोस्ट बन सकने की कल्‍पना मात्र से मुझे असीम आनंद का अनुभव हो रहा था। वैसे आनंद की परिभाषा भी बदलती रहती है। जब आ रहा था तो बीच रास्‍ते में एक शिव मंदिर पड़ा। वहां शिव के दर्शन से ज्‍यादा भीड़ उमड़ी पड़ी थी प्रसाद ग्रहण में। प्रसाद पाने की अनियमितता, धक्‍का-मुक्‍की और तुमसे पहले मैं की छीना-झपटी के बीच प्रसाद पाने का आनंद मुझे फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो दीवार फिल्‍म देखने के लिए प्राप्‍त किए गए टिकट के आनंद सा लगा।

आनंद हमें भटकाता भी है। आदमी आनंद प्राप्‍त करने के लिए कहां-कहां नहीं भटकता है। अब देखिए, जब रात गहराने लगी तो मन भटकने लगा कि चलो भाई! जल्‍दी करो, देहरादून भी वापस पहुंचना है। अब आनंद का कारण बदलने लगा। क्‍योंकि अब वापस देहरादून पहुंचकर जो आनंद मिलने वाला था उसकी उत्‍कंठा जागृत होने लगी थी।

हम धन-दौलत, मद-मोह, पद-वैभव लेकर कहां जाएंगे। जब जाएंगे – तब यहीं धरा रह जाएगा सब! तो इस गुफा के अंदर जल की आसनी पर बैठे ऋषि की कल्‍पना का विस्‍तार मुझे भरमाने भी लगा। मन में आया कि यदि हम उनकी तरह भगवान के बारे में जान भी लें तो हमें क्‍या मिलेगा? क्‍या भगवान स्‍वयं मिल जाएंगे?

इस कल्‍पना और इन्हीं मनोभावों के वशीभूत हमने अपने चारो तरफ नजर दौड़ाई तो मुझे लगा ये जो लोग हैं, जो हंस रहे हैं, गा रहे हैं, प्राकृतिक सौदंर्य का आनंद उठा रहे हैं, सब स्‍वस्थ प्रसन्‍न होने का ढोंग और स्वांग रच रहे हैं। कहीं न कहीं ये सब भीतर से अस्वस्‍थ हैं। कुछ जुमले जो मैंने गौर से सुनने की कोशिश की इस प्रकार थे –

‘देखो कैसे इतरा रहा है’

‘हूंह, पानी में ऐसे कूद रहा है मानो कभी स्‍वीमिंग पूल में नहाया ही न हो’

‘देखो कैसे लड़कियों को घूर रहा हैआदि।

ये परनिंदा, ईर्ष्‍या, द्वेष आदि का आनंद लूटते लोग – ये स्‍वस्‍थ भी हैं या मानसिक रूप से विकल?

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मैं फिर उस गुफा की तरफ मुड़ता हूँ। मेरी कल्‍पना फिर परवान चढ़ती है। मुझे लगता है उसमें धयानस्‍थ जो मुनि है, वही सच्‍चा आनंद लूट रहे हैं- भक्ति का, भगवत प्रेम का। उन्हें बाहरी आनंद की चाह नहीं, वह तो आन्‍तरिक आनंद की अमृत धारा से सराबोर हैं।

वापसी की यात्रा में ऐसा प्रतीत हुआ कि जो मनःस्थिति लेकर हम देहरादून आए थे उसमें बड़ा अन्‍तर आ गया है। मोटर के कैसेट प्‍लेयर पर फिर वही गीत बज रहा था जो जाते समय बजा था –

दिल ढूंढता, है फिर वही

फुरसत के रात दिन,

बैठे रहे तसव्‍वुर-ए-जाना किए हुए ।

इस गीत ने जाते समय मन में जो ताना-बाना बुना था अब वह टूट रहा था। हम वापस जा रहे थे, देहरादून के बारे में एक अलग अनुभव के साथ। फिर कोलकाता। फिर उमस, फिर गर्मी!!

गुरुवार, 6 मई 2010

मैं गया था अपने गांव --- मनोज कुमार

एक कविता पढ़ी थी। स्‍कूल के दिनों में। राष्‍ट्रकवि स्‍व. मैथिली शरण गुप्‍त की।

अहा ग्राम्‍य जीवन भी क्‍या है ?

क्‍यों न इसे सबका मन चाहे.....

तब यह काफी भाता था। तब यह कहा जाता था, भारत देश है कृषि प्रधान। हम है उसकी संतान। लहलहाती इसकी धरती है। भारत की आत्‍मा गांवों में बसती है। आज...... ? बीस बाइस सालों से देश के विभिन्न भागों में बिहार की मिट्टी से दूर रह्ते हुए पीछे छूट गए गांव की जबर्दस्त कसक सताती है। ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा, शिक्षा-दीक्षा की शुरुआत हुई सो उसके प्रति ममता हृदय से गई नहीं हैं। गांव की सादगी, ईमानदारी और अपनापन बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता रहता है। अपने गांव की स्मृतियां ही वह पूंजी है जिसके बल पर कई ऐसी कविता या कहानी लिख डाला। मेरे जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं जो शहर को मिथ्या और गांव को सत्य मानते हैं। पर आज का सत्य तो बड़ा कठोर, निर्मम और क्रूर है।

किसान किसान का पेशा अगर आपने अपना लिया तो आपका परिवार भूख से, बिमारी से बेबसी ओर लाचारी से तड़प तड़प कर मर जाएगा। आए दिन किसानों की आत्‍महत्‍या की खबरें देखने-पढ़ने को मिलती हैं। गांव की धूल मिट्टी भरी आवो हवा और गोबर की दुर्गंध ने वहां के युवकों को पलायन हेतु प्रेरित किया है। चर-चांचर की ज़िन्दगी से चंद रूपयों की चाकरी भली। झींगुरदास का बेटा तो अपनी परिवार के बोझ तले एवं जानलेवा बीमारी के दर्द से इतना परेशान हुआ कि रेल में कट कर अपनी मुक्ति पा ली।

पर जब आठ साल के अंतराल पर (हैदराबार के निकट एद्दुमैलारम की अपनी पोस्टिंग के वक्‍त) अपने गांव गया था, अहा ग्राम्‍य जीवन का आनंद लेने तो झींगुरदास का छोटा बेटा मुनिया समस्‍तीपुर रेलवे स्‍टेशन से गांव तक की 12 किलोमीटर की हमारी दूरी तय कराने तांगा लेकर आया था। रास्‍ते में बोल रहा था, “आब गाम कोनो रहई वाला छई? धुत्त! मूरूखे ओत्तs रहतई। हमहूँ सोचई छियई समसतीयेपुर चइल एबइ।”

