शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

हिन्दी सिनेमा और हिन्दी प्रचार का धोखा



हिन्दी सिनेमा पूरे देश में देखा और समझा जाता है। हम जानते हैं भारत में हिन्दी सिनेमा की अधिकतम अभिनेत्रियाँ जैसे बैजयंती माला, वहीदा रहमान, आशा पारेख, श्रीदेवी, हेमा मालिनी भी अहिन्दी प्रदेशों की ही हैं। लेकिन ये सब हिन्दी की बदौलत ही जानी जाती हैं। ठीक इसी तरह गायकों में कोई पंजाबी तो कोई बंगाली तो कोई मराठी जैसे मोहम्मद रफी, मन्ना डे, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, कुमार सानू आदि, अभिनेता जैसे धर्मेंद्र, अशोक कुमार, संजीव कुमार और जाने कितने नाम हैं जिनकी गिनती आसान नहीं आज आमि खान, शाहरुख खान जैसे कलाकार अंग्रेजी बोलते हैं लेकिन जरा सोचिये कि इन खानों को, इन अभिनेताओं को, इन गायकों को कौन जानता होता अगर हिन्दी में इनकी फिल्में नहीं बनी होतीं। …… आयोजित किया जाता है फिल्म के लिए अवार्ड समारोह वहां कहा जाता है कि यह समारोह हिन्दी या भारतीय सिनेमा का है। लेकिन वह आयोजित होता है विदेशों में, इस समारोह में दो घंटे में दो मिनट भी हिन्दी बोलते लोग नहीं देखे जाते। ……कभी-कभी तो लगता है कि हिन्दी को नुकसान पहुँचाने में और अंग्रेजी को स्थापित करने में पिछले 20 साल की फिल्मों ने सबसे ज्यादा हाथ दिया है।
किसी भी फिल्म को जो इन दिनों बनी है, को लेकर गांव में चले जाइये और लोगों से पूछिये कि कितने डायलॉग समझ में आये। 120 मिनट में 20-25-30-50 मिनट तक अंग्रेजी बोलने के दृश्य, विदेशों में शापिंग के दृश्य, करोड़ों की लेन-देन यही सब दिखाये जाते हैं। मैं पूछता हूं कि कौन से देश के लिए फिल्म बनी है यह? ……हिन्दी की कमाई खाकर अंग्रेजी का राग अलापने के लिए इन्हें भारत सरकार सम्मान देती है। खूब तरक्की कर रहे हैं हम!!
ये सब हिन्दी के साथ गद्दारी करना ही जानते हैं, ऐसा लगता है। हिन्दी फिल्मों के डायलॉग रोमन में लिख कर दिये जाते हैं, इससे शर्मनाक हिन्दी कला जगत के लिए और क्या होगी? अगर कोई यह कहे कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से आने के कारण इन्हें रोमन में लिखकर दिया जाता है तो उनसे इतना ही कहना है कि ऐसे कलाकार जो कला और फिल्म की भाषा ही नहीं जानते उन्हें फिल्म करने की कोई जरुरत नहीं। उनसे देश का कितना भला हुआ है, बताने की आवश्यकता नहीं।

