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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

यह मेरी मातृभूमि है

arunpicकथा सम्राट प्रेमचंद  की यह कहानी "यह मेरी मातृभूमि है" उनकी कम प्रचलित कहानियों में है लेकिन अपनी मिटटी के प्रति प्रेम को दिखाती यह एक महत्वपूर्ण कहानी है. आज जब विश्व की सीमाएं सिमट रही हैं  फिर भी आज प्रासंगिक है यह कहानी.  आप भी पढ़िए.                                   अरुण चंद्र रॉय
यह मेरी मातृभूमि है

प्रेमचंद

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है अरुण चंद्र रॉय की प्रस्तुति।

आज पूरे 60 वर्ष के बाद मुझे मातृभूमि-प्यारी मातृभूमि के दर्शन प्राप्त हुए हैं। जिस समय मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ था और भाग्य मुझे पश्चिम की ओर ले चला था, उस समय मैं पूर्ण युवा था। मेरी नसों में नवीन रक्त संचालित हो रहा था। हृदय उमंगों और बड़ी-बड़ी आशाओं से भरा हुआ था। मुझे अपने प्यारे भारतवर्ष से किसी अत्याचारी के अत्याचार या न्याय के बलवान हाथों ने नहीं जुदा किया था। अत्याचारी के अत्याचार और कानून की कठोरताएँ मुझसे जो चाहे करा सकती हैं, मगर मेरी प्यारी मातृभूमि मुझसे नहीं छुड़ा सकती। वे मेरी उच्च अभिलाषाएँ और बड़े-बड़े ऊँचे विचार ही थे, जिन्होंने मुझे देश-निकाला दिया था।
मैंने अमेरिका जाकर वहाँ खूब व्यापार किया और व्यापार से धन भी खूब पैदा किया तथा धन से आनंद भी खूब मनमाने लूटे। सौभाग्य से पत्नी भी ऐसी मिली, जो सौंदर्य में अपना सानी आप ही थी। उसकी लावण्यता और सुन्दरता की ख्याति तमाम अमेरिका में फैली। उसके हृदय में ऐसे विचार की गुंजाइश भी न थी, जिसका संबंध मुझसे न हो, मैं उस पर तन-मन से आसक्त था और वह मेरी सर्वस्व थी। मेरे पाँच पुत्र थे जो सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट और ईमानदार थे। उन्होंने व्यापार को और भी चमका दिया था। मेरे भोले-भाले नन्हें-नन्हें पौत्र गोद में बैठे हुए थे, जबकि मैंने प्यारी मातृभूमि के अंतिम दर्शन करने को अपने पैर उठाये। मैंने अनंत धन, प्रियतमा पत्नी, सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े नन्हें-नन्हें बच्चे आदि अमूल्य पदार्थ का केवल इसीलिए परित्याग कर दिया कि मैं प्यारी भारत-जननी का अंतिम दर्शन कर लूँ। मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ; दस वर्ष के बाद पूरे सौ वर्ष का हो जाऊंगा। अब मेरे हृदय में केवल एक ही अभिलाषा बाकी है कि मैं अपनी मातृभूमि का रजकण बनूँ।


यह अभिलाषा कुछ आज ही मेरे मन में उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि उस समय भी थी जब मेरी प्यारी पत्नी अपनी मधुर बातों और कोमल कटाक्षों से मेरे हृदय को प्रफुल्लित किया करती थी। और जबकि मेरे युवा पुत्र प्रात:काल आकर अपने वृद्ध पिता को सभक्ति प्रणाम करते, उस समय भी मेरे हृदय में एक काँटा-सा खटखटाता रहता था कि मैं अपनी मातृभूमि से अलग हूँ। यह देश मेरा देश नहीं है और मैं इस देश का नहीं हूँ।

मेरे पास धन था, पत्नी थी, लड़के थे और जायदाद थी, मगर न मालूम क्यों, मुझे रह-रहकर मातृभूमि के टूटे झोंपड़े, चार-छै बीघा मौरूसी जमीन और बालपन की लँगोटियाँ यारों की याद अक्सर सता जाया करती। प्राय: अपार प्रसन्नता और आनंदोत्सव के अवसर पर भी यह विचार हृदय में चुटकी लिया करता था कि ‘‘यदि मैं अपने देश में होता।’’

जिस समय मैं बंबई में जहाज से उतरा, मैंने पहिले काले कोट-पतलून पहने टूटी-फूटी अँगरेजी बोलते हुए मल्लाह देखे। फिर अँगरेज़ी दूकान, ट्राम और मोटरगाड़ियाँ दीख पड़ी। इसके बाद रबरटायर वाली गाड़ियों की ओर मुँह में चुरट दाबे हुए आदमियों से मुठभेड़ हुई। फिर रेल का विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन देखा। बाद में मैं रेल में सवार होकर हरी-भरी पहाड़ियों के मध्य में स्थित अपने गाँव को चल दिया। उस समय मेरी आँखों में आँसू भर आये और मैं खूब रोया, क्योंकि यह मेरा देश न था। यह वह देश न था, जिसके दर्शनों की इच्छा सदा मेरे हृदय में लहराया करती थी। यह तो कोई और देश था। यह अमेरिका या इंग्लैंड था; मगर प्यारा भारत नहीं था।

रेलगाड़ी जंगलों, पहाड़ों, नदियों और मैदानों को पार करती हुई मेरे प्यारे गाँव के निकट पहुँची, जो किसी समय में फूल, पत्तों और फलों की बहुतायत तथा नदी-नालों की अधिकता से स्वर्ग की होड़ कर रहा था। मैं उस गाड़ी से उतरा, तो मेरा हृदय बाँसों उछल रहा था-अब अपना प्यारा घर देखूँगा-अपने बालपन के प्यारे साथियों से मिलूँगाँ। मैं इस समय बिलकुल भूल गया था कि मैं 10 वर्ष का बूढ़ा हूँ। ज्यों-ज्यों मैं गाँव के निकट आता था, मेरे पग शीघ्र-शीघ्र उठते थे और हृदय में अकथनीय आनंद का स्रोत्र उमड़ रहा था। प्रत्येक वस्तु पर आँखें फाड़-फाड़कर दृष्टि डालता। अहा ! यह वही नाला है, जिसमें हम रोज घोड़े नहलाते थे और स्वयं भी डुबकियाँ लगाते थे, किन्तु अब उसके दोनों और काँटेदार तार लगे हुए थे। सामने एक बँगला था, जिसमें दो अँगरेज बँदूकें लिये इधर-उधर ताक रहे थे। नाले में नहाने की सख्त मनाही थी।

गाँव में गया और निगाहें बालपन के साथियों को खोजने लगीं, किन्तु शोक ! वे सब के सब मृत्यु के ग्रास हो चुके थे। मेरा घर-मेरा टूटा-फूटा झोपड़ा-जिसकी गोद में मैं बरसों खेला था, जहाँ बचपन और बेफ्रिकी का आनंद लूटे थे और जिनका चित्र अभी तक मेरी आँखों में फिर रहा था, वही मेरा प्यार घर अब मिट्टी का ढेर हो गया था।

यह स्थान गैर-आबाद न था। सैकड़ों आदमी चलते-फिरते दृष्टि में आते थे, जो अदालत-कचहरी और थाना-पुलिस की बातें कर रहे थे, उनके मुखों से चिंता, निर्जीवता और उदासी प्रदर्शित होती थी और वे सब सांसारिक चिंताओं से व्यथित मालूम होते थे। मेरे साथियों के समान हृदय-पुष्ट, बलवान, लाल चेहरे वाले नवयुवक कहीं न दीख पड़ते थे। उस अखाड़े के स्थान पर जिसकी जड़ मेरे हाथों ने डाली थी, अब एक टूटा-फूटा स्कूल था। उसमें दुर्बल तथा कांतिहीन, रोगियों की-सी सूरत वाले बालक फटे कपड़े पहिने बैठे ऊँघ रहे थे। उनको देखकर सहसा मेरे मुख से निकल पड़ा कि नहीं-नहीं, यह मेरा प्यारा देश नहीं है।

बरगद के पेड़ की ओर मैं दौड़ा, जिसकी सुहावनी छाया में मैंने बचपन के आनंद उड़ाये थे, जो हमारे छुटपन का क्रीड़ास्थल और युवावस्था का सुखद वासस्थान था। आह ! इस प्यारे बरगद को देखते ही हृदय पर एक बड़ा आघात पहुँचा और दिल में महान् शोक उत्पन्न हुआ। उसे देखकर ऐसी-ऐसी दु:खदायक तथा हृदय-विदारक स्मृतियाँ ताजी हो गयीं कि घण्टों पृथ्वी पर बैठे-बैठे मैं आँसू बहाता रहा। हाँ ! यही बरगद है, जिसकी डालों पर चढ़कर मैं फुनगियों तक पहुँचता था, जिसकी जटाएँ हमारी झूला थीं और जिसके फल हमें सारे संसार की मिठाइयों से अधिक स्वादिष्ट मालूम होते थे। मेरे गले में बाहे डालकर खेलने वाले लँगोटिया यार, जो कभी रूठते थे, कभी मनाते थे, कहाँ गये ? हाय, बिना घरबार का मुसाफिर अब क्या अकेला हूँ ? क्या मेरा कोई भी साथी नहीं ? इस बरगद के निकट अब थाना था और बरगद के नीचे कोई लाल साफा बाँधे बैठा था। उसके आस-पास दस-बीस लाल पगड़ी वाले करबद्ध खड़े थे। वहाँ फटे-पुराने कपड़े पहने, दुर्भिक्षग्रस्त पुरुष, जिस पर अभी चाबुकों की बौछार हुई थी, पड़ा सिसक रहा था। मुझे ध्यान आया कि यह मेरा प्यारा देश नहीं है, कोई और देश है। यह योरोप है, अमेरिका है, मगर मेरी प्यारी मातृभूमि नहीं है- कदापि नहीं है।

इधर से निराश होकर मैं उस चौपाल की ओर चला, जहाँ शाम के वक्त पिताजी गाँव के अन्य बुजुर्गों के साथ हुक्का पीते और हँसी-कहकहे उड़ाते थे। हम भी उस टाट के बिछौने पर कलाबाजियाँ खाया करते थे। कभी-कभी वहाँ पंचायत भी बैठती थी, जिसके सरपंच सदा पिताजी ही हुआ करते थे। इसी चौपाल के पास एक गोशाला थी, जहाँ गाँव भर की गायें रखी जाती थीं, और बछड़ों के साथ हम यहीं किलोलें किया करते थे। शोक ! कि अब उस चौपाल का पता तक न था। वहाँ अब गाँवों में टीका लगाने की चौकी और डाकखाना था।

उस समय इसी चौपाल से लगा एक कोल्हवाड़ा था, जहाँ जाड़े के दिनों में ईख पेरी जाती थी और गुड़ की सुगंध से मस्तिष्क पूर्ण हो जाता था। हम और हमारे साथी वहाँ गंडरियों के लिए बैठे रहते और गंडरियाँ करने वाले मजदूरों के हस्तलाघव को देखकर आश्चर्य किया करते थे। वहाँ हजारों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिलाकर पिया था और वहाँ आस-पास के घरों की स्त्रियाँ और बालक अपने-अपने घड़े लेकर आते थे और उनमें रस भरकर ले जाते थे। शोक है कि वे कोल्हू अब तक ज्यों के त्यों खड़े थे, किन्तु कोल्हवाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटने वाली मशीन लगी थी और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेटवाले की दूकान थी। इन हृदय-विदारक दृश्यों को देखकर मैंने दुखित हृदय से, एक आदमी से, जो देखने में सभ्य मालूम होता था, पूछा, ‘‘महाशय, मैं एक परदेशी यात्री हूँ। रात भर लेट रहने के लिए मुझे आज्ञा दीजिए ?’’ इस आदमी ने मुझे सिर से पैर तक गहरी दृष्टि से देखा और कहने लगा कि ‘‘आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है।’’ मैं आगे गया और वहां से भी यही उत्तर मिला। ‘‘आगे जाओ।’’ पाँचवीं बार एक सज्जन से स्थान माँगने पर उन्होंने एक मुट्ठी चने मेरे हाथ पर रख दिये। चने मेरे हाथ से छूट पड़े और नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा बहने लगी। मुख से सहसा मिकल पड़ा कि ‘‘हाय ! यह मेरा देश नहीं है, यह कोई और देश है। यह हमारा अतिथि-सत्कारी प्यारा भारत नहीं है- कदापि नहीं।’’

मैंने एक सिगरेट की डिबिया खरीदी और एक सुनसान जगह पर बैठकर सिगरेट पीते हुए पूर्व समय की याद करने लगा कि अचानक मुझे धर्मशाला का स्मरण हो आया, जो मेरे विदेश जाते समय बन रही
थी; मैं उस ओर लपका कि रात किसी प्रकार वहीं काट लूँ, मगर शोक ! शोक !!! महान् शोक ! !!! धर्मशाला ज्यों की त्यों खड़ी थी, किन्तु उसमें गरीब यात्रियों के टिकने के लिए स्थान न था। मदिरा, दुराचार और द्यूत ने उसे अपना घर बना रखा था। यह दशा देखकर विवशतः मेरे हृदय से एक सर्द आह निकल पड़ी और मैं जोर से चिल्ला उठा कि ‘‘नहीं, नहीं, नहीं और हजार बार नहीं है’’- यह मेरा प्यारा भारत नहीं है। यह कोई और देश है। यह योरोप है, अमेरिका है; मगर भारत कदापि नहीं है।

अँधेरी रात थी। गीदड़ और कुत्ते अपने-अपने कर्कश स्वर के उच्चारण कर रहे थे। मैं अपना दुखित हृदय लेकर उसी नाले के किनारे जाकर बैठ गया और सोचने लगा- अब क्या करूँ। फिर अपने पुत्रों के पास लौट जाऊँ और अपना यह शरीर अमेरिका की मिट्टी में मिलाऊँ। अब तक मेरी मातृभूमि थी, मैं विदेश में जरूर था किंतु मुझे अपने प्यारे देश की याद बनी थी, पर अब मैं देश-विहीन हूँ। मेरा कोई देश नहीं है। इसी सोच-विचार में मैं बहुत देर तक घुटनों पर सिर रखे मौन रहा। रात्रि नेत्रों में ही व्यतीत की। घंटे वाले ने तीन बजाये और किसी के गाने का शब्द कानों में आया। हृदय गद्गद् हो गया कि यह तो देश का ही राग है, यह तो मातृभूमि का ही स्वर है। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ और क्या देखता हूँ कि 15-20 वृद्ध स्त्रियाँ, सफेद धोतियाँ पहिने, हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं :
‘‘हमारे प्रभु, अवगुन चित न धरो....’’

मैं इस गीत को सुनकर तन्मय हो ही रहा था कि इतने में मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुन पड़ी। उनमें से कुछ लोग हाथों में पीतल के कमंडलु लिये हुए शिव-शिव, हर-हर, गंगे-गंगे, नारायण-नारायण आदि शब्द बोलते हुये चले जाते थे। आनंददायक और प्रभावोत्पादक राग से मेरे हृदय पर जो प्रभाव हुआ, उसका वर्णन करना कठिन है।

मैंने अमेरिका की चंचल से चंचल और प्रसन्न से प्रसन्न चित्तवाली लावण्यवती स्त्रियों का आलोप सुना था, सहस्त्रों बार उनकी जिह्वा से प्रेम और प्यार के शब्द सुने थे, हृदयाकर्षक वचनों का आनंद उठाया था, मैंने सुरीले पक्षियों का चहचहाना भी सुना था, किन्तु जो आनंद, जो मज़ा और जो सुख मुझे इस राग में आया, वह मुझे जीवन में कभी प्राप्त नहीं हुआ था। मैंने खुद गुनगुना कर गाया :
‘‘हमारे प्रभु, अवगुन चित न धरो.....’’

