गुरुवार, 8 मार्च 2012

उदयन की कथा

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआप सब को अनामिका का नमन. बहुत दिनों बाद आज आप के बीच आना हो पाया, क्या किया जाए घर - समाज के जरुरी कार्यों को भी प्राथमिकताएं तो हमें ही देनी हैं. खैर...जरुरी काम निपटा कर अब उपस्थित हूँ आप सब के सामने एक और कथा मञ्जूषा ले कर.


साथियो, अब तक कथासरित्सागर के दस अंक पूर्ण हो चुके हैं जिनमे हमने शिव-पार्वती जी की कथा, वररुचि की कथा पाटलिपुत्र (पटना)नगर की कथा,उपकोषा की बुद्धिमत्ता, योगनंद की कथा पढ़ी..और अंत में गुणाढ्य (माल्यवान) की कथा भी पढ़ी. इन सब को पढ़ कर हमने जाना कि कथासरित्सागर की कथाएं सच में चकित कर देने वाले किसी इंद्रजाल से कम नहीं. इनमे मिथक और इतिहास, यथार्थ,फंतासी और सच्चाई के अनूठे संगम के साथ साथ ऐसी बहुरंगी छटा है कि एक बड़ी मंजूषा के भीतर दूसरी, दूसरी को खोलने पर तीसरी कथा निकल ही आती है. मूल कथा में अनेक कथाओं को समेट लेने की यह पद्धति बहुत ही रोचक है.

हम सब को बचपन से ही अपने बड़ों से कहानियां सुनने का बहुत शौंक होता है, चाहे नींद बेचारी नयन द्वार पर आ आ कर लौट जाए लेकिन कहानी पूरी सुने बिना नींद को आने ही नहीं देते थे...वो बात अलग है कि हम बचपन में नींद से हार जाते थे...लेकिन तब हम छोटे थे न ....:-) किन्तु, परन्तु अब तो हम बड़े हो गए हैं...और अब कोई जटिल से जटिल कहानी भी सुनाये या पढाये तो भला हम सो जायेंगे....ना जी ना ऐसा हो ही नहीं सकता...तो लीजिये आज एक और कथा सागर में गोता लगाते हैं..ये कथा है उदयन की जो समझने में थोड़ी जटिल है लेकिन आनंद दायक है. जानती हूँ सोयेंगे नहीं .......हा.हा.हा...

उदयन की कथा

आप सब अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के  नाम से तो भली भांति परिचित  हैं..आज तक हमने पांड्वो और कौरवों के बारे में जाना, महाभारत के युद्ध के बारे में सुना, अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के चक्रव्यूह में मारे जाने के बारे में पढ़ा, उसकी पत्नी उत्तरा जो अभिमन्यु की मृत्यु के समय गर्भवती थी उसके बारे में भी पड़ा...लेकिन उसके आगे उनकी पीढ़ी कहाँ तक विस्तार पाई नहीं जानते.....! कथासरित्सागर हमारे आगे इतिहास की ऐसी ही कुछ सच्चाइयां प्रस्तुत करती है.

अभिमन्यु का बेटा परीक्षित हुआ और और परीक्षित का बेटा हुआ जनमेजय ! राजा जनमेजय का पुत्र था शतानीक जो कि पांडवों का वंशज था और वत्स नामक देश का राजा. कहते हैं यह वत्स देश इतना मनोरम था मानो स्वर्ग का अभिमान दूर करने के लिए ही विधाता ने उसे रचा था. इस वत्स देश की राजधानी थी कौशाम्बी जिस पर धन-धान्य की वर्षा होती थी. शतानीक की रानी का नाम विष्णुमति था जिसने सहस्त्रानीक नामक सुंदर पुत्र को जन्म दिया. सहस्त्रानीक के युवा होने पर पिता शतानीक ने उसे युवराज पद पर अभिषिक्त करने के तुरंत बाद वनवास गमन का विचार किया. लेकिन इसी दौरान भाग्य की लकीरों ने अपना असर दिखाना शुरू किया और  इंद्र देव ने शतानीक को असुरों के साथ युद्ध में सहायता पाने के लिए अपने पास बुला लिया और शतानीक वीरतापूर्वक लड़ते हुए इस युद्ध में मारा  गया. सहस्त्रानीक की माता विष्णुमति अपने पति के साथ सती हो गयी.

देवासुर संग्राम में देवों के  विजय उत्सव में सम्मलित होने के लिए इंद्र ने सहस्त्रानीक को बुलाया.  देवलोक में इंद्र ने सहस्त्रानीक  के साथ  सुखपूर्वक वार्तालाप करते हुए बताया - सहस्त्रानीक जिसके साथ तुम्हारा विवाह होगा उसे मैं जनता हूँ, वो अम्लुषा नामक अप्सरा है, जिसे ब्रह्मा जी ने शाप दिया था. पिछले जन्म में तुम वसु थे और तुम्हें उससे प्रेम था.