कितना प्रचार किया है हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी का 

खूब सुनने को मिलता है कि हिन्दी को फैलाने में हिन्दी की फिल्मों का बहुत योगदान है। जरा इस सच को समझ लेते हैं।  भारत के आधे लोग हिन्दी पहले से समझते और जानते हैं। यानि अब सिर्फ आधे लोगों में से ही तय करना है कि कितने लोगों ने हिन्दी फिल्मों से हिन्दी सीखीआधे में से कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने हिन्दी सीखी होगीपूरी दुनिया में कुल मिलाकर प्रतिवर्ष तीन लाख से ज्यादा गाँवोंशहरों आदि में हिन्दी सीखने वाले अगर एक गांव में दो भी लोग हों तो पूरे पचास साल में हिन्दी फिल्मों के दम पर हिन्दी सीखनेवाले लोग दो-तीन करोड़ से ज्यादा होंगे यह सोचना कहीं से बुद्धिमानी नहीं है। अगर इस संख्या पाँच करोड़ भी मान लें तो दस लाख प्रतिवर्ष लोग ऐसे होंगे जो हिन्दी सीखने का श्रेय फिल्मों को देंगे( यह पहले ही बता दूँ कि यह सम्भव ही नहीं कि फिल्मों के दम पर पाँच करोड़ लोगों ने हिन्दी सीख ली हो) लेकिन हिन्दी फिल्मों को देखकर अंग्रेजी की ओर आकर्षित होने वाले लोगों की संख्या सिर्फ फिल्मों के कारण पाँच करोड़ नहीं इससे कई गुना ज्यादा होगीयह एकदम सही है।
जब देश के स्टार और सेिब्रिटी कहे जाने वाले ये लोग अपनी भाषा को कुछ नहीं समते तो साधारण दर्शक या फैन जो भ्रमवश इनको अपना आदर्श नहीं आइडल बनाता है, भाषाओं को सही नजर से देखने लगे यह सोचना ठीक नहीं। ऐसा नहीं ये लोग ही हिन्दी प्रचार में योगदान देंगे।
अब जरा देखिए कि हिन्दी को बिगाड़ने में इन फिल्मों का कितना योगदान रहा है। अगर हम 1975-80 के बाद की फिल्में देखें तब जाकर पता चलता है कि हिन्दी फिल्मों में कितनी हिन्दी हैगानों में अंग्रेजी घुसाने की परम्परा पहले भी रही है लेकिन पहले यह संख्या 1000 गानों में एक-दो थी लेकिन लगभग बीस सालों से यह संख्या ऐसी हो गई है कि गानों को हिन्दी गाना माना ही नहीं जाययही सही होगा। अगर आप फिल्मों में घर को देखेंस्कूल को देखें तो मालूम हो जाएगा कि फिल्म वालों के स्कूल अंग्रेजी के ही रहे हैं। यानि फिल्मों में जितने भी स्कूल के दृश्य हैं उन सबमें कुछ अपवादों को छोड़कर सभी स्कूल अंग्रेजी के हैं। 1970 के पहले तक या कहें जब श्वेत-श्याम फिल्मों का समय था तब तक फिल्मों में स्कूल यानि विद्यालय होते थे लेकिन बाद में ये सिर्फ महँगे स्कूलों से बढ़ते-बढ़ते विदेशी स्कूलों तक पहुँच गए। फिल्मों में शिक्षा का मतलब ही है अंग्रेजी जानने वाला। लेकिन यह कहते हुए एक फिल्म याद रही है जिसका नाम था पूरब और पश्चिम जिसमें मनोज कुमार नायक थे और फिल्म का अच्छा-खासा हिस्सा इंग्लैंड पर आधारि था लेकिन उस फिल्म में मनोज कुमार के मुँह से आप अंग्रेजी के दस शब्द भी शायद ही सुनेंगे। उस फिल्म को बनानेवाले को शायद मालूम था कि यह फिल्म भारत में दिखाई जाएगी और हिन्दी में बन रही है। पहले अंग्रेजों के डायलाग भी अक्सर हिन्दी में होते थे या हिन्दी में अनुवाद करके किसी पात्र द्वारा बताए जाते थे लेकिन अब आप चाहें तो अंग्रेजों के समय पर बननेवाले फिल्म को देख लें सारे पात्र पूरी अंग्रेजी बोलते हैं। मैं पूछ सकता हूँ कि जिस दर्शक वर्ग ने फिल्मों को आगे बढ़ायाक्या यह फिल्में उसके लिए बन रही हैंजबकि उस वर्ग को अंग्रेजी आती नहीं है। आज अगर कोई फिल्म बनती है तो माना ही यह जाता है 121 करोड़ लोगों में से सिर्फ 21 करोड़ लोग(ये तो बहुत अधिक कह गया!) ही यह फिल्म देखेंगे और तथाकथित अभिनेता या अभिनेत्री जम कर पाकेटमारी करेंगे।
आप चाहें तो हिन्दी फिल्मों को खंगाल लें लेकिन आप बीस प्रतिशत फिल्म भी खोज नहीं पाएंगे जिसमें किताब के नाम पर हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा की किताबें किसी शेल्फ़ में दिख जाएंगी। क्योंकि हिन्दी फिल्मों में जब भी किताब का दृश्य होगा किताब अंग्रेजी में ही होगी।
अब लोग सोचने लगते हैं कि देखो ये हीरो-हीरोइन लोग अंग्रेजी बोलते हैं और उनकी नकल शुरु करते हैं। और हाल वही होता है जो नकलची लकड़हारे का हुआ था जिसकी अपनी कुल्हाड़ी भी खो गई। और एक यूरोपीय नकल आटोग्राफ हैजिसके बारे में इतना ही कहना है कि पूरे हिन्दी सिनेमा के सभी कलाकारों के आटोग्राफ ले लें और गिन लें कि हिन्दी में कितने लोगों ने हस्ताक्षर किए हैंसब साफ हो जाएगा।
अब बात करते हैं हिन्दी फिल्मों में हिन्दी और अंग्रेजी में लिखे नामों आदि की। हिन्दी फिल्मों में गुलजार की कुछ फिल्मों में शुरु से अन्त तक निर्दे, निर्माता से लेकर गीतकार-संगीतकार तक सबके नाम हिन्दी में लिखे मिल जाते हैं। लेकिन आज की फिल्मों में तो हिन्दी या नागरी में नाम देखने को भी नहीं मिल रहे हैं। ऐसा नहीं कि पहले ये सारे नाम हिन्दी में लिखे जाते थे। सिर्फ फिल्म का नाम हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में दिखाया जाता रहा है। उसमें भी अंग्रेजी में पहले और बाद में हिन्दी में। जब हिन्दी फिल्म को देखने वाले नब्बे प्रतिशत(या शायद कभी-कभी सौ प्रतिशत) से अधिक दर्शक हिन्दी जानते हैं तब क्यों सारे नाम अंग्रेजी में लिखे जाते हैं। कारण है फिल्मों के कलाकारों का धन कमाने का व्यावसायिक नजरिया जिसमें भाषा या भावना का कोई महत्व नहीं। अगर कभी-कभार कुछ अच्छी फिल्में बन जाती हैं तो ऐसा शायद ही होता है कि वहाँ निर्माता या निर्देशक देश का भला चाहते हों। वहाँ उन्हें लगता है कि अच्छी कमाई हो जाएगी और लूट भी।
      वैसे भी हिन्दी फिल्मों का गढ़ हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा भी नहीं है। दक्षिण के लगभग सारे बड़े कलाकारों ने अपने हाथ-पैर हिन्दी में चलाएँ हैं या कोशि की है। कुछ सफल रहे और कुछ असफल, क्यों? क्योंकि उन्हें दिखता है कि हिन्दी का बाजार कितना बड़ा है। उन्हें हिन्दी सीखने में कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन अन्य दक्षिणवासियों के लिए हिन्दी सीखना दुनिया का सबसे कठिन कार्य बन जाता है। और जब हिन्दी को व्यापार या बाजार की भाषा के रुप में ये दक्षिण के कलाकार अपनाते हैं तो जाहिर इनमें कितना हिन्दी-प्रेम होता होगा? किसी बाजार में किसी व्यापार को अपने व्यापार के अलावे किसी चीज की फिक्र तो होती नहीं है। कोई व्यापारी चाहे वह किराने का सामान बेचे, चाहे सिनेमा बेचे शायद ही कभी सेवा भाव रखता होगा। मैं या कोई भी आदमी यह दावा कर सकता है कि 80 प्रतिशत हिन्दी सिनेमा के सभी कलाकारों में कोई कलाकार हिन्दी का इस्तेमाल अपने जीवन में आठ प्रतिशत भी नहीं करता।  