मेरे हृदय में फिर उत्साह आया कि ये तो मेरे प्यारे देश की ही बातें हैं। आनंदातिरेक से मेरा हृदय आनंदमय हो गया। मैं भी इन आदमियों के साथ हो लिया और 6 मील तक पहाड़ी मार्ग पार करके उसे नदी के किनारे पहुँचा, जिसका नाम पतित-पावनी है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिंदू अपना परम सौभाग्य समझता है। पतित-पावनी भागीरथी गंगा मेरे प्यारे गाँव से छै-सात मील पर बहती है। किसी समय में घोड़े पर चढ़कर गंगा माता के दर्शनों की लालसा हृदय में सदा रहती थी। यहाँ मैंने हजारों मनुष्यों को इस ठंडे पानी में डुबकी लगाते हुए देखा। कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री-मंत्र का जाप कर रहे थे। कुछ लोग हवन करने में संलग्न थे। कुछ माथे पर तिलक लगा रहे थे और कुछ लोग सस्वर वेदमंत्र पढ़ रहे थे। मेरा हृदय फिर उत्साहित हुआ और मैं जोर से कह उठा- ‘‘हाँ, हाँ, यही मेरा प्यारा देश है, यही मेरी पवित्र मातृभूमि है, यही मेरा सर्वश्रेष्ठ भारत है और इसी के दर्शनों की मेरी उच्कट इच्छा थी तथा इसी की पवित्र धूलि कण बनने की मेरी प्रबल अभिलाषा है।’’

मैं विशेष आनंद में मग्न था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतारकर फेंक दिया और गंगा माता की गोद में जा गिरा, जैसे कोई भोला-भाला बालक दिनभर निर्दय लोगों के साथ रहने के बाद संध्या को अपनी प्यारी माता की गोद में दौड़कर चला आये और उसकी छाती से चिपट जाय। हाँ, अब मैं अपने देश में हूँ। यह मेरी प्यारी मातृभूमि है। ये लोग मेरे भाई हैं और गंगा मेरी माता है।

मैंने ठीक गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटी बनवा ली है। अब मुझे सिवा राम-नाम जपने के और कोई काम नहीं है। मैं नित्य प्रात:-सायं गंगा-स्नान करता हूँ और मेरी प्रबल इच्छा है कि इसी स्थान पर मेरे प्राण निकलें और मेरी अस्थियाँ गंगा माता की लहरों की भेंट हों।

मेरी स्त्री और मेरे पुत्र बार-बार बुलाते हैं; मगर अब मैं यह गंगा माता का तट और अपना प्यारा देश छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। अपनी मिट्टी गंगा जी को ही सौंपूंगा। अब संसार की कोई आकांक्षा मुझे इस स्थान से नहीं हटा सकती, क्योंकि यह मेरा प्यार देश और यही प्यारी मातृभूमि है। बस, मेरी उत्कट इच्छा यही है कि मैं अपनी प्यारी मातृभूमि में ही अपने प्राण विसर्जन करूँ।

मंगलवार, 5 जून 2012

गिरता रुपया देश की खोखली अर्थव्यवस्था की ओर कर रहा है इशारा

गिरता रुपया : देश की खोखली अर्थव्यवस्था की ओर इशारा

AIbEiAIAAABDCOfE87DiktCQTiILdmNhcmRfcGhvdG8qKGQyMmMwOTc5M2E3NzM0ZTAwMjc5ZjhkMTk4Y2ZiNjZkYjI1YTljZjAwAWm5rQn5UZTmF-r64rk6zu1s5kWWअरुण चन्द्र रॉय

सबसे पहले बता दूं कि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं और जो कोई अपना घर चला लेता है वह अर्थशास्त्री ही  है. जहाँ तक देश की  अर्थव्यवस्था का सवाल है, हाल ही  में जिस तरह डालर के मुकाबले रुपया तेज़ी से गिरा है, यह कोई आर्थिक घटना मात्र नहीं है बल्कि देश की खोखली हो चुकी   अर्थव्यवस्था की ओर इशारा कर रहा है.

आम बोलचाल की भाषा में समझे तो डालर के मुकाबले रुपये  के भाव का गिरने का कारण है आयात और निर्यात में अंतर. तकनीकी भाषा में इसे करेंट अकाउंट घाटा कहते हैं. करेंट अकाउंट का तात्पर्य है व्यापार संतुलन अर्थात कुल  निर्यात में से कुल आयात जिसमे उत्पाद और सेवा शामिल हैं को घटाकर प्राप्त आंकड़ा और जिस अर्थव्यवस्था का व्यापार संतुलन सकारात्मक होता है वह सबल और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था मानी जाती है.

बार बार यह जोर देकर कहा जाता है कि देश चौतरफा प्रगति कर रहा  है लेकिन सच बात यह है कि यह प्रगति उधार की है.

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि आज़ादी के बाद जब देश विषम परिस्थितियों में था तब भी हमारा व्यापार संतुलन सकारात्मक था और यह स्थिति कमोवेश सत्तर के दशक तक बनी हुई थी. सत्तर के दशक में करेंट अकाउंट घाटा नहीं था बल्कि यह १ बिलियन डालर सकारात्मक था, वहीँ  २०११ में यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद का ४% से अधिक हो कर १९ बिलियन यूएस डालर से अधिक पहुच गया है. ऐसे में दुनिया का विश्वास हमारी अर्थव्यवस्था पर डगमगाना बहुत सामान्य है.

फरवरी २०१२ में डालर का मूल्य लगभग ४८ रुपया था लेकिन अचानक क्या हो गया कि इसमें लगभग १६% की गिरावट आ गई और यह ५६ रूपये से अधिक पहुच गया. इसका सबसे बड़ा कारण है भारत का करेंट अकाउंट घाटा जो कि जी ड़ी पी का ४% से अधिक हो गया है, जिसकी भरपाई मुश्किल होती है. ताज्जुब की बात यह है कि जिस देश के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री अर्थशास्त्री हो और पिछले दस वर्षो से देश की कमान उनके हाथ में हो . वहां  इस घाटे को कम करने के कोई उपाय नहीं किये जा रहे. आम तौर पर जीडीपी का २.५% तक व्यापारिक घाटा सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसकी भरपाई आकस्मिक स्थिति में  ऍफ़ आई आई, एन आर आई डिपोजिट से पूरी की जा सकती  है लेकिन अभी देश एक तरह से कंगाली के ज्वालामुखी पर खड़ा है.

देश में ८०% से अधिक पेट्रोलियम उत्पादों का आयात हो रहा है, साथ ही ऊर्जा के अन्य श्रोतों जैसे कोयले का आयत भी किया जा रहा है. कुछ समय से सोने के आयात में भी काफी मुद्रा की जरुरत हो रही है. इनके आयात पर ना कोई नियंत्रण है न कोई ठोस नीति, फिर रूपये के स्वास्थ्य पर इनका असर पड़ना स्वाभाविक है. फिर भी वर्तमान अवस्था के लिए हमारी नीतियां जिम्मेदार हैं जब भारतीय रुपये  को नब्बे के दशक के मध्य में एक्सचेंज रेट तंत्र में लाया गया. आर्थिक उदारीकरण की दिशा में यह प्रमुख कदम माना गया था लेकिन इस से व्यापर असंतुलन वाली अपनी  अर्थव्यवस्था की मुद्रा को ट्रेडिंग में डाल दिया गया जिससे रुपये  पर विश्व के किसी में कोने में होने वाली आर्थिक घटना का प्रभाव पड़ने लगा. थोड़ी सी स्मृति पर जोर डालेंगे तो पायेंगे कि जैसे ही रुपया एक्सचेज रेट तंत्र में आया वैसे ही एशियाई बाज़ार में संकट आया और रुपया अचानक से डालर के मुकाबले तेज़ी से गिरा था. कुछ ऐसा ही अब हुआ है जब यूरो ज़ोन में अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है, यूरो देशों से निवेश वापिस जा रहा है, एक के बाद एक घोटालो के कारण कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जारी नोटिस के कारण, देश की साख घटी है,  अपना देश चारो ओर से आर्थिक दलदल में है.

वित्त मंत्री और आर बी आई किसी तरह के नीतिगत कदम उठाने में असमर्थ  हैं. सबसे आसान था पेट्रोलियम उत्पादों का दाम बढ़ाना, जो किया जा चुका है, जबकि कच्चे तेल के दाम में हुई कमी के वावजूद देश में पेट्रोल के दाम बढ़ाना, कतई भी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है. आज परिस्थियाँ पहले से अधिक गंभीर हैं. हमारा व्यापर घाटा लगातार बढ़ रहा है. सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धिदर में कमी आई है. हमारे पारंपरिक आर्थिक आधार जैसे कृषि में नकारात्मक वृद्धि है. ऐसे में यदि अर्थव्यवस्था में अनुशासन नहीं आता है, आयात पर लगाम नहीं लगते हैं तो आने वाला समय हमारी अर्थव्यवस्था के लिए  और भी संकटप्रद होगा. रुपये  के मोल का गिरना केवल रुपये  का गिरना भर नहीं है. यह बता रहा है कि कमजोर पड़ रहे हैं हमारी  अर्थव्यवस्था के  स्तम्भ.

मंगलवार, 8 मई 2012

औद्योगिक उत्पादन में कमी गंभीर आर्थिक बीमारी का संकेत


औद्योगिक उत्पादन में कमी गंभीर आर्थिक बीमारी का संकेत 

अरुण चंद्र रॉय

वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट के दौड़ से गुजर रही है. विकसित देशों में विकास का डर लगातार नकारात्मक हो रहा है. दुनिया भर की निगाहें उन विकासशील और गरीब देशों पर टिकी हैं जहाँ दोहन संभव हो सके. कुछ वर्ष पूर्व भारत भी उन्हीं देशों में से एक था. विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण होता है खपत में कमी. मांग में संत्रिप्तता. ऐसे में उनकी कंपनियों को नए बाज़ार की तलाश होती है. कभी नई प्रोद्योगिकी के नाम पर, तो कभी विकास के नए सोपान को दिखा कर विकसित देश पहले उन देशों की अर्थव्यवस्था को बाज़ार के लिए खोलते हैं. भारत में उदारीकरण को इसी घटनाक्रम में देखने की जरुरत है. धीरे धीरे भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी उद्योग और व्यापारिक क्षेत्र निवेश के नाम पर खुले. लेकिन गत दो दशक में सिवाय शहरीकरण, बाजारीकरण और अंधाधुंध उपभोक्तावाद के अधिक कुछ नहीं हासिल नहीं हुआ है. 

पिछले वित्तीय वर्ष में निर्यात और आयात की खाई और भी चौड़ी हो गई है. व्यापारिक संतुलन लगातार ख़राब हो रहा है. आम भाषा में कहें तो विदेशों से हम अधिक खपत करते हैं और हमारे उत्पाद कम मात्रा में दूसरे देशों में जाते हैं. जहाँ हमारा घरेलू उत्पादन, विनिर्माण में लगातार कमी हो रही वहीँ हमारा आयात 31% की दर से बढ़ा है (अप्रैल-अक्टूबर 2012 ) जो कि एक चिंता का विषय है. यह दर्शाता है कि हमारी खपत और मांग विदेशों पर कितनी निर्भर हो गई है. जनवरी 2002 में भारत का व्यापारिक असंतुलन लगभग 2ओ मिलियन अमेरिकी डालर का था जबकि मार्च, 2012 में यह घाटा बढ़ कर 13,906 मिलियन अमेरिकी डालर हो गया है. यह दर्शाता है कि हमारी आत्मनिर्भरता कम होने की बजाय बढ़ी है. आम आदमी के लिए ये आंकडे भले ही समझ ना आये लेकिन अंततः भुक्तभोगी वही होता है. 

हाल में ही जारी औद्यगिक उत्पादन सूचकांक (आई आई पी ) के आंकडे बताते हैं कि औद्योगिक उत्पादन पिछले वित्तीय वर्ष यानि 2011-12 में महज 3.5% की वृद्धि हुई. किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए विनिर्माण, खनन और विद्युत् क्षेत्र का विकास बहुत मायने रखते हैं. भारत जैसे विकासशील देश के लिए विनिर्माण यानि मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र कभी अर्थव्यवस्था का आधार हुआ करता था. जहाँ विनिर्माण क्षेत्र में लोगों को रोजगार मिलता है वहीँ अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ आधार भी. अभी अपने देश के आधे गाँव तक बिजली पहुचनी है, विद्युत् क्षेत्र का विकास भी बहुत महत्वपूर्ण है. किन्तु चिंता की का विषय है कि खनन क्षेत्र में नकारात्मक वृद्धि हुई है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र में विकास की गति केवल 3.7 % रहा है जो कि औसत जीडीपी के दर से भी काफी कम है. इस से प्रतीत होता है भारतीय अर्थव्यवस्था के पारंपरिक आधार खिसक रहे हैं. 

बुधवार, 28 मार्च 2012

सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं

सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

अच्छा हुआ कि श्री श्री रविशंकर जी ने यह बयान दिया कि सरकारी स्कूल नक्सली पैदा करते हैं. कम से कम सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल की एक बहस तो शुरू होगी. इस विषय पर मेरा अध्यनन कुछ नहीं है लेकिन सरकारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय से पढ़ कर निकला हूं तो थोडा अहम् को ठेस तो लगा ही है.


पब्लिक स्कूल की अवधारणा 

इतिहास का तो नहीं पता लेकिन मुझे लगता है कि पब्लिक स्कूल की अवधारणा भारत में अंग्रेज़ों के आने के बाद शुरू हुई है. कहीं पढ़ रहा था कि भारत में जातीय और धार्मिक विद्वेष पहले उतना नहीं था, यह तो अंग्रेज़ों ने आकर पैदा किया. उनके हित साधन के लिए, यानी भारत पर शासन करने के लिए भारतीय समाज में दो वर्ग पैदा करना ज़रुरी था, एक जो शासन करे और एक जिस पर शासन चले. शासक वर्ग को तब तक अलग नहीं किया जा सकता था जब तक कि उनके बच्चे को समाज से अलग न हों और वहीं से शुरू हुई अलग स्कूल की जरुरत. यहीं पडी थी पब्लिक स्कूल की नींव. देश आज़ाद तो हुआ लेकिन मानसिकता नहीं बदली. सो चलते रहे इस तरह के स्कूल. आर्थिक उदारीकरण  के बाद समाज में यह खाई और बढ़ी और स्कूल बन गए स्टेटस सिम्बल. पब्लिक स्कूल बन गए बाज़ार. बाज़ार का नियम है एक उत्पाद तब तक नहीं चल सकता जब तक कि उसके प्रतिस्पर्धी उत्पाद को निकृष्ट न दिखाया जाय. बाज़ार में होड़ होना ज़रुरी है. यही होड़ आज अपने चरम पर है जो बेहतर पढाई के नाम पर मध्यवर्गीय भारतीय समाज की जेब काट रहा है.

भारत में विद्यालय

भारत एक विशाल देश है. अधिकाश लोगों को भारत के भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक विषमता और व्यापकता का आभास ही नहीं है.  सरकारी आकड़ों को मान लें, तो भी अभी देश के आधे गाँव में चार घंटे बिजली नहीं पहुची है. सौ लोगों तक की आबादी वाले मोहल्ले तक सड़क पहुचने के लक्ष्य से काफी दूर है अपनी सरकार. ऐसे में स्कूल तक कितनी पहुंच होगी देश के नौनिहालों की, यह सहज सोचा और महसूस किया जा सकता है. देश में अभी लगभग सात लाख प्राथमिक विद्यालय हैं. लेकिन एक बच्चे को 1 से 3 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है प्राथमिक विद्यालय तक पहुचने के लिए.  माध्यमिक विद्यालय तक यह दूरी और बढ़ जाती है. कालेज के लिए तो यह दूरी 25 से 50 किलोमीटर तक भी हो जाती है.  जिन लोगों का कभी गाँव या सुदूर गाँव से पाला नहीं पड़ा है वे सोच भी नहीं सकते हैं कि बिना भवन और शिक्षक के कैसे स्कूल चलते हैं. यह तो है देश में शिक्षा की दयनीय तस्वीर. लेकिन हर दयनीय व्यक्ति नक्सली है, यह नहीं हो सकता.

सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल 

school1देश में तीन तरह के विद्यालय हैं. एक खास सरकारी. एक पब्लिक स्कूल और एक बड़ा तबका स्कूल का सरकारी स्कूल को बदनाम करते हुए बिना मान्यता के चलते हैं. ऐसे स्कूलों की संख्या बड़ी तादाद में है. खैर यह एक अलग मुद्दा है. 52वे राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण आकडे के अनुसार देश में उच्च विद्यालय में लगभग 86 %  बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और शेष 14 % पब्लिक स्कूलों में, जिसमे असंगठित रूप से चल रहे पब्लिक स्कूल भी शामिल हैं.  सरकारी स्कूल भी तीन तरह के हैं. एक केंद्रीय विद्यालय, जिसमे अधिकांशतः शहरी, सरकारी कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं. दूसरे सुदूर क्षेत्र में अवस्थित नवोदय विद्यालय और तीसरे देश के विभिन राज्यों में चलते प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय. गौरतलब है कि इन तीनो विद्यालयों का परीक्षा परिणाम लगातार तथाकथित पब्लिक स्कूलों को पीछे छोड़ रहा है.

schol2एक अध्ययन के अनुसार 2001 से 2011 तक की अवधि में जवाहर नवोदय विद्यालय (जो कि एक सरकारी स्कूल ही है) में दसवी की परीक्षा में सफलता के परिणाम में लगातार सुधार हुआ है और 2001 में 87% पास परिणाम की तुलना में 2011 में पास हुए विद्यार्थियों की प्रतिशतता बढ़ कर 97.5% हो गई है. जबकि पब्लिक स्कूलों की पास प्रतिशतता 2011 में 92 प्रतिशत रही है. केंद्रीय विद्यालयों का औसत भी पब्लिक स्कूलों की तुलना में बेहतर ही है. भारतीय प्रसाशनिक सेवा अधिकारीयों पर किये गए एक अध्यनन के अनुसार 73% आई ए एस अधिकारी ग्रामीण पृष्टभूमि से होते हैं और सरकारी स्कूलों से पढ़े होते हैं. 

जीवन में उपलब्धिया 

एक पुस्तक "डाइवर्सिटी एंड चेंज़ इन माडर्न इण्डिया - एंटोनी ऍफ़ हीथ और रोज़र जेफरी (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) "  के अनुसार भारत में सफल जीवन जीने वाले लोग आम तौर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और उनमे परिवर्तन करने और नेतृत्व क्षमता अधिक होती है. देश में बदलाव लाने वालों की अगली कतार में वे हैं जिनका संघर्ष अधिक रहा है. ऐसे लोगों की सूची में देश के बड़े वैज्ञानिको, खिलाडियों, शिक्षाविदो के नाम हैं जिन्होंने आधुनिक भारत की नीव रखी है. भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का नाम भी इसमें शामिल है. एक शोधपत्र "एक्सेस, सटिस्फैक्शन एंड फ्यूचर : अंडर ग्रैज़ुएट  एजुकेशन इन इण्डिया - आर वर्मा " में स्पष्ट उल्लेख है कि सरकारी स्कूलों और खुद पढ़ कर आये छात्र में रचनात्मकता और नवोंन्मेषण तुलनात्मक रूप से अधिक होती है और वे अपने जीवन को नए नज़रिए से देखते हैं तथा नए समाधान के लिए उत्त्प्रेरक का काम करते हैं.  इसके अतिरिक्त सरकारी स्कूल से सैकड़ों ड्रॉप आउट बच्चे ऐसे हैं जो कुशल, अर्धकुशल कामगार के रूप में देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान कर रहे हैं. क्या श्रम का योगदान आर्थिक विकास के चित्र से हटा दिया जायेगा ?

ऐसे में, श्री श्री रविशंकर से आग्रह है,

आप कभी भारत के उन गाँव, कस्बो की यात्रा करें, सरकारी स्कूलों में एक दिन बिताएं, जहाँ बच्चे सूरज, चाँद, खेत खलिहान, फसल, तालाब, पोखर से सीखते हुए बड़े होते हैं. जीवन जीने की कला उनमे प्राकृतिक रूप से आती है. वे नक्सल नहीं होते. वे परिवर्तनगामी होते हैं. 

सरकारी स्कूल – यानी असरकारी स्कूल!

मंगलवार, 20 मार्च 2012

शिकायती टट्टू (व्यंग्य रचना)

शिकायती टट्टू

(व्यंग्य रचना) 

मेरा फोटोअरुण चन्द्र रॉय

लोकतंत्र का चरित्र बदल रहा है.  जनता जाग गई है और यही है असली समस्या. जनता हो गई है शिकायती टट्टू. हर चीज़ में शिकायत. हर बात में शिकायत. ठीक है कि हर एक वोट जरुरी है लेकिन अब देश के हर व्यक्ति की सुविधा और जरुरत का ख्याल तो रखा नहीं जा सकता ना.  लोग पीछे पड़ गए हैं कि सेवा का अधिकार अधिनियम पास हो गया है तो सब काम समय पर होना चाहिए. लेकिन यदि सब काम समय पर होना ही होता तो अधिनियम की क्या जरुरत थी.


जनता को शिकायत करने की आदत है, तो आदत है सरकार की भी कान में तेल डाल सोने की. डंका बजा बजा के जनता सरकार को जगाना चाह रही थी लेकिन हुआ क्या?  उदाहरण के तौर पर जनता छोटी छोटी बातों पर शिकायत करने लगती है.  अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकान पर यदि चीनी नहीं मिले तो शिकायत, दाना छोटा हो जाये तो शिकायत. अरे भाई ! सरकार कोई हंसी खेल थोड़े ही है! सरकार है, इसे देश को चलाना है. अब सरकार चीनी के दाने पर नियंत्रण  रखें या दाम पर. दाम पर नियंत्रण रखती हैं तो सरकार अल्पमत में आ जाती है. बड़े बड़े घाघ बैठे हैं … सरकार में … जो देश की मिठास पर कब्ज़ा जमाये हुए हैं.  दाना के बड़े छोटे होने को तो संभाला भी जा सकता है, लेकिन जनता से  जरुरत तो पांच साल में एक बार ही पड़ती है. उसे तो अंत में मना ही लिया जाता है.

शिकायती टट्टू तो हो गई जनता लेकिन स्मृति दोष भी तो है. जिस चौखट से दुत्कारे जाते हैं, वहीँ दुम दबाये, दुम हिलाते पहुँच जाते हैं. अब पिछली बार साइकिल के पहिये से बाँध जनता को कितना घसीटा गया था तो जनता ने भी पाला बदल लिया. जब पांच साल तक हाथी के पैरो के नीचे कुचलने के बाद फिर से उसी साइकिल के पहिये से बंधना पड़ गया. अब क्या हक़ है जनता को शिकायत करने का. कमल के दलदल में फंसे, या हाथ की ओर से झन्नाटेदार थप्पड़ खाए... विकल्प सब एक जैसे हों तो बेचारी जनता भी क्या करें.. शिकायती टट्टू होकर उसे तो बोझ ही ढोना है... महंगाई का, भ्रष्टाचार का, गुंडा राज का, पुलिसिया रौब का. और यह सूची तो अंतहीन है.


आज कल एक शिकायत और है कि क्रिकेट के मैच फिक्स होने लगे हैं. लेकिन कोई पूछे इनसे कि क्या छक्का चौका देखने में क्या इससे आनंद कम हो जाता है. क्रिकेटर क्या हैं... रेस में दौड़ने वाले घोड़े से ना तो कम हैं, न अधिक. घोड़े के दौड़ने से जो जोश और उन्माद आता है क्रिकेट के मैदान में भी वही आनंद आता है इन दिनों. परदे के पीछे देखने की क्या जरुरत पड़ गई है जनता को. मैच देखो. विज्ञापन देखो, क्रिकेटर के विज्ञापन वाले उत्पाद खरीदो. खुश रहो. मैच को ऐसे देखो जैसे फिल्म देखते हो. डाइरेक्टर कहीं और होता है और किरदार तो बस किरदार होता है. इसमें क्या और कैसे शिकायत.  आज कल जनता के हितैषी भी बहुत हो गए हैं. आधी जनता तो कभी रेल पर चढ़ती नहीं है उसके किराये पर जंग हो जाती है बेचारे मंत्री शहीद हो जाते हैं. शिकायती जनता विस्मित है.

जनता को थक तो जाना ही है एक दिन. जैसे थक गए हैं टूजी घोटाले, लोकपाल, सी डब्लू जी आदि आदि की ख़बरें पढ़कर, सुनकर, एक दिन ये शिकायती टट्टू भी थक जायेंगे. कब तक, कितनी जल्दी, ये देखने वाली बात होगी.

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

बजट 2012 स्पष्ट दृष्टि की कमी

बजट 2012

स्पष्ट दृष्टि की कमी

अरुण चंद्र रॉय

यह समय पूरी दुनिया के लिए एक कठिन समय है. विकसित देशो में जिस तरह अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, वित्तीय नियंताओं के लिए नीतियों और दिशाओं पर फिर से सोचने का समय आ गया है. दुनिया दो तरह से बटी हुई है. एक बराबरी के देश जहाँ आम तौर पर बराबरी-सा माहौल है. रोज़ी और रोटी, मूलभूत नागरिक सुविधाओं के लिए मारामारी नहीं है यानि विकसित देश. दूसरा गैर बराबरी वाला देश. जैसे हम. इन देशों में जहाँ कुछ लोगों के पास अकूत सम्पदा है तो अधिकांश लोगों के पास जरुरी चीजों तक का आभाव है. ऐसे गैर बराबरी वाले देशो में जिस तरह पश्चिम की अर्थव्यवस्था और नीतियों को अपनाया गया, गैर बराबरी की खाई और भी बढती चली गई. विकास की किरण तो दिखी लेकिन यह छन कर नीचे तक नहीं पहुच सकी. साठ के दशक के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था करवटें बदलने लगी थी लेकिन यह नब्बे के दशक में पूरी तरह बाजारू हो गई जहाँ लाभ के अतिरिक्त व्यापार का अन्य कोई मकसद नहीं रह गया था. इक्कीसवी सदी का पहला दशक दुनिया भर के लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि पूंजीवादी व्यवस्था की भी अपनी खामिया हैं जिसे अंततः हाशिये पर रहने वालों को वहन करना होता है.

इधर आम आदमी बज़ट में रूचि दिखाने लगा है. जिससे लग रहा है कि लोकतंत्र और भी परिपक्व हो रहा है. बज़ट पूर्व और उपरांत पान की दुकान से लेकर टी वी चैनलों तक बहस होती है. बज़ट विमर्श में बढती भागीदारी हमारी लोकतंत्र की सारगर्भिता का संकेत भी है.लेकिन  प्रणव दा के बजट 2012 में एक स्पष्ट सोच और दृष्टि की कमी दिखाई दे रही है.  इस बज़ट में जिन मुद्दों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए उन्हें तरजीह नहीं दी गई है. ढांचागत विकास, कृषि, जन आवास, जन स्वास्थय आदि के क्षेत्र में जितना निवेश होना चाहिए था, जितनी प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली है.

उदारवादी अर्थव्यस्था के परिणामो से जिस तरह विश्व के विकसित देश प्रभावित हो रहे हैं, आर्थिक मंदी के जिस चपेट में अमेरिका और यूरोप है, उस से सीख लेने की बजाय, हमारे बजट में फिर से विदेशी निवेश को प्राथमिकता दी गई है. रिटेल में विदेशी निवेश के पुरजोर विरोध होने के बाद भी, लग रहा है सरकार के एजेंडे पर यह अब भी है और किसी जुगाड़ से इसे संसद में पारित करने की कोशिश की जाएगी.  वित्तमंत्रीजी ने बजट 2012-13 में कृषि का बजट 18 फीसदी बढ़ाकर 20208 करोड़ रुपये कर दिया है। कहा गया है किसानो को और कर्जे दिए जायेंगे लेकिन किसानो के पैदावार को विचौलियों से बचाने और उन्हें सिंचाई, बीज और खाद आसानी से कैसे उपलब्ध होंगे, इस बारे में नीतिगत उपायों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है. सत्तर हज़ार गाँव में बैंक खोलने की बात तो कही गई है लेकिन खेती के लिए उपजाऊ भूमि में हो रही लगातार कमी से कैसे निपटा जायेगा, इस बारे में चुप्पी है. पहली हरित क्रांति से उपज में साढ़े पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई थी लेकिन लगभग आठ फिसिदी कृषि योग्य खेतो में कमी भी हुई थी. कृषि के क्षेत्र में प्रतिकूलता और सरकारी उदासीनता के कारण छोटे और मझौले किसानो की खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भरता में भारी कमी आई है.

जहाँ देश की आधी आबादी के पास रहने को छत नहीं है वहीं बज़ट में कहा गया है कि सस्ते घर बनाने के लिए बिल्डर विदेशों से क़र्ज़ ले सकते हैं. प्रणव दा ने यह नहीं बताया कि सस्ते घर का तात्पर्य क्या है. इसे काले धन को सुनियोजित तरीके से भारत में पुनर्निवेश करने के लिए एक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए. जहाँ आम जानता पहले से ही भारी महंगाई के चपेट में है, सेवा कर में २ फिसिदी बढ़ोतरी से आम सेवा पहले से अधिक महँगी हो जाएँगी. और इसका अंततः बोझ उपभोक्ता पर ही आयेगा.  अभी बज़ट का विश्लेषण होना बाकी है, लेकिन इतना तो तय है कि इस बज़ट में स्पष्ट सोच और दिशा की कमी है, आम आदमी फिर हाशिये पर है.

(चित्र : साभार गूगल सर्च)

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

भारत और भुखमरी

भारत और भुखमरी

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

कुछ माह पूर्व इसी ब्लॉग पर इसी शीर्षक से मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था. बाद में किसी अखबार ने उसे प्रकाशित कर दिया. ब्लॉग जगत में लोग जिन मुद्दों पर लिखते हैं मुझे भी लग रहा था कि ये क्या मैंने लिख दिया. वास्तव में ब्लॉग जगत एक ऐसी आभासी दुनिया हैं जहाँ से ज़मीनी हक़ीक़त दिखता नहीं शायद. खैर. अभी एक सम्मलेन में प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश में कुपोषण और भुखमरी की हालत शर्मनाक है. हम कई अफ़्रीकी देशों से भी नीचे हैं. लेकिन अफ़सोस कि इतने बड़े मुद्दे को ऐसे ढक दिया गया कि इस पर एक दिन भी चर्चा नहीं हुई. सारी चर्चाएं हाथियों को ढकने पर ही लगी रहीं.

एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार पांच साल के कम के अत्यंत कुपोषित बच्चों की कुल संख्या में से लगभग आधे बच्चे भारत में हैं. विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया भर में 146  मिलियन बच्चे कुपोषित हैं और इनमे से लगभग 65 मिलियन बच्चे भारत में हैं. देश में पांच साल से कम के बच्चो में लगभग 46% बच्चो को नियमित भोजन प्राप्त नहीं होता है. एक और अध्ययन के अनुसार लगभग 19 लाख बच्चे जो पैदा तो जीवित होते हैं किन्तु अपना प्रथम जन्मदिन नहीं मना पाते हैं. भारत में प्रत्येक 1000 जीवित पैदा हुए बच्चों में से 32 बच्चे जन्म के कुछ ही माह के बाद कुपोषण का शिकार हो मर जाते हैं. और यह विडम्बनापूर्ण स्थिति केवल अफ़्रीकी देशों में ही है. बच्चो में कुपोषण के मामले में हम हैती, मंगोलिया और वियतनाम जैसे देशो के साथ खड़े हैं.

विश्व के अन्य देशो जहाँ कुपोषण और भुखमरी मौजूद है वह या तो प्रतिकूल प्राकृतिक अवस्था जैसे बाढ़, भूकंप हैं या फिर वे देश युद्ध जैसी परिस्थिति में रह रहे हैं. विडंबना यह है कि ऐसी स्थिति भारत में नहीं है फिर भी देश के आधे बच्चे भूखे रह रहे हैं. यह स्थिति मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओड़िसा, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में अधिक भयावह है. ये वही क्षेत्र हैं जहाँ सरकार की मशीनरी या तो नहीं पहुची है या पहुच कर भी प्रभावी नहीं रही है. राष्ट्रीय स्वस्थ्य सर्वेक्षण में मध्य्रदेश और छतीसगढ़ में बच्चो में कुपोषण की प्रतिशत 60% से भी अधिक है.

आश्चर्य है कि दहाई में जी ड़ी पी में वृद्धि, आर्थिक और सामरिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश के प्रधानमंत्री जी को कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा मानना पड़ रहा है और कहना पड़ रहा है कि इस बारे में योजना बनाने की जरुरत है. अब कौन पूछेगा संसद और सरकार से कि इन पैंसठ सालों में सरकार इस बारे में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा सकी ? योजना आयोग क्या कर रही थी इन वर्षो में ? चूँकि देश के ये बच्चे ना तो वोट बैंक हैं कि इन पर ध्यान रखा जाए,  न उपजाऊ ज़मीन कि इनके अधिग्रहण के लिए को योजना बने, न ही खनिज खान  कि इनसे राजस्व प्राप्त होगा, या फिर कोई स्पेक्ट्रम भी नहीं हैं ये बच्चे की नीलाम कर दिया जाये कौड़ी के भाव जल्दीबाजी में... !

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

ग़रीबी के हज़ार चेहरे हैं , लेकिन पहचाने कौन !

ग़रीबी के हज़ार चेहरे हैं , लेकिन पहचाने कौन !

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

दरभंगा. बिहार का एक महत्वपूर्ण शहर. रेलवे के लिहाज़ से देश के बड़े शहरो के बराबर क्योंकि बहुत राजस्व देता है. एतिहासिक शहर भी है. लेकिन इतिहास को जबतक इतिहासकार, सरकार और समाचार पत्र नहीं मिलता इतिहास मिटटी में दबा रहता है. गुमनाम रहता है. देश में बहुत कम ही ऐसे शहर होंगे जहाँ एक साथ इतने सारे शैक्षणिक संस्थान हो. दरभंगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, मेडिकल कालेज, महिला इंजीनियरिंग कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, पोलेटेक्निक, दो दो एमबीए संस्थान के अतिरित्क्त कई और निजी संस्थान हैं. अब तो देश भर से लोग पढ़ने आते हैं. यहाँ का विश्वविद्यालय परिसर देश के किसी भी विश्वविद्यालय परिसर के समकक्ष है.

दरभंगा महाराज ने अपना किला विश्वविद्यालय को दे दिया था. यूरोपियन स्थापत्य कला का नमूना है यह परिसर. कभी घूमने की नज़र से कोई आये तो यह परिसर निराश नहीं करेगा आपको. पूरे परिसर में आम के बगीचे हैं, नारियल के बड़े बड़े वृक्ष हैं. पूरे परिसर में धूप कम ही लगेगी. पूरे परिसर में नहर  का जाल सा है, जो बिना रखरखाव के भी पानी से भरा रहता है. इन दिनों मखाने से पटे हैं ये नहर.

जय श्यामा माईदो मंदिर भी हैं इस परिसर में . एक मनोकामना मंदिर. कहते हैं इस मंदिर में मनोकामना रखने पर हनुमान जी मन की बात पूरी कर देते हैं. छोटा सा खूबसूरत मंदिर है. ना जाने कितने आई ए एस अफसर, आई पी एस, बैंक मैनेज़र आदि आदि बने हैं अपनी मेहनत और आस्था के समन्वय से. मंगलवार को अच्छी भीड़ होती हैं यहाँ. लड़कियां भी चुपके चुपके लाल धागा बाँध जाती हैं मंदिर में उगे पीपल से. दूसरा मंदिर श्यामा माई का मंदिर है. भगवती दुर्गा का मंदिर है यह. शारदीय दुर्गा पूजा एवं चैत्री दुर्गापूजा में मेला सा लगता है. छोटा सा स्टेडियम भी है इस परिसर में जहाँ दरभगा महाराज कभी पोलो खेला करते थे. यूरोपियन गेस्ट हाउस में महाराज के विदेशी मित्र रहते थे. आज इसमें विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन है.

विश्वविद्यालय का मुख्य आकर्षण नरगौना पैलेस है जो कभी महारानी का निवास था. तीस बीघे में फैला यह पैलेस चारो ओर से एक सा दिखता है. चारो ओर एक जैसे प्रवेश द्वार, तालाब और आम के बगीचे थे. ठाणे में जब रेलगाड़ी कि शुरुआत हुई थी, उसके कुछ ही साल के बाद दरभंगा महाराज के इस किले को भी रेल से जोड़ा गया था और पूर्व में कलकत्ता के बाद सबसे पहले रेल दरभंगा ही पहुची थी. लेकिन रेलवे के पहुचने से गरीबी दूर हो जाये यह गारंटी नहीं है. दरभंगा और इसके आसपास का इलाका इस बात का गवाह वर्षों से है.

बिहार को पूरब से जोड़ने के रास्ते में समस्तीपुर भी एक महत्वपूर्ण जक्शन है. पहले समस्तीपुर और दरभंगा के बीच केवल पैसेंज़र गाड़िया चलती थी. लेकिन अब तीन तरह कि रेलगाड़ियाँ चलती हैं. एक पैसेंज़र. समस्तीपुर और दरभंगा के बीच इसका किराया केवल ६ रुपया है. एक है फास्ट पैसेंज़र जिसका किराया ३६ रुपया है. और एक है सुपरफास्ट. आम तौर पर दरभंगा से दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, पूरी आदि को जाने वाली गाड़ियाँ सुपर फास्ट श्रेणी की गाड़ियाँ है. इसका किराया १२८ रूपये है.

मैं दिल्ली से अपने गाव जा रहा था. गाड़ी सुबह नौ बजे समस्तीपुर पहुच चुकी थी. यहाँ से गाड़ी को अंतिम स्थान दरभंगा पहुचना था. गाड़ी खुलने को थी कि एक पति पत्नी मेरी सीट पर आकर बैठ गए. वे ठीक से बैठे ही थे कि टी टी ई साहब पहुच गए. शायद उन्होंने इन्हें गाड़ी में चढ़ते देखा था. टिकट मांगने पर पत्नी ने टिकट निकाल कर दे दिया. टी टी ई साहब की बांछे खिल गई. उन्होंने जोड़ लिया कि १२८ रुपया किराया में से ६ रुपया किराया घटाकर बनता है १२२ रुपया इसमें २५० रुपया जुर्माना जोड़ने से बनता है ३७२ रुपया और दो लोगों का सात सौ चौवालिस रुपया. बेचारी पत्नी तो सुनकर रोने ही लगी.

वे समस्तीपुर के पास मुसरीघरारी के रहने वाले थे. पति को कोई मानसिक बीमारी हो गई थी. पत्नी ने बताया कि चिंता से. इतिहास से एम ए होने के वावजूद उन्हें कोई उचित रोज़गार नहीं मिल सका . अपना देश गाँव छोड़ कर बाहर जा नहीं पाया. आज पत्नी अपने गाँव में ही घर के बाहर परचून की दुकान चला कर दो बेटियों को पाल रही है. टी टी ई से जुर्माने का नाम सुनकर वो दवाई के सारी कागज़ दिखाने लगी, अपना खाली स्टील का डब्बा भी दिखाने लगी जिसमे तीन चार सुखी रोटियां और घर के बने आचार थे. पति कुछ कह नहीं पा रहा था क्योंकि दवाई के असर से वो हमेशा नींद में ही रहता था. रोते रोते पत्नी कह रही थी कि उसे पता नहीं था कि जिस गाड़ी में वो चढ़ी है वह सुपरफास्ट है. किसी टी टी ई ने ही बता दिया कि यह गाड़ी दरभंगा जाएगी. उस महिला के पास पूरे अस्सी रूपये थे. पचास रुपया डाक्टर के लिए और बाकी वापसी किराया के लिए. किन्तु टी टी ई महोदय का ह्रदय बिल्कुल भी पसीज नहीं रहा था. शायद वो अपना काम कर रहे थे. हम दो यात्रियों के अनुरोध पर टी टी ई एक व्यक्ति का जुर्माना लेकर छोड़ने को तैयार हो गए और उस महिला के 3७२ रूपये हमने दिए.

टी टी ई के जाने के बाद जब महिला से बात हुई तो पता चला कि वो उच्च जाति की है इस लिए उसे गरीबी रेखा के नीचे वाला कोई लाभ नहीं पहुचता. खेती बाड़ी कुछ है नहीं. जो है उसमे भी करने के लिए उनमे सामर्थ्य नहीं है. बटाई नहीं दे सकती क्योंकि कमजोर समझ कर निचली जाति के लोग उसका खेत छीन लेंगे. किसी तरह परचून की दुकान से अपने बीमार पति और दो बेटियों का पालन पोषण कर रही है. हाँ ! बेटियों को पढ़ा रही है वह. उच्च जाति, स्टील के डिब्बे में सूखी रोटी, बीमार पति और फटती हुई महँगी साडी, गरीबी का एक चेहरा है, जिसकी गिनती शायद सरकार के आकड़ो में नहीं होती.

दरभंगा और पूरे इलाके में गरीबी का यह चेहरा बहुत आम है, सरकार है कि पहचानती ही नहीं है.

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

देश को ढूंढना है अभी इस प्रश्न का उत्तर !

देश को ढूंढना है अभी इस प्रश्न का उत्तर !




arunpicअरुण चन्द्र रॉय
पिछले एक महीने में काफी घूमना हुआ. स्क्रीन प्रिंटरों की छोटी अँधेरी गलियों से लेकर कारपोरेट दफ्तरों की चमक दमक तक. दिल्ली की पोश कालोनियों से लेकर बिहार स्थित बिना बिजली सड़क वाले अपने गाँव तक का. कभी बड़े-बड़े ब्रांड के प्रबंधको से लेकर रेडलाईट पर खड़े बच्चों से भी मिला. कुछ बातें मन में उथल पुथल मचा रही थीं. इसी बीच देश के नीति-नियंताओं ने कह दिया कि ३२ रूपये काफी हैं जीवन यापन के लिए.
दिल्ली के विकास मार्ग के अंतिम छोड़ पर करकरडूमा रेडलाईट पर पिंटू नाम का एक लड़का खिलौने बेचता है. पहले लगता था कि ये लड़का उद्यमी है. लेकिन इस से पूछने पर बताया कि माल कोई और दे जाता है और उसे हर खिलौने पर दो रूपये मिलते हैं. कुल मिला कर वह चार हज़ार रूपये कमा लेता है. माननीय मोंटेक साहब के हिसाब से वह गरीबी रेखा से ऊपर है लेकिन उसका जीवन तो देखिये... ट्रैफिक के कम हो जाने के बाद रात को कोई दो बजे करकरडूमा फ्लाई ओवर के नीचे सो जाता है वह. वहीँ पास के नाले के पास शौच जाता है. ढाबे पर खा लेता है. पढाई के नाम पर केवल रूपये गिनने आते हैं उसे. कुछ पैसे जो जमा करता है उसकी माँ आके छीन कर ले जाती है. अफीम, चरस गांजा सब चख चुका है और नियमित नशा करता है. दिल्ली के सैकड़ो रेडलाईट पर कम से कम तीन हज़ार बच्चे हैं जो मेहनत भी करते हैं, पैसे भी कमाते हैं लेकिन उनका जीवन कैसा है, क्या है ! काफी दिनों से पिंटू दिमाग पर छाया हुआ है. अपने बेटे की छवि बार-बार पिंटू में चेहरे पर मोर्फ हो रही है.
एक और चित्र है आलम का. हमारी गली के नुक्कड़ पर एक बाइक पंक्चर बनाने वाली दुकान पर काम करता है. एक दिन बाइक पंक्चर हो गया. मुझे पास में ही जाना था. उसकी दुकान के सामने गुज़र रहा था सो आलम को कहता गया. स्कूटर से चल कर वो मेरे घर तक आया. बाइक से पहिया निकाल कर अपनी दुकान पर ले गया, दस पंद्रह मिनट में बाइक का पहिया लेकर लौटा. उसने सेंट टॉमस स्कूल की टीशर्ट पहन रखी थी. कितना विरोधाभास है. आलम स्कूल क्या मदरसे तक नहीं गया है. पैसे तो चार पांच हज़ार रूपये तक कमा लेता है लेकिन जीवन क्या उसका . वही दुकान पर सोता है. वही जीवन है उसका. जो पैसे बचते हैं वो उसके बाबूजी  लेके जाते हैं. मेरठ के पास किसी गाँव का रहने वाला है आलम. 
मेरे गाँव के एक चाचा हैं.  नोएडा के औद्योगिक सेक्टर में चाय की ठेली लगाते हैं. दस हज़ार रूपये तक कमा लेते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं रह सकते नहीं तो पांच लोगो का परिवार नहीं चल पायेगा. ठेली ही उनका जीवन है पिछले सात आठ वर्षों से.
दिल्ली में आधे से अधिक स्क्रीन प्रिंटर अँधेरी गलियों में हैं. आठ गुणा आठ फुट के कमरे में पंद्रह पंद्रह घंटे काम होता है, कम रौशनी, कम हवा पानी और दस साल से सत्तर साल तक के कामगार. पैसे के लिहाज़ से भले गरीबी रेखा से ऊपर हों लेकिन जीवन क्या है उनका है. एक कमरे में पंद्रह पंद्रह लडको का रहना. ना शिक्षा, ना भविष्य.  झुग्गी पर जब भी चर्चा होती है अक्सर हम कह बैठते हैं कि झुग्गियों में सारी सुविधाएँ मौजूद हैं. टीवी, फ्रिज आदि आदि . लेकिन कभी एक दिन गुज़ार का देखिये. कुछ घंटे रहना मुश्किल है वहां. अमानवीय परिस्थिति में रहते हैं लोग. भले लोग भूखे ना हो लेकिन भूख से बाहर भी तो जिंदगी है.
जब पिछले कुछ महीनो से देश २ ज़ी स्पेक्ट्रम घोटाले, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर इतनी बहस हो रही हो, मुझे लगता है कि देश की नीतियों में ऐसे हजारों बच्चे और कामगारों की गिनती कहाँ है, इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना है बाकी है !

