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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

हिन्दी सिनेमा और हिन्दी प्रचार का धोखा



हिन्दी सिनेमा पूरे देश में देखा और समझा जाता है। हम जानते हैं भारत में हिन्दी सिनेमा की अधिकतम अभिनेत्रियाँ जैसे बैजयंती माला, वहीदा रहमान, आशा पारेख, श्रीदेवी, हेमा मालिनी भी अहिन्दी प्रदेशों की ही हैं। लेकिन ये सब हिन्दी की बदौलत ही जानी जाती हैं। ठीक इसी तरह गायकों में कोई पंजाबी तो कोई बंगाली तो कोई मराठी जैसे मोहम्मद रफी, मन्ना डे, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, कुमार सानू आदि, अभिनेता जैसे धर्मेंद्र, अशोक कुमार, संजीव कुमार और जाने कितने नाम हैं जिनकी गिनती आसान नहीं आज आमि खान, शाहरुख खान जैसे कलाकार अंग्रेजी बोलते हैं लेकिन जरा सोचिये कि इन खानों को, इन अभिनेताओं को, इन गायकों को कौन जानता होता अगर हिन्दी में इनकी फिल्में नहीं बनी होतीं। …… आयोजित किया जाता है फिल्म के लिए अवार्ड समारोह वहां कहा जाता है कि यह समारोह हिन्दी या भारतीय सिनेमा का है। लेकिन वह आयोजित होता है विदेशों में, इस समारोह में दो घंटे में दो मिनट भी हिन्दी बोलते लोग नहीं देखे जाते। ……कभी-कभी तो लगता है कि हिन्दी को नुकसान पहुँचाने में और अंग्रेजी को स्थापित करने में पिछले 20 साल की फिल्मों ने सबसे ज्यादा हाथ दिया है।
किसी भी फिल्म को जो इन दिनों बनी है, को लेकर गांव में चले जाइये और लोगों से पूछिये कि कितने डायलॉग समझ में आये। 120 मिनट में 20-25-30-50 मिनट तक अंग्रेजी बोलने के दृश्य, विदेशों में शापिंग के दृश्य, करोड़ों की लेन-देन यही सब दिखाये जाते हैं। मैं पूछता हूं कि कौन से देश के लिए फिल्म बनी है यह? ……हिन्दी की कमाई खाकर अंग्रेजी का राग अलापने के लिए इन्हें भारत सरकार सम्मान देती है। खूब तरक्की कर रहे हैं हम!!
ये सब हिन्दी के साथ गद्दारी करना ही जानते हैं, ऐसा लगता है। हिन्दी फिल्मों के डायलॉग रोमन में लिख कर दिये जाते हैं, इससे शर्मनाक हिन्दी कला जगत के लिए और क्या होगी? अगर कोई यह कहे कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से आने के कारण इन्हें रोमन में लिखकर दिया जाता है तो उनसे इतना ही कहना है कि ऐसे कलाकार जो कला और फिल्म की भाषा ही नहीं जानते उन्हें फिल्म करने की कोई जरुरत नहीं। उनसे देश का कितना भला हुआ है, बताने की आवश्यकता नहीं।