अब आप ही सोचिए  

अब आप खुद ही सोचिए कि कितने लोग हिन्दी फिल्मों से हिन्दी सीखते हैं और कितने लोग हिन्दी फिल्मों से हिन्दी छोड़ते हैं या हिन्दी को बिगाड़ते हैं? जब हिन्दी सिनेमा के कलाकार तो आटोग्राफ हिन्दी में देते हैं, गाने हिन्दी में गाते हैं, साक्षात्कार हिन्दी में देते हैं, हिन्दी बोलना पसन्द करते हैं और हिन्दी फिल्मों के जरिये अंग्रेजी और अंग्रेजियत का मोह फैला रहे हैं तो कैसे कहा जा सकता है हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को फैलाने में हमारी मदद की है! यह हिन्दी के नाम किया जाने वाला मिथ्या प्रचार है। यहाँ मेरा विषय हिन्दी फिल्मों का विषय आदि नहीं था वरना इसपर जमकर लिखता। किसी भी अक्लमंद के लिए यह संभव नहीं कि वह पाँच जार आदमी को हिन्दी सिखाकर बीस हजार आदमी को हिन्दी सीखने से रोके या हिन्दी को छोड़कर अंग्रेजी के मोह में  पड़ने की प्रेरणा दे और कहे कि इस काम से हिन्दी का प्रचार हो रहा है।