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

जगजीत सिंह हैं अभी यहीं कहीं

जगजीत सिंह हैं अभी यहीं कहीं


arunpicअरुण चन्द्र रॉय

संगीत से प्रेम नहीं है मुझे. गुनगुना भी नहीं सकता. कोई गीत भी याद नहीं है. मुखड़ा भी नहीं. बस रेडिओ उपलब्ध था और उसी पर अक्सर एक आवाज़ को सुना करता था जिससे कई दिनों तक जेहन में उथल पुथल मचा रहता था. नाम नहीं पता था उस गायक का. फिर १९९९ में दिल्ली आ गया और एक विज्ञापन एजेंसी में ट्रेनी कापीराइटर के तौर पर काम करने लगा. नौकरी की पहली दिवाली. बोनस मिला कुल सत्ताईस सौ रूपये. शायद इतने रूपये एक साथ हमने नहीं देखे थे. सत्रह सौ मासिक था उस समय. लक्ष्मी नगर के नवरंग ऑडियो वीडियो से नेशनल पैनासोनिक का एक टू इन वन ले लिया. साथ में लिए कुछ कैसेट्स जिसमे ज़ाकिर हुसैन के फ्यूज़न म्युज़िक के पांच कैसेट थे... अर्थ, स्काई, वाटर, फायर और एयर. और एक कैसेट था.. सम वन सम व्हेयर .... ना जाने इस कैसेट को कितनी बार सुना. रोया.... महसूस किया... खो गया  ..... और   आज तक की यह मेरी सबसे अच्छी कमाई रही. घर पहुच कर सबसे पहले अपनी माँ और फिर अपने कंपनी के मालिक श्री अग्रवाल जी को बताया कि मैंने आपके द्वारा दिए गए बोनस के पैसे से टू इन वन और जगजीत सिंह जी के कैसेट खरीद लिए हैं. बाद में कंपनी ने मुझे उसकी प्रतिपूर्ति कर दी थी.... अभी जब अप्रैल में एल ई ड़ी टीवी उसी नवरंग ऑडियो विडियो से लेकर आया तो सबसे अधिक याद आया था मेरा पहला टू इन वन और जगजीत सिंह.

उसी दिसंबर यानी १९९९ में टाटा येल्लो पेजेज़ ने जगजीत सिंह जी का शो किया था ताज दिल्ली में. मेरी कंपनी में दो पास आये थे. जाना श्री अग्रवाल जी और मेरे वरिष्ट सहयोगी श्री लवलेश जी को था. लेकिन मैंने अग्रवाल सर से कहा कि आज तक मैंने जगजीत सिंह जी की केवल आवाज़ सुनी है और उन्हें देखना चाहता हूं. उन्होंने मुझे जाने की अनुमति दे दी. अपनी टेबल का काम निपटाते निपटाते देर हो गई और जब तक ताज पहुचता हाल भर चुका था. मुझे स्टेज के बिल्कुल नीचे बैठने की जगह मिली. और तीन घंटे तक उन्हें बस अपलक देखता रहा मात्र दस फिट की दूरी रही होगी.  क्या सुना बस कहीं धरोहर की तरह सहेजा है किसी संदूक में. किसी तपस्वी की तरह लीन उनका चेहरा आज भी ताज़ा है मानसपटल पर  मानो कल की बात हो.

samvednaफिर जब माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे और जगजीत सिंह जी ने उनकी कविताओं को 'संवेदना' एल्बम में स्वर दिया था, उस कार्यक्रम के स्टेज का बैकड्राप तैयार करने में मेरी भूमिका थी और उस कार्यक्रम में फिर से जगजीत सिंह जी को और भी करीब से देखने का मौका मिला था. अपने मित्र सुरेश अमीन जिन्होंने उन्हें पहली बार किसी फिल्म में गाने का मौका दिया (गुजराती फिल्म : धरती ना छोडू ) की स्मृति में गाया उनका गीत उन्ही को समर्पित.

" चिट्ठी  ना  कोई  सन्देश…

जाने  वो कौन  सा  देश जहा  तुम  चले गए
इस दिल पे लगा के ठेस जाने वो कौन सा देश
जहा तुम चले गए....”

जब तक मेरा वह पहला टू इन वन है... या दुनिया में दूसरा कोई संगीत यन्त्र है... जगजीत सिंह यहीं कहीं हैं आसपास.... सम वन सम व्हेयर..... हम सब के दिलों में .

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

हिंदी दिवस के बाद भी...

हिंदी दिवस के बाद भी...
(अरुण चन्द्र रॉय )

अभी १४ सितम्बर के आसपास हिंदी, हिंदी दिवस, हिंदी की गिरती उठती अवस्था पर खूब चर्चा हो रही थी. फिर अचानक यह चर्चा बंद हो गई है. लगता है कि मुद्दा ही ख़त्म हो गया है. हिंदी दिवस मानाने को लेकर सरकार के प्रति नाराज़गी भी देखी गई इन चर्चाओं में. लेकिन क्या भाषा के प्रति क्या सरकार की अकेली जिम्मेदारी है ? मुझे लगता है कि बाज़ार के प्रभाव के इतर जब तक हिंदी में काम काज नहीं होगा हिंदी की प्रगति सच्ची नहीं होगी. पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं लेकिन हिंदी में बनाने वाले विज्ञापनों के स्क्रिप्ट रोमन में लिखे जाते हैं. फिल्मों जिन्हें हिंदी को बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है वहां अधिकांश काम/स्क्रिप्टिंग, निर्देश आदि आदि  रोमन में होते  है. इस से हिंदी कमजोर हो रही है.


अरे मैं तो मुद्दे से भटक गया. हुआ यूं कि चीन की एक बड़ी रेडीमेड ब्रांड यिशिनो पिछले साल भारत के बाज़ार में आई है. अभी इस कंपनी के कोई दस स्टोर भारत के विभिन्न शहरों में हैं. जल्दी ही कम्पनी १०० नए स्टोर लाने वाली है. इस सिलसिले में उन्हें विज्ञापन कंपनी की जरुरत थी. कई प्रतुतिकरण के बाद हमें उनका काम करने का अवसर मिला. भारत में यिशिनो की मार्केटिंग मैनेज़र बोनी है. उस से मिलने के बाद मुझे भाषा के प्रति चीन के नज़रिए की एक झलक मिली जो मुझे तो प्रेरित कर गई.


बोनी एक २३-२४ साल की लड़की है. उसने चीन से फैशन में एम बी ए किया है. अंग्रेजी बोलती और समझती है. उच्चारण में थोड़ी समस्या है. पिछले छः महीनो से भारत में है. हिंदी भी समझने लगी है. हमारी पहली मीटिंग में उसने अपनी कंपनी का प्रोफाइल चीनी भाषा में ही दिया जिसमे चित्रों और सब टाईट्ल्स की वजह से समझ सका. लेकिन बोनी को कतई परेशानी नहीं थी कि चीनी भाषा में कार्पोरेट प्रेजेंटेशन से मैं चीज़ों को समझ नहीं सका हूं. और वो ठीक भी थी क्योंकि हमने उसके कार्पोरेट प्रेजेंटेशन को चीनी में अनुवाद कराया और फिर दूसरी मीटिंग में उसके लिए प्रिंट मीडिया की रणनीति लेकर गए थे. उसकी भाषा के प्रति स्वाभिमान ने हमें चीनी में अनुवाद करने पर मजबूर किया. और यिशिनो कोई सरकारी कंपनी नहीं है. वह एक लाभ कमाने वाली कंपनी है और भाषा के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है.  लेकिन चीन में ऐसा नहीं है. वहां आम चीनी में अपनी भाषा के प्रति सम्मान है.


दूसरी मीटिंग में उसने हमने अपनी कंपनी के विभिन्न स्टोरों और प्रोडक्ट की सूची दी जो द्विभाषी थी. ये अंग्रेजी और चीनी भाषा में थी . यह एक आश्चर्य कम न था मेरे लिए.  अपने यहाँ केवल सरकार में द्विभाषी काम होता है. केवल संसद के काम हिंदी और अंग्रेजी में होते हैं. कार्पोरेट सेक्टर जो कि अपने उत्पाद तो हिंदी बोलने वाले के बीच खपाते हैं... हिंदी भाषी के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए हिंदी में विज्ञापन करते हैं, लेकिन उन्हें किसी कारपोरेट को कार्यालय स्तर पर हिंदी में काम करते नहीं देखा है. यह जानते हुए कि हमें चीनी भाषा नहीं आती है बोनी ने अपनी भाषा को नहीं छोड़ा. बाद में उनके वाईस प्रेसिडेंट श्री ज्हाओ ज़ुज्हतो से मिलना हुआ. उनके साथ भी भाषाई अनुभव एक सा ही रहा. ज़ुज्हतो पहले चीनी भाषा में बोल रहे थे और बाद में उसे स्वयं ही अंग्रेजी में अनुवाद कर हमसे बात कर रहे थे. यिशिनो चीन की एक बड़ी रिटेल कंपनी है और दुनिया के बीसियों देशों में उसके रिटेल आउटलेट हैं. इस कंपनी से मिलने के बाद हिंदी में काम करने के प्रति मेरा नज़रिया बदला है और निश्चय और अधिक दृढ हुआ है.


अगली मीटिंग में बोनी मुस्कुरा रही थी. मेरा मीडिया प्लान भी द्विभाषी था. 
हिंदी दिवस ख़त्म नहीं हुआ है. इसे हर रोज़ मनाइये.

बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी दिवस के बहाने

हिंदी दिवस के बहाने

अरुण चन्द्र रॉय

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं! ठीक उसी भाव से जैसे हम आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामना देते हैं. कई दिनों से लगातार देख रहा हूं कि हिंदी दिवस के विरोध में, विपक्ष में तरह तरह की बाते हो रही हैं. इन सबमे उलझने की बजाय मुद्दे पर चर्चा करें.

दिल्ली के दिल और सांस्कृतिक केंद्र श्री राम सेंटर में एक किताब की दुकान हुआ करती थी. वर्षों पुरानी दुकान थी वह. हिंदी की उत्कृष्ट पुस्तकें वहां मिल जाया करती थी. सभी साहित्यिक पत्रिकाएं वहां मिल जाया करती थी. बैठ कर पढने की सुविधा भी थी वहां. वाणी प्रकाशन इस दुकान का सञ्चालन करती थी. मैं जब से दिल्ली आया था नियमित जाता था वहां. कुछ साल पहले बंद कर दी गई. कोई शोर नहीं हुआ. जानकारी नहीं है कि किसी साहित्यकार, रंगमंच के पुरोधाओं ने इसके लिए आवाज़ उठाई हो. जबकि इस से इतर कॉफी होम को बंद होने से बचाने के लिए कितना शोर हुआ. बुद्धिजीवियों ने मार्च किये. मीडिया में कवरेज़ हुआ. दुखद तो यह है कि श्रीराम सेंटर देश के अग्रणी सांस्कृतिक केन्दों में से एक है, रोज़ ही यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, अधिकांश हिंदी में होते हैं. किसी ने इस मुद्दे को नहीं उठाया. किताब की दूकान को बचाने की कोई कोशिश नहीं हुई जबकि श्रीराम सेंटर के भीतर हिंदी की पुस्तकों की यह दूकान किसी मायने में कॉफी होम से कम अहमियत नहीं रखती थी. मैंने कुछ अखबारों में पत्र लिखे लेकिन शायद छपा नहीं. मालूम नहीं कि कोई दूसरी दूकान है जहाँ एक स्थान पर हिंदी के किताबें मिल जाएँगी.

इसका कारण जानने के लिए हमें सदियों पहले जाना होगा. जब अँगरेज़ भारत में आये तो यहाँ की संस्कृति की गहराई से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें लग गया कि बिना संस्कृति प्रहार किये भारत को उपनिवेश बनाना संभव नहीं होगा. सन 1813 में ईस्ट इंडिया कंपनी के बीस साल चार्टर का नवीकरण करते समय साहित्य को पुनर्जीवित करने, यहाँ की जनता के ज्ञान को बढ़ावा देने और विज्ञान को प्रोत्साहन देने के लिए एक निश्चित धनराशि उपलब्ध कराई गई . इसका उद्देश्य भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रति नकारात्मक और पिछड़ेपन का भाव उत्पन्न करना था. जिसमे वे सफल रहे थे और आज तक हम उनके आरंभिक निवेश की भरपाई कर रहे हैं अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति उदासीनता का रवैया अपनाकर.

 

फिर कैसे मिली आज़ादी. एक गुजराती मोहनदास करमचंद गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका के वापिस लौटे और देश भर का भ्रमण किया तो उन्हें लग गया था हिंदी के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा नहीं है जो देश की संस्कृति और आत्मा के इतने करीब हो. इसलिए उनके अधिकांश भाषण, लेखन हिंदी में हैं. यदि सांस्कृतिक उत्थान और जागरूकता नहीं आई होती, यदि भारतीयता की भावना जागृत नहीं हुई होती तो आज़ादी मिलनी मुश्किल थी. उस दौरान हिंदी भाषा की वकालत करने वाले अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी गैर हिंदी भाषी थे. इस लिए अभी देश में एक भाषाई क्रांति आनी बाकी है जो सही मायने में सच्ची स्वतंत्रता की ओर ले जाएगी.

कुछ दिनों पहले की बात है. मैं चेन्नई गया था और फिर वहां से पुदुचेरी. तमिलनाडु जाने से पहले तक मुझे लगता था कि वाकई हिंदी विरोधी हैं. लेकिन स्थिति बिल्कुल उलट है. ड्राइवर से लेकर दूकानदार तक, होटल वाले, छोटे छोटे ठेले वाले, नारियल वाले, कटहल वाले सब कामचलाऊ हिंदी जानते हैं. कम से कम अंग्रेजी से अधिक हिंदी जानते हैं. इस से मेरा मत बदला है कि आधा देश हिंदी विरोधी है. जिस तरह राजनीतिक रोटी सेंकने के कई मुद्दे होते हैं, भाषाई मुद्दा उनमे से एक है. इसे गलती कहेंगे या राजनीति हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया गया है जबकि वास्तविकता इसके विपरीत हैं.

हिंदी बिना भारतीय भाषाओँ के हिंदी अधूरी है. सुना है आज से कोई तीस-चालीस साल पहले स्कूलों में मातृभाषा के अतिरिक्त एक अन्य भारतीय भाषा को मैट्रिक स्तर पर पढाया जाता था जिसमे उर्दू, पंजाबी, तेलगु, तमिल, बंगाली आदि हुआ करते थे. इसके लिए पार्ट टाइम शिक्षकों की व्यवस्था की जाती थी. लेकिन आज वह व्यवस्था ख़त्म हो गई है. यदि भाषा पढाई भी जाती है तो फ्रेंच, स्पैनिश, चैनीज़ आदि आदि. इस से अपने ही देश के भूगोल और सांस्कृतिक से पहचान कम हो रही है. इससे प्रान्तों के बीच भाषाई  और संस्कृतिक दूरी बढ़ी है. आज भी यदि देश के सभी राज्यों में मातृभाषा के अतिरिक्त एक और भारतीय भाषा को पढना अनिवार्य बना दिया जाय तो निश्चित ही इसका सबसे अधिक लाभ हिंदी को मिलेगा.

इतनी जटिलताओं के बाद भी हिंदी देश की आधे से अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जा रही है तो इसका श्रेय हमारी संस्कृति, विविधता और आर्थिक उन्नति को जाता है. आर्थिक उन्नति का सारा श्रेय नई तकनीक और अंग्रेजी को देना बेमानी होगा. मेरे एक करीबी मित्र हैं जो टेलीकाम इंजिनियर हैं. दुनिया के कई देश घूम आये हैं. बड़ी-बड़ी दूरसंचार कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं अपनी खिचड़ी अंग्रेजी और ठेठ हिंदी के बदौलत. पंद्रह साल दूरसंचार के क्षेत्र में काम करने के बाद जब कहता हूं कि अब तो अंग्रेजी ठीक कर लो अपनी, हंस के कहते हैं भाई अपनी हिंदी लोग सीख रहे हैं.