गांव की मिट्टी से लगाव नहीं। लोग करें भी तो क्‍या? मूलभूत सुविधाओं का सर्वथा अभाव, महंगी होती कृषि सामग्री, फसलों का उचित मूल्‍य न मिलना और ऊपर से प्राकृतिक आपदाएं बाढ़ आदि ने तो वहां के लोगों का जीना दूभर कर दिया है।

विधालय, चिकित्‍सा और बिजली पानी की समस्‍या इतनी विकराल है कि लोग शहर की ओर भाग रहे हैं। इसी ब्‍लॉग के एक योगदानकर्ता करण समस्‍तीपुरी से बेहतर इस समस्‍या का भुक्‍तभोगी कौन होगा। उन्होंने गांव में रहकर इन सब समस्‍याओं से जूझ कर स्‍नातकोत्तर की न सिर्फ पढ़ाई की। विश्‍वविद्यालय में अव्‍वल आए। यह तो भला हो उस पुश्‍तैनी साइकिल का, जो इनके पिताजी ने इन्‍हें दे दिया था, सो शहर से गाव की दूरी इन्‍होंने गांव में रह कर तय करली वरना काला अक्षर से दूर रहते और काली भैंस इनके पास न होती।

गौशाला-१ शहरीकरण का प्रसार इस तीव्र गति से हो रहा है कि गांव की सभ्‍यता बुरी तरह संक्रमित हो रही है। गांव में पहले चौपाल होती थी, पेठिया पोखर होते थे, पनघट कुंआ, दालाना बथान। सब प्रायःगायब होते जा रहे हैं। जब मैं अपने बच्‍चों को गांव के पेठिया में झिल्‍ली बड़ी कचरी खिलाने के प्रलोभन से ले गया तो वहां पेप्सी की मौज़ूदगी ने अहा! ग्राम्य जीवन का मेरा सारा उत्‍साह ठिकाने लगा दिया।

घोघ तानने (घूंघट डाले) झरझरी वाली मेरे चेहरे पर की लकीरें पढ़ते हुए बोली, “बउआ की तकई छियई ।....... अब किछो नई भेटत । सब गेलई.......बज़ार!”

गांव जब जा रहा था तो मन में था कि अभी भी वहां गांव का बहुत कुछ बचा होगा और जब लौट रहा था तो स्पष्ट था कि वहां से बहुत कुछ विलुप्त हो चुका है। मेरे मन में प्रश्‍न था कि हम गांवों को आत्मनिर्भर, सुंदर और सुविधा-संपन्न क्यों नहीं बनाना चाहते थे? अब तो वह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी नहीं हैं जिसकी कामना करके मैं वहां गया था। फिर सोचता हूँ गांव किसके लिए हैं? युवक वर्ग वहां रहना नहीं चाहते। अवसर ही नहीं है। उसकी तलाश में वे शहर भागते हैं। गांव से आ कर जो लम्बे समय तक शहर में रहे, वे गांव लौटना नहीं चाहते। गांव में रहने वाला मुनिमा भी अब गांव में रहना नहीं चाहता। जुगेसर ने शहर में सैलून खोल ही लिया है। हां, झींगुरदास की तरह के अभिशप्त लोग ही रहते हैं गांव में।

21 साल की नौकरी के बाद भी किसी शहर में न ज़मीन ली है, न मकान। शायद रिटयर होने के बाद गांव में ही रहूँ, कह नहीं सकता। वहां से लौट कर, आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में, तब एक कविता लिखी थी, उस ग्राम्‍य गमन के पश्‍चात! पेश है।

मैं गया था अपने गांव

बरसों के बाद गया

मैं अपने गांव,

क्या करता छू आया

बस बड़ों के पांव।

KONICA MINOLTA DIGITAL CAMERA गौशालों की गंध से

थी सनी हवाएं,

छप्परों पर धूल सी

जमी मान्यताएं।

स्वेद सिक्त, श्रमरत,

सर गमछे की छांव।

सूरज तो भटक गया

शहरों की भीड़ में,

चांदनी भी फंस गई

मेघ की शहतीर में।

खोजते हैं शहर

वहां अपने ही दांव।

गौशाला-२ मक्खियाँ तक अब नहीं

करती हैं भिन- भिन,

आम के दरख़्तों पर

ठिठुरे से दिन।

सब गए शहर कहे

अम्मा की झाँव।

सिकुड़ी आँखों झुककर

झांके झींगुर दास,

पेठिये के शोरगुल पर

मण्डी का उपहास।

कब्बार के कोने उपेक्षित

दादाजी की खड़ाउँ।

कुंआ झुर्रियों ढपी आंखें

सपने अब शेष नहीं,

शहर इन गांवों को

छोड़ आया दूर कहीं।

इनारों की जगत पर

शाम का ठिठकाव।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

सारे तीर्थ बार-बार गंगासागर एक बार .......भाग -चार - कर्दम ऋषि

कर्दम ऋषि को ब्रह्माजी का मानसपुत्र माना जाता है। ब्रह्मा जी के अंश से कर्दम मुनि हुए। वे प्रजापतियों में गिने जाते हैं। उन्‍हें ब्रह्माजी ने आदेश दिया था कि तुम प्रजा की सृष्टि करो। योग्‍य संतान प्राप्‍त हो इसके लिए उन्‍होंने कठोर तपस्‍या की। गुजरात अहमदाबाद के निकट प्रसिद्ध तीर्थ स्‍थल है बिन्‍दुसार। यही ऋषि कर्दम की तपोभूमि है। इस तप से प्रसन्‍न हो शब्‍दब्रतरूप स्‍वयं नारायण अवतरित हुए। कर्दम ऋषि की तपस्‍या और साधना को देखकर भगवान की आंखों से आनन्‍द के आंसू गिरे। उससे बिन्‍दु सरोवर पवित्र हो गया।

भगवान ने कर्दम ऋषि से कहा “चक्रवर्ती सम्राट मनु, पत्‍नी शपरूपा के साथ अपनी पुत्री देवहूति को लेकर तुम्‍हारे ज्ञान आश्रम में आएंगे। उसका पाणिग्रहण कर लेना। ”

