बुधवार, 7 मार्च 2012

‘अज्ञेय’ जी के जन्म दिवस पर …

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

अज्ञेय

(1911-1987)

प्रस्तुति : मनोज कुमार

जन्म : ‘अज्ञेय’ जी का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसया (कुशीनगर) नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ था। अज्ञेय जी के पिता श्री हीरानन्द पुरातत्व विभाग में उच्च पदाधिकारी थे। पिताजी उस समय खुदाई शिविर में रहते थे। वहीं ‘अज्ञेय’ जी का जन्म हुआ। इनका बचपन अधिकतर पिता के साथ श्रीनगर, लाहौर, पटना, नालंदा, लखनऊ, मद्रास, उटकमंड आदि बहुत से स्थानों में बीता। फलस्वरूप इनकी शिक्षा व्यवस्थित रूप से किसी एक स्थान पर नहीं हुई।

शिक्षा : इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा विद्वान पिता की देख-रेख में घर पर ही संस्कृत, फारसी, अँग्रेज़ी और बँगला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ हुई। अज्ञेय जी ने 1925 में पंजाब से एंट्रेंस, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से विज्ञान में इंटर तथा 1929 में लाहौर के फॉरमन कॉलेज से बी एस सी की परीक्षा पास की। अंगरेज़ी विषय में एम.ए. पढाई करते समय दिल्ली षडयंत्र केस तथा अन्य अभियोग के सिलसिले में वे भूमिगत हुए पर बाद में पकड़े गए और दो वर्ष तक नज़रबंद रहे। इस तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण पढ़ाई पूरी न हो सकी। इन्होंने किसान आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया। 1930 से 1936 तक के दौरान इनका अधिकांश समय विभिन्न जेलों में कटे।

कार्यक्षेत्र : अज्ञेय जी 1936 में आगरा के साप्ताहिक`सैनिक के बगैर नाम के संपादक नियुक्त किए गए। वहां लगभग एक साल तक रहे और उसके बाद 1937 में बनारसीदास चरुर्वेदी के आग्रह पर कलकत्ता से निकलने वाले विशाल भारत के संपादन का दायित्व संभाला। इसी पत्र के माध्यम से ये सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के नाम से साहित्य-जगत में प्रतिष्ठित हुए। यहां डेढ़ साल तक रहे। 1940 में वे “आरती” नामक मासिक पत्रिका की संपादकीय टीम में शामिल हुए।

1939 में उन्होंने ‘ऑल इंडिया’ रेडियो में नौकरी कर ली। लेकिन यह काम उन्हें बहुत उबाऊ लगा और इससे छुटकारा पाकर ये 1943 से 1946 तक अपने जीवन के तीन वर्ष ब्रिटिश सेना में बिताए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इन्हें कुछ दिनों तक असम और बर्मा के मोर्चों पर भी रहना पड़ा। इसके बाद 1947 में इलाहाबाद से द्वैमासिक प्रतीक नामक पत्रिका का सम्पादन शुरु किया। बाद में इसे उन्होंने इसे मासिक कर दिया। इस पत्रिका की संपादकीय टीम में रघुबीर सहाय, सियारामशरण गुप्त, शिवमंगल सिंह सुमन और श्रीपत राय जैसे साहित्यकार शामिल थे। इसमें छप कर कई नए लेखक रातों रात प्रसिद्ध हो गए।

1955-1956 में ये यूनेस्को के आमंत्रण पर पश्चिमी यूरोप की यात्रा पर गए। 1957-58 तक पूर्वेशिया की यात्राएँ कीं। इसके बाद अनेक बार भ्रमण और अध्यापन के सिलसिले में अज्ञेय जी विदेश गए। 1961 में इन्हें केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भारतीय संकृति और साहित्य के अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। यहां से इन्होंने पूरे अमेरिका का भ्रमण किया। 1966 में इन्होंने रूमामिया, यूगोस्लाविया, मंगोलिया, रूस आदि देशों की यात्राएं कीं। 1965 में इन्हें हिन्दी के प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र “दिनमान” का संपादक नियुक्त किया गया। 1967 के बिहार के सूखा और अकाल के समय “रेणु” जी के साथ उन्होंने बिहार के विभिन्न भागों का दौरा कर “दिनमान” में जो श्रृंखलाबद्ध रिपोर्ताज पेश किया वह आज तक बेमिसाल है। “दिनमान” की उनकी संपादकीय टीम में रघुबीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे नामी साहित्यकार शामिल थे।