अब जरा फिल्मों के नाम देखिए। यह एक साधारण सी खोजबीन से पता चली जानकारी है।

2011 में अंग्रेजी-31हिंग्रेजी-17 कुल-85
2010 में अंग्रेजी-34, हिंग्रेजी-11, कुल-120 
2008 में अंग्रेजी-26, हिंग्रेजी-10, कुल-80
2009 में अंग्रेजी-26, हिंग्रेजी-12, कुल-81
2007 में अंग्रेजी-32, हिंग्रेजी-10, कुल-102
2006 में अंग्रेजी-13, हिंग्रेजी-13, कुल-80
2005 में अंग्रेजी-15, हिंग्रेजी-12, कुल-93
2004 में अंग्रेजी-10, हिंग्रेजी-7, कुल-72
2003 में अंग्रेजी-11, हिंग्रेजी-10, कुल-70
2002 में अंग्रेजी-4, हिंग्रेजी-4, कुल-62
एक मामले में हिन्दी सिनेमा जगत सबसे रद्दी सिनेमा जगत है जिसमें शायद ही कोई अभिनेता ऐसा हो या अभिनेत्री ऐसी हो जिसे अंग्रेजी के कुत्ते नहीं काटा हो। लगभग सभी जाने-माने सिनेमा कलाकार भारतीय अंग्रेजी में ही सबकुछ करते हैं।
फिल्मों में नौकरों से, गँवारों से हिन्दी, क्षेत्रीय भाषाएँ बोलवाई जाती हैं, लेकिन साहब या मेमसाहब मालिक या अंग्रेजी बोलते हैं। स्कूल देखिएगा तो अंग्रेजी में पढ़ाई हो रही है। इसका सीधा सा अर्थ तो इतना ही है कि हिन्दी नौकरों की भाषा है, दाइयों की भाषा है?


(यह लेख मेरी किताब के एक अध्याय का संपादित रूप है। कुछ बातें और थीं, लेकिन उनका सीधा सम्बन्ध हिन्दी या भारतीय भाषाओं से नही था, इसलिए कुछ सम्पादन करना पड़ा। यह एक विवादास्पद-सा लेख है क्योंकि हर जगह सुनने को मिलता है कि हिन्दी सिनेमा ने हिन्दी का बहुत प्रचार किया है। इसको लेकर एक बार एक जगह बहस भी हो चुकी है।)

9 टिप्‍पणियां:

  1. चन्दन मिश्र जी आपका लेख बहोत अच्छा है.लेकिन आपसे एक निवेदन है आपने लेख में कुछ हिंदी शब्दों को अंग्रेजी शब्द में लिखा है उसे सही करे | जैसे स्कूल,फिल्म.

    धन्यवाद

    history of panipat

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  2. हिन्दी सिनेमा जगत सबसे रद्दी सिनेमा जगत है जिसमें शायद ही कोई अभिनेता ऐसा हो या अभिनेत्री ऐसी हो जिसे अंग्रेजी के कुत्ते नहीं काटा हो। लगभग सभी जाने-माने सिनेमा कलाकार भारतीय अंग्रेजी में ही सबकुछ करते हैं। मेरी भी मान्यता है कि सिने जगत के अभिनेताओं का ध्यान हिंदी की ओर उत्कृष्ट करने के लिए कुछ पहल की जानी चाहिए । पोस्ट अच्छा लगा । धन्यवाद ।

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  3. आपका विश्लेषण अच्छा लगा। साधुवाद।

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  4. देशवासी अंग्रेज़ी भाषा से इतने मोहित होते जा रहे हैं कि हिन्दी भाषा उपेक्षित होती जा रही है। आज कई देशवासी हिन्दी पत्रिका या समाचार पत्र पढ़ना फैशन के विरुद्ध मानते हैं। राजभाषा होते हुए भी हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा है।
    सभी देशवासियों से निवेदन है कि अपनी राष्ट्र भाषा का सम्मान करें और इसे प्राथमिकता दें ताकि विश्व भर के लोग इसे अपनायें और हमारी राष्ट्रभाषा का मान बढ़े।

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  5. बहुत अच्छी बात कही आपने चंदन जी।

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  6. बहुत ही लीक से हटकर, आप न सिर्फ़ सोचते हैं बल्कि अभिव्यक्त भी करते हैं, यह मैंने व्यक्तिअगत तौर पर आपसे बातचीत के दौरान भी पाया है।

    कुछ बातों से असहमति रहने के बावज़ूद आपसे असहमत होने का जी नहीं चाहता।

    आपकी यह पुस्तक निश्चित रूप से क्रांतिकारी विचारधारा का वाहक होगी।

    शुभकामनाएं।

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  7. अमिताभ बच्चन और आशुतोष राणा जैसे चंद कलाकार ही हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में हिंदी की शुचिता बनाए रखने में सहयोग दिया है। यह भाषाई संक्रमण का काल है,क्या किया जाए!