कालान्‍तर में वैसा ही हुआ। सबसे पहले मनु ( स्वयंभू मनु ) और उनकी पत्नी शतरूपा ब्रह्मा जी के अलग अलग दो भागो से प्रगट हुए। इनकी तीन बेटिया हुई। आकूति , प्रसूति और देवहूति। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से हुआ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ। ये वही दक्ष हैं जो माता पार्वती के पूर्वजन्म में उनके पिता थे और भगवान् शिव के पार्षद वीरभद्र ने जिनका यज्ञ विध्वंश किया था।

कर्दम मुनि का विवाह मनु जी की तीसरी बेटी देवहूति से हुआ। राजकुमारी देवहूति ने कर्दम ऋषि के साथ उस तपोवन में रहकर पति की सेवा करती रही। राजपुत्री होने का जरा भी उन्‍हें अभिमान नहीं था। कर्दम ऋषि काफी प्रसन्‍न एवं संतुष्‍ट हुए। उन्‍होंने पत्‍नी देवहूति को देवदुर्लभ सुख प्रदान किया।

परम तेजस्वी दम्पति के गृहस्‍थ धर्म में पहले नौ कन्याओं का जन्म हुआ। इन नौ कन्याओं का विवाह ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न नौ ऋषिओं से हुआ ।

(1) कला - मरीचि ऋषि के साथ विवाहित

(2) अनुसूया - अत्रि ऋषि के साथ विवाहित

(3) श्रद्धा - अड्गिंरा ऋषि के साथ विवाहित

(4) हविर्भू - पुलस्‍त ऋषि के साथ विवाहित

(5) गति - पुलह ऋषि के साथ विवाहित

(6) क्रिया - क्रत्तु ऋषि के साथ विवाहित

(7) ख्‍याति - भृगु ऋषि के साथ विवाहित

(8) अरूंधति - वशिष्‍ठ ऋषि के साथ विवाहित

(9) शान्ति देवी - अथर्वा ऋषि के साथ विवाहित

कर्दम ऋषि ने सन्‍यास लेना चाहा तो ब्रह्माजी ने उन्‍हें समझाया कि अब तुम्‍हारे पुत्र के रूप में स्‍वयं मधुकैटभ भगवान कपिलमुनि पधारने वाले हैं। प्रतीक्षा करो।

कर्दम एवं देवहूति की तपस्‍या के फलस्‍वरूप भगवान श्री कपिलमुनि उनके गर्भ से प्रकट हुए।

बाद में पिता के वन चले जाने के पश्‍चात कपिलमुनि ने अपनी माता देवहूति को सांख्‍यशास्‍त्र के बारे में जानकारी दी और उन्‍हें मोक्षपद की अधिकारिणी बनाया।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

सारे तीर्थ बार-बार गंगासागर एक बार .......भाग -तीन - सांख्‍य दर्शन

भारतीय दर्शन के छ प्रकारों संख्या, योग, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, न्याय एवं वैशेषिक में से एक है सांख्य। 'सांख्य' का शाब्दिक अर्थ है - 'संख्या सम्बन्धी'। सांख्य दर्शन के रचयिता कपिल मुनि माने जाते हैं। सांख्य दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति 'भगवान' के द्वारा नहीं मानी गयी है बल्कि इसे एक विकासात्मक प्रक्रिया के रूप में समझा गया है और माना गया है कि सृष्टि अनेक परिवर्तनों से गुजरने के बाद अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई है।

जीव की दुर्गति का कारण है --- आध्‍यात्मिक, अधिदैविक एवं अधिभौतिक पाप। भगवान कपिल ने इन तीनों दुःखों से मुक्ति का उपाय बतलाया है। सांख्य का अर्थ होता है ज्ञान।

सांख्‍य के अनुसार मूल तत्‍व 25 है। ये है

१. प्रकृति, २. महत् ३. अंहकार, ४. 11 इन्द्रियां, ५. पांच तन्मात्राएं, ६. पांच महाभूत और ७. पुरूष।

१. प्रकृति :

सत्व, रजः, तमः – इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा जाता है। इस अवस्था में प्रकृति निष्क्रिय रहती है। इन तीनों गुणों में जब कभी कमी आती है या बढोत्तरी होती है, तब उस विषमता से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। उसमें विकृति आती है। प्रकृति की विकृति से ही जीव और जगत की सृष्टि होती है।

जीव और जगत अव्यक्त रूप में प्रकृति में विद्यमान रहते हैं। इसी कारण से प्रकृति का एक और नाम “अव्यक्त” है। सृष्टि आदि क्रिया में प्रकृति ही प्रधान है। वह प्रकृतरूप में काम करती है। प्रकृति बना है प्र और कृति के संयोग से। प्र का अर्थ है प्रकर्ष और कृति का अर्थ है निर्माण करना। जिन मूल तत्वों से मिलकर बाकी सब कुछ बनता है, उसे प्रकृति कहते हैं। इसी कारण से “प्रकृति” नाम पड़ा -- “प्रकरोरीति प्रकृतिः।”

२. महतः

प्रकृति का प्रथम परिणाम महत्तत्व या बुद्धितत्व है।

३. अहंकार:

महत्तव की विकृति अहंकारतत्व है।

४. ग्‍यारह इन्द्रियां:

अंहकार तत्‍व के परिणाम हैं इन्द्रिय --- विषय।

इन्द्रियां दो प्रकार की है –

(क) बाह्य इन्द्रियां – दो प्रकार की होती है –

(अ) ज्ञानेन्‍द्रियां

1 चक्षु

2 कर्ण

3 नासिका

4 जिह्वा

5 त्‍वक्

(आ) कर्मेन्द्रियां

1 वाक्

2 पाणि

3 पाद

4 पायु

5 उपस्‍थ

(ख) अन्‍तरेन्द्रिय – मन

(5) पंच मात्राएं

पंत्रतम्‍मात्रा अहंकारतत्‍व का एक परिणाम है। पांच तम्‍मात्राएं है --

1 रूप

2 रस

3 गन्‍ध

4 स्‍पर्श और

5 शब्‍द

(6) पंच महाभूत

उपर्युक्‍त वर्णित पंचतमात्रओं से ही पांच स्‍थूल त‍त्‍वों की उत्‍पति होती है। ये हैं –

1 क्षिति,

2 अप् (जल)

3 तेज (पावक)

4 व्‍योम (गगन , आकाश ) और

5 मरूत् (समीर)