1972 में जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर उन्होंने एवरीमैंस नामक नए वैचारिक पत्रिका का बड़ी कुशलता से संपादन किया। यहां वे साल भर तक रहे। उन्होंने “थाट” के साहित्यिक पृष्ठों का संपादन भी किया। अंग्रेज़ी में उन्होंने वाक् नामक पत्रिका निकाली। कुछ समय तक इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के निदेशक पद पर भी कार्य किया।

1973 में उन्होंने फिर से “प्रतीक” को निकाला। इस बार इसका नाम “नया प्रतीक” था। 1977 में वे “नवभारत टाइम्स” के संपादक हुए। यहां वे दो साल तक रहे। इस प्रकार साहित्य के साथ ‘अज्ञेय’ जी ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पुरस्कार :
(१) 1964 में `आँगन के पार द्वार' पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ।

(२) 1978 में 'कितनी नावों में कितनी बार' शीर्षक काव्य ग्रंथ पर भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च पुरस्कार मिला।

मृत्यु : 4 अप्रैल 1987 को अज्ञेय जी का निधन हुआ।

:: प्रमुख रचनाएं ::

:: काव्य रचनाएँ :: भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्‌, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, सुनहरे शैवाल, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूं, और ऐसा कोई घर आपने देखा है इत्यादि उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं।

:: उपन्यास :: शेखर: एक जीवनी (दो भागों में), नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।

:: कहानी-संग्रह :: विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप आदि।

:: यात्रा वृत्तांत :: अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।

:: निबंध संग्रह :: त्रिशंकु, आत्मनेपद, हिंदी साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, सबरंग और कुछ राग, लिखि कागद कोरे, जोग लिखी, अद्यतन, आल-बाल, आदि।

:: संस्मरण :: स्मृति लेखा

:: डायरियां : भवंती, अंतरा और शाश्वती।

:: विचार गद्य :: संवत्‍सर

:: गीति-नाट्य :: उत्तर प्रियदर्शी

:: अनुवाद :: त्याग पत्र (जैनेन्द्र) और श्रीकांत (शरदचन्द्र) उपन्यासों का अंग्रेज़ी में अनुवाद।

उनका लगभग समग्र काव्य सदानीरा (दो खंड) नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध केंद्र और परिधि नामक ग्रंथ में संकलित हुए हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के साथ-साथ अज्ञेय ने तारसप्तक, दूसरा सप्तक, और तीसरा सप्तक जैसे युगांतरकारी काव्य संकलनों का भी संपादन किया तथा पुष्करिणी और रूपांबरा जैसे काव्य-संकलनों का भी। वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध-संग्रहों के भी संपादक हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका-पुरूष थे जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।

:: साहित्यिक योगदान ::

अज्ञेय एक सफल कवि, उपन्यासकार, कहानीकार और आलोचक रहे हैं। इन सभी क्षेत्रों में वे शीर्षस्थ भी थे। छायावाद और रहस्यवाद के युग के बाद हिन्दी-कविता को नई दिशा देने में अज्ञेय जी का सबसे बड़ा हाथ है। हिन्दी के अनेक नए कवियों के लिए अज्ञेय जी प्रेरणा-स्रोत और मार्ग-दर्शक रहे हैं। आपकी रचनाओं का मूल स्वर दार्शनिक और चिन्तन-प्रधान है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आज ऐसे विरले साहित्यकार बहुत कम मिलते हैं ..
    अज्ञेय जी के सम्पूर्ण रचनालोक की बहुत बढ़िया ढंग से प्रस्तुति हेतु आभार ..

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  2. अज्ञेय जी को नमन ॥सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार

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  3. हिंदी कहानी और रचना को नया आयाम देने वाले नयी दिशा देने वाले अज्ञेय जी को नमन ...

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  4. प्रशंसनीय सार्थक प्रयास .आभार मनोज जी ..
    अज्ञेय जी को नमन ..

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  5. अज्ञेय जी के जन्मदिन पर उनकी स्मृति को नमन !

    आभार एवं होली की शुभकामनाएँ !

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  6. अज्ञेय जी के जन्मदिवस पर आज ही एक गोष्ठी सम्पन्न हुई है!
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सपरिवार होली की मंगलकामनाएँ!

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  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति| होली की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  8. अज्ञेय पर इस विस्तृत जानकारी के लिए आपका आभार!!! अज्ञेय ने केवल तीन उपन्यास लिख कर मनुष्य मन की अथाह गहराई में डूबकियां लगाई हैं।

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  9. अज्ञेय के जीवन और कार्यक्षेत्र पर विस्तृत प्रकाश डालता आलेख.

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  10. विनम्र नमन ....उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय करवाता सार्थक आलेख.....

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