तकनीक के क्षेत्र में किसी भाषा का न आना बाधक नहीं हो सकता. बस हमें चाहिए तो अपनी भाषा के प्रति सम्मान . यह एक जटिल बात है. जो पिछली तीन शताब्दियों से हमारी संस्कृति पर प्रहार कर रहा हो उसके ठीक होने में कुछ दशक तो लगेंगे ही. इस तरह मुझे लगता है हिंदी की दशा-दिशा सत्तर के दशक की तुलना में बेहतर है.

मेरे एक मित्र हैं श्री ताहिर . हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी पर समान अधिकार रखते हैं. लखनऊ में बुक्स एंड बुक्स नाम की बड़ी पुरानी दुकान वाले परिवार से तालुक्क रखते हैं. देश की एक बड़ी विज्ञापन कंपनी के साथ क्रिएटिव डाइरेक्टर है. उन्होंने कभी कहा था कि अरुण जानते हो देश में पब्लिक स्कूल की परंपरा कैसे आई क्यों आई. क्योंकि अंग्रजो को उनकी तनख्वाह पर काम करने वाले भारतीय बाबुओं के बच्चों को आम भारतीय से अलग करना था. मुझे उनकी बात जंची. अँगरेज़ अपनी साजिश में सफल रहे और आज भी वह परंपरा जारी है. हिंदी के प्रति नीचता का भाव यहीं से शुरू होता है जो कालांतर में विभिन्न स्तर तक पहुचता है.

भारत में अंग्रेजी शिक्षा पर रोष जाहिर करते हुए मार्क टुली कहते हैं, "कोढ़ में खाज का काम अंग्रेज़ी पढ़ाने का ढंग भी है। पुराना पारंपरिक अंग्रेज़ी साहित्य अभी भी पढ़ाया जाता है। मेरे भारतीय मित्र मुझे अपने शेक्सपियर के ज्ञान से खुद शर्मिंदा कर देते हैं। अंग्रेज़ी लेखकों के बारे में उनका ज्ञान मुझसे कई गुना ज़्यादा है। जो अंग्रेज़ी जानते हैं उन्हें भारतीय साहित्य की जानकारी नहीं है और जो भारतीय साहित्य के पंडित हैं वे अपनी बात अंग्रेज़ी में नहीं कह सकते। जब तक हम इस दूरी को समाप्त नहीं करते अंग्रेज़ी ज्ञान जड़ विहीन ही रहेगा। यदि अंग्रेज़ी पढ़ानी ही है तो उसे भारत समेत विश्व के बाकी साहित्य के साथ जोड़िए न कि ब्रिटिश संस्कृति के इकहरे द्वीप से।"

बाजारीकरण के कई नुकसान हुए हैं लेकिन एक लाभ भी हुआ है कि हिंदी के लिए एक बाज़ार खुला है, नई दिशाएं बनी हैं. यह केवल इसलिए नहीं हुआ है कि हिंदी बोला जाने वाला भूभाग आर्थिक रूप से संपन्न है बल्कि ऐसा इसलिए हुआ है कि हिंदी पूरे देश से संपर्क बनाने में सक्षम है. यही सक्षमता हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा दिलाया है. हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा मिले या ना मिले इसके लिए सरकार द्वारा एक आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने देश भर के विद्वानों, साहित्यकारों, आम जनता से संपर्क करने के बाद ही इस नतीजे पर पंहुचा कि देवनागरी लिपि में हिंदी देश की राजभाषा होगी. और १९६५ में १४ सितम्बर को हिंदी को आधिकारिक राजभाषा का दर्ज़ा मिला. जिस तरह देश में अन्य सैकड़ो ऐसे प्रावधान हैं जिनपर अमल नहीं होता है, जिनमे विरोधाभास हैं, उसी तरह हिंदी के साथ भी है और यह उपनिवेशवाद के असर के अतिरिक्त कुछ और नहीं.

हिंदी दिवस विशुद्ध रूप से एक सरकारी आयोजन है क्योंकि देश की भाषा, संस्कृति जैसे विषयों की जिम्मेदारी सरकार की और केवल सरकार की ही होती है. निजी क्षेत्र में यह दिवस तो मनाया ही नहीं जाता है क्योंकि इस दिवस के साथ बाज़ार नहीं जुड़ा है. बाज़ार तो मनाता है फादर्स डे, मदर्स डे, कपुल्स डे, अर्थ आवर, एन्वयोरेंमेंट डे, एनर्जी डे, वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे आदि आदि. इस बाज़ार को संस्कृति और भाषा के क्या लेना देना. चूँकि बाज़ार इस दिवस को तवज्जो नहीं देता हमें भी इस दिवस का कोई महत्व नहीं  पता चलता है. जबकि सरकारी क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग में धीमी किन्तु उल्लेखनीय प्रगति हुई है. एक स्पष्ट प्रगति तो सामने आती है कि सरकार जो कि इस देश का सबसे बड़ा विज्ञापन प्रदाता है, अपनी विज्ञापन राशि को अंग्रेजी और हिंदी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओँ के बीच समान रूप से खर्च करता है जो कि कुछ वर्ष पूर्व तक नहीं था, इस से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के अखबारों और अन्य मीडिया को बहुत संबल मिला है, उनमे प्रगति हुई है.

इसलिए आने वाली पीढी जो दुनिया देख रही है, उसे पता है बाकी दुनिया में अपनी मातृभाषा के प्रति कितना सम्मान है, इस से अपनी भाषा के प्रति भी सम्मान जग रहा है और उपनिवेशवादी मानसिकता से धीरे धीरे निकल रही है. इस लिहाज़ से मुझे तो हिंदी का भविष्य उज्जवल दिख रहा है.

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

संसद में जन लोकपाल बिल

संसद में जन लोकपाल बिल


अरुण चन्द्र रॉय

पिछले दस दिनों से देश अन्नामय है. जनता जिन अहिंसक आंदोलनों, क्रांति जो इतिहास की किताबों में था वह निकल कर रामलीला मैदान में आ गया है. इस से पूर्व जो छोटे मोटे आन्दोलन हुए हैं उनमे और इस आन्दोलन में एक भारी फर्क है. दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में कोई ट्रैफिक जाम नहीं हुआ है. कोई तोड़ फोड़ या जबरदस्ती बंद नहीं हुआ है. फिर भी औसतन साठ हज़ार लोग रोज़ रामलीला मैदान पहुचे हैं. सब स्व प्रेरणा से हुआ है. राजनीतिक रैलियों की तरह कोई भाड़े पर नहीं आया है. कोई बिना टिकट यात्रा करके नहीं आया है. कोई जबरदस्ती बस को खींच कर नहीं लाया है.

उलटे कई ऐसे ऑटो ड्राइवर मिले हैं जिन्होंने फ्री सेवा दी है रामलीला मैदान तक. संक्षेप में कहें तो एक नया इतिहास लिखा जा रहा है.
इन सब के बीच राजनीतिक पार्टियां बार बार संसद की दुहाई दे रही हैं कि संसद सर्वोच्च है. लेकिन संसद की गरिमा कहाँ चली जाती है जब हमारे सांसद माइक उखाड़ कर एक दूसरे पर दे मारते हैं. ऐसे कई उदहारण हैं जब हमारे माननीय सांसदों के व्यवहार से हमारे संसद और लोकतंत्र को शर्मशार होना पड़ा है. एक उदहारण देखिये इस विडिओ में.
(http://www.metacafe.com/watch/86775/goverment_brawl_in_india/)

साथ ही,  सभी राजनीतिक पार्टियां एक सुर में कह रही हैं कि जन लोक पाल बिल को ३० अगस्त तक संसद में पास नहीं कराया जा सकता है. इस बारे में कुछ अधिक तो नहीं जनता मैं लेकिन मुझे याद आ रहा है कि २००९ के बजट सत्र में कई महत्वपूर्ण बिल संसद में बिना बहस के पास हुए. इकोनोमिक टाइम्स ने बहुत रोचक शीर्षक दिया था उस समय :"These days, bills get passed in Parliament faster than a T20 match". चौदहवी लोकसभा में स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन एक्ट  जो कि किसी भी तरह से कम महत्वपूर्ण बिल नहीं था, को लोकसभा ने दो घंटे से कम के बहस में पास कर दिया था, जबकि इस बिल से हजारों किसानो का भविष्य जुड़ा था. भूमि अधिग्रहण जैसे मामले इस से जुड़े थे. इसी लोकसभा में ७००,००० करोड़ रूपये वाला भारतीय बजट जिस से हर एक भारतीय का जीवन प्रभावित होता है, केवल छः से दस घंटे के बहस में पास हो गया था. मार्च २००९ के सत्र में केवल २० मिनट में संसद ने ३६ में से १६ बिल को पास कर दिया था और बिना बहस के सभी सांसदों की सहमति बन गई थी. सांसदों के वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाओं से जुड़े बिल बिना किसी बहस के पास हो जाते हैं. भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील बिल को लोकसभा ने २००८ में बिना बहस के पास कर दिया था जबकि राज्य सभा में जाकर यह अटक गई. यदि देखें तो दिनों दिन दोनों सदनों में बिलों पर बहस का समय लगातार घट रहा है. एक तो बैठकों के दिन कम रहे हैं दूसरे महत्वपूर्ण समय लोकसभा विपक्ष के वाकआउट में चला जाता है. ऐसे में यदि राजनीतिक दल कहते हैं कि जन लोकपाल बिल पर बहस कराया जाना और बिल पास करना संभव नहीं है तो यह विश्वसनीय नहीं लगता.

आज अन्ना को अनशन पर बैठे ११ दिन हो गए हैं. इतने दिनों में गंभीर सरकार इस बिल पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा करा सकती थी. जो बातें आज हो रही हैं (इस आलेख के पढ़े जाने तक संसद में जन लोक पाल बिल पर चर्चा हो रही होगी) वह १६ अगस्त को भी हो सकती थी. लेकिन सरकार इस मुहिम की गंभीरता से प्रायः अनिभिज्ञ रही होगी. आज सरकार को अन्ना को मिल रहा जनसमर्थन चौंका रहा है.

१५वीं लोकसभा के पांचवे सत्र यानी २०१० के मानसून सत्र में लोकसभा में १८ बिल पेश हुए और पुराने लंबित बिलों को मिला कर २१ बिल पास हुए इसमें अधिकाश बिल बिना चर्चा के पास हुए जबकि कई बिल ऐसे थे जिनका देश के आम जन पर दूरगामी प्रभाव पड़ा है. इसी सत्र में संसद सदस्य के वेतन, भत्तों और पेंशन से जुड़ा बिल भी था जो बिना चर्चा हुए पास हो गया था. इसी तरह राज्य सभा के २२०वें सत्र (मानसून सत्र २०१०) में आठ बिल पेश हुए थे और लंबित बिलों को मिला कर कुल २१ बिल पास हुए. संसद सदस्य के वेतन, भत्ता और पेंशन (संशोधन) बिल २०१० पर राज्य सभा पर भी चर्चा नहीं हुई.  लेकिन जनलोकपाल बिल पर हमारे राजनीतिक दल देशवासियों को संसदीय प्रक्रिया की सीख दे रहे हैं.

यदि जन लोकपाल पर सभी राजनीतिक पार्टियों और सरकार ने इच्छा शक्ति दिखाई होती तो अन्ना का अनशन ग्यारहवें दिन नहीं पंहुचा होता. किन्तु जिस संसद के एक तिहाई सदस्य आपराधिक पृष्ठभूमि के हों उस सदन से सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक सशक्त लोकपाल का पास होना एक चुनौती से कम नहीं है. जो भी हो, देश को एक गाँधी और देशवासियों को राजनीतिक दलों और अपने प्रतिनिधियों को जानने का मौका मिला है.

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

चलिए अन्ना गाँव की ओर

चलिए अन्ना गाँव की ओर

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

सरकार ने आनन फानन में लोकपाल बिल को संसद में पेश कर दिया है. सब एक ओर से कह रहे हैं, मान रहे हैं कि यह बिल प्रभावी रूप से देश में भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब नहीं होगा. सच भी है. अब अन्ना साहब और उनकी सिविल सोसाइटी ने घोषणा कर दी है कि वे अनशन पर बैठेंगे. सरकार ने अन्ना साहब को बता दिया है कि वे जंतर मंतर पर धरने पर नहीं बैठ सकते. दिल्ली पुलिस ने उन्हें औपचारिक रूप से सूचित भी कर दिया है. अब अन्ना और उनकी टीम किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश में हैं. अन्ना और उनकी सिविल सोसाइटी की पहली हार यही है. किसी लोकतान्त्रिक देश में जब आपको किसी खास स्थल पर विरोध प्रदर्शन नहीं करने दिया जाय तो इस से बड़ी अलोकतांत्रिक बात और क्या होगी.

मुझे लगता है कि अन्ना साहब की इस मामले में तैयारी कम थी. जब सरकार संसद में लोकपाल बिल पेश कर रही है तो अन्ना को धरने के लिए उपयुक्त स्थान तलाशने की बजाय जानता के बीच जाना चाहिए. जानता वो नहीं है जो उनके साथ जंतर मंतर पर थी या ई-मेल और फ़ोन के जरिये उनका साथ दे रही थी. जनता वो है जो आज भी दो जून की रोटी के लिए लड़ रही है. जनता वो है जिसके हिस्से का इंदिरा आवास पंचायत तक पहुच कर भी उस तक नहीं पहुचता. जनता वो है जिसे अपने मनरेगा की मजदूरी के लिए गाँव के मुखिया को आधी मजूरी देनी पड़ती है. सरकार न्यूनतम मजदूरी तय करती है और जिन्हें बारह घंटे काम करने के बाद भी वो मजदूरी नहीं मिलती है वे है जनता. और अन्ना जी को जरुर पता होगा कि संसद जो चला रहे हैं वे आपकी बात नहीं सुन रहे, आपसे नहीं डर रहे क्योंकि उन्हें पता है कि आपकी पहुँच वहां तक नहीं है.

सिविल सोसाइटी बनाम पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़

वर्तमान स्थिति और सत्तर के दशक की इमर्जेंसी से काफी मेल खा रही है. जिस तरह २-ज़ी स्पेक्ट्रम घोटाले और राष्ट्र मंडल खेलों में अनियमितता में प्रधानमत्री और उनके कार्यालय पर उंगलियाँ उठ रही हैं.. उच्चतम  न्यायालय तक से फटकार मिल रही और सरकार तानाशाह की तरह व्यव्हार कर रही है, ऐसी ही मिलती जुलती स्थिति १९७५ में भी थी. १२ जून १९७५ को इलाहबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा ने श्रीमती इंदिरागांधी की श्री राजनारायण पर लोकसभा के चुनाव में जीत को खारिज कर दिया था और श्रीमती गाँधी की भ्रष्ट तरीके से चुनाव जीतने के कारण लोकसभा की सदयस्ता समाप्त कर दी थी. उस समय जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, राज नारायण, जॉर्ज फर्नांडीज़ जैसे नेता देश भर के किसानो, मजदूरों, कामगारों और छात्रों को एक जुट करने में लगे थे. जयप्रकाश नारायण की एन जी ओ संस्था पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ की इसमें प्रमुख भूमिका थी. ये नेतागण देश के कोने कोने में लोगों को कांग्रेस और उसके भ्रष्ट आचरण के खिलाफ खड़ा करने का काम कर रहे थे. ऐसा आन्दोलन स्वतंत्रता पूर्व ही देखा गया था. लेकिन आज परिस्थितियां एक और आन्दोलन के लिए तैयार हैं लेकिन नेतृत्व दिल्ली से निकल कर गाँव, देहात, मजदूरों और कामगारों तक पहुचने में नाकामयाब है. आज की सिविल सोसाइटी और जय प्रकाश नारायण की पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ में बहुत अंतर है.