(7) पुरूष

सांख्‍य मत के अनुसार इन 25 तत्‍वों का सम्‍यक ज्ञान ही पुरूषार्थ है।

  • सांख्‍य मत में, जीव और जगत की सृष्टि में ईश्‍वर को प्रमाणरूप में नहीं माना जाता।
  • जगत के दो भाग हैं -पुरुष और प्रकृति।
  • पुरूष और प्रकृति के अविभक्‍त संयोग से सृष्टि की क्रिया निष्‍पन्‍न होती है।
  • पुरूष और प्रकृति दोनों ही अनादि है।
  • पुरूष चेतन है, प्रकृति जड़।
  • पुरुष मनुष्य का चेतन तत्व है।
  • प्रकृति शेष जगत है।
  • पुरूष निष्क्रिय है, प्रकृति क्रियाशील।
  • चेतन पुरूष के सान्निध्‍य से प्रकृति भी चैतन्‍यमयी लगती है।
  • पुरूष केवल भोक्‍ता है, कर्ता नहीं।
  • पुरुष का यह भोग औपचारिक है।
  • पुरूष सर्वदा ही दुखवर्जित है।
  • दुःख तो बुद्धि का विकार है।
  • दुख का कारण अज्ञानतावश पुरुष और प्रकृति में भेद नहीं कर पाना है।
  • दुःखबुद्धि पुरूष में प्रतिबिम्‍बित मात्र होती है।

सांख्‍य मत

  • सांख्य ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता है।
  • शरीर के भेद में आत्‍मा और पुरूष बहु है। पुरूष और प्रकृति 24 तत्‍व से स्‍वतन्‍त्र है।
  • संसार के दुखों और सुखोंका विश्लेषण इन्हीं चौबीस तत्वों और पुरुष के संयोग के आधार पर किया जाता है।
  • अज्ञानतावश, न जानने के कारण ही जीव को बन्‍धन में बंधना पड़ता है। अर्थात दुख और संसार में आवागमन के चक्र में फंसना पड़ता है।
  • प्रकृति पुरूष को अपने हाव-भाव छल-कौशल द्वारा बांधकर रखती है। प्रकृति मानों नाटक की नर्तकी है।
  • इसके कारण ही वह भोग की वस्तुओं को ही अपना लक्ष्य मान लेता है और काम, क्रोध, मद, मोह आदि में ही आनंद प्राप्त करता है। यही दुख का कारण है।
  • इसी भेद को ठीक-ठीक नहीं समझ पाने के कारण पुरुष अपने को प्रकृति ही समझ लेता है। यही मिथ्या ज्ञान है।
  • मनमोहिनी उसके इस हाव-भाव, नाच-नृत्‍य, छल कौशल को पुरूष जिस दिन पकड़ लेता है, उसी दिन वह मुक्‍त हो जाता है, अर्थात सारे बंधन तोड़ देता है।
  • पुरुष निरंतर अपने बारे में चेतना प्राप्त करता है और इसी क्रम में अपने और प्रकृति के अस्तित्व के भेद का ज्ञान प्राप्त करता है।
  • प्रकृति से पुरूष की स्‍वतंत्रता या मुक्ति के विवेक को “ज्ञान” कहा जाता है।
  • “ज्ञानामुक्ति”! अर्थात ज्ञान ही मुक्ति है।
  • कठोर साधना द्वारा प्रकृति पुरूष के भोग्‍या-भोक्‍ता भाव का उच्‍छेद ही पुरूषार्थ या आत्‍यन्तिक “दुखनिवृत्ति” है।
  • अर्थात् प्रकृति को तलाक देकर ही पुरूष के जीवन में मुक्ति की प्राप्ति होती है। इस प्रकार से प्रकृति से सम्‍पूर्ण रूप से स्‍वतन्त्र होने का नाम ही पुरूष का “कैवल्‍य” है।
  • कैवल्य की अवस्था जब पुरुष इस चैतन्य को प्राप्त कर ले और अपने आप को शुद्ध पुरुष के रूप में समझ ले, तो इस अवस्था को कैवल्य कहते हैं। कैवल्य की अवस्था में मनुष्य सुख और दुख से ऊपर उठ जाता है।
  • चेतना के स्तर पर पहुंच जाने से दुखों की निवृत्ति हो जाती है और इसे ही मोक्ष कहते हैं।
  • मुक्‍त पुरूष को प्रकृति अपने छल बल से रिझाने नहीं आती। जिस प्रकार सभा समाप्‍त हो जाने के पश्‍चात नर्तकी पुर्णतः निढ़ाल हो जाती है और नाचने के लिए नहीं उठती, उसी प्रकार की स्थिति यह है।
  • सांख्य के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति का उपाय पूजा-पाठ या किसी ईश्वर की उपासना नहीं है, बल्कि अपनी चेतना के असली स्वरूप को समझ लेना ही है।

पुरूषार्थ प्राप्ति

सांख्‍यकारों ने इसके लिए ध्‍यान, धारणा, अभ्‍यास, वैराग्‍य तपश्‍चरण आदि का पालन करने का उपदेश दिया है। सांख्‍य के साथ योग का घनिष्‍ठ संबंध है।

रविवार, 18 अप्रैल 2010

सारे तीर्थ बार-बार गंगासागर एक बार .......भाग -दो - कपिल मुनि

पिछ्ले पोस्ट सारे तीर्थ बार बार, गंगा सागर एक बार में हमने गंगासागर तीर्थ स्थल के यात्रा की चर्चा की थी। गंगासागर तीर्थ के साथ-साथ आदि संख्‍याचार्य कपिलमुनि का नाम भी समभाव से संलग्‍न है। भागवत के अनुसार भगवान कपिलदेव विष्णु के अन्यतम अवतार थे। कर्दम प्रजापति के औरस एवं मनुकन्‍या देवहुति के गर्भ से इनका जन्‍म हुआ था। नौ कन्याओं के बाद भगवान् कपिल मुनि का जन्म हुआ । ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे। कपिल के आविर्भाव के समय ब्रह्मा ने कर्दम से कहा था हे मुनि! आपका यह पुत्र साक्षात ईश्वर के स्वरूप हैं। स्वयं भगवान माया का रूप धारण कर कपिल के रूप में आपके यहां अवतरित हुए हैं।