कितना प्रचार किया है हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी का 

खूब सुनने को मिलता है कि हिन्दी को फैलाने में हिन्दी की फिल्मों का बहुत योगदान है। जरा इस सच को समझ लेते हैं।  भारत के आधे लोग हिन्दी पहले से समझते और जानते हैं। यानि अब सिर्फ आधे लोगों में से ही तय करना है कि कितने लोगों ने हिन्दी फिल्मों से हिन्दी सीखीआधे में से कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने हिन्दी सीखी होगीपूरी दुनिया में कुल मिलाकर प्रतिवर्ष तीन लाख से ज्यादा गाँवोंशहरों आदि में हिन्दी सीखने वाले अगर एक गांव में दो भी लोग हों तो पूरे पचास साल में हिन्दी फिल्मों के दम पर हिन्दी सीखनेवाले लोग दो-तीन करोड़ से ज्यादा होंगे यह सोचना कहीं से बुद्धिमानी नहीं है। अगर इस संख्या पाँच करोड़ भी मान लें तो दस लाख प्रतिवर्ष लोग ऐसे होंगे जो हिन्दी सीखने का श्रेय फिल्मों को देंगे( यह पहले ही बता दूँ कि यह सम्भव ही नहीं कि फिल्मों के दम पर पाँच करोड़ लोगों ने हिन्दी सीख ली हो) लेकिन हिन्दी फिल्मों को देखकर अंग्रेजी की ओर आकर्षित होने वाले लोगों की संख्या सिर्फ फिल्मों के कारण पाँच करोड़ नहीं इससे कई गुना ज्यादा होगीयह एकदम सही है।
जब देश के स्टार और सेिब्रिटी कहे जाने वाले ये लोग अपनी भाषा को कुछ नहीं समते तो साधारण दर्शक या फैन जो भ्रमवश इनको अपना आदर्श नहीं आइडल बनाता है, भाषाओं को सही नजर से देखने लगे यह सोचना ठीक नहीं। ऐसा नहीं ये लोग ही हिन्दी प्रचार में योगदान देंगे।
अब जरा देखिए कि हिन्दी को बिगाड़ने में इन फिल्मों का कितना योगदान रहा है। अगर हम 1975-80 के बाद की फिल्में देखें तब जाकर पता चलता है कि हिन्दी फिल्मों में कितनी हिन्दी हैगानों में अंग्रेजी घुसाने की परम्परा पहले भी रही है लेकिन पहले यह संख्या 1000 गानों में एक-दो थी लेकिन लगभग बीस सालों से यह संख्या ऐसी हो गई है कि गानों को हिन्दी गाना माना ही नहीं जाययही सही होगा। अगर आप फिल्मों में घर को देखेंस्कूल को देखें तो मालूम हो जाएगा कि फिल्म वालों के स्कूल अंग्रेजी के ही रहे हैं। यानि फिल्मों में जितने भी स्कूल के दृश्य हैं उन सबमें कुछ अपवादों को छोड़कर सभी स्कूल अंग्रेजी के हैं। 1970 के पहले तक या कहें जब श्वेत-श्याम फिल्मों का समय था तब तक फिल्मों में स्कूल यानि विद्यालय होते थे लेकिन बाद में ये सिर्फ महँगे स्कूलों से बढ़ते-बढ़ते विदेशी स्कूलों तक पहुँच गए। फिल्मों में शिक्षा का मतलब ही है अंग्रेजी जानने वाला। लेकिन यह कहते हुए एक फिल्म याद रही है जिसका नाम था पूरब और पश्चिम जिसमें मनोज कुमार नायक थे और फिल्म का अच्छा-खासा हिस्सा इंग्लैंड पर आधारि था लेकिन उस फिल्म में मनोज कुमार के मुँह से आप अंग्रेजी के दस शब्द भी शायद ही सुनेंगे। उस फिल्म को बनानेवाले को शायद मालूम था कि यह फिल्म भारत में दिखाई जाएगी और हिन्दी में बन रही है। पहले अंग्रेजों के डायलाग भी अक्सर हिन्दी में होते थे या हिन्दी में अनुवाद करके किसी पात्र द्वारा बताए जाते थे लेकिन अब आप चाहें तो अंग्रेजों के समय पर बननेवाले फिल्म को देख लें सारे पात्र पूरी अंग्रेजी बोलते हैं। मैं पूछ सकता हूँ कि जिस दर्शक वर्ग ने फिल्मों को आगे बढ़ायाक्या यह फिल्में उसके लिए बन रही हैंजबकि उस वर्ग को अंग्रेजी आती नहीं है। आज अगर कोई फिल्म बनती है तो माना ही यह जाता है 121 करोड़ लोगों में से सिर्फ 21 करोड़ लोग(ये तो बहुत अधिक कह गया!) ही यह फिल्म देखेंगे और तथाकथित अभिनेता या अभिनेत्री जम कर पाकेटमारी करेंगे।