सहस्त्रानीक  ने उत्सुक होकर अल्मुषा का पता पूछा, इंद्र ने बताया कि अल्मुषा ने अयोध्या के राजा कृतवर्मा की पुत्री मृगावती के रूप में जन्म लिया है. इतना सुनना था कि सहस्त्रानीक मृगावती को पाने के लिए व्याकुल हो उठा. सहस्त्रानीक के आकाशमार्ग से पृथ्वी की ओर जाते हुए तिलोत्तमा नामक अप्सरा ने उसे पुकारा जिसे सहस्त्रानीक ने अनसुना कर दिया. तिलोत्तमा ने चिढ़ कर उसे शाप दे दिया कि जिस राजकुमारी के लिए तू मेरी बात तक नहीं सुन रहा, तुझे १४ वर्ष उससे अलग रहना होगा. सहस्त्रानीक के साथी मातली ने तिलोत्तमा का यह शाप सुन लिया जिसे राजा नहीं सुन सका.

धरती पर आकर सहस्त्रानीक ने मृगावती से विवाह किया. राजा सहस्त्रानीक रानी मृगावती के प्यार में ही डूबा रहता. कुछ समय बाद मृगावती ने गर्भ धारण किया. राजा की आँखे उसे निहारते थकती न थी और वह बार बार उससे पूछता कि तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ. रानी ने खून से भरी हुई वापी में नहाने की इच्छा प्रकट की. राजा ने उसका मान रखने के लिए लाख आदि के रस से भरी वापी बनवाई. जैसे ही रानी उस वापी में गोता लगा कर निकली कि किसी गरुड़ पक्षी ने उसे मांस का पिंड समझ कर झपट कर अपने पंजों में दबोच लिया और रानी को ले उड़ा.

साथियों लगता है देवलोक की अप्सरा तिलोत्तमा का शाप अपना असर दिखाने लगा है...आगे की कथा जानने के लिए थोड़ा इंतजार करते हैं...और अगले सप्ताह जानेंगे  इस कथा का शेष भाग तब तक के लिए आपसे आज्ञा लेती हूँ.

नमस्कार !

बुधवार, 7 मार्च 2012

‘अज्ञेय’ जी के जन्म दिवस पर …

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

अज्ञेय

(1911-1987)

प्रस्तुति : मनोज कुमार

जन्म : ‘अज्ञेय’ जी का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसया (कुशीनगर) नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ था। अज्ञेय जी के पिता श्री हीरानन्द पुरातत्व विभाग में उच्च पदाधिकारी थे। पिताजी उस समय खुदाई शिविर में रहते थे। वहीं ‘अज्ञेय’ जी का जन्म हुआ। इनका बचपन अधिकतर पिता के साथ श्रीनगर, लाहौर, पटना, नालंदा, लखनऊ, मद्रास, उटकमंड आदि बहुत से स्थानों में बीता। फलस्वरूप इनकी शिक्षा व्यवस्थित रूप से किसी एक स्थान पर नहीं हुई।

शिक्षा : इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा विद्वान पिता की देख-रेख में घर पर ही संस्कृत, फारसी, अँग्रेज़ी और बँगला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ हुई। अज्ञेय जी ने 1925 में पंजाब से एंट्रेंस, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से विज्ञान में इंटर तथा 1929 में लाहौर के फॉरमन कॉलेज से बी एस सी की परीक्षा पास की। अंगरेज़ी विषय में एम.ए. पढाई करते समय दिल्ली षडयंत्र केस तथा अन्य अभियोग के सिलसिले में वे भूमिगत हुए पर बाद में पकड़े गए और दो वर्ष तक नज़रबंद रहे। इस तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण पढ़ाई पूरी न हो सकी। इन्होंने किसान आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया। 1930 से 1936 तक के दौरान इनका अधिकांश समय विभिन्न जेलों में कटे।

कार्यक्षेत्र : अज्ञेय जी 1936 में आगरा के साप्ताहिक`सैनिक के बगैर नाम के संपादक नियुक्त किए गए। वहां लगभग एक साल तक रहे और उसके बाद 1937 में बनारसीदास चरुर्वेदी के आग्रह पर कलकत्ता से निकलने वाले विशाल भारत के संपादन का दायित्व संभाला। इसी पत्र के माध्यम से ये सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के नाम से साहित्य-जगत में प्रतिष्ठित हुए। यहां डेढ़ साल तक रहे। 1940 में वे “आरती” नामक मासिक पत्रिका की संपादकीय टीम में शामिल हुए।