पद्मपुराण के अनुसार महामुनि कपिल को सांख्ययोग का प्रणेता माना जाता है। श्रीमद्भागवत में भी इस आशय का उल्लेख है। उनका जन्म बिन्दु सरोवर आश्रम में हुआ था जो गुजरात में स्थित है। ऐसा कहा गया है कि स्‍वयं ब्रह्मा ने कहा था, सांख्‍यज्ञान का उपदेश देने के लिए परब्रह्म ने स्‍वयं भगवान के सत्त्वअंश से जन्म लिया है। गीता (1016) में भगवान श्रीकृष्‍ण कहते हैं -

सिद्धानां कपिलो मुनिः।

अर्थात सिद्धगणों के बीच प्रधान। श्‍वेताश्‍वतर (5/2) उपनिषद में भी कपिल का नाम मिलता है। श्वेताश्वर श्रुति में कपिल को वासुदेव का अवतार कहा गया है।

ग्रंथों में यह वर्णित है कि महर्षि कर्दम ने मनुकन्या देवहुति को भविष्यवाणी करते हुए बताया कि मैं जब तपस्या में लीन रहूँगा तब तुम भगवान विष्णु को पुत्ररूप में प्राप्त करोगी। वो तुम्हें परब्रह्म के तत्व को समझाएंगे और तुम्हें मुक्ति (मोक्ष) का पथ बतलाएंगे। कपिल के जन्म के पश्चात कर्दम मुनि चले गए और देवहूति को बताकर गए कि उनका पुत्र कपिल ही देवहूति का उद्धार करेगा। सांख्ययोज्ञाचार्य कपिल ने अपनी माता देवहुति को सिद्धपुर में सांख्ययोग की शिक्षा दी थी। यह स्थान गुजरात के पाटन के नज़दीक है। संसार की सृष्टि व जीवात्मा का गूढ़ रहस्य का तत्व सांख्यदर्शन में दिया है।

महर्षि कपिल ने अपनी मां को अहं का भाव, अहंकार त्याग करने की दीक्षा दी। साथ ही भक्तिमार्ग पर अनुगमन करने को कहा और मंत्र प्रदान किया। भक्ति से शरीर और ज्ञान से मन की शुद्धि होती है। इससे आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जब आत्मज्ञान प्राप्त हो जाए तो लक्ष्य यानी मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

देवहुति भगवान विष्णु को पुत्र रत्न के रूप में पाकर धन्य हुई। उनके द्वारा बताए गए विधि अनुसार पूजा-पाठ, जप-तप, ध्यान-योग में रम गईं। इस प्रकार अपनी मां को योग, मीमांसा, तत्व आदि की व्याख्या करने के पश्चात कपिल मुनि ने आश्रम का त्याग किया और एकाग्रचित्त होकर तपस्या करने के उद्देश्य से पाताललोक (सागरद्वीप) चले आये। यहां पर अपना आश्रम बनाया।

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अतः कपिल एवं उनके द्वारा प्रतिपादित सांख्‍यदर्शन की प्राचीनता के विषय में कोई संदेह होना उपयुक्‍त नहीं है। सांख्‍यवादियों का मानना है कि कपिलमुनि ही विश्‍व के आदि विद्वान और उपदेशक हैं। वे स्‍वयंभु ज्ञानी थे। उनका कोई गुरू अथवा उपदेशक नहीं था। सत्त्‍वज्ञान लेकर ही उनका आविर्भाव हुआ था।

सुतंरा सांख्‍ययोग को विश्‍व का आदि उपदेश माना जाता है। प्राचीन सांख्‍यवादियों के बीच आसुरि पंचशिख आदि के नाम प्रसिद्ध है। रामायण में भी उल्‍लेख है कि कपिलमुनि पाताल लोक के क्षेत्र में तपस्‍यारत थे। वाल्मीकी रचित रामायण से साबित होता है कि गंगासागर क्षेत्र ही महर्षि कपिल का आश्रम था। अतः कलुषनाशिनी सुरेश्‍वरी गंगा का सागर में मिलन और नारायणावतार महायोगी, महातपस्‍वी, आदि महाज्ञानी कपिलमुनि के आश्रम वाले क्षेत्र

गंगासागर में सर्वत्र मोक्ष है – जल, थल और अंतरिक्ष में।

भगवान विष्णु व महादेव जी गंगा-सागर में नित्य निवास करते है उसका प्रमाण है

स्नात्व य: सागरे मर्त्यो दृष्ट्वा च कपिल हरिम् । ब्र.पु.

गंगासागरसंयोगे संगमेश इति स्मृत: ।। शि.पु.

प्रस्तुतकर्ता

मनोज कुमार

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

सारे तीर्थ बार बार गंगा सागर एक बार

आदिकाल से बहती आ रही हमारी पाप विमोचिनी गंगा अपने उद्गम गंगोत्री से भागीरथी रूप में आरंभ होती है। यह महाशक्तिशाली नदी देवप्रयाग में अलकनंदा से संगम के बाद गंगा के रूप में पहचानी जाती है। लगभग 300 किलोमीटर तक नटखट बालिका की तरह अठखलियां करती, गंगा तीर्थनगरी हरिद्वार पहुंचती है। तीर्थनगरी में कुंभस्‍नान तो हम पिछले महीने कर आए थे। अब घर के सदस्‍यों का विचार हुआ गंगा का सागर से संगम भी हो आया जाय। हर साल मकर सक्रांति पर्व पर महाकुंभ जैसा पर्व यहां लगता है। तीर्थस्‍थल गंगासागर श्रेष्‍ठ तीर्थ क्षेत्र है। पहले यहां आने जाने की सुविधा उतनी नहीं थी। अतः यह लोकोक्ति प्रचलित हो गई।

सारे तीर्थ बार बार |

गंगा सागर एक बार||

यह तीर्थ एक समय अत्‍यंत दुर्गम था। उस समय यंत्र चालित नाव नहीं थी। बिजली, पानी, आश्रम एवं परिवहन संवा का अभाव था। आज ऐसी बात नहीं है। पथ की वह दुर्गमता अब नहीं रही। यातायात के अनेक साधन का विकास हुआ है। जिससे यात्रा सहज हो गई है। इस जनविरल तीर्थ में अनेक आश्रम स्‍थापित हो चुके हैं पक्‍के रास्‍तों का निर्माण बसों का आवागमन आदि आंरभ हो चुका है।