चांदनी चौक में सर्वेक्षण : गहराई और गंभीरता दोनों में कमी

अन्ना और उनकी टीम का विज़न कम होता दिख रहा है. उनके सत्याग्रह का प्रभाव कम होता प्रतीत हो रहा है. जिस तरह एक के बाद एक भूषण द्वय पर सरकार की ओर से हमले होने शुरू हुए, जब बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से खदेड़ा गया, तभी से सरकार की नीयत साफ़ थी. ऐसे में सबसे बढ़िया रणनीति होती कि आप जनता के पास जाएँ. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अन्ना और उनकी टीम जनता के पास जाने की बजाय राजनीतिक दलों के पास समर्थन के लिए गए. लेकिन यह बात तो साफ़ है कि राजनीति में कोई भी दल ऐसा लोकपाल नहीं चाहेगा जो सांसदों, प्रधानमंत्री को भी कठघरे में खड़ा करने की ताकत रखता हो. हास्यास्पद तो तब लगता है जब अन्ना हजारे की सिविल सोसाइटी चांदनी चौक में सर्वेक्षण करने गए. यदि सर्वेक्षण करना ही था तो करते महाराष्ट्र के गाँव में, मध्य प्रदेश में, बिहार में, गुजरात में, उड़ीसा में, उत्तर प्रदेश में. लेकिन उन धूल भरे गाँव में कौन जाए. इस कारण से अन्ना के सत्याग्रह में गहराई और गंभीरता दोनो में कमी आई है. आम जनता की विश्वशनीयता भी कम हुई है. जो लोग बिल्कुल जमीन से जुड़े हैं वे खुद को अन्ना के सत्याग्रह के साथ जुड़ा महसूस नहीं करते. उन्हें लगने लगा है कि अन्ना और उनकी टीम का लक्ष्य भ्रष्टाचार को ख़त्म करना नहीं बल्कि अपने लिए सुविधाजनक जमीन तैयार करना है. सरकार भी उनकी इस कमजोरी को भांप रही है.

चलो गाँव की ओर
एक समय था जब जॉर्ज फर्नांडीज़ के एक आह्वान पर लाखों रेलवे कर्मचारी क्रांति के लिए तैयार रहते थे. लाखों मिल मजदूर मोरारजी देसाई की एक आवाज़ पर सड़क पर उतर आते थे. जय प्रकाश नारायण, लोहिया, राजनारायण के आह्वान पर देश के किसान और छात्र गाँव गाँव से उठ कर दिल्ली, पटना, लखनऊ से लोहा लेने के लिए तैयार रहते थे. पूरी तरह लोकतान्त्रिक तरीके से. लाठी झेल कर. गोली झेल कर. लेकिन आज के नेतृत्व में वो पहुँच, वह जुझारूपन दिख नहीं रहा. और जब आपकी एक आवाज़ पर लाखो किसान मजदूर भाई बहन संसद पर कूच करने के लिए तैयार रहे तभी सरकार भी सुनती है. देश में भ्रष्टाचार तब तक आम आदमी का प्राथमिक मुद्दा नहीं बन सकता जब तक उसकी रोज़ी-रोटी और छत के मुद्दे का समाधान हो जाये. एक मजदूर यदि अपनी मजदूरी में से दस रूपये देने के लिए तब तक तैयार रहेगा जब तक कि उसके पास कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हो जाता है. और उसके सामने यह विकल्प नहीं है न ही निकट भविष्य में कोई विकल्प दिख रहा है. ऐसे में आम जनता का इस मुद्दे के साथ पूरी तरह खड़ा होना अभी दूर ही दिख रहा है. सरकार ने बहुत ही सुनियोजित रूप से किसान, मजदूर की एकता को ख़त्म किया है. 

इसलिए अन्ना हजारे और भूषण द्वय के लिए बेहतर विकल्प है कि इन इन्टरनेट पीढी के वर्चुअल समर्थन के बजाय गाँव, देहात की यात्रा करें, पद यात्रा करें, साइकल यात्रा करें, किसानों से मिले, फैक्ट्री मजदूरों से मिले, निर्माण मजदूरों से मिले, कॉलेज के छात्रो से मिले और उनका समर्थन प्राप्त करें. तभी यह सत्याग्रह देश का आग्रह बन पायेगा. सरकार भी जनता का दवाब महसूस करेगी. अन्यथा सिब्बल साहब धमकी देंगे और आप धरने के लिए वैकल्पिक स्थान और तिथि का का चुनाव करने में अपनी ऊर्जा लगायेंगे.

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

मैं कहता आँखिन देखी : मैनेजर पाण्डेय

'समालोचन' एक ब्लॉग है. जब हिंदी ब्लॉग्गिंग में गुणवत्ता, पाठकीयता, पुरस्कार,उत्सव की चर्चा हो रही है, तथाकथित ब्लोग्गर्स उत्सवों और टिप्पणियां जुटाने में व्यस्त हैं, मेरी नज़र इस ब्लॉग पर गई. इसी तरह की सामग्री कल हिंदी ब्लॉग्गिंग को मूलधारा के साहित्य के समकक्ष खड़ा करेगी.प्रस्तुत है समालोचना ब्लॉग की नवीनतम पोस्ट. (समालोचन ब्लॉग से साभार )... अरुण चन्द्र रॉय

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मैं कहता आँखिन देखी : मैनेजर पाण्डेय



नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय को आलोचकों का आलोचक कहते हैं. पर इसके साथ ही मैनेजर पाण्डेय के  यहाँ  समकालीन रचनाशीलता की गहरी परख भी है. उनकी आलोचना सभ्यता परक है, वह साहित्य, समाज और विचार  के वतर्मान से टकराते हुए भविष्य की बेहतरी का सपना देखती है. वह आलोचना-परम्परा के ऐसे वरिष्ठ हैं जहां शब्द और कर्म का द्वैत नहीं रह जाता. शब्दों की रौशनी में कर्म की जनपक्षधरता आलोकित होती है. जीवन के 70 वें साल में यह मेधा आज भी अपनी पूरी प्रखरता के साथ विचारों की दुनिया में दीप्तिमान है.

उनसे हिंदी आलोचना की परम्परा पर बात की गई है, विषय थोड़ा जटिल और एकेडमिक है. पर यहाँ सहजता और बोधगम्यता मिलेगी.



मैनेजर पाण्डेय से अरुण देव की बातचीत   


हिंदी आलोचना पर बातचीत की शुरुआत आचार्य रामचंद्र शुक्ल से की जानी चाहिए. आखिर ऐसा क्या है उनमें कि वह आज भी आवश्यक बने हुए हैं.

आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलोचना को अपने समय की, दुनिया की आलोचना के समकक्ष खड़ा किया. उनका अंग्रेजी आलोचना से एक ओर तो दूसरी ओर संस्कृत काव्यशास्त्र से गहरा नाता था. इसमें ख़ास बात यह है कि वह न तो संस्कृत काव्यशास्त्र के किसी सिद्धांत से और न तो अंग्रेजी के किसी आलोचक से अभिभूत थे. वह दोनों परम्पराओं के विचारों को अपने समय और समाज की कसौटी पर कसकर, जिसे हिंदी और हिंदुस्तान के लिए उपयोगी समझते थे, उसे ही स्वीकार करते थे.

उनकी आलोचना की प्रक्रिया के भीतर दो तरह की स्थितियाँ दिखाई देंगी. कई बार जो सैद्धांतिक ढांचा आचार्य शुक्ल निर्मित करते हैं उसको रचनाओं के विश्लेषण के समय छोड़ देते हैं. भक्तिकाल की आलोचना के संदर्भ में इसे देखा जा सकता है. विशेष रूप से सूरदास के प्रसंग में याद दिलाना चाहूँगा- कि उन्होंने सूरदास को अपने में सिमटे, अपनी मानसकिता में खोये कवि के रूप में स्थापित किया है. उनकेअनुसार सूर का समय और समाज प्रत्यक्ष वर्णन के रूप में उनके काव्य में प्रस्तुत नहीं है लेकिन अप्रस्तुत विधान के रूप में उन्होंने इस कमी को पूरा किया है. शुक्ल जी के इस बात के विश्लेषण के क्रम में मैंने सूर की काव्य भाषा पर काम करते हुए किसान जीवन की छबियों, अनुभवों और समस्याओं की उपस्थिति की चर्चा की है.

आचार्य शुक्ल गहरे स्तर पर स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए आलोचक हैं. इसके दोनों पक्ष उनके यहाँ दिखाई देते हैं- एक अतिवाद यह है कि वह जिन चीजों को पसंद नहीं करते उसको पराया या विदेशी कहकर खारिज़ करते हैं पर साथ ही दूसरी कई विदेशी और पराई चीजों को हिंदी के लिए उपयोगी समझकर उनका स्वागत और उपयोग करते हैं. आचार्य शुक्ल कुल मिलाकर रीतिकाल और रीति कविता के विरोधी हैं. इसके बावजूद उन्होंने इस सम्बंध में कुछ बातें ऐसी खोजी, जो आगे चलकर बाद की हिंदी आलोचना के लिए दिशा–निर्देशक बनीं. रीतिकाल के भीतर उनको घनानंद लगभग आधुनिक कवि की तरह से सहज, स्वछन्द और अनुभूति प्रवण कवि के रूप में मिले. उन्होंने अपने एक लेख में घनानन्द की काव्य भाषा की तुलना छायावादी कविओं की काव्यभाषा से की है. इस प्रसंग में एक बात और ध्यान में रखने की है रीतिकाल के बड़े कवियों की काव्यभाषा की उन्होंने जिस तरह से गहरी, सटीक और सधी हुई व्याख्या की है, वह अलग से सीखने लायक है. रीतिकाल के कवियों के सामाजिक दृष्टिकोण को वह बहुत पसंद नहीं करते हैं, लेकिन उनकी भाषिक संरचना की गुणवत्ता को वह देखते हैं.

आधुनिक काल में भी आचार्य शुक्ल आमतौर से ऐसी कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि को महत्व देते थे जिनका संबंध कम से कम दो चीजों से दिखाई दे एक तो अपने समय के भारतीय समाज से, उसकी वास्तविकता से, उसकी समस्याओं से या किसी न किसी स्तर पर स्वाधीनता आंदोलन से.आचार्य शुक्ल ऐसे अकेले आलोचक हैं जिन्हें मैं पूर्ण आलोचक समझता हूँ. आलोचना के लिए आवश्यक सभी चीजें उनके यहाँ मिलती हैं. सैद्धांतिक ढांचे का निर्माण मतलब हिंदी का अपना साहित्य शास्त्र निर्मित करना , जो न केवल संस्कृत के काव्य शास्त्र पर निर्भर हो और न केवल पश्चिम के आलोचना शास्त्र पर आधारित हो. तथा  इस सैद्धांतिक ढांचे के अंतर्गत रचनाकारों की रचनाशीलता की व्यावहारिक व्याख्या और मूल्यांकन का कार्य जो विशेष रूप से उन्होंने भक्तिकाल के कविओं के संदर्भ में किया है. हिंदी साहित्य का  इतिहास के माध्यम से  उन्होंने इतिहास दृष्टि का निर्माण किया है.

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचनाकार के साथ-साथ आलोचक भी हैं. उनकी आलोचना दृष्टि को आलोचक शुक्ल का पूरक क्यों न माना जाए.

हिंदी आलोचना को समग्रता में देखें तो द्विवेदी जी आचार्य शुक्ल के पूरक के रूप में ही सामने आते हैं. इस पूरक शब्द की थोड़ी व्याख्या जरूरी है. पूरक कहने से लोग मन में छोटा होने का बोध पाल लेते हैं. पूरक का मतलब होता है मूल में जो न हो उसको जो पूरा करे. वही पूरक होता है. पूरक कहने से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का महत्त्व कम नहीं हो जाता. कुछ लोगों ने आचार्य द्विवेदी को आचार्य शुक्ल के विरोध में खड़ा करने की कोशिश की है. जब आचार्य द्विवेदी ने आलोचना लिखने की शुरुआत की उस समय तक आचार्य शुक्ल अपनी आलोचना लिख चुके थे.

आचार्य द्विवेदी की जो सबसे महत्वपूर्ण आलोचना-पुस्तक है, वह है – हिंदी साहित्य की भूमिका. इसे लिखते समय आचार्य द्विवेदी के सामने आचार्य शुक्ल आदि से अन्त तक खड़े हैं. इसमें वह यह प्रयत्न करते हैं कि आचार्य शुक्ल ने जो छोड़ दिया है, जो अपने इतिहास में नहीं किया है, जिन पक्षों की उपेक्षा की है, उन सबको समेट कर हिंदी साहित्य के इतिहास संबंधी दृष्टिकोण का निर्माण करें और इतिहास लेखन का भी कार्य करें. इस दृष्टि से भी वह पूरक ही हैं.

उनकी एक प्रारम्भिक किताब है सूर साहित्य, आचार्य शुक्ल की सूर संबंधी कमियों को पूरा करने का एक प्रयास यहाँ दिखता है. उसमें द्विवेदी जी ने प्रेम स्वधीनता से जुड़ा हुआ भाव है, यह मूल स्थापना की है. आचार्य शुक्ल का यहाँ एक नैतिक आग्रह है जो एक सीमा के बाद इस स्वाधीनता को पसंद नहीं करता है. भ्रमर गीत सार की भूमिका में आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि सूर की गोपियाँ शेली के पक्षियों की तरह स्वतंत्र हैं. गोपियों की ऐसी स्वतंत्रता आचार्य शुक्ल को बहुत पसंद नहीं थी. आचार्य द्विवेदी ने इस स्वतंत्रता के महत्त्व को पहचाना, उसकी व्याख्या की. यह उनकी नवीन दृष्टि भी है और स्थापना भी.

आचार्य द्विवेदी की आलोचना की सबसे महत्वपूर्ण किताब कबीर पर है. शुक्ल जी की आलोचना दृष्टि के केन्द्र में तुलसीदास हैं, इसलिए जब तुलसीदास ही कबीरदास को पसंद नहीं करते तो जो तुलसीदास के व्याख्याकार हैं उन्हें कबीर दास क्यों कर पसंद आते. इसलिए कबीर पर कुछ महत्वपूर्ण बातें कहने के बावजूद कबीर की जो महत्ता है उसे उन्होंने कभी ठीक से स्वीकार नहीं किया, और अनके प्रसंगों में उनकी आलोचना भी की है. यह सब आचार्य द्विवेदी के सामने था, इसलिए इसके ठीक विपरीत कबीर की कविता की गहरी और व्यापक सामाजिकता की पहचान करते हुए, कबीर की एक सामाजिक क्रन्तिकारी की छबि बनाई आचार्य द्विवेदी ने. जो उनकी एक उपलब्धि भी है और आचार्य शुक्ल से छूट गए एक काम को पूरा करने का प्रयास भी है.

आचार्य द्विवेदी एक बड़े रचनाकार भी हैं, बड़े उपन्यासकार और निबन्धकार भी. यह जो रचनाशीलता है वह आचार्य द्विवेदी की आलोचना में भी है. वह भाषा के स्तर पर है और सोच के स्तर पर भी है. रचनाकार तो शुक्ल जी भी हैं पर द्विवेदी जी के स्तर के रचनाकार वह नहीं हैं. शुक्ल जी कवि थे पर कवि के रूप में उनकी वह हैसियत नहीं है जो उपन्यासकार के रूप में आचार्य द्विवेदी की है. इन दोनों की रचनाशीलता के स्तर का प्रभाव उनकी आलोचना पर भी दिखता है. इन दोनों के निबन्धों को अगर ध्यान में रखा जाए तो केवल एक बात कहूँगा कि शुक्ल जी के निबन्धों में एक बौद्धिक की सह्रदयता दिखाई देती है पर द्विवेदी के निबन्धों में एक सहृदय व्यक्ति की बौद्धिकता दिखाई देती है.