आप चाहें तो हिन्दी फिल्मों को खंगाल लें लेकिन आप बीस प्रतिशत फिल्म भी खोज नहीं पाएंगे जिसमें किताब के नाम पर हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा की किताबें किसी शेल्फ़ में दिख जाएंगी। क्योंकि हिन्दी फिल्मों में जब भी किताब का दृश्य होगा किताब अंग्रेजी में ही होगी।
अब लोग सोचने लगते हैं कि देखो ये हीरो-हीरोइन लोग अंग्रेजी बोलते हैं और उनकी नकल शुरु करते हैं। और हाल वही होता है जो नकलची लकड़हारे का हुआ था जिसकी अपनी कुल्हाड़ी भी खो गई। और एक यूरोपीय नकल आटोग्राफ हैजिसके बारे में इतना ही कहना है कि पूरे हिन्दी सिनेमा के सभी कलाकारों के आटोग्राफ ले लें और गिन लें कि हिन्दी में कितने लोगों ने हस्ताक्षर किए हैंसब साफ हो जाएगा।
अब बात करते हैं हिन्दी फिल्मों में हिन्दी और अंग्रेजी में लिखे नामों आदि की। हिन्दी फिल्मों में गुलजार की कुछ फिल्मों में शुरु से अन्त तक निर्दे, निर्माता से लेकर गीतकार-संगीतकार तक सबके नाम हिन्दी में लिखे मिल जाते हैं। लेकिन आज की फिल्मों में तो हिन्दी या नागरी में नाम देखने को भी नहीं मिल रहे हैं। ऐसा नहीं कि पहले ये सारे नाम हिन्दी में लिखे जाते थे। सिर्फ फिल्म का नाम हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में दिखाया जाता रहा है। उसमें भी अंग्रेजी में पहले और बाद में हिन्दी में। जब हिन्दी फिल्म को देखने वाले नब्बे प्रतिशत(या शायद कभी-कभी सौ प्रतिशत) से अधिक दर्शक हिन्दी जानते हैं तब क्यों सारे नाम अंग्रेजी में लिखे जाते हैं। कारण है फिल्मों के कलाकारों का धन कमाने का व्यावसायिक नजरिया जिसमें भाषा या भावना का कोई महत्व नहीं। अगर कभी-कभार कुछ अच्छी फिल्में बन जाती हैं तो ऐसा शायद ही होता है कि वहाँ निर्माता या निर्देशक देश का भला चाहते हों। वहाँ उन्हें लगता है कि अच्छी कमाई हो जाएगी और लूट भी।
      वैसे भी हिन्दी फिल्मों का गढ़ हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा भी नहीं है। दक्षिण के लगभग सारे बड़े कलाकारों ने अपने हाथ-पैर हिन्दी में चलाएँ हैं या कोशि की है। कुछ सफल रहे और कुछ असफल, क्यों? क्योंकि उन्हें दिखता है कि हिन्दी का बाजार कितना बड़ा है। उन्हें हिन्दी सीखने में कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन अन्य दक्षिणवासियों के लिए हिन्दी सीखना दुनिया का सबसे कठिन कार्य बन जाता है। और जब हिन्दी को व्यापार या बाजार की भाषा के रुप में ये दक्षिण के कलाकार अपनाते हैं तो जाहिर इनमें कितना हिन्दी-प्रेम होता होगा? किसी बाजार में किसी व्यापार को अपने व्यापार के अलावे किसी चीज की फिक्र तो होती नहीं है। कोई व्यापारी चाहे वह किराने का सामान बेचे, चाहे सिनेमा बेचे शायद ही कभी सेवा भाव रखता होगा। मैं या कोई भी आदमी यह दावा कर सकता है कि 80 प्रतिशत हिन्दी सिनेमा के सभी कलाकारों में कोई कलाकार हिन्दी का इस्तेमाल अपने जीवन में आठ प्रतिशत भी नहीं करता।  