अब तो यातायात के कई साधन हो चुके हैं। कोलकाता से गासागर जाने की सड़क भी काफी अच्‍छी और चौड़ी है। सरकारी व गैर सरकारी बस के द्वारा लट नम्‍बर 8 तक पहूँचा जा सकता है। हमने तो अपनी गाड़ी से ही यात्रा आरंभ की। कोलकाता से लट नं 8 तक की दूरी लगभग 100 किलोमीटर की है। बीच में लगभग 40 किलोमीटर की दूरी तय करने पर डायमंड हारबर आता है। यहां पर सड़के के किनारे गंगा का फैलाव एवं दृश्‍य बड़ा ही मनोरम है। गाड़ी से उतर कुछ देर यहां का आनंद लिया फिर आगे की यात्रा पर निकल पड़े

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डायमंड हारबर

लट नं; 8 तक पहूँचने में लग्‍भग दो घंटे लगे। यहां से जलयान द्वारा कचुबेडि़या द्वीप के लिए जाया जाता है। यह दूरी लगभग 8 किलोमीटर की है और जलयान द्वारा इसे तय करने में 25 से 30 मिनट लगते हैं। सुबह छह बजे से ही जलयान या फेरी सेवा शुरू हो जाती है, जो रात के नौ बजे तक चलती रहती है।

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कहते हैं कि पहले कोचुबेडि़या द्वीप और घोड़ामारा द्वीप एक था बाद में जल के कटाव से दोनों अलग हो गए।

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बंगाल के सुदूर दक्षिणी छोर पर विश्‍वविख्‍यात सुंदरवन है। सागर द्वीप उसी सुन्दर वन का एक महत्‍वपूर्ण भाग है। यह द्वीप 30 किलोमीटर लम्‍बा और औसत 10-12 किलोमीटर चौडा है। यह लगभग 5000 वर्ष पुराना है। यह दक्षिण 24 परगना जिले में आता है। कोचुबेडि़या से गंगासागर तट तक दूरी 30 किलोमीटर है और यहां बस, ट्रेकर अथवा प्राइवेट गाड़ी से जाया जा सकता है। हमने यह यात्रा टाटा सूमो से तय की। रास्‍ता काफी अच्‍छा है।

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तट पर का मनोरम दृश्‍य देख कर हम तो अत्‍यंत प्रसन्‍नचित हुए। जलनिधि का किल्‍लोल, रूपहले बालू कण और महामुनि कपिल का प्राचीन मन्दिर।

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गंगासागर की छवि की छटा निराली है। ऊपर नील गगन का विस्‍तार, नीचे श्‍वेत, फेनिल जलधि तरंगे, और धरा पर रजत बालूका कणों का फैलाव ऊपर से सूरज की सुनहली किरणें – इस स्‍थल की शोभा को असीमित विस्तार देते हैं। दक्षिण की ओर फेनिल समुद्र है समुद्र की उत्ताल लहरें दूर दूर तक शुभ्र वालुकामय सुविस्‍तृत स्‍थलखण्‍ड का विस्‍तार है। चारो ओर फैले हुए हरे भरे बन इसकी शोभा में चार चांद लगाते हैं। चारो ओर प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्‍छादित है गंगासागर की पुण्‍यभूमि।

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गंगासागर पाताल (अर्थात नदी और समुद्र से घिरा जल-जंगल परिपूर्ण निम्‍नभूमि क्षेत्र) लोक के अंतिम छोर पर है जहां भगवान विष्‍णु के पांचवे अवतार महा‍मुनि कपिल का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा माना जाता है कि कपिल मुनि महर्षि कर्दम और मनुकन्या देवहुति के यहां पुत्र रूप में अवतरित हुए। कपिलमुनि के उपदेश सांख्‍यदर्शन के रूप में जगत विख्‍यात है। संसार की सृष्टि व जीवात्‍मा का गूढ़ रहस्‍य का तत्‍व उस दर्शन में दिया गया है। इसके बारे में विस्‍तार से फिर कभी।

यहां पर कपिल मुनि का आश्रम है। परंपराओं की माने तो महामुनि कपिल का आश्रम सागर और गंगा के मिलन के पहले से ही प्रतिष्ठित था। पर बारम्‍बार समुद्र द्वारा ग्रास किए जाने के कारण अपना स्‍थान बदलता रहा। हालांकि ईसा के 437 वर्ष पूर्व यहां पर एक प्राचीन मंदिर के अस्तित्‍व की चर्चा मिलती है , पर वह मंदिर सागर के गर्भ में समा गया। वर्तमान अवस्थित मंदिर का निर्माण सन 1974 हमें हुआ। यह सांतवां मंदिर है।

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श्री गंगासागर संगम प्रवाह में गोता लगाकर और सिद्धेश्‍वर श्री कपिलमुनि का भाव भरे नेत्रों से दर्शन और अनुराग भरे हृदय से अर्चन वन्‍दन और आत्‍मनिवेदन कर हमने अपने मानव जीवन को कृतार्थ किया।

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इस मंदिर में कई विग्रह है। कपिल मुनि पद्मासन में अपने आसन पर आरूढ़ है। उनका श्रीमुख जटाओं से मंडिंत है। उनके बांए हाथ में कमण्‍डल है। दाहिने हाथ में जपमाला। शीर्ष भाग में बने पंचनाग छत्‍त्रवत् उनपर छाया करते हैं। यह मूर्ति हमें संदेश देती है कि अगर कैवल्‍य या मुक्ति की कामना करते हो तो जप, तप, अराधना में लीन रहो। भगवान कपिल के दाहिने भाग में मां गंगा की मुर्ति है। ये चतुर्भुजा और मकरवाहिनी है। इनके हाथ शंख, चक्र, रत्‍नकुंभ एवं वरमुद्रा है। देवी के अंक में महातपस्‍वी भगीरथ विद्यमान है। देवी गंगा से कुछ दूरी पर विराजमान है हनुमान जी, जिनके एक हाथ में गदा और दूसरे में गंदमादन पर्वत है। कपिलदेवके बाएं में राजा सगर है। इनके बाएं में अष्‍टभुजा सिंहारूढ देवी विशालाक्षी अधिष्ठित है। मां के करकमलों में त्रिशुल, खड्ग चक्र आदि आयुध और कमल पुष्‍प हैं। इनके बाई ओर इन्‍द्रदेव है जिनके दाहिने हाथ में धनुष, बाएं में यज्ञ के अश्‍व की वल्‍गा एवं बाएं स्‍कन्‍ध में तरकस है। इन्‍द्रदेव के बगल में देवाधिदेव महादेव है। साथ ही राधा-कृष्‍ण के युगल की मूर्ति भी है। सभी मूर्तियां सिन्‍दूर से मण्डित हैं। प्रतिदिन पांच बार मंदिर में पूजा होती है। रात 2 ½ बजे मंगल आरती और 4 बजे श्रृंगार आरती, दोपहर 2 बजे भोग आरती, संध्‍या 7 बजे संध्‍या आरती एवं रात 8 ½ बजे शयन आरती|