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  8. सभी लोगों का बहुत बहुत आभार।

    आदरणीय मनोज जी,
    अपना स्नेह बनाएँ रखें। कुछ असहमतियाँ हैं, तभी तो हम दो व्यक्ति हैं…बहुत धन्यवाद आपका।

    आदरणीय कुमार राधारमण जी,

    बार-बार यह सवाल भी मेरे दिमाग में उठता है कि अमिताभ अगर हिन्दी के विख्यात कवि बच्चन के बेटे न होते तब ऐसा कहा जाता? शायद नहीं। सम्भव है, उनको बस बच्चन के खयाल से ही (केवल और केवल)ऐसा कहा जाता हो। वैसे भी अमिताभ हिन्दी सिनेमा के पुराने कलाकार हो चुके। तब से हैं जब से हिन्दी सिनेमा में अंग्रेजी घुसी नहीं थी…जैसे आरक्षण फिल्म को ही लेते हैं। इस पर लिखने का मन भी था अपना। फिल्म में अमिताभ को हिन्दी बोलते हुए दिखाया जाता है। लेकिन वे पढाते हैं अंग्रेजी में…जबकि प्राचार्य या शिक्षा या आरक्षण जैसे तत्सम शब्द बस घुमाए जाते रहे हैं…मेरी नजर में तो हिन्दी का मजाक ही उड़ाया गया है…

    और अमिताभ के ब्लाग के बारे में भी मैंने हिन्दी दिवस के आस-पास कुछ लिखा था। इसलिए यहाँ प्रपंच अधिक दिखता है।

    आशुतोष राणा के बारे में अधिक पता नहीं। हालाँकि पुराने कलाकार हैं वे भी और अच्छा अभिनय करते हैं।

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  9. हिन्दी के साथ धोखा तो आज से नहीं हो रहा है - न जाने कितने वर्षों से हो रहा है । यह धोखा तो मेरी धारणा में, आजादी से पूर्व, उन सामंती जमींदारों के घरों से शुरु हूई थी जो अपनी दौलतों की बदौलत विदेशों में जा कर पढ़ कर भारत आते थे और यहां के पढ़े-लिखे समाज का हिस्सा माने जाते थे । ये वही लोग थे जिन्हें तब भी भारतीय व्यापारियों ने अपने मुनाफा के लिए भारतीय नगरों एवं गांवों में अपनी व्यापारिक उन्नति की सीढीयां बनाया था ।
    आज वही व्यापारी समुदाय उधार में लिए पैसे से देश में कुछ खास क्षेत्रों में अपना धन लगा व कमा रहे हैं ताकि वे करोड़पति, अरबपति या कुबेर बन सकें । आज जमीन की कीमतें बड़ें शहरों में आसमान छू रहीं हैं और किसान का बेटा व्यापारिक समुदाय के सहयोग से संचालित संस्थाओं में पढ़-लिख कर अभियंता, तकनीकी विशेषज्ञ या चिकित्क आदि बन कर भी उन्हीं राहों को अपने आमदनी का ज़रिया बना रहा है जिन राहों पर वह चल कर शिक्षा पा सका है पर किसान आज भी खाली हाथ झक मार रहा है और बुढ़ापे में दर-दर भटक कर मरता जा रहा है ।