रामविलास शर्मा ने हिंदी आलोचना के आधार का विस्तार किया है और उसे एक सुसंगत वैचारिक आधार भी दिया है. यह विस्तार और आधार बहस तलब हैं..

डॉ. रामविलास शर्मा के लेखन और चिंतन का दायरा बहुत विस्तृत था. उनके लेखन और चिंतन के दायरे पर सोचें तो वह हिंदी के एकमात्र लेखक चिन्तक राहुल सांकृत्यायन से तुलनीय हैं. रामविलास जी भाषा विचारक हैं, वे इतिहास–दर्शन, प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृति के व्याख्याकार हैं, वे भारतीय समाज और स्वाधीनता आंदोलन के इतिहासकार भी हैं.जहां तक आलोचक रामविलास शर्मा का सवाल है तो उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने हिंदी भाषा को जनतांत्रिक बनाया. रामविलास जी अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, विद्वान थे. यह देखकर आश्चर्य होता है कि उनकी आलोचना भाषा पर अंग्रेजी का न कोई दबाव है न कोई आतंक. हिंदी के अनेक आलोचक हिंदी में अंग्रेजी का ऐसा दुरुपयोग करते हैं कि उनकी आलोचना पाठकों का बोध बढ़ाने की जगह उनका बोझ बढ़ा देती है.

उनकी आलोचना दृष्टि हिंदी साहित्य में भक्ति आंदोलन से शुरू होकर प्रगतिशील आंदोलन तक फैली है.समाजोन्मुख, जनतांत्रिक, अग्रगामी और संवेदनशील बनाने वाली प्रवृतियों की पहचान और मूल्यांकन का कार्य रामविलास जी ने किया है. उन्होंने आचार्य शुक्ल की तरह सीधे हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा है. यह जरूर है कि भारतेंदु से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक का इतिहास उनके लेखन में आ गया है.

रामविलास जी छायावाद में निराला को हिंदी नवजागरण से जोड़ कर देखते हैं. उसका जो कुछ भी सार्थक, सकरात्मक और मूल्यवान है उसकी खोज वह निराला की कविता में करते हैं और उसका विस्तार निराला के गद्य में भी करते हैं. इस प्रक्रिया में उनकी सीमाएं भी उजागर होती है. पहली सीमा यह है कि कोई भी कवि या लेखक चाहे वह वाल्मीकि हों, कालिदास हों या नागार्जुन हों वेअपने समय की सीमाओं से घिरे हुए कवि-लेखक होते हैं. इसका मतलब यह है कि बड़े से बड़े लेखक का भी सब कुछ हमेशा प्रासंगिक नहीं होता. एक आलोचक को यह फर्क करना चाहिए की किस कवि या लेखक का कितना और कब प्रासंगिक है या नहीं है.

रामविलास ने भारतेंदु से लेकर नागार्जुन तक जो कुछ भी लिखा है या जिस पर आपने विस्तार से काम किया है – महावीरप्रसाद द्विवेदी.. उन सब की बहुत अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयाँ भी. रामविलास जी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कभी भी अपने प्रिय लेखकों,आलोचकों और विचारकों की किसी कमी पर कभी ध्यान नहीं देते. उसका हिंदी आलोचना पर दुष्प्रभाव यह पड़ा है कि कुछ दूसरे लोग उन कविओं, लेखकों, आलोचकों, विचारकों में कमी के अलावा कुछ नहीं देखते. मतलब रामविलास जी ने जो छोड़ दिया है उसे ही लेकर हिंदी में कुछ लोग आलोचक बने हुए हैं. मूल्यांकन की समग्रता में अंतर्विरोधों की पहचान भी होती है. इस अधूरेपन के कारण रामविलास जी की आलोचना कई समस्याएं पैदा करती है.

रामविलास अपनी आलोचना में जीवन भर बहस करते रहे हैं. बहस की लोकतांत्रिकता की पहली मांग यह है कि आप दूसरों को भी महत्व दें. सारे संसार से हमेशा असहमत ही हों तो बहस का कोई अर्थ नहीं है. रामविलास जी दूसरों के मत का खंडन करते हैं यह मान लेने के बाद भी कि इस मत में दम है. वह स्वीकार करने और अपने विचारों में सुधार करने की कोई कोशिश नहीं करते हैं. मेरे पास इसके लिखित और अलिखित व्यक्तिगत प्रमाण हैं.

हिंदी में अच्छी आलोचना का विकास करना हो तो रामविलास जी से  अपनी असहमतियों की ताकत को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए. आपकी असहमतियां पूर्वाग्रह न हों, उसका आधार हो और वे सार्थक हों तो मुझे ऐसा लगता है कि उसमें से नए सोच- विचार की संभावनाएं दिखाई देंगी . यह हमेशा मैंने महसूस किया है.

अन्त में वह वेदों की ओर लौट गए..

कुछ लोग यह आपत्ति उठाते हैं कि रामविलास जी ऋग्वेद की ओर गए ही क्यों. परम्परा के मूल्यांकन की भूमि पर जो वैचारिक संघर्ष होता है उसका गहरा संबंध वर्तमान के वैचारिक संघर्ष से होता है. और वह भविष्य की दिशा भी तय करता है. ऋग्वेद पर लिखने और बोलने का एकाधिकार इस देश के पंडितों, पुरोहितों और संतो को ही नहीं है. ऋग्वेद एक ग्रंथ है उसका एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व और मूल्य है, इसे हर आदमी जानता है. तब उस पर बात करने और विचार करने का अधिकार रामविलास शर्मा या किसी को क्यों नहीं है.हाँ,रामविलास जी ने वहां क्या देखा और उस पर क्या लिखा इस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए. केवल उनके उधर जाने की आलोचना का कोई मतलब नहीं है. रामविलास जी ने उसमें जन जीवन की विभिन्न स्थितियों,समस्याओं आदि को देखा है. ऐसा तो है नहीं कि जब ऋग्वेद लिखा जा रहा होगा तब वहां जनता या जन नहीं होगा. ऋग्वेद में जन भी है, प्रकृति भी है और संस्कृति भी है.  इन तीनों की पहचान की कोशिश रामविलास जी ने की है.

इस प्रसंग में मुझे यह कहना है कि रामविलास जी के ऋग्वेद संबंधी मत के खंडन का अधिकार उसे है जिसका ऋग्वेद के बारे में अपना मत भी हो. अतीत की ओर जाना अगर अपराध है तो अपराधी ३०० साल पहले जाने वाला भी है और ३००० साल पहले जाने वाला भी.उनकी इस सम्बन्ध में जो सीमा मुझे दिखती है वह यह है कि जीवन के आखिरी दिनों में वह ऋग्वेद से इतने प्रभावित हुए कि वह तुलसीदास ही नहीं निराला की कविता में भी ऋग्वेद की छाया देखने लगे.  है .. दोनों के यहाँ उसकी छाया है. देखिए कई बार ऐसा होता है कि जो छाया होती है वह कई बार दूर से घूम कर आती है. जिसे हम लोकाचार कहते हैं, कई बार उसमें भी वेद और कुरान की छाया होती है.

इस छाया के होने से मेरी आपत्ति नहीं है दिक्कत तब होती है जब तुलसीदास और निराला ऋग्वेद की चीज का विरोध कर रहे हों रामविलास जी उसका नोटिस नहीं लेते. ऋग्वेद के सबसे बड़े देवता हैं इंद्र. जयशंकर प्रसाद का इस पर एक लेख भी है कि इंद्र आर्यों के पहले सम्राट हैं. उस इंद्र की जितनी निंदा तुलसीदास ने रामचरितमानस में की है वैसी निंदा पूरे भारतीय साहित्य में कहीं नहीं मिलती है. इस बात को रामविलास जी नहीं देखते हैं. अवध में जो किसान आंदोलन हुआ उसके नेता थे बाबा रामचन्द्र. इंद्र की आलोचना में जो दोहे और चौपाइयां तुलसीदास ने लिखी थीं, बाबा रामचन्द्र उनका इस्तेमाल जमींदारों की निंदा और आलोचना में करते थे. निराला की एक कविता है वेदों का चरखा चला . निराला ने वर्ण व्यवस्था की कड़ी निंदा की है. अब इस कविता को रामविलास जी भूल जाते हैं.

अपनी व्याख्या में उन्होंने ऋग्वेद की सीमा का कहीं ज़िक्र नहीं किया है. ऋग्वेद के अपने अध्ययन में उन्होंने  वर्ण व्यवस्था के ढांचे का भी  कहीं कोई ज़िक्र नहीं किया है . ऋग्वेद के अध्ययन की दो परम्पराएँ भारत में है एक ऐतिहासिक और दूसरी रूपकात्मक. रामविलास जी को कहीं तो इतिहास दिखता है और जहां असमंजस पैदा करने वाले पक्ष हैं वहां वह रूपकात्मक व्याख्या करने लगते हैं.

आलोचना की यात्रा के आपके सहयात्री नामवर सिंह आज भी सक्रिय हैं और कुछ हद तक सार्थक भी हैं , उनकी दृष्टि पर आपका दृष्टिकोण ....

नामवर जी के मार्क्सवाद के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ लिखा गया है. उस पर मैं कुछ नहीं कहूँगा. हिंदी का अच्छा आलोचक होना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह मार्क्सवादी है या नहीं है. हिंदी में पहले भी ऐसे आलोचक हो चुके हैं जो मार्क्सवादी नहीं थे, आचार्य शुक्ल, आचार्य द्विवेदी, नन्द दुलारे वाजपेई आदि. निर्द्वन्द्व और निर्भ्रांत रूप से कहा जा सकता है कि ये लोग बड़े आलोचक हैं.

नामवर सिंह की साहित्य से अटूट प्रतिबद्धता है और यही प्रतिबद्धता उनकी आलोचना की ताकत है. इस प्रतिबद्धता से साहित्य के संबंध में उनकी जो दृष्टि बनती है उसे लेकर मतभेद तो है पर उसके महत्त्व को ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. नामवर जी की आलोचना दृष्टि का सबसे पहला पता उनकी छायावाद नामक पुस्तक से लगता है. इसमें कविता की साहित्यिकता की व्याख्या और पहचान है. छायावाद की कविता को समझने में इसके महत्व को सबलोग स्वीकार करते हैं. इसमें भी साहित्य से जुड़ने का भाव ही अधिक है. उनकी दूसरी किताब कहानी और नई कहानी है. उन्होंने इसमें कहानी की शास्त्रीय और प्राध्यापकीय आलोचना को तोड़ कर पहली बार हिंदी में कहानी की गम्भीर आलोचना की शुरुआत की है.

नामवर सिंह अत्यंत पढ़े लिखे आलोचक हैं. इतना बहुपठित मैं हिंदी में सिर्फ रामचंद्र शुक्ल को पाता हूँ. समकालीन दुनिया की आलोचना से वह पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से जुड़े रहे हैं. इसका असर उनकी आलोचना दृष्टि से लेकर उनकी भाषा तक पर है. कहानी और नई कहानी में कहानी की आलोचना की जो प्रक्रिया और पद्धति है उसमें एक ताज़गी है. आज भी उनके मूल्यांकनों से यदा कदा मतभेद होते हुए भी उनको खारिज़ नहीं किया जा सकता.

उनकी आलोचना का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव कविता के नए प्रतिमान है. इसकी आलोचना भी हुई है. नामवर सिंह के प्रसंग में मुझे जार्ज लुकाच की याद आती है. उन्होंने अपने जीवन में अपनी कई किताबों को disown किया. उसी तरह नामवर सिंह ने अपनी कई किताबों और मान्यताओं को disown किया है. इनमें उनकी दो महत्वपूर्ण किताबें हैं- एक तो इतिहास और आलोचना और दूसरी किताब कविता के नए  प्रतिमान.  पर मैं D.H. Lawrence की उस बात पर विश्वास करता हूँ कि कहानी पर विश्वास कीजिए कहानीकार पर नहीं. तो नामवर सिंह के own, disown  को छोडकर उनकी कविता के नए प्रतिमान को ध्यान में रखें तो पाएंगे कि उसका मूल्य उसके विवादास्पद होने में ही है. नामवर जी ने उसमें दो तरह के विवाद किए है – एक विवाद डॉ. नागेन्द्र और उनकी आलोचना दृष्टि और इनकी कविता संबधी समझ से है, दूसरा विवाद अज्ञेय की कविता से है.

नागेन्द्र के संदर्भ में नामवर सिंह रामचंद्र शुक्ल को ध्यान में रखते हैं और अज्ञेय के प्रसंग में मुक्तिबोध को रखते हैं. हिंदी आलोचना में विचारों के विकास में बहस की भूमिका की अगर किसी दिन खोज़ और खबर ली जायेगी तो कविता के नए प्रतिमान का यह योगदान स्वीकार किया जायेगा.कविता के नए प्रतिमान की शुरुआत रामचंद्र शुक्ल के प्रसिद्ध निबन्ध कविता क्या है से होती है.ऐसा लगता है जैसे नामवर सिंह यह चाहते हो कि रामचन्द्र शुक्ल ने कविता के जैसे नए प्रतिमान बनाए उसी तरह की उम्मीद इस किताब से भी की जाए. बाद में खुद नामवर सिंह ने यह स्वीकार किया कि उसमें इस तरह का कोई नया प्रतिमान नहीं है.

उनका आखिरी महत्वपूर्ण कार्य है दूसरी परम्परा की खोज. इसकी भाषा बहुत ही सृजनशील है. नामवर सिंह की भाषा बहुत ही जानदार है और इसी लिए वह असरदार आलोचना लिखते हैं और बोलते हैं. नामवर सिंह की आलोचना की भाषा पर उनकी वक्तृता का गहरा असर है. दूसरी परम्परा की खोज में हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना और रचनाशीलता की नई व्याख्या की कोशिश है, पर रामचन्द्र शुक्ल के महत्व को कम करने के लिए इसमें जो तर्क दिए गए है वह गले नहीं उतरते. कुल मिलाकर उनकी आलोचना में साहित्य के प्रति जो प्रतिबद्धता है वही मुझे मूल्यवान लगती है.

समकालीन आलोचना - परिदृश्य कैसा लगता है..

समकालीन आलोचना की जो प्रवृतियाँ हैं वह चिंताजनक अधिक हैं, उत्साहवर्धक कम हैं.पत्र–पत्रिकाओं में छपने वाले लेखों और समीक्षाओं को ध्यान में रखें तो यह देखने को मिलता है कि आलोचना और रचना की परम्परा के गम्भीर ज्ञान का आभाव है. यह नितांत समकालीनता तक सीमित हो गई है. अक्सर समकालीन कविओं, कहानीकारों और उपन्यासकारों की समीक्षा ही आलोचना के रूप में सामने आ रही हैं. मैं केवल पुस्तक समीक्षा को आलोचना नहीं मानता. रचना के केन्द्र में स्थित समाज और विचार से अगर आलोचना की टकराहट नहीं है तो वह आलोचना नहीं है.

सबसे चिंताजनक पहलू इसका व्यक्तिगत राग – द्वेष से संचालित होना है.जिससे आपका राग है उसके लिए अतिरंजित प्रशंसा और जिससे आपका द्वेष है उसकी रक्तरंजित निंदा की जा रही है. पर मैं यह भी कहूँगा,.. इस चिंता, संकट और अवसरवाद के बावजूद ऐसी आलोचनाएं भी दिखती हैं जो आलोचना के भविष्य को लेकर आश्वस्त करती हैं और उम्मीद भी जगाती हैं. गोपाल प्रधान, सियाराम शर्मा, नन्द भारद्वाज ऐसे ही आलोचक हैं. शमशेर पर आलोचक ज्योतिष जोशी की किताब भी आई है.  इनसे हिंदी आलोचना को बहुत उम्मीदें हैं.

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