गंगा सागर आज नित्‍यतीर्थ बन चुका है। फिर भी मकर सक्रांति के अवसर पर गंगा सागर तीर्थस्‍थान परम पुण्‍यादायक है। त्रिपथगामिनी (त्रिपथ अर्थात इड़ा, पिंगला, सुषुम्‍ना ग्रंथियों) गंगा भगीरथ के अभूतपूर्व तपस्‍या से इहलोक में अवतीर्ण हुई जो मानवमात्र के लिए मुक्तिप्रदायिणी व कल्‍याणकारी है। गंगा के पृथ्‍वी पर आने की अनेक कथाएं प्रचलित है। इसमें एक है राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की महामुनि कपिल की क्रोधग्नि से जलकर भस्मिभूत हो जाना और सगर के पौत्र अंशुमान द्वारा भगीरथ के अक्‍लान्‍त परिश्रम और चेष्‍टा के बाद उनका उद्धार करने की प्रक्रिया में गंगा का पृथ्‍वी पर लाया जाना। इसकी भी विस्‍तृत चर्चा फिर कभी।

आज तो यही कहूँगा कि त्रिपथगामिनी स्‍वर्ग से मंदाकिनी, पाताल से भगवती और जो धारा मर्त से अवतीर्ण हुई वह भगीरथ द्वारा आनयन होने के कारण भागीरथ नाम से आख्‍यात, त्रिलोकपावनी गंगा का नाम स्‍मरण करने में समस्‍त पाप कट जाते हैं। जिनके दर्शन और स्‍थान से सप्‍तकुल पवित्र हो जाते हैं। गंगासागर तीर्थ की महिमा अपरिसीम और अनिर्वचनीय है।

इन धार्मिक आध्‍यात्मिक बातों के अलावा गंगा भारतवर्ष की चेतना, दर्शन और संस्‍कृति की धरोहर है। इसके तट पर न सिर्फ ऋषि, मुनि, साधक, तपस्‍वी अपनी साधना के चरम शिखर पर पहुंच कर सिद्धि प्राप्‍त किए बल्कि इसके तटभूमि में अनन्‍त याय योज्ञ शास्‍त्र पाठ, पुष्‍यानुष्‍ठान का आयोजन होते रहा है।

सागरद्वीप ब्रहम्‍पुत्र के डेल्‍टा के दक्षिण-पश्चिम छोर पर है। इस का क्षेत्रफल 205 वर्ग किमी है। इसके 9 ग्रामपंचायत है। 2001 की जनगणना के आधार पर यहां की जनसंख्‍या 1,85,630 थी। यहां पर एक महाविद्यालय, 6 उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय, 13 माध्‍यमिक विद्यालय, 12 निम्‍न माध्‍यमिक विद्यालय, 123 प्राथमिक विद्यालय, 16 गैरसरकारी के.जी एवं नर्सरी स्‍कूल, 63 शिशु केंद्र है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि स्‍थानीय सरकार यहां पर शिक्षा के प्रति कितनी सजग है। इसका परिणाम है कि यहां की साक्षरता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। स्‍वास्‍थ्य के प्रति भी इस जनविरल क्षेत्र में काफी जागरूकता दिखी। यहां एक ग्रामीण अस्‍पताल, प्राथमिक स्‍वास्‍थ्य केंद्र एवं 35 उप स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र हे। पेय जल की भी व्‍यवस्था की गई है। 600 नलकूप, 5 बोरिंग है खेल के दर्जन भर मैदान है। 7 सरकारी बैंक है। कृषि समिति, दुग्‍ध समिति मत्‍सय समिति आदि यहां की सक्रियता संबंधी जानकारी देते हैं। 35 किलोमीटर की पिचढलाई सड़क और 120 किलोमीटर की ईटं निर्मित सड़क यहां के परिवहन व्‍यवस्‍था को गति प्रदान करते हैं।

विधुत परिसेवा की कमी है। 17 डिजल इंजिन चालित जेनरेटर से प्रतिदिन शाम 5.30 से 9.30 तक 4 घंटा तक बिजली रहती है। सौरशक्ति से 10 गांवों को बिजली पहुंचाई जाती है। पवन चक्की से भी ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है।

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यहां पर बिजली पहुंचे इसकी परियोजना पर काम चल रहा है। और अनुमान है कि दो वर्षों में यह काम पूरा हो जाएगा।

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दोपहर दो बजे तक हमारी वापसी की यात्रा शुरू हो चुकी थी। जलयान द्वारा कोचु‍बेडि़या से लट नं. 8 वापस आए। वहां से पुनः अपनी गाड़ी से शाम छह बजे तक कोलकाता के अपने आवास तक पहुंच गए।

लौटते समय मन में यही भाव थे –

मातः शान्‍तति शम्‍भुसंगमिलिते मौलो निधायां‍जलिं।

त्‍वत्तीटे वपुषोsवसानसमये नारायणांध्रिद्वयम्।।

त्‍वन्‍नाथ समरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्‍सवे।

भूयाद्भक्तिरविच्युता हरिहराद्वैतात्मिका शाश्‍वतौ।।

हे मातः! तुम शंभु का निजस्‍व हो, उनके अंग से एकात्‍म हो। तुम्‍हारा प्रसाद जिसे मिला, वह मृत्‍युंजय हुआ। तुम्हारे तीर पर मरण के वरण से आनन्द और मुक्ति का लाभ होता है। इसी कारण मस्‍तक पर करबद्ध प्रणाम करके कहता हूँ--- मां, मेरे अन्तिम समय में तुम्‍हारा पुण्‍य सलिल मेरे शरीर पर पडे़, मैं नारायण का नाम लेता-लेता एवं तुम्‍हारा स्‍मरण करता-करता ही अद्वैत हरिहरात्‍मक ब्रह्मा की परमभक्ति में, अचला भक्ति में लीन हो जाउँ। मुझे परमगति की प्राप्ति हो।