    भारत के लोगों के साथ हुए उस छलावे का जो अंग्रेजों के जाने के बाद सपने-सा दिखा और दिखाया गया था कि अपनी धरती अपना देश, देता है आजादी का संदेश - वह भारतीय संविधान के शत-शत अनुबंधों में बहुअर्थी हो विलीन हो गया है और वामपंथी विचारों से उद्भूद् समाजवाद की संरचना के साहित्य के वावदूद (उसका उल्था हिन्दी में आया), मौलिक रचनाएं हिन्दी में सृजित हो कर भी दरकिनार होती रहीं । आज हिन्दी वोट की संख्या के रुप में सत्ता पर नशीन होनेवालों का साधन है किन्तु गरीब, मड़ई में आज भी ढि़बरी में तेल खरीद कर उसे न जला पाने की साधनहीनता का शिकार है क्योंकि तेल तो है किरासन का या तिलहनों का या वैकल्पिक उत्पादों का - उपलब्ध व्यापारियों के पास, किन्तु, उसे खरीदने की ताकत नहीं है गांव के गरीब को, क्योंकि मंहगाई की मार से आड़ी-तिरछी खड़ी झोपड़ी तो है पर उसमें जलाने के लिए किरासन तेल को खरीद कर लाने के लिए पैसे नहीं – 'का कमाय और का खाय' का ही प्रश्न यक्षवत् खड़ा है आज भी - उसके दरवाजे । फिर सिनेमा में अंग्रेजी के प्रयोग और हिन्दी के तिरस्कार के सवाल से केवल हिन्दी का प्रचार व प्रसार नहीं सम्बद्ध है बल्कि यह तो हमारी मौलिक सोच और भारतीय वैचारिकता के नित हो रहे स्खलन से सम्बद्ध है । हिन्दी साहित्य में भी यह घाल-मेल अंतरायित है । और हिन्दी का प्रयोग, प्रचार एवं प्रार और उसमें हर स्तर की शिक्षा प्राप्त करने का सीधा संबद्ध तो हमारे स्वाभिमान के प्रश्न है और उसके समाधान से जुड़ा है– उसी स्वाभिमान का, जिसकी कड़वाहट को कभी इलाहाबाद में डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी जैसे लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार को भी झेलना पड़ा था - विश्व विद्यालय में और विदेश मंत्रालय में जब वे वहां हिन्दी के अनुवाद कार्य से जोड़े गए थे - वहां के अनुभव उन्हें वही पीड़ा देते रहे हैं जो आज आप के लेख में अन्तरायित है या हिन्दी के विकास के प्रति हम जैसे लोग विपरीत धारा में पड़ कर भी हाथ-पांव मार रहे कि इस नदी को तैर सकें, इसमें अपने स्नान का आनंद उठा सकें पर यह सोंच आक्रांत हो जाते हैं इस नदी में कूद कर पौंड़ना शुरु करने पर कि कहीँ डूब न जाएँ - किनारे पहुंचते-पुहुँचते ।

    बहरहाल सोचता हूं कि शायद यह सही हो - मुद्दई लाख़ बुरा चाहे –वही होता है जो मंजूरे ख़ुदा होता है - हिन्दी का विकास उसके खुद के दम से हो रहा है ना कि इन व्यापारियों और उन व्यावसायिकों के कारण जिनके लिए हिन्दी एक भाषा के रुप में उनके व्यापार के मुनाफोखोरी का हिस्सा है - चाहे भारतीय सिनेमा से जुड़े वे लोग जिन्होंने हिन्ही के माध्यम से जीवन संवारा है और अपना करो अरबों की सम्पत्तियां भनाई हैं, अपना घर भारा है पर फिल्मों के अतिरिक्त, हिन्दी, उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा कदापि बन सकी है । अतः आप ने जिन सवालों को उठाया है वह प्रासंगिक हैं । आज भी हिन्दी के साथ वही दोगली राजनीति हो रही है जो आजादी से पूर्व लॉर्ड मैकाले ने की थी ! अंग्रेजी भाषा के पठन-पाठन का एक छूरा जो हमारी पीठों में वह भोंक गया उसका घाव अब नासूर हो गया है वह बढ़ा और फैला ही है और अब तो कैंसर की शक्ल लेने को तैयार है । पता नहीं यह राजीतिक मार हम अब तक क्यों नहीं समझ सके ! दर्द इस वजह से नहीं होता कि हम अंग्रेजी के दंश से भयाक्रांत है पर पर दर्द इसलिए हो रहा कि क्या हम में स्वाभिमान है भी या नहीं ? इस यक्ष प्रश्न का हल कैसे ढ़ूँढ़ूं ? भारत की 70 प्रतिशत जनता को गर खुश देखना है तो हमें हिन्दी भाषा को माध्यम बनाकर हर तरक्की को हासिल करना होगा और तभी हम स्वयं इस भाषा के माध्यम से दुनियां पर भी राज कर सकते हैं ।


    (उदय कुमार सिंह)
    सीबीडी बेलापुर ।
    singhuks333@gmail.com

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