1939 में उन्होंने ‘ऑल इंडिया’ रेडियो में नौकरी कर ली। लेकिन यह काम उन्हें बहुत उबाऊ लगा और इससे छुटकारा पाकर ये 1943 से 1946 तक अपने जीवन के तीन वर्ष ब्रिटिश सेना में बिताए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इन्हें कुछ दिनों तक असम और बर्मा के मोर्चों पर भी रहना पड़ा। इसके बाद 1947 में इलाहाबाद से द्वैमासिक प्रतीक नामक पत्रिका का सम्पादन शुरु किया। बाद में इसे उन्होंने इसे मासिक कर दिया। इस पत्रिका की संपादकीय टीम में रघुबीर सहाय, सियारामशरण गुप्त, शिवमंगल सिंह सुमन और श्रीपत राय जैसे साहित्यकार शामिल थे। इसमें छप कर कई नए लेखक रातों रात प्रसिद्ध हो गए।

1955-1956 में ये यूनेस्को के आमंत्रण पर पश्चिमी यूरोप की यात्रा पर गए। 1957-58 तक पूर्वेशिया की यात्राएँ कीं। इसके बाद अनेक बार भ्रमण और अध्यापन के सिलसिले में अज्ञेय जी विदेश गए। 1961 में इन्हें केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भारतीय संकृति और साहित्य के अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। यहां से इन्होंने पूरे अमेरिका का भ्रमण किया। 1966 में इन्होंने रूमामिया, यूगोस्लाविया, मंगोलिया, रूस आदि देशों की यात्राएं कीं। 1965 में इन्हें हिन्दी के प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र “दिनमान” का संपादक नियुक्त किया गया। 1967 के बिहार के सूखा और अकाल के समय “रेणु” जी के साथ उन्होंने बिहार के विभिन्न भागों का दौरा कर “दिनमान” में जो श्रृंखलाबद्ध रिपोर्ताज पेश किया वह आज तक बेमिसाल है। “दिनमान” की उनकी संपादकीय टीम में रघुबीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे नामी साहित्यकार शामिल थे।

1972 में जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर उन्होंने एवरीमैंस नामक नए वैचारिक पत्रिका का बड़ी कुशलता से संपादन किया। यहां वे साल भर तक रहे। उन्होंने “थाट” के साहित्यिक पृष्ठों का संपादन भी किया। अंग्रेज़ी में उन्होंने वाक् नामक पत्रिका निकाली। कुछ समय तक इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के निदेशक पद पर भी कार्य किया।

1973 में उन्होंने फिर से “प्रतीक” को निकाला। इस बार इसका नाम “नया प्रतीक” था। 1977 में वे “नवभारत टाइम्स” के संपादक हुए। यहां वे दो साल तक रहे। इस प्रकार साहित्य के साथ ‘अज्ञेय’ जी ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पुरस्कार :
(१) 1964 में `आँगन के पार द्वार' पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ।

(२) 1978 में 'कितनी नावों में कितनी बार' शीर्षक काव्य ग्रंथ पर भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च पुरस्कार मिला।

मृत्यु : 4 अप्रैल 1987 को अज्ञेय जी का निधन हुआ।

:: प्रमुख रचनाएं ::

:: काव्य रचनाएँ :: भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्‌, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, सुनहरे शैवाल, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूं, और ऐसा कोई घर आपने देखा है इत्यादि उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं।

:: उपन्यास :: शेखर: एक जीवनी (दो भागों में), नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।

:: कहानी-संग्रह :: विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप आदि।

:: यात्रा वृत्तांत :: अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।

:: निबंध संग्रह :: त्रिशंकु, आत्मनेपद, हिंदी साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, सबरंग और कुछ राग, लिखि कागद कोरे, जोग लिखी, अद्यतन, आल-बाल, आदि।

:: संस्मरण :: स्मृति लेखा

:: डायरियां : भवंती, अंतरा और शाश्वती।

:: विचार गद्य :: संवत्‍सर

:: गीति-नाट्य :: उत्तर प्रियदर्शी

:: अनुवाद :: त्याग पत्र (जैनेन्द्र) और श्रीकांत (शरदचन्द्र) उपन्यासों का अंग्रेज़ी में अनुवाद।

उनका लगभग समग्र काव्य सदानीरा (दो खंड) नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध केंद्र और परिधि नामक ग्रंथ में संकलित हुए हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के साथ-साथ अज्ञेय ने तारसप्तक, दूसरा सप्तक, और तीसरा सप्तक जैसे युगांतरकारी काव्य संकलनों का भी संपादन किया तथा पुष्करिणी और रूपांबरा जैसे काव्य-संकलनों का भी। वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध-संग्रहों के भी संपादक हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका-पुरूष थे जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।

:: साहित्यिक योगदान ::

अज्ञेय एक सफल कवि, उपन्यासकार, कहानीकार और आलोचक रहे हैं। इन सभी क्षेत्रों में वे शीर्षस्थ भी थे। छायावाद और रहस्यवाद के युग के बाद हिन्दी-कविता को नई दिशा देने में अज्ञेय जी का सबसे बड़ा हाथ है। हिन्दी के अनेक नए कवियों के लिए अज्ञेय जी प्रेरणा-स्रोत और मार्ग-दर्शक रहे हैं। आपकी रचनाओं का मूल स्वर दार्शनिक और चिन्तन-प्रधान है।