बुधवार, 10 मार्च 2010

जी हाँ ! मुझे शर्म आयी।



जी हाँ ! मुझे शर्म आयी।
श्री संतोष कुमार गुप्‍ता , कनिष्‍ठ हिन्‍दी अनुवादक


शासकीय कर्मचारी होने के नाते मुझे एल.टी.सी. पर पूर्वोत्तर राज्यों में भ्रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ। पूर्वोत्तर राज्यों का भ्रमण मेरे लिए कुछ नया नहीं था क्योंकि मेरी ससुराल असम के बंगाईगाँव में ही है। मेरी पत्नी व उसके परिजन उसी स्थान पर 6 दशक से रहते आए हैं। मैं पहले भी पूर्वोत्तर जा चुका था किन्तु इस बार पूर्वोत्तर जाना मेरी विवशता थी। दरअसल मुझे मेरी पत्नी के छोटे भाई के विवाह मे शामिल होना था जिसे मैं कतई टाल नहीं सकता था।


अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मैं असम पहुँचा तथा विवाह समारोह में शामिल हुआ। इस दौरान मैं कई स्थानों पर घूमने भी गया और पता ही नहीं चला की कब मेरी 21 दिनों की छुट्टी समाप्त हो गई। घर लौटने की तैयारियाँ होने लगी। अगले दिन अर्थात 30/11/2009 को मुझे गुवाहाटी से फ्लाइट पकड़नी थी। अत: मेरे साले ने सुबह 05:00 बजे कार द्वारा गुवाहाटी एयरपोर्ट तक ले जाने की तैयारी कर ली किन्तु इसी बीच हमें खबर मिली की दिनांक 30/11/2009 को एक राजनीतिक पार्टी ने असम बंद का आह्वान किया गया है। हमारी वापसी की योजना धरी की धरी रह गई। बंद की स्थिति में असम में हिंसा होना आम बात होती है। ऐसी स्थिति में मुझे मजबूरन सपरिवार 29/11/2009 की रात 12:00 बजे ट्रेन से गोवहाटी के लिए निकलना पड़ा। दिनांक 30/11/2009 को प्रात: 4:30 बजे हम स्टेशन पर पहुँचे। हम रात भर सो नहीं पाए और थकान हम पर हावी हो रही थी परन्तु स्टेशन पर रूक कर हम कोई जोखिम नहीं ऊठाना चाहते थे, पता नहीं कब बंदी हो जाती। इसलिए हमने तत्काल एयरपोर्ट के लिए वाहन लिया और एयरपोर्ट पहुँच गए।


एयरपोर्ट पहुँचने के पश्चात हमने पाया कि ऐसे यात्री जिनकी फ्लाईट शाम 05:00 बजे की थी वे भी अलसुबह ही एयरपोर्ट पहुँच गए थे। हमारी फ्लाइट पूर्वा.11:40 की थी और हम लोग 06:30 बजे को ही गुवाहाटी के गोपीनाथ बोरदलोई एयरपोर्ट पहुँच गए थे। किसी तरह हमने 09:00 बजे तक का समय काटा और तत्‌पश्चात चैक-इन संबंधी औपचारिकताएं पूर्ण कर सिक्योरिटी चेक एरिया के पास यात्रियों के बैठने की कुर्सी पर जम गए। हमारे सामने बड़े आकार का रंगीन टेलिविजन रखा हुआ था जिसपर जी न्यूज का चैनल चल रहा था। मैंने आसपास के दृश्य का मुआयना किया और देखा कि प्रथम पंक्ति में दो सज्जन बैठे हुए थे जो कि पहनावे एवं बोलचाल से सरकारी विभाग के उच्चाधिकारी लग रहे थे। द्वितीय पंक्ति की दाँयी ओर एक युवा मणिपुरी युवती मेखला चादर पहने बैठी हुई थी। मेखला चादर असम राज्य का पारंपरिक वस्त्र है। मैंने अपनी बगल में देखा तो पाया की मेरी पत्नी और बच्चे को नींद ने अपनी आगोश में ले लिया था। मैं भी थका हुआ था किन्तु जगे रहने का प्रयास कर रहा था । इस बीच प्रथम पंक्ति में बैठे व्यक्तियों की बातचीत से मुझे ज्ञात हुआ कि उनमें से एक ब्रिगेडियर है तथा दिल्ली में तैनात है और दूसरा सांस्कृतिक विभाग में आई.ए.एस. अफसर।


मैं उकता रहा था तथा समय काटने के लिए मैं टेलिविजन देखने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। उस समय टेलिविजन पर मुम्बई पर हुए 26/11 आतंकी घटना की याद में जी टी.वी. द्वारा आयोजित समारोह की विडियो रिकार्डिंग दिखाई जा रही थी। एकाएक मैंने आगे बैठे ब्रिगेडियर साहब की आवाज सूनी "आई वाज देयर इन दिस फन्‍कशन! इट वाज रियली नाइस!"

अब आई.ए.एस. की बारी थी उसने कहा "माय डिपार्टमेंन्ट गेव सपोर्ट टू दैम!"

इस बीच टेलिविजन पर "राष्ट्रगान" का प्रसारण हुआ और मैंने देखा कि युवा मणिपुरी युवती तत्काल अपनी कुर्सी से खड़ी हो सावधान की मुद्रा में आ गई। मैं अब भी अपनी कुर्सी पर टिका हुआ था। ब्रिगेडियर और आई.ए.एस. अब भी अपनी-अपनी हाँके जा रहे थे। मेरी नजर पत्नी पर गई वह इस सब से बेखबर सो रही थी। मुझे अपने आप पर शर्म आई, जी हाँ! मुझे अपने आप पर शर्म आई। मैं स्वयं खड़ा हो गया तथा पत्नी से खड़े होने को कहा। उसने वैसा ही किया। राष्ट्रगान समाप्त हो चुका था किन्तु मेरी राष्ट्रभक्ति को जगा गया था। उस मणिपूरी युवती की राष्ट्रभक्ति के आगे मैं स्वयं को, ब्रिगेडियर तथा आई.ए.एस. को बहुत बौना पाता हूँ। उसकी राष्ट्रभक्ति के आगे पूर्वोत्तर के उस मंत्री के बयान को भी बौना पाता हूँ कि "भारत में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के साथ भेदभाव होता है। उन्हें भारतीय नहीं समझा जाता है।"

उस युवती ने समझा दिया कि राष्ट्रभक्ति किसी पद अथवा शासकीय सेवा की मोहताज नहीं वह तो हर आमोखास भारतीय नागरिक में निहित है।

जय हिन्द !! जय भारत !!