अब आप ही सोचिए  

अब आप खुद ही सोचिए कि कितने लोग हिन्दी फिल्मों से हिन्दी सीखते हैं और कितने लोग हिन्दी फिल्मों से हिन्दी छोड़ते हैं या हिन्दी को बिगाड़ते हैं? जब हिन्दी सिनेमा के कलाकार तो आटोग्राफ हिन्दी में देते हैं, गाने हिन्दी में गाते हैं, साक्षात्कार हिन्दी में देते हैं, हिन्दी बोलना पसन्द करते हैं और हिन्दी फिल्मों के जरिये अंग्रेजी और अंग्रेजियत का मोह फैला रहे हैं तो कैसे कहा जा सकता है हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को फैलाने में हमारी मदद की है! यह हिन्दी के नाम किया जाने वाला मिथ्या प्रचार है। यहाँ मेरा विषय हिन्दी फिल्मों का विषय आदि नहीं था वरना इसपर जमकर लिखता। किसी भी अक्लमंद के लिए यह संभव नहीं कि वह पाँच जार आदमी को हिन्दी सिखाकर बीस हजार आदमी को हिन्दी सीखने से रोके या हिन्दी को छोड़कर अंग्रेजी के मोह में  पड़ने की प्रेरणा दे और कहे कि इस काम से हिन्दी का प्रचार हो रहा है।

अब जरा फिल्मों के नाम देखिए। यह एक साधारण सी खोजबीन से पता चली जानकारी है।

2011 में अंग्रेजी-31हिंग्रेजी-17 कुल-85
2010 में अंग्रेजी-34, हिंग्रेजी-11, कुल-120 
2008 में अंग्रेजी-26, हिंग्रेजी-10, कुल-80
2009 में अंग्रेजी-26, हिंग्रेजी-12, कुल-81
2007 में अंग्रेजी-32, हिंग्रेजी-10, कुल-102
2006 में अंग्रेजी-13, हिंग्रेजी-13, कुल-80
2005 में अंग्रेजी-15, हिंग्रेजी-12, कुल-93
2004 में अंग्रेजी-10, हिंग्रेजी-7, कुल-72
2003 में अंग्रेजी-11, हिंग्रेजी-10, कुल-70
2002 में अंग्रेजी-4, हिंग्रेजी-4, कुल-62
एक मामले में हिन्दी सिनेमा जगत सबसे रद्दी सिनेमा जगत है जिसमें शायद ही कोई अभिनेता ऐसा हो या अभिनेत्री ऐसी हो जिसे अंग्रेजी के कुत्ते नहीं काटा हो। लगभग सभी जाने-माने सिनेमा कलाकार भारतीय अंग्रेजी में ही सबकुछ करते हैं।
फिल्मों में नौकरों से, गँवारों से हिन्दी, क्षेत्रीय भाषाएँ बोलवाई जाती हैं, लेकिन साहब या मेमसाहब मालिक या अंग्रेजी बोलते हैं। स्कूल देखिएगा तो अंग्रेजी में पढ़ाई हो रही है। इसका सीधा सा अर्थ तो इतना ही है कि हिन्दी नौकरों की भाषा है, दाइयों की भाषा है?


(यह लेख मेरी किताब के एक अध्याय का संपादित रूप है। कुछ बातें और थीं, लेकिन उनका सीधा सम्बन्ध हिन्दी या भारतीय भाषाओं से नही था, इसलिए कुछ सम्पादन करना पड़ा। यह एक विवादास्पद-सा लेख है क्योंकि हर जगह सुनने को मिलता है कि हिन्दी सिनेमा ने हिन्दी का बहुत प्रचार किया है। इसको लेकर एक बार एक जगह बहस भी हो चुकी है।)